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भैया का भाइंग


जब सीरियल का काम पटरी पर आ गया और उसने लोकप्रियता के नए आयाम तय करने शुरू किए तो अमर नेहा और बच्चों से मिलने के लिए व्यग्र हो गया। हालांकि उसकी शारीरिक जरूरत पूरी हो रही थी लेकिन उसे नेहा की चिंता लगी रही। दिन में लगभग दो-तीन बार वह नेहा से बात करता। उसकी व्यस्तता को देखते हुए नेहा भी चुप थी लेकिन आशंकित भी थी।
अंधेरे कोने
 भाग दस

भैया का भाइंग
रमेश ने जैसा सोचा था वैसा ही हुआ। मनोरंजन चैनलों ने सीरियल की डिमांड शुरू हो गई। प्रायोजक भी इतने मिल गए कि कइयों को इनकार करना पड़ गया। अनु को फिल्म प्रोडेक्शन कंपनी मंे काम करने का फायदा हुआ। अमर की घटना से एक सप्ताह बाद ही उसने प्रोडेक्शन कंपनी से इस्तीफा देकर अपनी कंपनी बना ली थी। स्क्रिप्ट अमर की तैयार थी ही। बस उसमें किसिंग सीन को जोड़ना था।
चैनल से लेकर कलाकार और डायरेक्टर तक सभी एक माह में फाइनल कर लिए गये। कलाकर चयन मंे थियटर से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दी गई। चूंकि किसिंग सीन के कारण अमर-अनु चर्चित हो गये थे इसलिए इन्हें मुख्य भूमिका निभानी थी।
करीब डेढ़ माह की अथक मेहनत के बाद सीरियल प्रसारण के लिए तैयार हो गया। इस कार्य में जो भी पैसा लगा उसे रमेश ने दिया। सीरियल को लेकर उन्होंने मीडिया में बड़े-बड़े विज्ञापन दिये। बड़े धूम-धाम से सीरियल लांच किया गया। हालांकि सीरियल की शूटिंग दिल्ली में ही की गई लेकिन कई दृश्यों के फिल्मांकन के लिए इन्हें मुंबई भी जाना पड़ा।
जब सीरियल का काम पटरी पर आ गया और उसने लोकप्रियता के नए आयाम तय करने शुरू किए तो अमर नेहा और बच्चों से मिलने के लिए व्यग्र हो गया। हालांकि उसकी शारीरिक जरूरत पूरी हो रही थी लेकिन उसे नेहा की चिंता लगी रही। दिन में लगभग दो-तीन बार वह नेहा से बात करता। उसकी व्यस्तता को देखते हुए नेहा भी चुप थी लेकिन आशंकित भी थी।
जिस दिन अमर नेहा से मिलने के लिए घर जाने लगा अनु उदास हो गई। उसने साथ चलने का प्रस्ताव रखा तो अमर ने इनकार कर दिया। वह जानता था कि अनु के जाने से बात का बतंगड़ बन जाएगा। इसलिए उसने अनु को साफ मना कर दिया। इससे अनु नाराज होकर अपने कमरे में चली गई। उसने अमर पर ओराप लगाया कि उसे उसकी कोई परवाह नहीं है। वह उसके पास होकर भी नहीं होता है। अधिकतर समय या तो स्क्रिप्ट लिखने में व्यस्त रहता है या फिर बीवी-बच्चों से बातें करने में। उसे पर्याप्त समय नहीं देता।
किसी हद तक उस पर यह आरोप सही था। अमर की व्यस्तता बढ़ गई थी। उसे दो सीरियल के लिए स्क्रिप्ट लिखने का काम मिल गया था। एक सीरियल में अभिनय कर ही रहा था। अभिनय के बाद के समय में वह स्क्रिप्ट लेखन का काम करता। यह काम वह अनु के घर अपने कमरे में करता। इस बीच कई बार अनु उसके कमरे में आती लेकिन वह व्यस्त रहता। अनु को उसकी व्यस्तता अखरती। वह चाहती थी कि उसके कमरे में आने पर अमर चाहे बात कर रहा हो या काम, सब बंद कर दे। लेकिन अमर अपने काम को तब्वजो देता। कई बार अनु को जबरन उसका काम बंद कराना पड़ता।
तैयार होने के बाद अमर अनु के कमरे में गया। उस समय अनु लैपटाप पर कुछ कर रही थी। उसने अमर की उपस्थिति का नोटिस ही नहीं लिया।
- अनु मैं जा रहा हूं।
- जाने वाले को कौन रोक सकता है?
