Thursday 25 October 2012


परिवर्तन लाजमी है तो डरना क्यों?
- ओमप्रकाश तिवारी
मानव सभ्यता अंतरविरोधों के परमाणु बम जैसी है। इसके अंतरविरोध परिवर्तनशील बनाकर इसे आगे बढ़ाते हैं तो यही इसका विनाश भी करते हैं। मानव जाति का इतिहास गवाह है कि भूत में कई सभ्यताएं तबाह हो गईं जिनके मलबे से खाद-पानी लेकर नई सभ्यताओं ने जन्म लिया और फली-फूली हैं। यही वजह है कि मानव भविष्य को लेकर हमेशा चिंतित रहता है। उसकी अधिकतर योजनाएं बेहतर भविष्य के लिए होती हैं। लेकिन हर आदमी, हर समाज और हर सभ्यता व संस्कृति हमेशा बेहतर नहीं साबित होती। अक्सर इंसानी अनुमान धरे केधरे रह जाते हैं और भविष्य कुछ का कुछ हो जाता है।
वामपंथी चिंतक कार्ल मार्क्स का आकलन था कि पूंजीवादी व्यवस्था अपनी तबाही के लिए खुद ही रास्ते बनाती है। यही वजह है कि एक दिन यह व्यवस्था तबाह हो जाएगी और इसके स्थान पर नई व्यवस्था सामने आएगी। नई व्यवस्था क्या होगी इसकी भी मार्क्स ने कल्पना की और बताया कि वह साम्यवादी व्यवस्था होगी। लेकिन ऐसा हुआ क्या? आज लगभग पूरी दुनिया में पूंजीवादी व्यवस्था है। सोवियत रूस जैसे देशों में साम्यवादी व्यवस्था आई भी तो वह पूंजीवादी व्यवस्था से पहले ही ढह हो गई। चीन साम्यवाद के रूप में पूंजीवाद को ही बढ़ावा दे रहा है। (उत्तरकोरिया और क्यूबा आदि अपवाद हो सकते हैं) इस तरह मार्क्स का आकलन अभी तक पूरी तरह सही साबित नहीं हो पाया है। इसी तरह भवष्यि के बारे में किसी का भी आकलन सही साबित हो यह जरूरी नहीं है। आने वाले वर्षाें में मार्क्स का कथन सत्य साबित हो जाए इस पर आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रकृति, मानव, समाज और सभ्यता एवं संस्कृति का बदलाव लाजमी है। इसी के साथ आज जो व्यवस्था है आने वाले वर्षों में उसका बदलना भी अनिवार्य है। आज की पूंजीवादी व्यवस्था आने वाले वर्षों में ऐसी ही रहेगी इसकी कोेई गारंटी नहीं है। आने वाले वर्षों में हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था बनी रहेगी इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। किसी भी देश का मानाव समाज नहीं बदलेगा और संस्कृति भी इसी तरह ही रहेगी इसे भी आज ही सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।
बदलाव तय है। परिवर्तन तय है तो इससे डर कैसा? दरअसल, डर बदलाव या परिवर्तन से नहीं, बल्कि उसकी प्रक्रिया से लगता है। आने वाले परिणामों से लगता है। मसलन, एक डर यह है कि एक दिन हिंदी भाषा खत्म हो जाएगी। यदि हिंदी भाषा खत्म हो जाएगी तो क्या हिंदी भाषी समाज गूंगा हो जाएगा? जवाब नहीं ही है। हिंदी भाषी समाज अपनी सुविधानुसार नई भाषा तैयार कर लेगा। प्रकृति, पाली, संस्कृत आदि भाषाओं से हमें यही सबक मिलता है। यदि हिंदी भाषी समाज दूसरी भाषा नहीं तैयार कर पाया तो भाषा ही नहीं एक सभ्यता का अंत हो जाएगा।
आजकल देश में किराना बाजार (रिटेल) में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश (एफडीआई) का बहुत शोर है। एक तरफ सरकार है, जो कह रही है कि पैसा पेड़ों पर नहीं लगता। यदि देश की अर्थव्यवस्था का विकास चाहिए तो एफडीआई जरूरी है। दूसरी तरफ विपक्ष है, जो कह रहा है कि इससे देश बरबाद हो जाएगा। देश गुलाम हो जाएगा। किसान बरबाद हो जाएंगे। देश के करोड़ों खुदरा व्यापारी तबाह हो जाएंगे। दरअसल, क्या ऐसा हो जाएगा, जैसा कि कहा जा रहा है? अभी तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही आकलन करके आशंका और संभावना ही व्यक्त कर रहे हैं। दोनों केआकलन केपीछे तथ्य होंगे, जिनकेआधार पर दोनों भविष्य की तस्वीर खींच रहे हैं, लेकिन भविष्य की जैसी तस्वीर बनाई जा रही है वह आने वाले दिनों में वैसी ही हो, इसकी कोई गांरटी नहीं है।
