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श्लीलता और अश्लीलता के बीच

आज जब उसे उगते सूरज को देखने का मौका मिला तो वह रोमांचित हो गया।
वह मनोहारी सुबह को मुग्ध होकर देख रहा था कि उसके पास अनु भी आ गई। 


अंधेरे कोने
भाग नौ

श्लीलता और अश्लीलता के बीच

ठंड के एहसास से अमर की नींद खुल गई। उठकर बालकनी पर आया गया। उजाले ने अंधेरे को परास्त कर दिया था लेकिन क्षितिज में भाष्कर ने अभी अपनी उपस्थति दर्ज नहीं कराई थी। गली के पेड़ों पर चिड़ियां चहचहा रही थीं। आसमान में बादल के टुकडे़ इधर-उधर भाग रहे थे।
अमर ने ऐसी सुबह बहुत दिनों बाद देखी थी। पत्रकारिता की नौकरी ऐसी है कि इसमें रात को जागना पड़ता है और दिन में सोना पड़ता है। कभी-कभी तो मोहल्ले वाले शक करने लगते हैं कि यह आदमी करता क्या है? शाम को जाता है और सुबह तीन बजे आता है। ड्यूटी का यह टाइम किसी की समझ में न आता लेकिन अखबार का काम तो शाम से ही आरंभ होता है। खासकरके उनका जो डेस्क पर काम करते हैं। रिपोर्टर फिर भी रात दस बजे तक निपट जाते हैं लेकिन डेस्क वाले तो शुरू ही तब होते हैं जब संवाददाताओं का काम खत्म होता है। संवाददाताओं की खबरों को संपादित करना और उनका सही जगह प्लेसमेंट करने के बाद अखबार को छपने लायक बनाना ही तो डेस्क वालों का काम होता है। इसी डेस्क पर अमर भी काम करता है। इस कारण उसे बहुत सालों से उगते सूर्य के दर्शन नहीं हुए। बचपन में जरूर कई बार सूर्याेदय को देखा है। आज जब उसे उगते सूरज को देखने का मौका मिला तो वह रोमांचित हो गया।
वह मनोहारी सुबह को मुग्ध होकर देख रहा था कि उसके पास अनु भी आ गई। अमर के उठते ही उसने भी बिस्तर छोड़ दिया।
दोनों बड़ी देर तक चुपचाप खड़े रहे। फिर अनु ने कहा कि चलो लॉन में टहलते हैं। अमर ने सहमति दी और दोनों लॉन में आकर टहलने लगे।
अमर और अनु को उठा देखकर रमाकिशुन भी उठ गये और लॉन में आकर बैठ गये।
रामकिशुन परेशान थे। गांव से बेटी का फोन आया था कि बैंक से नोटिस आया है। चार किस्तें रुक गई हैं। फोन सुनने के बाद से ही रामकिशुन सो नहीं पाए।
कितने आराम से जिंदगी गुजर रही थी। वह बैंक से कर्ज के चक्कर में पड़ते ही नहीं लेकिन बेटे को इंजीनियर बनाने के चक्कर मंे कर्जदार हो गये। बेटा तो इंजीनियर बन नहीं पाया। इस पढ़ाई ने बेटे को और छीन लिया।
रामकिशुन का बेटा अजय बारहवीं के बाद बीटेक करने के लिए बैंक से शिक्षा ऋण लिया था। रामकिशुन की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह बेटे को इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए खर्च उठा सकते। बाप-बेटों ने अपने सपनों को साकार करने के लिए बैंक का सहारा लिया। बहुत पापड़ बेलने पर बैंक ने किसी तरह तो कर्ज दिया।
सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन एक दिन अजय के कालेज से खबर आई कि अजय के साथ कुछ लोगों ने रैगिंग की है। उसे सताया और मारा-पीटा है और टार्चर किया है जिससे उसकी हालत गंभीर है। रामकिशुन कालेज पहुंचे तो वहां उन्हें बेटे की लाश मिली। रैगिंग के राक्षस ने एक मासूम को लील लिया था और बूढ़े-बाप के सहारे और सपने को अपने खूनी पंजों तले कुचल दिया था। इस असहाय वेदना को रामकिशुन सह नहीं पाए। वह बेटे की लाश देखते ही बेहोश होकर गिर पड़े। पुलिस वालों ने उन्हें आस्पताल में भर्ती कराया। डाक्टरों ने कहा कि उन्हें गहरा सदमा लगा है। करीब चार घंटे बाद उन्हें होश आया था। उसके बाद बेटे की लाश गांव लाकर दाह संस्कार किए थे।