- देखो तुम ऐसा व्यवहार करोगी तो मैं जा नहीं पाउंगा।
- तो मत जाओ न।
- यार बच्चों की याद आ रही है।
- बच्चों की या...।
- तुम समझ सकती हो।
- लेकिन मुझे कौन समझेगा?
- तुम तो मेरे दिल में हो।
- मुझे दिल में नहीं तुम्हारे पास रहना है।
- एक ही हफ्ते की तो बात है। तब तक दिल में रह लो।
- मुझसे नहीं रहा जाएगा।
- इतना प्यार करती हो मुझसे? कहते हुए अमर ने अनु को बाहों में भर लिया। अमर जानता था कि अनु को मनाने का यही सबसे बेस्ट तरीका है। उसने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया।
बाहर मौसम खुशनुमा हो गया था। आसमान में बादल घिर आये थे। ठंडी हवा बह रही थी। जो कमरे की खिड़कियों से अंदर आ रही थी। बादलों की गड़गड़ाहट के साथ आसमान में बिजली चमकी और जोरदार बारिश होने लगी...।
- देखा, मौसम भी नहीं चाहता कि हम जुदा हों। अनु ने अमर को बाहों में लपेटते हुए कहा। अमर खिड़की से बरसात को देख रहा था। इनका शारीरिक तूफान खत्म हो चुका था लेकिन तन-मन था कि बारिश में भीगना चाह रहा था। दोनांे ने फटाफट कपड़ा पहना और भीगने के लिए लॉन में आ गये।
- ऐसे मौसम में जुदाई, न बाबा न। अनु ने अपने भीगे केश को समेटते हुए कहा। अमर ने गौर किया कि वह बिना ब्रा के ही शर्ट पहन कर आ गई थी। शर्ट के भीगने से उसके वक्ष साफ नजर आ रहे थे। अमर के शरीर में एक सिहरन सी उठी।
बारिश काफी देर तक हुई। वे दोनों काफी समय तक भीगते रहे लेकिन जब ठंड  लगने लगी तो अंदर आ गये।
बारिश रुकी भी नहीं थी कि अमर जाने के लिए तैयार हो गया। इस बार अनु ने उसका विरोध नहीं किया। वह उसे अपनी कार से स्टेशन तक छोड़ने आई। जाते समय अमर ने अनु को अपना एकाउंट नंबर देते हुए कहा कि इसमें कुछ पैसे जमा कर देना। मुझे जरूरत पड़ेगी। इस पर हंस कर अनु ने सॉरी कहा और सफाई दी कि उसे तो ध्यान ही नहीं रहा। हालांकि इस बीच अमर को दो स्क्रिप्ट लिखने के लिए कुछ पैसे एडवांस में मिल गये थे। इसलिए उसका काम चल रहा था। चूंकि वह घर जा रहा था और अभी तक अनु की तरफ से उसे कुछ मिला नहीं था तो उसने यह मांग रख दी। वह इस बहाने अनु को यह एहसास दिलाना चहता था कि उसकी भी भौतिक जरूरतें हैं और वह भी उसकी कंपनी में काम कर रहा है। जैसे सभी कर्मचारियों और कलाकारों को वह मानदेय दे रही है उसे भी दे।
अमर घर पहुंचा तो बच्चे बहुत खुश हुए। वह सभी के लिए कुछ न कुछ लेकर आया था। सबसे छोटे बेटे के लिए खूब सारे खिलौने जिसमें कारें अधिक थीं। क्योंकि उसकी पसंद का खिलौना कार ही थी, लेकर आया था। एकाध घंटे के बाद जब बच्चे अपने खेल में मस्त हो गये तो उन्हें एकांत मिला। नेहा अमर के गले गई और उसकी आंखें भर आईं...।
- तुम रो रही हो?