सरकार का आकलन सही हो सकता है, क्योेंकि वह वर्तमान को देखते हुए फैसला कर रही है। (केवल एफडीआई के मामले में) हमारी अर्थव्यवस्था की विकास की गति धीमी हो गई है ऐसे में उसमें पूंजी लगाने की आवश्यक्ता है लेकिन सरकार केपास पूंजी नहीं है। देश केपूंजीपतियों का निवेश भी पर्याप्त नहीं है या वह विदेशी पूंजी का साथ चाहते हैं। ऐसे में सरकार को रिटेल में विदेशी पूंजी के लिए रास्ता खोलना पड़ रहा है। अब यह विदेशी पूंजी आएगी तो कितनी? और अर्थव्यवस्था को किस रूप में लाभ पहुंचाएगी, इसे आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन फिलहाल इसके माध्यम से एक बेहतर रास्ता दिखता है अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए।
विपक्ष की आशंका में इसलिए ज्यादा दम नजर नहीं आता, क्योंकि आने वाले वर्षाें में न केवल समाज को बदलना है बल्कि उसकी व्यवस्था को भी बदलना है। भारत में आज खुदरा बाजार का जैसा स्वरुप है, आने वाले वर्षों में उसका स्वरूप ऐसा ही कदापि नहीं रहने वाला। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भूत में हमारी ऐसी कई सामाजिक व्यवस्थाओं का स्वरूप बदला है। एक समय था कि गांवों में नाई, पंडित, धोबी, कहार, कुम्हार, हलवाहा और केवट आदि काम के बदले अनाज लिया करते थे अपने यजमानों से। लेकिन आज ऐसा नहीं है। धोबी, कहार, कुम्हार और हलवाहा जैसी व्यवस्थाओं का आज अस्तित्व नहीं रह गया है। इन धंधों से जुड़े लोगों को आज आजीविका के लिए दूसरा काम करना पड़ रहा है। इसी तरह एक समय था कि किसानों केखेतों में काम करने वाले कामगार अपने श्रम के बदले अनाज लेते थे लेकिन आज वह नकद लेते हैं।
किसानों का भी स्वरुप बदला है। देश के कुछ राज्यों को यदि छोड़ दिया जाए तो अधिकतर राज्यों में अधिकतर किसान सीमांत जोत वाले हैं। आने वाले दिनों में इनमें से अधिकतर सीमांत से भूमिहीन होकर कामगार हो जाएंगे। जनसंख्या के घनत्व ने खेती की जमीनों पर ऐसा दबाव डाला है कि खेती किसी के लिए जीने का एक मात्र साधन नहीं रह गई है। खेती में हो रहे इस परिवर्तन को समझना होगा। आज भले ही हमारे देश की अधिकतर आबादी गांवों में रह रही है। लेकिन आने वाले दिनों में ऐसा ही रहेगा यह मान लेना कतई उचित नहीं होगा। गांवों से शहरों की तरफ जिस तेजी से युवाओं का पलायन हो रहा है और शहरों में जिस तरह से जनसंख्या का दवाब बढ़ रहा है, उससे शहरीकरण तेजी से बढ़ेगा। गांव खत्म होकर शहर और कस्बों में समा जाएंगे। तब न ऐसा समाज रहेगा न ही ऐसी कोई व्यवस्था। सभी व्यवस्थाएं और समाज समयानुकूल और आवश्यकतानुकूल बदल जाएंगे।
आज शहरों की युवा पीढ़ी मॉल में घूमना और खरीदारी करना पसंद करती है। यह वह पीढ़ी है जो विदेश में पढ़ाई करना, नौकरी करना और वहां रहने के लिए लालायित रहती है। यही नहीं देश में भी उसे विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी करना अधिक बेहतर और सुविधाजनक लगता है। युवा पीढ़ी की यह पसंद और रुचियां यूं ही नहीं बनी होंगी। यह कहना कि उनमें विवेक नहीं है, निरा बेवकूफी होगी। ऐसे मे रिटेल में एफडीआई का विरोध करने वाले और उसका समर्थन करने वाले कहां खड़े हैं यह समझना कोई मुश्किल काम नहीं है।
रही बात केंद्र सरकार से तृणमूल कांग्रेस का समर्थन वापस लेने का तो यह देश केभले के लिए बहुत पहले हो जाना चाहिए था। भारतीय रेल का जिस तरह से बंटाधार ममता बनर्जी और उनके नेताओं ने किया है वैसा ही बंटाधार वह पश्चिम बंगाल का भी करेंगी और कर रही हैं। आज पश्चिम बंगाल वामपंथ की अंधेरी सुरंग से निकलकर ममता बनर्जी नामक अंतहीन छोर वाली उससे कहीं अंधेरी सुरंग में फंस गया है। शुक्र है कि भारतीय रेल इससे निकल गई है। रही बात भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों की तो वह हमेशा दिशाहीन रहे हैं और आगे भी रहेंगे। उनकी आज की उछल-कूद का भविष्य में क्या लाभ होगा इसे वह अच्छी तरह से जानते हैं। यह बात तो दावे से कही जा सकती है कि सत्ता में आने के बाद यह लोग भी वही करेंगे जो आज की सत्तारूढ सरकार कर रही है। आम जनता को इंतजार करना चाहिए इस बार के लोकसभा चुनाव केबाद के वक्त का। उस समय केलिए जो हास्यास्पद नाटक का मंचन होगा उसकी स्क्रिप्ट फिलहाल लिखी जा रही है।