बेटा चला गया। उन्हें कर्जदार बना गया। अजय की मौत के बाद मीडिया में बड़ा हंगामा हुआ तो पुलिस ने कार्रवाई करते हुए पांच लड़कों को गिरफ्तार किया था। उन्होंने शराब के नशे में ऐसी घिनौनी हरकत की थी जिसकी जो भी सजा दी जाए कम होगी। कालेज के प्रिंसिपल को सरकार ने हटा दिया था। मुआवजे के तौर पर एक लाख रुपये देने की घोषण की थी। जो अभी तक नहीं मिली थी। रामकिशुन ने सोचा था कि मुआवजा मिल जाएगा तो बैंक का लोन चुकता कर देंगे लेकिन इस मामले में कोई प्रगति नहीं हो रही थी।
उधर, उनकी बेटी पूजा भी ग्रेजुएशन कर रही थी। उसकी शादी की भी चिंता रामकिशनु को होने लगी थी। खेती से इतनी आय नहीं थी कि सारा खर्च वह उठा पाते। उन्होंने तय किया कि वह शहर जाकर कोई काम करेंगे और मां-बेटी मिलकर खेती संभाल लेंगी तो एक दो साल में बेटी का हाथ पीला कर देंगे। उसके बाद उनका पति-पत्नी का क्या होगा देखा जाएगा।
गांव के एक आदमी के सहारे वह दिल्ली आ गये थे। काम करने लायक न तो उम्र थी न ही कोई विशेष योग्यता। कुछ दिन तक लेबर चौराहे पर खड़े होते रहे। यहां लोग आते और काम कराने के लिए ले जाते। इस तरह तीन-चार माह तक किसी तरह से काम चलता रहा। इसके बाद किसी परिचित के माध्यम से वह विक्रम के यहां पहुंच गये थे। वहां रहने-खाने के साथ काम भी मिला था तो उन्होंने राहत की सांस ली। खा पीकर दो हजार बचा जाते थे तो उसे घर भेज देते। लेकिन अनु के साथ वह भी चले आये थे विक्रम के यहां से। तब से वह यहीं पर थे। अपना दुखड़ा वह अनु को सुना चुके थे। चूंकि रामकिशुन ने अनु को विक्रम के यहां से भागने मंे मदद की थी इसलिए वह रामकिशुन को मानती थी। उसने आश्वासन दिया था कि वह लोन चुकता कर देगी और उनकी बेटी की भी शादी करा देगी। इससे रामकिशुन को राहत तो मिली थी लेकिन वह आशंकित रहते। उनका मानना था कि पैसे वालों का कोई भरोसा नहीं। यह अपनी बात से कब मुकर जाएं कहा नहीं जा सकता। वह गलत भी नहीं थे। आश्वासन के बावजूद अनु ने अभी तक मदद नहीं की थी।
- अरे अंकल आप इतनी सुबह उठ जाते हैं? उनके पास आने पर अनु ने कहा।
- हां, बेटा। मेरी तो भोर में ही उठने की आदत है। यहां क्या गांव में भी उठ जाता था।
- आप कुछ परेशान लग रहे हैं? इस बार अमर ने सवाल किया। बेचैनी और फिक्र रामकिशुन के चेहरे पर साफ देखी जा सकता थी।
- क्या पेरशानी है अंकल? अनु सावधान हो गई।
- बेटी का फोन अया था। बैंक से नोटिस आया है।
- ओ माई गॉड। क्या अंकल? आपने फिर से जिक्र भी नहीं किया। मैं तो भूल ही गई। आज ही आप बैंक का एकाउंट नंबर मुझे दे देना। मैं उसमें पैसा जमा करवा दूंगी। आप चिंता न करें। आप मुझे अपनी बेटी समझ कर कोई भी परेशानी बेझिझक कह सकते हैं। अनु ने जल्दी-जल्दी कहा। वह इस संबंध में अमर के सामने और बात नहीं करना चाहती थी।