- शायद मेरी किस्मत में यही लिखा है।
- ऐसा क्यों सोचती हो। अमर ने नेहा की पलकों को चूम लिया। जैसा तुम सोच रही हो ऐसी कोई बात नहीं है।
- बिना आग के धुआं नहीं निकलता।
- कभी-कभी आंखें जो देखती हैं और कान जो सुनते हैं वह सच नहीं होता।
- औरत-मर्द के बीच दोस्ती का परिणाम जांघों के बीच से ही गुजरता है।
- यह सब बहुत पुरानी बातें हैं। अब औरत-मर्द एक साथ काम कर रहे हैं। एक आफिस में आठ घंटे अगल-बगल या आमने-सामने होते हैं। उसमें लड़के-लड़की और शादीशुदा लोग भी हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सभी को कमर के नीचे के संबंध ही दिखते हों या सभी उसी में लिप्त हैं।
नेहा को याद आई उसकी एक सहेली। उसकी शादी नहीं हुई थी तो वह केवल लड़कों को देखने के लिए घूमने जाती थी। कुछ दिन बाद शादी हो गई तो वह अपने मियां में खो गई। एक बार नेहा ने उससे पूछा था कि नजरों का खेल अब भी खेलती है? उसने जवाब दिया था कि आंखें हैं, तो संुदर चीजें भी देखंेगी। कुदरती संुंदरता किसी की बपौती तो होती नहीं। आंखें अपना खेल खेलती ही रहती हैं।
- यह खेल यदि दिल में उतर गया तो। नेहा ने सवाल किया था।
- यहीं सवाधान रहने की जरूरत होती है। अपने मान-मर्यादा का ख्याल रखना पड़ता है। जो ऐसा नहीं कर पाते। बहक जाते हैं, फिर परिणाम अच्छा नहीं निकलता। वैसे भी हमारे देश में जितने लोग आतंकवाद से नहीं मरते उससे कई गुना नयनों से घायल होकर जान दे देते हैं। इश्क में जान देने वाले बहुत हैं। ये कमबख्त है ही बुरी बला। जब सिर चढ़कर बोलता है तो आदमी को पागल बना देता है। उसकी सहेली ने कहा था।
- क्या सोचने लगी? अमर ने नेहा से पूछा। साथ ही उसे गले लगा लिया।
- क्या कर रहे हो? बच्चे आ जाएंगे। अमर का इरादा भांपते हुए नेहा ने बनावटी ऐतराज जताया। इस पर अमर ने आगे बढ़कर कमरे का दरवाजा बंद कर दिया।
वे आनंद के चरमोत्कर्ष पर थे कि दरवाजे पर दस्तक हुई।
- मम्मी क्या कर रही हो? दरवाजा खोलो। छोटे साहब थे। जब तक दरवाजा नहीं ख्ुाला वह आवाज लगाते रहे। दरवाजा खोलते ही उन्होंने पूछा कि इतनी देर से दरवाजा क्यांे नहीं खोला? अमर ने मुस्कुराते हुए बेटे को गोद में उठा लिया और उसे प्यार करने लगा। नेहा दूसरे कामों में लग गई।
अमर ने सोचा अनु के साथ ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। लेकिन नेहा के साथ तो शादी के बाद से ही ऐसे हालात का सामना करना पड़ रहा है।
