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छंटनी की तलवार तले जीवन का पौधा

रात के तीन बज रहे थे। इसे सुबह के भी तीन बजना कह सकते हैं। अमर ने आसमान की तरफ देखा तो वहां अर्धवृत्ताकार चांद चमक रहा था। उसकी रोशनी मंे प्रकृति स्वच्छंद स्नान कर रही थी। और दिन होता तो अमर चांद और उसकी चांदनी को भाव-विभोर होकर देखता और उसे सिद्दत से महसूस करता। उसे चांदनी रात बहुत पसंद है लेकिन आज उसे चांदनी रात में शीतलता की जगह गरमी महसूस हुई। हिंदी.भारत@इंडिया भाग छह छंटनी की तलवार तले जीवन का पौधा कार्यालय से निकलकर अमर सड़क पर आ गया। उसके साथ उसके कार्यालय के ही चार सहकर्मी और थे। इस समय वे अखबार का अंतिम संस्करण छोड़कर घर जाने के लिए निकले थे। रात के तीन बज रहे थे। इसे सुबह के भी तीन बजना कह सकते हैं। अमर ने आसमान की तरफ देखा तो वहां अर्धवृत्ताकार चांद चमक रहा था। उसकी रोशनी मंे प्रकृति स्वच्छंद स्नान कर रही थी। और दिन होता तो अमर चांद और उसकी चांदनी को भाव-विभोर होकर देखता और उसे सिद्दत से महसूस करता। उसे चांदनी रात बहुत पसंद है लेकिन आज उसे चांदनी रात में शीतलता की जगह गरमी महसूस हुई। उसने देखा उसके सहकर्मी अभी अखबार की किसी खबर पर माथा-पच्ची कर रहे हैं। अमर उनसे थोड़ा आगे होकर चलन…

पथरीली जमीन पर सपनों की खेती

हिंदी.भारत@इंडिया
भाग पांच पथरीली जमीन पर सपनों की खेती
अमर अनिल के कमरे पर पहुंचा ही था कि मंझले बेटे का एसएमएस आ गया।
डैडी, आई वांट चेंज माई स्कूल। बीकॉज दिस स्कूल एसएसटी सब्जेक्ट नॉट टीच इन इंग्लिश। यू know, आई एम वीक इन हिंदी।
एसएमएस पढ़कर अमर की समझ में नहीं आया कि वह क्या प्रतिक्रिया दे। उसे खुशी थी कि बेटे का अंग्रेजी ज्ञान अच्छा है लेकिन दुख इस बात का था कि हिंदी कमजोर है। उसने सोचा कि अंग्रेजी न आने की वजह से जो शर्मिंदगी, बेइज्जती और जिल्लत उसने उठाई है वह बेटे को नहीं उठानी पड़ेगी। लेकिन वह यह भी नहीं चाहता कि बेटे हिंदी को भूल ही जाएं।
हिंदी जो एक भाषा ही नहीं संस्कृति भी है। अमर मानता है कि एक भाषा का मरना एक सभ्यता का खत्म हो जाना होता है। हिंदी एक सभ्यता है। जिस पर उसे गर्व है। यह देश में सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। इसके बाद ही अंग्रेजी का नंबर आता है। वह भी संख्या में काफी कम है। यह सही है कि अंग्रेजी सत्ता की भाषा है और आज के उदारीकरण व वैश्वीकरण के युग में अंग्रेजी के बिना किसी का विकास नहीं हो सकता। इसके बावजूद हिंदी की अपनी अहमियत है। इससे भारतीयों की अस्मि…

गगन कुसुम की ख्वाहिशें

हिंदी . भारत /इंडिया - ओमप्रकाश तिवारी भाग दो गगन कुसुम  की ख्वाहिशें ---------------
अनु को रात भर नींद नहीं आई। पूरी रात करवटें बदलती रही। अपनी इस बेचैनी का कारण वह समझ नहीं पा रही थी। उसे लग रहा था कि कुछ है जो वह पाना चाहती है...। कुछ है जो उसके पास नहीं है...। उसे लगता कि वह एक खाली बर्तन है...। एक स्टेचू है।
हालत यह थी कि वह कई बार बिस्तर से उठ कर बॉलकनी पर गई। वहां से गली में देखती। स्ट्रीट लाइटों की पीली रोशनी उसे बीमार लगती। आसमान की तरफ देखती तो असंख्य तारे टिमटिमाते नजर आते। चांद अपनी चांदनी के साथ गगन विहार कर रहा होता। वह एक अनजानी ईर्षा से भर जाती।
फिर बिस्तर पर आ जाती और सोने का प्रयास करती लेकिन नींद न आती। करवटें बदलती और जब बिस्तर शरीर में चुभने सा लगता तो फिर बॉलकनी पर आ जाती। इस तरह उसकी पूरी रात कट गई। सुबह के चार बजे नींद आई।
पार्क में, रेस्टोरेंट में, मेट्रों में, बस में, वह पूरा दिन किसकी के साथ घूमती है। कभी रूठती है तो कभी प्रेमभरी बातें करती है। उसके साथ सिनेमा देखने जाती है। हॉल के अंदर वह उसे किस करती है।
सपने को देखते हुए अनु कसमसा रही थी कि बहादुर चाय लेकर आ गया…