अमर कुछ समझ नहीं पाया। वह दोनों का मुंह ही ताकता रहा। फिर टहलते हुए अनु ने रामकिशुन की पूरी व्यथा-कथा विस्तार से बताई। उसे सुनने के बाद अमर ने कहा।
- हम एक अजब से समाज और व्यवस्था में रह रहे हैं। कहने को कहा जाता है कि यहां सभी को समान अवसर है। कोई भी उसका लाभ उठा सकता है लेकिन समान अवसर के लिए सामाजिक-आर्थिक समानता भी तो चाहिए। किसी भी खेल का नियम होता है बराबरी। समान वजन वाले पहलवान ही कुश्ती लड़ते हैं। लेकिन इस व्यवस्था में तो अपंग को स्वस्थ आदमी से लड़या जा रहा है। अमीर-गरीब में क्या समानता? फिर समान अवसर का क्या तुक? हमारी शिक्षा नीति ऐसी हो गई है कि लोगों को मजदूर बनाया जा रहा है। कुशल श्रमिक ताकि वह अमीर देशों की कंपनियों की गुलामी कर सकें। चूंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कुशल श्रमिक चाहिए इसलिए हमारे यहां थोक में श्रमिकों का उत्पादन किया जा रहा है। इस उत्पादन में भी लोग कमाई कर रहे हैं। सरकार ने तो स्कूल-कालेज चलाने से तौबा कर लिया है। अब यह काम धनपति कर रहे हैं। जो मनमानी फीस वसूल रहे हैं। सरकार उनकी मदद करने के लिए सारे नियम कायदे तोड़ दिये हैं। कई मामलों में तो आंखें ही मूंद रखी है। इन निजी स्कूल-कालेजों में शिक्षा की कोई गुणवत्ता नहीं है लेकिन फीस आसमान पर है। आम आदमी की संतानें निजी स्कूल-कालेजों में नहीं पढ़ सकतीं।
इसके लिए भी उपाय निकाला गया। एजुकेशन लोन यानी व्यक्ति को कमाने से पहले ही चार-पांच लाख का कर्जदार बना दिया जाता है। कर्ज की सीमा कोर्स के अनुसार कम या ज्यादा हो सकती है। उसे नौकरी मिलती है तो कई सालों तक तो वह बैंक का कर्ज ही चुकाता है। देखा जाए तो इस तरह भी कुछ धनपति मुनाफा कूट रहे हैं। कालेज वाले मालामाल। बैंक की तिजोरी फुल। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सस्ता श्रम। उनका भी मुनाफा बढ़ता है। बेशर्मी तो तब हो जाती है जब खबर छपती है कि देश में अरबपतियों और करोड़पतियों की संख्या में इजाफा हो रहा है। कभी यह नहीं छपती कि कितने करोड़ लोग गरीबी के दलदल में फंसे जिंदगी की भीख मांग रहे हैं। ऐसे करोंड़ों लोग किसी को दिखाई नहीं पड़ते।
ये अश्लीलता किसी को नहीं दिखती। एक लड़का-लड़की सड़क पर किस क्या कर लेते हैं तूफान आ जाता है। जो गरीबी के मारे जान देते हैं। पूरा का पूरा परिवार खत्म कर लेते हैं। उनका मीडिया में कोई जिक्र तक नहीं होता। हीरोइनों के कपड़ों के साइज नापते रहते हैं। उनका किससे चक्कर है इसके लिए उनका शरीर ही नहीं कपड़े तक सूंघते रहते हैं। सभी अखबार बेकार की खबरों से भरे रहते हैं। टीवी चैनलों की खबरें देखकर सिर दर्द करने लगता है।
अमर ने लॉन में पड़े एक गत्ते को पैर से जोर से मारा लेकिन वह थोड़ी ही दूर जाकर गिर गया...।
- अमर प्लीज कूल यार... तुम इतना क्या-क्या सोच लेते हो? मैं तो तुम्हारी बातें सुनकर ही परेशान हो जाती हूं।
- अभी तो मेरी बातांे से परेशान हो जाती हो। कल को मुझसे भी परेशान हो जाओगी।
- बात को घुमाओ मत यार। सुबह-सुबह मूड मत खराब करो प्लीज ..।
- ठीक है। अखबार आ गया है चल कर अपने कारनामे को देखें?