उसे अतीत याद आ गया। उस समय वह फैक्ट्री में मजदूरी करता था। कमरे के नाम पर जीने के नीचे की जगह थी। दोनों भाई उसी में खाना बनाते कपड़ा वगैरह रखते और छत पर सो जाते। किसी तरह काम चल रहा था लेकिन एक बार बड़े भाई घर गये तो नेहा को भी लेते आए। साथ में पिता जी भी आ गये। पहली रात जब वह नेहा के साथ जीने के नीचे वाले कमरे में लेटा तो ऊपर से यानी छत पर रहने वाले लोगों ने ताक-झांक शुरू कर दी। यह कमरा ऐसी जगह पर था जहां अधिकतर मजदूर रहते थे। वह भी बिना परिवार के। यहां जो परिवार के साथ रहता, छड़े-छांट लोग उनके कमरे में रात को अक्सर ताक-झांक करते। मकसद कुछ करते हुए देखना। यहां हर सुबह औरत पुरुष संबंधों पर नई कहानी होती...।
अमर जानता था कि इसमें से अधिकतर बातेें तो काल्पनिक ही होतीं लेकिन कमरों की खिड़कियों और दरवाजों में बने सुराखों को देखते हुए इनकार भी न नहीं किया जा सकता था। उसने कई बार लोगों को ऐसे सुराखों से झांकते देखा था।
वह अपने कमरे में सावधान था लेकिन बाहर लोग सक्रिय थे। कमरे की लाइट बंद होते ही लोग दृश्य की कल्पना करने लगे। थोड़ी ही देर में टार्च की रोशनी से अमर-नेहा की आंखें चुंधिया गईं और वे जिस हाल में थे वैसे ही फ्रीज हो गये। छत से दरवाजे के ऊपर के रास्ते किसी ने टार्च की रोशनी को उनके कमरे में उड़ेल दिया था। कई आंखांे ने उनके निर्वस्त्र शरीर की तस्वीरें खींच ली थी...।
अगले ही दिन उन्होंने कमरा बदल दिया। लेकिन समास्या यहां भी थी। पहले तो चार लोग थे। अमर, भाई और पिता जी। बाद में अमर की मां भी आ गईं थीं। एक कमरे में पांच लोग। ऐसे में अमर और नेहा का मिलाप होना ही संभव नहीं था। इतने लोगों के बीच में पति-पत्नी की तरह सोने की सोचना भी गुनाह था। लोग सो रहे हैं लेकिन कब कौन जाग जाए, इसकी क्या गारंटी? फिर सभी रिश्ते में बड़े। सभी का लिहाज भी जरूरी था।
अमर-नेहा को न तो रात में समय मिल पाता ना ही दिन में। कई बार अमर दिन में ड्यूटी से जल्दी आ जाता लेकिन तब कमरे में मां-बापू होते। वह मन मसोस कर रह जाता।
एक दिन नेहा दूध उबाल रही थी। अमर बैठा दूध को उबलते देख रहा था। दूध कभी उपर आता तो नेहा स्टोव की आंच धीमी कर देती। दूध का उफान नीचे चला जाता तो नेहा स्टोव की आंच तेज कर देती। दूध में फिर उफान आ जाता। इस काम को नेहा एक खेल की तरह कर रही थी। अमर भी इसे ध्यान से देख रहा था। एक बार तो उसने नेहा से कहा भी कि ऐसे तो दूध बह जाएगा। इस पर नेहा ने उसकी तरफ देखा और जवाब दिया कि बह जाए...। बहने की किसे चिंता है...?
इसी समय मकान मालकिन कमरे में आईं और सभी को टीवी देखने के बहाने ले गईं अपने कमरे में। एकांत मिलते ही नेहा ने स्टोव बंद किया और अमर से लिपट गई। थोड़ी देर में यह दोनांे भी दूध की तरह स्थिर हो गये...।
- जो बात मकान मालकिन समझती हैं वो आपके भाई और अम्मां-बाबू क्यों नहीं समझते? नेहा ने सवाल किया।
- समझते हैं लेकिन क्या करें? देखो मौका मिला तो चले गये। हमारी मजबूरी है नेहा। हम इतना नहीं कमाते की दो कमरा ले सकेें किराये पर। कुछ दिन बाद अम्मां-बाबू चले जाएंगे गांव। फिर सब ठीक हो जाएगा।
- फिर भाई साहब तो रहेंगे?
