Skip to main content

Posts

कविता/ समय साक्षी

समय साक्षी
----------
सूर्यालोकित स्वर्गलोक की
रंगीनियां उसे भी पसंद हैं
लुभाती और ललचाती भी हैं
लेकिन प्रभावित नहीं कर पातीं
चमकती किरणों की
सचाइयों को जनता है वह
कहां से मिलती है
 उनकी आभा को ऑक्सीजन
कभी कभी सोचता है वह
जाहिल ही क्यों नहीं बना रहा
आस्था के समुद्र में डुबकी लगाता
किसी का देवालय बनाने
किसी का पूजाघर तोड़ने की
बहसों और साजिशों में व्यस्त रहता
अपने धर्म के लिए आक्रामक रहता
दूसरे के धर्म के लिए कुतर्क गढ़ता
रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाने के लिए
किसी संन्यासी से योग सीखता
फिर केंचुए की तरह रेंगते हुए
चढ़ जाता स्वर्ग की सीढ़ियां
और बन जाता विदूषक
कथित सर्वशक्तिमान
किसी नरपिशाच का
लेकिन नहीं
वह तो लिखना चाहता है
आज के समय की पंचपरमेश्वर
पर लिख नहीं पा रहा
अब और ताकतवर हो गए हैं
तमाम अलगू चौधरी
रेहन पर रखे बैलों का
निचोड़ रहे हैं कतरा कतरा
न एक अलगू चौधरी हैं
न कम है बैलों की संख्या
उसे तलाश है
किसी पंचपरमेश्वर की
जो उसके कथा के
चरित्रों के साथ
कर सके न्याय
वह बार बार सोचता है
कथा सम्राट प्रेमचंद होते तो
कैसी पंचपरमेश्वर लिखते
क्या बांच पाते
अलगू चौधरी का बही खाता
साल दर साल बढ़ता उ…
Recent posts

तो सभी धर्मों की सार्वजनिक गतिविधियों पर रोक लगे

वैसे तो हमारा संविधान धार्मिक आज़ादी का हक देता है। किसी भी नागरिक का यह मौलिक अधिकार भी है। लेकिन कई बार सरकारें और उसके समर्थित संगठन व लोग नागरिक अधिकारों का हनन करते हैं। उसमें भी दिक्कत तब होती है जब किसी समुदाय विशेष को निशाने पर लिया जाता है। कुछ नेताओं के हिन्दू मुस्लिम वैमनस्य की वजह से देश का बंटवारा हो गया। लेकिन यह नफरत गयी नहीं। कुछ संगठनों ने आज़ादी के बाद से ही नफरत फैलानी शुरू कर दी थी। कालांतर में वह सियासी दल बनाकर सत्ता में आ गए। उनके लिए संविधान कोई मायने नहीं रखता। नागरिककों के मूल अधिकारों का हनन वे अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझते हैं और ऐसा ही व्यवहार करते हैं। इसके लिए उनके पास अपने तर्क और तथ्य भी हैं जो वह स्वयं गड़ते हैं और कुतर्क करते है। जब इससे भी नहीं पर पाते तो हिंसक हो जाते है। मूलतः वे हिंसक ही हैं। मानवीयता का तो केवल चोला पहने हैं। यदि सार्वजनिक जगह में नमाज नहीं पढ़नी चाहिए तो शोभायात्रा या नगर कीर्तन भी नहीं निकलना चाहिए। एक के लिए धार्मिक आज़ादी दूसरे के लिए पाबंदी नहीं होनी चाहिए।