दोनों ने लगभग सभी अखबारों का पहला पेज देख डाला। कम ज्यादा सभी ने उस खबर को पहले पेज पर फोटो साहित कवरेज दिया था। कई अखबारों ने फोटो को बड़ा तो कई ने छोटा छापा था। लगभग सभी ने विशेष बाक्स में खबर को छापा था। सभी अखबारों ने अपनी तरफ से आकर्षक शीर्षक लगाने का प्रयास किया था।
अमर और अनु अखबार देख ही रहे थे कि वहीं रमेश और कविता भी आ गये। उन्होंने भी अखबारों को देखा।
- अमर तुम्हें नहीं लगता कि कवरेज में जरूरत से ज्यादा सादगी बरती गई है? फोटो छोटा कर दिया गया है? खबर को भी चंद शब्दों में लिखा गया? यानी मीडिया इस मामले को तूल नहीं देना चाहता?
- मीडिया बहुत चालाक है। वह अपना हित किसमें है यह अच्छी तरह जानता है। इलेक्ट्रानिक मीडिया की इस खबर से ही टीआरपी बढ़नी थी इसलिए वह खेल गया लेकिन प्यार-मौसम-डाक्टरी-साइंस और साहित्य के आवरण में उसने भी अपने कार्यक्रम में वैसी अश्लीलता नहीं आने दी कि उसका ‘विज्ञापनदाता’ नाराज हो जाए। रही बात प्रिंट मीडिया की तो उसे इस खबर के छापने न छापने से कोई फर्क नहीं पड़ता। एक दिन एक खबर से वह अपनी प्रसार संख्या में कोई फर्क नहीं ला सकता। हां, उसकी विश्वासनीयता और गुणवत्ता पर जरूर फर्क पड़ता है। सबसे अधिक फर्क उसके विज्ञापन पर पड़ता है। उसे एक बार पता चल जाए कि इस खबर से उसका विज्ञापनदाता नाराज हो जाएगा फिर तो वह उस खबर को रद्दी की टोकरी में ही फेंक देता है।
- फिर भी मैं जो चाहता था वह तो हो ही गया।
- हां, किसी हद तक।
- क्या प्रेस कांफ्रेंस करके सफाई देनी चाहिए?