- रहेंगे लेकिन तब हमें मौका मिल जाएगा।
कई बार तो जब सब सो जाते तो दोनों तखत के नीचे आ जाते। ऐसे में यदि किसी को खबर भी हो जाती तो वह यही जताता कि उसे कुछ नहीं मालूम है। इसी लुकाछिपि में बड़ा बेटा पेट में आ गया था...।
- डैडी ओ डैडी जी। छोटे बेटे ने कहा तो अमर वर्तमान में आ गया।
- क्या है बेटा जी?
- आप मुझे छोड़ कर मत जाना।
- नहीं जाउंगा।
- चले जाओगे तो मैं बहुत रोउंगा।
- नहीं बेटा, मैं आपको छोड़कर नहीं जाउंगा।
साडा पुत्तर कहकर अमर ने बेटे को चूम लिया और सीने से चिपका लिया। उसका मन कर रहा था कि यदि दिल में थैली होती तो वह बेटे को वहां डाल लेता।
वह बेटे को प्यार करते हुए छत पर चला गया। शाम का समय था। मौसम में  हल्की-हल्की ठंड घुल गई थी। सूरज अस्त होने वाला था। अमर इस मौसम को अपनी निगाहों से मन मस्तिष्क के पटल पर रेखांकित कर था कि मोइबाल बज उठा। उसने उसे ऑन करके कान से लगा लिया।
- मिस्टर अमर बोल रहे हैं? उधर अंग्रेजी मंेे पूछा गया।
- हां, बोल रहा हूं। अमर ने जवाब दिया। उधर से किसी विज्ञापन कंपनी का कोई अधिकारी बोल रहा था। उसने किसी उत्पाद के प्रचार के लिए विज्ञापन की स्क्रिप्ट लिखवाने की बात कही। वह अपनी बातें अंग्रेजी में कह रहा था। अमर उसका हिंदी में जवाब दे रहा था लेकिन वह हिंदी में बोलने को तैयार नहीं था। उसने उत्पाद के बारे में अंग्रेजी में ही अमर को बताया। अमर बहुत सारी चीजेें तो समझ गया लेकिन कुछ समझ नहीं पाया। अमर ने उससे हिंदी में बोलने को कहा तो उसने जवाब दिया कि आई नॉट स्पीक हिंदी।
- कमाल करते हो यार। हिंदुस्तान में रहते हो और हिंदी नहीं आती? अमर ने हंसते हुए कहा।
- आई एम नॉट हिंदुस्तानी। आइएम इंडियन। उसने बड़े गर्व से कहा।
- अरे अंग्रेज भाई। क्या यह बताने का कष्ट करोगे कि स्क्रिप्ट हिंदी में लिखनी है या अंग्रेजी में?
- दोनों में। मिलीजुली भाषा का प्रयोग करना है।
- माफ करना ऐसी दोगली भाषा मुझे नहीं आती।
- व्हाट दोगली?
- जिसका अपना कोई चरित्र न हो।
- व्हाट चरित्र?
- अरे मूर्खाधिराज चरित्र बोले तो करेक्टर।
- व्हाट नॉनसेंस कैसी लैंग्वेज बोलता है।
- अबे अंग्रेज की औलाद। मैं हिंदी में बोल रहा हूं। मुझे तेरे साथ काम नहीं करना।
- साला हिंदुस्तानी।
- अबे बहन चो... क्यों हिंदुस्तानी से अपनी मां चु... रहा है। बहन के... किसी अंग्रेज से...मरा। मेरा इसमें कोई शौक नहीं है। कहकर अमर ने फोन काट दिया।
- फोन पर किसे गाली दे रहे हो? अब तक नेहा भी छत पर आ गई थी और दोनों बड़े बेटे भी।
- था एक अंग्रेज की औलाद। साले अंग्रेज चले गये और अपनी औलाद छोड़ गये। बहन चो... खाते हिंदी और हिंदुतान की हैं और हगते अंग्रेजी हैं।
- इनके पीछे क्यों अपना दिमाग खराब कर रहे हो?
- मैं इनके पीछे नहीं पड़ा हूं। उसी साले ने फोन किया था।
- किसलिए?
- विज्ञापन के लिए स्लोगन लिखवाना था।
- तो परेशानी क्या है?