Saturday 3 December 2011

कहानी

ओमप्रकाश तिवारी

अम्मा
----
- अरे नालायकों इसे क्यों उठा लाए? घायल बिल्ली के बच्चे को देखते ही अम्मा चीख पड़ीं।
- अम्मा, यह रास्ते में पड़ा था। बच्चे बोले।
- जो भी रास्ते में पड़ा मिलेगा, तुम सब उसे उठा लाओगे? अम्मा गुस्से में बोलीं।
- इसे चोट लगी है। कौवे ने चोच मार-मार कर घायल कर दिया है। यह भाग नहीं सकता। बेचारा मर जाएगा। बच्चों ने अपने बचाव में तर्क दिया।
- तो मैं क्या करूं?
-अम्मा यह मर जाएगा। अम्मा के नाती ने वकालत की। उसकी दिली इच्छा थी कि अम्मा मान जाएं। अब तक अम्मा भी उसकेपास आ गई थीं। उन्होंने बिल्ली के बच्चे को देखा। घाव गहरा था और खून बह रहा था। अम्मा का दिल पसीज गया। उन्होंने पास खड़ी नातीन से कहा - यहां खड़ी-खड़ी मुंह क्यों देख रही है, जरा सरसों का तेल और हल्दी गरम करके ला।
अम्मा ने बिल्ली के बच्चे को अपने हाथ में ले लिया। जो साड़ी पहनी हुईं थी उसी से बिल्ली के बच्चे का घाव को पोछने लगीं।
-कहां मिला यह? अम्मा ने बच्चों से पूछा।
-जंगल के किनारे, खेत को जाने वाले रास्ते में पड़ा था। एक कौवा इसे चोच मार रहा था।
- तुम लोगों ने मारा नहीं कौवे को? अम्मा ने नाती से कहा।
- कैसे मारता, हमें देखकर तो वह उड़ गया।
- ढेला मारना था हरामी कोे। अम्मा ने गुस्से में कहा।
इस बीच एक बच्चा कटोरी में पानी लेकर आया। अम्मा बिल्ली केबच्चे को पानी पिलाने लगीं। साथ ही कहती भी रहीं कि इसे उठाकर तो लाए हो, लेकिन क्या पी कर जिंदा रहेगा यह? अपने यहां दूध तो है नहीं।
बच्चे जब बिल्ली केबच्चे को उठा कर लाए थे तो अम्मा किसी जरूरी काम से खेत जा रही थीं, लेकिन उसका घाव देखकर वह सब कुछ भूल गईं। उन्होंने बच्चे के घाव पर हल्दी तेल लगाया। उसे पानी पिलाया और जब उन्हें लगा कि वह नहीं मरेगा, तभी खेत को गईं। जाते समय बच्चों को हिदायत देती र्गइं कि इसका ख्याल रखना। कौआ यहां भी आ सकता है। कुत्ता भी इसे मार सकता है। इसलिए इसे किसी चीज से ढक देना। इसे खोजने इसकी मां भी आ सकती है। इसलिए कोई बिल्ली आए तो आने देना।
अम्मा खेत में चली गईं। बच्चे बिल्ली के बच्चे की सेवा में लग गए। कोई उसे पानी पिलाता तो कोई उसकी पीठ सहलाता। कोई घाव में हल्दी-तेल लगाता।
अम्मा जब खेत से लौटीं तो बच्चे उन्हें बताने लगे कि अम्मां बिल्ली का बच्चा अब चलने लगा है। वह जी जाएगा। अम्मा उसके लिए दूध नहीं ले सकती क्या? अम्मा पहले तो चुप रहीं, लेकिन दूध लेने की बात पर उन्हें गुस्सा आ गया।
- रवि को पिलाने के लिए दूध ले नहीं पा रहीं हूं। बिल्ली के बच्चे के लिए दूध खरीदूंगी। रवि अम्मा का एक साल का नाती है। धनाभाव के कारण वे उसके लिए दूध की व्यवस्था नहीं कर पा रहीं थीं। उनकी एक भैंस गर्भवती है। लेकिन फिलहाल वे नाती के लिए दूध की व्यवस्था न होने से व्यथित हैं।
बिल्ली के बच्चे को देखकर अम्मा को एक घटना याद आ गई।