- मुझे नहीं लगता कि इसकी कोई जरूरत है। अमर ने कहा।
- लेकिन ऐसे तो मामला ठंडा पड़ जाएगा। इसका असर तुम लोगों के सीरियल पर पड़ेगा। हमारी भलाई इसी में है कि हम इसे अपनी तरफ से तूल दें। इसलिए प्रेस कांफ्रेंस करना जरूरी है। इस बहाने मीडिया में एक दिन और कवरेज मिल जाएगी।
- जैसा आप उचित समझें। अमर ने कहा। वह परेशान था कि उसका तो इतने से ही जीना हराम हो जाएगा। लेकिन एक बात तो वह भी जानता था कि मीडिया के माध्यम से ही लोगों को यह मालूम पड़ जाए कि यह किसी सीरियल का दृश्य है न कि उनकी निजी जिंदगी का। इससे काफी हद तक राहत मिल जाएगी।
रमेश के मैनेजर ने सभी मीडिया वालों को बता दिया था कि किसिंग सीन पर उनके हीरो-हीरोइन बारह बजे मीडिया से रू-ब-रू होंगे। यह सूचना मिलते ही मीडिया एक्साइटेड हो गया था। लगभग सभी चैनलों ने इस प्रेस कान्फ्रेंस को लाइव दिखाने का प्रोग्राम बना डाला था। कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता था। उन्हें लगा कि बिना मेहनत के ही एक खबर उनके हाथ लग गई है जिस पर वह दो चार घंटे खेल सकते हैं। सभी ने अपने-अपने तरीके से तैयारी भी शुरू कर दी थी। अमर और अनु की पूरी प्रोफाइल और अब तक की जिंदगी के खास पहलुओं को खोजा जा रहा था। एक नहीं कई-कई पत्रकारों को इसमंे लगा दिया गया था।
निर्धारित समय पर अमर और अनु प्रेस कान्फ्रेंस स्थल पर पहुंचे थे। अब तक कान्फें्रस हॉल पत्रकारों से भर गया था। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कैमरों और माइकों से ऐसा लग रहा था, जैसे किसी बड़ी हस्ती की पत्रकार वार्ता होने जा रही है। टीवी चैनलों ने इनकी इंट्री से ही लाइव दिखाना शुरू कर दिया था। लहराती रेश्मी जुल्फों को हाथ से पीछे करने की अनु की अदा को कैमरों ने सबसे पहले कैच किया। कैमरों के फोकस में अनु ही थी। अमर को तो सिक्के के दूसरे पहलू की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था ...।
पत्रकारों को संबोधित करते हुए अनु ने कहा कि दरअसल हमने आप लोगों को यह बाताने के लिए बुलाया है कि कल जो किसिंग सीन आप लोगों ने दिखाया और छापा है। वह एक सीरियल का सीन है। हमारी निजी जिंदगी से उसका कोई लेना-देना नहीं है। चूंकि उसे इस तरह से दिखाया गया और समाज में गलतफहमी फैल गई, जिसकी वजह से हमें काफी परेशानी उठानी पड़ रही है। इसलिए हमने यह बताना उचित समझा। उम्मीद करती हूं कि आप लोग हमें कॉपरेट करेंगे।
- यह जानकारी तो आप कल भी दे सकती थीं। किसी पत्रकार ने सवाल किया।
- कल हम सकते में थे। हमारी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें? जवाब अमर ने दिया। उसने आगे कहा कि वैसे भी पत्रकारों का भी यह कर्त्तव्य बनता है कि जो खबर वह लिख रहे हैं, दिखा रहे हैं, उसकी पूरी सचाई जान लें। तथ्यों को जांच लें।
- आप तो पत्रकार हैं। अच्छी तरह जानते होंगे कि ऐसे मामलों को कैसे तूल दिया जाता है।
- इसीलिए तो आज आप सबके सामने हैं। हमें लगा कि समाज को सच पता चलना चाहिए। आप लोग तो सच तक जाना नहीं चाहेंगे। क्या यह विडंबना नहीं हैं कि आजकल पत्रकार तथ्यों को अपनी सुविधानुसार न केवल तोड़ते-मरोड़ते हैं बल्कि बदल भी देते हैं। पुलिस फर्जी एनकांउटर करती है। पत्रकार भाई वही लिखते हैं, वही देखते हैं जो पुलिस कहती है। क्या यही है पत्रकारिता? आप कुछ नहीं देखते? आपके मन में कोई सवाल क्यों नहीं उठता? आप पुलिस से कोई सवाल क्यों नहीं करते? पहले पुलिस के बयान के आधार पर खबर छापते-दिखाते हैं और जब मामले कि जांच होती है। मामला कुछ और निकलता है तो पुलिस को कोसते हैं? अपनी गलती आप लोगों को दिखाई नहीं देती। हमारे मामले में भी ऐसा हुआ है। खबर को सनसनी बनाकर प्रस्तुत किया गया। सच क्या है जानने की जहमत आप में से किसी नहीं उठाई।
- यदि यह सीरियल की शूटिंग थी तो पुलिस से अनुमति क्यों नहीं ली?