- उसे अंग्रेजी में चाहिए।
- इस देश में क्या सब काम अंग्रेजी में ही होता है?
- इस देश की यही विडंबना है। यहां के लोग सदियों तक गुलाम रहे। कभी किसी का तो कभी किसी का। इन्हें गुलामी की आदत पड़ गई है। उस दायरे से बाहर निकलना ही नहीं चाहते। आज यह देश आजाद है लेकिन भाषा और संस्कृति के रूप में अब भी गुलाम है। देश का वित्तमंत्री बजट पेश करता है तो प्रधानमंत्री कहता है कि यह बजट भारत और इंडिया के बीच की दूरी कम करेगा। इस देश में दो देश बना दिया गया है। दो नहीं बल्कि तीन। दो तो सभी को दिखता है लेकिन तीसरा किसी को नहीं दिखता और सबको दिखता है। उसका अभी तक नामकरण नहीं हुआ है। इस बिना नाम वाले देश में ऐसे लोग रहते हैं, जो सरकार बनाते हैं लेकिन सरकार उनके लिए कुछ नहीं करती। हां, योजनाएं बनाती है और उसके नौकरशाह उसे हड़प जाते हैं। इस देश की करीब बीस फीसदी आबादी खुद को इंडियन कहती है। उसका देश है इंडिया। 30 फीसदी आबादी खुद को भारतीय कहती है। उसका देश है भारत। शेष 50 फीसदी आबादी बिना देश और बिना नाम के रहती है। ऐसे लोगों के लिए न भारत में जगह है न ही इंडिया में। इनमें इतनी राजनीतिक चेतना भी नहीं है कि यह अपना कोई देश बना सकें। हालांकि इनके देश का नाम भाइंग दिया जा सकता है।
- भाइंग? यह क्या नाम हुआ भला? नेहा ने पूछा।
- भारत का भा. इंडिया का इं और गरीब का ग यानी भाइंग।
- आपने इस देश में एक और देश बना दिया।
- मैंने तो नाम दिया है। बनाने वाले तो इसे नाम तक नहीं देना चाहते।
- क्यों भला?
- अभी तो भारत और इंडिया की दूरी कम की जा रही है। यदि एक और नाम दे दिया तो बयान भी नहीं देते बनेगा नेताओं से।
- भाइंग के लोगों को क्या कहेंगे?
- भैया। यानी बेचारा। जिस पर दया करो। जिससे काम कराओ लेकिन मेहनताना मत दो, दो भी तो इतना कम कि वह केवल जी सकें। उसका शोषण करो और उस पर दया कर दयावान बने रहो। दयावान यानी देवता जो जितना अधिक शोषण करता है वह उतना ही बड़ा देवता हो जाता है।
- भाइंग के भैया। क्या नामकरण किया है आपने? आप अपनी इसी सोच के कारण हमेशा दिक्कतों में रहते हो। अंग्रेजी में लिखने का कह रहा था तो लिख देते।
- क्यों लिख देते?
- लिखते तो पैसे ही मिलते।
- पैसे के लिए कुछ भी नहीं कर सकता।
- ठीक है यार। अब आपसे कौन बहस करे। मैं तो चलती हूं खाना बनाने। कहते हुए नेहा चली गई। बच्चे भी खेलने में व्यस्त हो गए।
अमर सोचने लगा कि यह बात अनु को पता चलेगी तो नाराज होगी। लेकिन मैं क्या कर सकता हंू। वह साला बदतमीजी कर रहा था। शायद अनु को पता ही न चलें। लेकिन मेरा नंबर तो उसी ने दिया होगा इसे। और कहीं से तो मिला नहीं होगा। इसलिए उसे तो पता चलेगा ही। अब तक तो अंग्रेजी की औलाद ने बता भी दिया होगा। देखते हैं कि क्या होता है। मैडम नाराज होंगी और क्या? साली यह अंग्रेजी भी न पीछा नहीं छोड़ रही है। जिस क्षेत्र में जाओ वहीं पीछे पड़ जाती है...।
- ओमप्रकाश तिवारी

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