उस दिन अम्मा का छोटा बेटा एक घायल तोते केबच्चे को उठा लाया था। अम्मा ने उसकी सेवा करके उसे स्वस्थ कर दिया। बच्चा होने के कारण वह उड़ने के लायक नहीं था इसलिए अम्मा ने उसे पाल लिया। अम्मा ने तोते को पाल तो लिया, लेकिन उनके पास उसे रखने की समस्या थी। खुला छोड़े दें तो कुत्ते-बिल्ली खा जाएं। बाहर उड़ने के लिए छोड़ दें तो कौए या दूसरे पक्षी मार डालें। चोट ठीक होने तक उन्होंने उसे झौआ-खांची के नीचे ढंककर रखा, लेकिन इस तरह उसे अधिक दिन तक नहीं रखा जा सकता था। वैसे भी आदमियों केबीच रहने के कारण तोते की आदत भी आदमियों में रहने की हो गई थी। वह मिठ्ठू बोलने लगा था।
अम्मा ही नहीं तोते को रखने के लिए पिंजरे की चिंता उनके बेटे को भी थी। अम्मा और उनका छोटो बेटा किसी न किसी बहाने से पिंजरा खरीदने केलिए पैसा बचा रहे थे।
जिस दिन बेटा पिेंजरा लेकर आया अम्मा बहुत खुश हुईं। तोते के बच्चे को पिंजरे में बंद करकेपिंजरे को घर के दरवाजे के सामने टांग दिया। पिंजरा पाकर मिठ्ठू भी बहुत खुश हुआ। अब उसके पास पिंजरे में हमेशा कुछ-न-कुछ खाने-पीने के लिए जरूर रहता। दरवाजे से बाहर कोई निकलता तो उससे बातें जरूर करता। वह घर का अहम सदस्य बन गया। दिन में उसे पिंजरे से बाहर छोड़ दिया जाता तो वह इधर-उधर घूमकर फिर पिंजरे में आ जाता। इससे अम्मा को यकीन हो गया था कि वह कहीं नहीं जाएगा।
उस दिन शाम का धुंधलका होते ही मिठ्ठू तेज-तेज आवाज में बोलने लगा। अम्मा उसके पास गईं और बड़ी देर तक उससे बातें करतीं रहीं। अम्मा को अपने पास देख मिठ्ठू शांत हो गया, लेकिन अम्मा केवहां से हटते ही वह फिर जोर-जोर से बोलने लगा। अम्मा फिर उसके पास आईं तो वह चुप हो गया। अम्मा को लगा कि मिठ्ठू उनके साथ खेल खेल कर रहा है। यह सोचकर वह मुस्कराते हुए वहां से चली गईं।
लेकिन मिठ्ठू तो घबराया हुआ था। उसके घबराने का कारण था दरवाजे के पास चारपाई केनीचे बैठा बिल्ला। जिसकी आंखें हल्के अंधेरे में चमक रही थीं, जिसे अम्मा नहीं देख पा रहीं थीं और मिठ्ठू देख रहा था। मिठ्ठू को यह आशंका सता रही थी कि बिल्ला कहीं आज भी उस पर हमला न कर दे। इसलिए वह अपने पास अम्मा की उपस्थिति चाह रहा था पर इस बार अम्मा ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। उन्हें कोई जरूरी काम याद आ गया था।
अम्मा केहटते ही चारपाई के नीचे छिपे बिल्ले ने पिंजरे पर हमला बोल दिया। इससे पिंजरे का दरवाजा खुल गया। उड़ने में अनाड़ी मिठ्ठू जान बचाने के लिए पिंजरे से बाहर निकल आया। उसका बाहर निकलना था कि बिल्ले ने उसकी गर्दन अपने मुंह में दाब ली। मिठ्ठू चीं-चीं करता रहा। जब तक अम्मा और घरवाले दौड़ते बिल्ला घर से निकल पास के जंगल में गायब हो गया। पीछे रह गया घड़ी के पेंडृलम की तरह झूलता तोते का पिंजरा....।
अम्मा का छोटा बेटा लठ्ठ लेकर बिल्ले के पीछे भागा, पर बिल्ला उसके हाथ नहीं आया। थक हार कर बेटा वापस आ गया।