- क्योंकि बारिश पुलिस से पूछकर नहीं हुई। जब तक हम कानूनी प्रक्रिया पूरी करते बारिश बंद हो जाती।
- तो आप कानून हाथ में लेंगे?
- किसी का कत्ल कर दिया क्या?
- सार्वजनिक स्थान पर अश्लीलता फैलाई आपने।
- ओ, अश्लीलता! क्या शब्द खोजा है आपने। कभी अपने गिरेबान में झांक कर देखा है? अमर ने कहा।
- कल से आप लोग जो दिखा रहे हैं वह क्या है? उसकी क्या परिभाषा है? अनु ने पूछा?
- तो क्या इसे प्रचार का तरीका माना जाए ? किसी पत्रकार ने सवाल उछाल दिया।
- हमने तो ऐसा नहीं सोचा था। अमर ने जवाब दिया।
- मान लिया कि यह सीरियल का दृश्य है तो क्या इसे दिखाना उचित है? क्या इससे हमारे समाज पर बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा? ऐसा सीन दिखाकर आप समाज को क्या मैसेज देना चाहते हैं? एक पत्रकार ने सवाल किया।
- आपका सवाल सही है लेकिन यह कहानी की मांग है। उसके अनुकूल इसका फिल्मांकन किया गया है। सीरियल में यह दृश्य पूरी कहानी और उसके परिवेश के साथ दिखाया जाएगा। दर्शकों को चरित्रों के बारे में मालूम होगा। लेकिन मैं आप सब से पूछता हूं कि आप लोगों ने जिस तरह से इस सीन को दिखाया या छापा है क्या वह उचित है? आप लोग समाज को क्या मैसेज देना चाहते हैं?
- हम पत्रकार हैं। प्रत्येक खबर को लिखना-दिखाना और छापना हमारा काम है और कर्तव्य भी।
- सही कहा आपने लेकिन क्या आप उस खबर को भी दिखाना-छापना चाहते हैं जो समाज के लिए ठीक नहीं है? जिसे आप अश्लील मानते हैं? अमर ने फिर सवाल किया।
- एक जवान लड़की और लड़का बारिश में खुलेआम सड़क पर इस तरह की हरकत करेंगे तो उसे दिखाना, छापना तो पड़ेगा ही। यह बताने के लिए कि देखो हमारे समाज में क्या हो रहा है?
- बिल्कुल सही बात है लेकिन खबर का पूरा तथ्य जुटाना भी तो आपकी जिम्मेदारी है। आप लोगों ने खबर को दिखाया लेकिन हमारा वर्जन लेना जरूरी नहीं समझा। यह भी नहीं समझा कि इस तरह से खबर दिखाने या छापने से हमारी जिंदगी तबाह हो सकती है। आप लोगों को लगा कि यह लीक से हटकर हरकत हुई है तो खबर बना दी लेकिन यह नहीं सोचा कि इससे दो जिंदगी बर्बाद भी हो सकती है। कल को और लोग भी इस तरह की हरकत करने लगेंगे। आखिर यह सोचना भी तो आप लोगों की जिम्मेदारी है। अनु ने कहा।
- मैडम, मैंने तो आपसे कल ही पूछा था। जब आप लोग यह हरकत सॉरी सीन शूट करके खत्म किये थे। तब आपने कहा था कि खुद ही करके देख लो और कार में बैठकर चली गईं थीं। एक महिला पत्रकार ने अनु से सवाल किया। यह वही पत्रकार थी जिसने इनकी हरकत को शूट किया था और अपने चैनल पर न दिखाये जाने के बाद सभी चैनलों को क्लीपिंग बांट दी थी।
- हम अचानक मीडिया के आ जाने से खबरा गये थे। वैसे भी हम इस विषय पर मीडिया से बात नहीं करना चाहते थे। हमें नहीं मालूम था कि आपने सीन शूट किया है और इस तरह तिल का ताड़ बना देंगी।
- चलिए, मान लेते हैं कि मीडिया ने तिल का ताड़ बना दिया लेकिन क्या आपके सीरियल को लोग परिवार के साथ बैठकर देख सकेंगे?