यूं ही जहरीली नहीं होती जा रही हवा

जो खबरें हैं वे गायब हैं
खबरें गढ़ी जा रही हैं
बनाई जा रही हैं
किसी के अनुकूल
किसी के प्रतिकूल
अपनी पसंद की
उसकी पसंद की
खबर जो होनी चाहिए थी
कुछ दंगाइयों ने कर लिया अपहरण
खबर वह बन गई
जो दंगाई चाहते थे
खबर वह बन गई
जो आतंकी चाहते थे
हर रोज अखबार के पन्नों में
खबर के नाम पर
परोस दिया जाता है
तमाम तरह की गढ़ी गई खबरें
ठोक पीटकर बनाई गई खबरें
आदेश-निर्देश से लिखी-लिखाई गई खबरें
कौन चाहता है इन्हें पढऩा
समाचार न विचार
केवल एक किस्म का अचार
टीवी चैनलों पर बहस का शोर
कूपमंडूक लोग फैला रहे होते हैं ध्वनि प्रदूषण
बहुत कष्ट और शोक के साथ
बंद कर देना पड़ता है टीवी
कई-कई दिन नहीं देखते हैं
टीवी पर समाचार
नहीं देखना और सुनना है
झूठ का व्याभिचार
सूचना विस्तार के युग में
गायब कर दी गई है सूचना
हर पल प्रसारित की जा रही है
गैरजरूरी गैर वाजिब सूचना
सूचना के नाम पर
अफवाहों का पैकेज
प्रसारित किया जा रहा है
अंधाधुंध चौबीस घंटे
रिफाइंड करना मुश्किल हो गया है
काम की खबरों को
शक होने लगा है
अखबार में छपी
मुस्कराती तस्वीर पर
सवाल उठता है कि क्यों हंस रहा है
क्या मिल गया है…

डूबते सूरज की ओर

समय का ख्याल आते ही सियाराम साइकिल की गति बढ़ाने के लिए जल्दी-जल्दी पैंडल मारने लगे। पेट में चूहे कूद रहे थे। प्यास भी लग गई थी। वह शीघ्र घर पहुंच कर पहले पानी फिर कुछ खाना चाह रहे थे।
जैसे ही वह पैंडल जल्दी-जल्दी चलाने की कोशिश करते चेन उतर जाती। इसके अलावा सड़क में जगह-जगह बने गढ्डे अलग से परेशान कर रहे थे। गढ्डों की वजह से साइकिल तेज चलाना और मुश्किल हो रहा था। कहने को यह हाइवे है, लेकिन सड़क की हालत गांव की पगडंडी से भी बदतर है। गड्डों में सड़क को खोजना पड़ता है....


डूबते सूरज की ओर
-------------
सियाराम ने साइकिल पर बैठकर पैर से जैसे ही पैंडल पर जोर लगाया खटाक करके चेन उतर गई...।
सियाराम को बहुत गुस्सा आया। मन ही मन गाली देते हुए साइकिल से उतरे और चेन को ठीक करने लगे। चेन चढ़ा ही रहे थे कि किसी ने पूछ लिया।
- साइकिल खराब हो गई का?
सियाराम ने चेन छोड़कर आवाज की तरफ देखा और मुस्करा कर बोले कि हां।
- किसी कबाड़ी को बेच दो यार। अब यह चलाने लायक नहीं है।
- पुरानी होने पर कोई घरवाली को बदल देता है का? सियाराम ने उस आदमी से चुहल की।
- अरे भाई, दुनिया मोटरसाइकिल और कार से …

बारिश

कविता से संजय की मुलाकात उसकी दुकान पर हुई थी। कविता की जनरल स्टोर की दुकान थी। वह दुकान पर बैठी थी और संजय कोई सामान लेने आया था। पहली ही नजर में दोनों एक दूसरे को देखते रह गए। कुछ क्षण के बाद जब मुस्कराते हुए कविता ने मुंह मोड़ा था तो संजय के दिल की धड़कनें तेज हो चुकी थीं। अचानक उसे लगा कि वह आसमान में उड़ रहा है...।
कहानी