उस दिन अम्मा के घर में मातम छा गया। लगा जैसे परिवार का कोई सदस्य मर गया हो। भोजन बना, अम्मा को छोड़कर सभी ने भारी मन से भोजन किया। अम्मा खाने बैठीं तो खाया नहीं गया और रोने लगीं। वह मुंह जूठा करकेचारपाई पर लेट र्गइं और सारी रात उन्हें नींद नहीं आई। जब भी आंख लगती मिठ्ठू उनके सामने आ जाता।
इस घटना के बाद से अम्मा और उनके छोटे बेटे के दिल में बिल्ली जाति के प्रति नफरत पैदा हो गई। इसके बाद तो उनकी मौजूदगी में कोई बिल्ला या बिल्ली घर में घुसने ही नहीं पाता।
आज एक नन्हें मासूम घायल बिल्ली के बच्चे को देखते ही अम्मा को मिठ्ठू की याद आ गई। इसी की तरह वह भी आया था।
अम्मा ने फैसला लिया कि जब तक बिल्ली की बच्चा चलने-फिरने और अपनी रक्षा करने में समर्थ नहीं हो जाता, तब तक वह इसी घर में रहेगा। धीरे-धीरे बिल्ली के बच्चे का घाव भर गया और वह चलने-फिरने लगा। अम्मा ने उसके लिए दूध की भी व्यवस्था कर दी।
रात को उसे या तो ढक दिया जाता या कोई आदमी उसे अपने पास लेकर सोता। दिन में उसे खांची या झौआ के नीचे ढक दिया जाता ताकि कुत्ता या बिल्ला उस पर हमला न कर सकें। अम्मा को उम्मीद थी कि उसकी मां एक-न-एक दिन उसे खोजते हुए जरूर आएगी। इसीलिए उन्होंने बच्चों को यह हिदायत दे रखी थी कि बिल्ली आए तो बच्चे के पास जाने देना ताकि वह अपने बच्चे को अपने साथ ले जा सके।
एक दिन शा को अम्मा खेत र्से आइं और आंगन में चारपाई डालकर बैठ र्गइं। यहीं पर उनकी बड़ी बेटी भी बैठी थी, जो आज ही ससुराल से आई थी। अम्मा उसी से बातें कर रही थीं। तभी एक बिल्ली घर में आई। उसे देखते ही अम्मा ने बच्चों को अगाह किया कि देखो बिल्ली आई है, इसे बच्चे के पास जाने देना। यह भी देख लेना कि कहीं यह बिल्ला न हो। बिल्ला हो तो उसे बच्चे के पास जाने मत देना, नहीं तो वह उसे मार डालेगा। इस पर उनकी बेटी ने कहा कि लगती तो बिल्ली ही है। यह लोग अभी चर्चा कर ही रहे थे कि वह उस कमरे में घुस गई, जहां बिल्ली का बच्चा रखा था। अम्मा ने सोचा कि चूंकि वह उस घर में घुसी है इसलिए बिल्ली ही होगी। उन्होंने बच्चों से बिल्ली के बच्चे को खोल देने को कहा। बच्चों ने उनकी आज्ञा का पालन किया। बिल्ली कमरे में घुसने के बाद अंधेरे में छिप गई थी। जब बच्चों ने बिल्ली के बच्चे को खोला तो वह आंगन की तरफ बढ़ने लगा। अभी वह अम्मा की चारपाई तक आया ही था कि बिल्ली के वेश में घुसा जंगली बिल्ले ने उस पर हमला बोल दिया और बच्चे की गर्दन मुंह में दबा कर भाग खड़ा हुआ। बच्चा म्याऊं-म्याऊं करता रह गया।
यह देखकर सभी सकते में आ गए। तत्काल किसी को कुछ नहीं सूझा। जब तक बच्चे बिल्ले का पीछा करते वह घर से निकल कर पास के जंगल में गायब हो चुका था।
निराश अम्मा चारपाई पर धड़ाम से गिर पड़ीं। लेटे-लेटे ही बोलीं कि इसीलिए कह रही थी कि इसे मत पालो। मर जाने दो। आखिर मर ही गया न। इतने दिन तक परेशान होते रहे और वह मुआ एक ही झटके में काम तमाम कर गया। उन्हें बिल्ली के बच्चे के साथ मिठ्ठू की भी याद आ गई और उस रात उन्होंने फिर खाना नहीं खाया।