- क्यों नहीं? जब आपका न्यूज चैनल देख सकते हैं? आप लोगों का अखबार पढ़ सकते हैं तो सीरियल क्यों नहीं देख सकते? जवाब अमर ने दिया। आप लोग हमें माफ करेंगे। प्रसंग आ गया इसलिए कहना पड़ रहा है। मेरे पास आज के सभी अखबार हैं। लगभग सभी अखबारों में ऐसी तस्वीरें छपी हैं। जो हमारे इस सीन से ज्यादा अश्लील हैं। देसी-विदेशी हीरोइनों की बिकनी-ब्रा और पेंटी में आप लोग तस्वीरें छापते हैं हर रोज। यही अखबार घरों में जाता है। लोग पढ़ते हैं। तब आप लोग यह सवाल खुद से क्यों नहीं करते? रही बात चैनलों की तो वहां टीआरपी के लिए सेक्स और सेक्सी हीरो-हिरोइनों को किस तरह से दिखाया जाता है इसके लिए किसी प्रामण की जरूरत नहीं है। जिस खबर में भी सेक्स का एंगल होता है मीडिया टूट पड़ता है। कहीं से ब्लू सीडी की क्लीपिंग मिली नहीं कि खेल शुरू। इसके बाद भी क्या आप लोग यह नैतिकता रखते हैं कि हमसे नैतिकता का सवाल करें?
हकीकत तो यह है कि हमारे देश में जो अपसंस्कृति की बाढ़ आई है उसके लिए मीडिया ही जिम्मेदार है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए ऊल-जुलूल से लेकर सेक्स तक खबरें प्रसारित कर रहा है। और प्रिंट मीडिया भी इसमें पीछे न नहीं है। सामाजिक सरोकार और नैतिक मूल्य कहां रह गया है मीडिया में? आप लोगों की हरकतों की वजह से ही सरकार मीडिया पर नियंत्रण की सोच रही है।
 अमर बोल रहा था तो इसी बीच चैनलों ने इस कार्यक्रम को लाइव लिखाना बंद कर दिया।
- देखा, हमने आप पर उंगली उठाई तो आपने इस कार्यक्रम को लाइव दिखाना ही बंद कर दिया। अरे भाई अपनी बात भी तो जनता के सामने आने दो। इसी लोकसभा चुनाव में पैसे लेकर आप लोगों ने प्रत्याशियांे की खबरें छापीं। जिसने दिया उसके पक्ष में लिखे जिसने नहीं दिया उसके खिलाफ। क्या यही है आपकी नैतिकता? यही है देश के प्रति सरोकार? समाज के प्रति प्रतिबद्धता? मुझे मालूम है कि मेरी बातें आप लोगों को अच्छी नहीं लग रही होंगी। लगनी भी नहीं चाहिए। लेकिन सोचना जरूर कि आज जो मीडिया का पतन हो रहा है, वह उसे कहां ले जाएगा? आप हमारी हरकतों को दोष दे सकते हैं लेकिन अपने कारनामों को भी देखिए। समाज में अश्लीलता के लिए कौन दोषी है? फिल्म वाले, मीडिया या दोनों? अर्धनंगी हीरोइनों की तस्वीरें छापने और दिखाने की क्या जरूरत है आप लोगों को? चूंकि आप लोग ऐसी हरकत करते हैं तो उनका भी मनोबल बढ़ता है। वह मिनी स्कर्ट से पैंटी-ब्रा पर आ जाती हैं। ब्रा भी ऐसी जिसमें से पूरा स्तन दिखता है। फिर तो आप कहते हैं कि क्या हॉट माल है। क्या हॉट हीरोइन है। बाद में यही गर्मी आपके समाज में भी फैल जाती है। कभी सोचा है आप लोगों ने? कुछ और सवाल जवाब के बाद पत्रकार वार्ता खत्म हो गई।
- ओमप्रकाश तिवारी

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