बारिश


सुबह से ही झमाझम बारिश हो रही थी। पिछले एक सप्ताह की उमस भरी गर्मी के बाद इस तरह की बरसात होना काफी सुखदायी अनुभव था। यही कारण था कि कई लोग बारिश में भीग रहे थे। मोतियों की तहर आसमान से टपकतीं बूंदें शरीर पर पड़ती तो मन किसी मयूर की तरह नाच उठता।
संजय छाता लगाए भीगने से बचने का प्रयास करता चला जा रहा था।
एकाएक सामने निगाह पड़ी तो दिल धक् से करके रह गया और होंठ मुस्कान में बरबस ही फैल गए। सामने वाले की भी ऐसी ही प्रतिक्रिया थी। दोनों एक दूसरे को रुक कर देखते ही रह गए। इसी बीच आसमान में बादल गड़गड़ाए और तेजी से बिजली चमकी। साथ ही हवा का एक झोंका आया और दोनों की छतरियां उड़ गईं...।
दोनों अपनी-अपनी छतरी को जब तक संभालते बारिश में भीग चुके थे।
- …

लड़की

लड़की के दोनों भाई कुर्सी पर बैठ गए तो पिता चारपाई पर लेट गए। उनकी शरीर में अथाह पीड़ा उतर आई। लगा किसी ने शरीर का सारा खून निचोड़ लिया है। लड़की के चाचा भी एक चारपाई पर पसर गए। सभी थके थे, लेकिन स्वयं को किसी अज्ञात भार से मुक्त समझ रहे थे...। पिता की यह चौथी और अंतिम बेटी थी। इसलिए बेटी की विदाई की जहां उन्हें पीड़ा थी, वहीं यह सोचकर हल्का महसूस कर रहे थे कि चलो बेटियों के भार से मुक्ति मिली...।



कहानी
----
लड़की
-----
- ओमप्रकाश तिवारी
सुबह होते ही घर के मर्द बारातियाें को चाय-नाश्ता कराने में मशगूल हो गए। औरतें उसे तैयार करने में जुट गईं। कहने को सभी को उसे विदा करने की खुशी है, लेकिन सभी उदास हैं। वह तो रोए ही जा रही है। पिछले एक हफ्ते से रो रही है फिर भी आंसू हैं कि सूखने का नाम नहीं ले रहे। बहनें सोच रही हैं कि इस बेटी को विदा करने के बाद माता-पिता बेटियों के भार से मुक्त हो जाएंगे...। बुआ सोच रही हैं कि भैया ने इस बेटी को विदा करके गंगा नहा लिया..। मां सोच रही हैं कि उनके कलेजे का टुकड़ा अपने घर जाकर सुखी रहे। एक अज्ञात भार उतरने का जहां उन्हें संतोष है, वहीं तम…

आंचल में सूरज की चाहत

अमर ने पलट कर घर के दरवाजे की तरफ देखा। करन को गोद में लिए नेहा खड़ी थी। उसका चेहरा सपाट था। खुश थी कि उदासी अमर समझ नहीं पाया। बेटों को देखा। वह हाथ हिलाते हुए खुश थे। कार चल पड़ी तो अमर ने अनु के चेहरे को देखा। अनु का चेहरा दप दपा रहा था...।
अंधेरे कोने

भाग 13---------अंतिम
आंचल में सूरज की चाहत
अमर से बात करने के बाद अनु उदास हो गई। उसे यकीन हो गया कि अमर उसके हाथ से निकल गया। उसका किसी काम में मन नहीं लगा। वह सोफे पर बैठी-बैठी अमर की यादों में खो गई। उसे अमर की अच्छाइयां और बुराइयां याद आने लगीं।
- क्या बात है अनु? परेशान हो? रमेश ने अनु से पूछा तो उसकी तंद्रा भंग हुई।
- नहीं डैडी, ऐसी कोई बात नहीं है। अनु ने रमेश को टालने के लिए कहा।
- कैसे कोई बात नहीं है। कोई यों ही उदास और परेशान नहीं होता। रमेश ने अनु के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
- डैडी हम किसी को इतना क्यों चाहने लगते हैं कि लगने लगता है कि उसके बिना जिंदगी अध्ूारी हो गई। एक अंजाने आदमी से मुलाकात होती है और हम हम नहीं रह जाते। खुद को भूल कर किसी और के लिए जीने लगते हैं। अपना हर काम गलत और उसका हर काम सही क्यों लगने…