संपर्क : 61, शक्तिविहार, फेस-1, माजरा, देहरादून।
मोबाइल : ९७५९१८९५५९ 9536901397

Sunday 15 August 2010

मगही दिवस के रूप मे मनेगी योगेश की जयंती

बाढ़ । मगही कवि स्व. योगेश्वर सिंह योगेश की पुण्यतिथि समारोह के मौके पर बीती रात नीरपुर गांव मे अखिल भारतीय मगही-कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन की अध्यक्षता साहित्यकार (magahi akadami ke adhyaksh) उदय शंकर ने की जबकि संचालन मगही के चर्चित कवि रामाश्रय झा ने किया। सम्मेलन मे बिहार व यूपी की विभिन्न जगहो से आये साहित्य- काव्य के कई दिग्गज पुरोधा शामिल हुए। कवियो की व्यंगात्मक व समाजिक कुरितियो पर प्रहार करती काव्य रस की सुर सरिता मे श्रोतागण देर रात तक झूमते रहे। हिसुआ से आये चर्चित कवि दीनबंधु, कवि कारू गोप, जयराम जी, व गोपालगंज के पंकज जी समेत अन्य साहित्यकारो ने सामाजिक अव्यवस्था पर चोट करती कविता पाठकर लोगो को मंत्र मुग्ध कर दिया। इस मौके पर कवि योगेश फाउंडेशन के द्वारा मगही मंडल के अध्यक्ष व वरिष्ठ साहित्यकार डा. रामनंदन जी को 2010 का योगेश शिखर सम्मान प्रदान किया गया। एक साथ जुटे मगही साहित्य के दिग्गजो ने इस मौके पर घोषणा किया कि कवि स्व. योगेश की जयंती 23 अक्टूबर को मगही दिवस के रूप मे मनाया जायेगा। समापन समारोह को संबोधित करते हुए मृत्युंजय कुमार ने कहा कि कवि योगेश जी की 1950 के दशक की दुर्लभ पांडुलिपियां मगही मंडल व बिहार सरकार को de देंगे ताकि मगही साहित्य का प्रचार प्रसार व्यापक रूप से हो सके।

Friday 20 March 2009

यादें

मित्र,
आपके शहर से गुजर रहा था
ट्रेन में बैठा
ट्रेन भाग रही थी
उससे भी तेज गति से भाग रही थीं मेरी यादें

यादें जो ढूह बन गईं थीं
भरभरा कर गिर रही थी

कितने हसीन थे वो दिन, वो पल
जब हम बैठकर
घंटों बातें किया करते थे
वे दिन और आज का दिन

यादों का पहाड़
सीने पर लिए जी रहे हैं
फिर रहे हैं
इस शहर से उस शहर

सच बताना मेरे दोस्त
बीते दिनों की यादों में
कभी मेरा चेहरा उभरता है?
मेरे दिल में तो मचता है हाहाकार
और आंखों से टपक पड़ते हैं आंसू

सोचता हूं
क्या बीते दिन लौटेंगे?
काश! लौट पाते बीते दिन!

मेरे यार, क्या हमारी यादें जंगल बन जाएंगी?
हम क्या इन्हें गुलशन नहीं बना सकते ?

(बिछड़े दोस्तों के नाम )

Tuesday 7 October 2008

कहानी - कोढ़ी का नल

अन्तिम भाग
--
उसने नल की तरफ देखा। अब वहां चिड़ियां नहीं थीं। उसने इधर-उधर निगाह दौडाई। चिड़ियां पास के नीम के पेड पर फुदक-फुदक कर चहक रही थीं। नल पे़ड की छाया में निर्विकार भाव से खड़ा था। उसका हत्था नीचे की तरफ लटका हुआ था...।
रामनाथ नल पर गया। अपनी चादर को भिगोया और वापस आकर चारपाई पर गीली चादर को ढकर लेट गया। गीले कपड़े से उसे गर्मी से थोडी राहत महसूस हुई। हल्की-हल्की हवा भी चलने लगी थी और सूरज भी पश्चिम दिशा की तरफ बढ़ने लगा था।
गर्मी से थोडी राहत मिली तो रामनाथ नींद की आगोश में समा गया।
दो पथिकों के वार्तालाप ने उसकी नींद को तोडा। पथिक कहीं से आ रहे थे। उन्हें प्यास लगी थी। नल को देखा तो पानी पीने लगे।
- यार किसी पुण्यात्मा ने यह नल लगवाया होगा। राहगीरों को पानी पीने से तृप्ति मिली तो उनके उद्गार बाहर आ गए।
- सो तो है ही भाई। आज के जमाने में तो लोग नल घर के अंदर लगवाते हैं। बाहर लगवा भी दिए तो हत्था निकाल कर रख देते हैं। दूसरे राहगीर ने पहले वाले की बात को आगे बढ़ाया और आगे बढ़ लिए।
रामनाथ के कानों में पुण्यात्मा शब्द गूंज रहा था। वह सोचने लगा कि मैं भी पुण्यात्मा हूँ । तो मैं पापी नहीं हूँ । वह भावुक होने लगा। लेकिन तुरंत उसके दिमाग में यह विचार आया कि या मुझे पुण्यात्मा कहने वाले लोग यदि यह जानते कि यह नल मेरा है यानी एक कोढी का तो या तब भी यह लोग पुण्यात्मा कहते? यही नहीं तब शायद यह लोग इस नल का पानी ही न पीते? रामनाथ इन्हीं विचारों में उलझा था कि उसे नल केपास से बाल्टी रखने की आवाज आई। उसने नल की तरफ देखा तो वहां पर अपने पड़ोसी की लड़की को बाल्टी लिए खड़ी पाया। रामनाथ को आश्चर्य हुआ। वह उठकर बैठ गया। सोचने लगा कि यह बच्ची मेरे नल पर पानी भरने आई है। ऐसी या बात हो गई। या इसके घरवालों ने भेजा है? लगता है कि गलती से आ गई है। शायद इसे अपने पिता की भावनाएं नहीं मालूम हैं। इसके पिता तो मेरा मुंह भी नहीं देखना चाहते। यह मेरे नल से पानी भरेगी?
रामनाथ चिंतामग्न था और लड़की दो बाल्टी पानी भर कर चली गई। सूरज ढल गया था। गर्मी कम हो गई थी। मंद-मंद हवा चलने लगी थी। रामनाथ को फिर नींद आ गई। इस बार उसकी आंख खुली तो देखा नल पर भीड़ लगी है। लाइन में बाल्टियां रखी हुई हैं। पंक्तिबद्ध लोग अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उसी लाइन में रामनाथ की घरवाली भी खड़ी है...। रामनाथ को आश्चर्य हुआ। अपनी ही नल पर पानी भरने के लिए लाइन में लगना पड़े...। उसे गुस्सा आ गया। अपनी चीज का उपयोग करने के लिए लाइन में खड़ा होना पड़े वह भी उन लोगों के बीच जो उससे नफरत करते हैं...। अभी सब को भगा देता हूँ । गुस्से के मारे वह पसीने से भीग गया...।
- विमली की अम्मा। वह गुस्से में चीख पड़ा। उसकी आवाज सुनकर नल पर खड़े सभी लोग सहम गए...।
रामनाथ की आवाज सुनकर उसकी घरवाली उसके पास आ गई तो वह एक बर फिर चीखा।
- यह सब या है?
नल पर खड़े लोग फिर सहम गए...। कई लोग तो अपनी बाल्टी उठाने लगे...।
- सरकारी नल खराब हो गया है। इसलिए...।
- हमने ठेका ले रखा है या? रामनाथ ने अपनी घरवाली की बात को बीच में ही काट दिया।
- पागल हो गए हो या?
- हां, मैं पागल हो गया हूँ । यह कहकर रामनाथ उठा और नल की तरफ चल पड़ा।
- देखो, किसी को कुछ मत कहना। रामनाथ को नल की तरफ जाते देख उसकी घरवाली ने उसे समझाने के लहजे में कहा। जवाब में रामनाथ कुछ नहीं बोला। उसे नल पर आता देख सभी लोग अपना-अपना बर्तन उठाकर चलने का उपक्रम करने लगे तो बोल पड़ा।
- आप लोग पानी भर कर ही जाएं। बस मुझे जरा यह गमछा गीला करना है और दो घूंट पानी पीना है, यदि आप लोग इजाजत दें तो....।
कोई कुछ नहीं बोला। जो जहां था खड़ा रहा। रामनाथ पानी पीने लगा तो एक ने नल चला दिया। रामनाथ ने गमछा भिगोया और घर की तरफ चल पड़ा।
लौटते हुए वह खुश था...। सूर्य की गर्मी से तप रही धरती पर वह नंगे पैर चल रहा था, लेकिन उसे तपन का एहसास भी नहीं हो रहा था...। -समाप्त-
पहले के हिस्से के लिए यहाँ क्लिक करें-
कहानी - कोढ़ी का नल - भाग एक
कहानी - कोढ़ी का नल - भाग दो
कहानी - कोढ़ी का नल - भाग तीन




Monday 6 October 2008

कहानी कोढ़ी का नल

भाग तीन

- क्या सोच रहे हो? कितनी बार कहा है कि नल पर मत जाया करो। लेकिन मेरी सुनते ही नहीं। रामनाथ की घरवाली ने पानी से भरी बाल्टी जमीन पर रखते हुए कहा।
- क्यों न जाऊं? नल या उनके बाप का है? या मैं आदमी नहीं हूँ ? रामनाथ अभी तक जिस गुस्से को पानी की तरह पी रहे थे उसे पत्नी पर उलच दिया।
- कहावत है कि शूद्र की गगरी दाना, शूद्र पड़ा उताना। आजकल कमाई हो रही है तो इनकी आंखों पर चर्बी चढ़ गई है।
- तब मैं कोढ़ी नहीं था जब यह लोग यहां आकर बसे थे और हमसे ही मांग कर पानी पीने थे? रामनाथ ने पत्नी से सवाल किया। हालांकि यह प्रश्न वह उन लोगों से पूछना चाहते थे।
- आदमी का मतलब निकल जाता है तो उसकी चाल ऐसे ही बदल जाती है।
- कोई बात नहीं। ईश्वर ने चाहा तो कभी मेरा भी व त आएगा। तू एक काम कर, मेरा गमछा भिगा दे। मैं बाजार होकर आता हूँ ।
- बाजार किसलिए?
- दवा लेनी है और वैसे ही चिक (मांस बेचने वाला कसाई) से पैसा लेकर नल (हैंडपंप) ले आता हूँ । अब नहीं दिखाना इनको अपना मुंह ।
- नल तो बहुत महंगी आएगी। इतने पैसे?
- हां, तीन बकरी बेचनी पड़ेगी।
- फिर बचेंगी क्या ?
- जो बचेंगी बहुत हैं। अब मुझसे सहा नहीं जाता।
- ठीक है, लेकिन जल्दी आना। न हो विमली को साथ लेते जाओ।
- पैरों की अभी उंगलियां ही कटी हैं। इतना अपंग भी नहीं हूँ पगली।
रामनाथ ने नल (हैंडपंप) लगवा लिया। चमनगंज के लिए यह एक अनोखी घटना थी। जिसने सुना उसी को आश्चर्य हुआ। रामनाथ कोढ़ी ने नल लगवा लिया! अच्छा रामनाथ ने नल लगवा लिया...। साला पैसा कहां से लाया? अरे उसकी औलादों को नहीं देखते कितनी गोरी हैं...। जितने मुंह उतनी बातें। तमाम तरह की घटिया बातों से लोगों ने चमनगंज के वायुमंडल को दूषित कर दिया...। ऐसा नहीं था कि इन बातों से रामनाथ अंजान था। ऐसी बातें उसके कानों तक पहुंचतीं तो वह तिलमिला जाता, लेकिन गालियों का रामायण पाठ करने के सिवा कुछ कर न पाता। कहता कि सालों को मेरे खाली खूंटे नहीं दिखते।
---
जेठ का महिना और दोपहर का समय। गर्मी अपनी जवानी का एहसास कराने के लिए फिल्मी नायिका की तरह अश्लील नृत्य कर रही है। ऐसे में रामनाथ के लिए परेशानी और बढ़ गई है। बीमारी की वजह से उसे गर्मी बर्दाश्त नहीं होती। लगता है जैसे बदन में आग लग गई है। इसलिए वह अपने काले नंगे बदन पर एक भीगा कपड़ा हमेशा लपेटे रहता है। इस समय उसका भीगा कपड़ा सूख गया है।
वह चारपाई पर उठकर बैठ गया है। निगाह खाली खूंटे पर चली गई और दिमाग खराब हो गया। गाली देने के बाद उसने इधर-उधर देखा। दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आया। केवल दोपहर सांय-सांय करती नजर आई। जहां तक नजर गई धूप ही धूप दिखाई पड़ी। उसकी आंखें सिकुड गईं और लाल-पीला सा दिखाई पड़ने लगा। उफ! गर्मी बहुत है। लगता है जान लेकर ही रहेगी। रामनाथ बुदबुदाया और ऊपर देखने लगा। नीम के पेड की डालों और पत्तों से छन-छन कर सूर्य की किरणें उसकी चारपाई पर आ रही थीं। उसने चारपाई को उस तरफ खींच लिया जिधर छाया घनी थी। चारपाई छाया में करने के बाद रामनाथ नल की तरफ बढ़ा। चार कदम चलने के बाद उसके पैर रुक गए। नल के आस-पास के गढ्डों में रुके पानी में चिड़ियां चहचहा कर नहा और पानी पी रही थीं। मेरे जाने से उन्हें उड़ना पड़ेगा यही सोचकर रामनाथ नल के पास नहीं गया। वह चारपाई पर आकर बैठ गया और प्रेम भाव से चिड़ियों को पानी पीते देखने लगा। चिड़ियां अपने में मस्त दुनिया से बेखबर पर आत्मरक्षा के लिए सजग थोडे से गंदे पानी में प्रसन्ता पूर्वक स्नान करते हुए खेल रही थीं।
रामनाथ को यह दृश्य बड़ा प्यारा लगा। इस तन्मयता में वह यह भी भूल गया कि उसके घावों पर मि खयां बैठी हैं। मक्खियों ने घावों से खून निकाल दिया। दर्द से तड़प कर उसने घावों पर हाथ रख दिया और कई मक्खियाँ मौत के मुंह में समा गईं। मक्खियों के मरने से उसे दुश्मन को मार गिराने जैसा आनंद मिला। लेकिन मक्खियाँ उसका पीछा छोड ही नहीं रही थीं। उसे बड़ी कोफ्त हुई। वह सभी मि खयों को मार देना चाहता था, लेकिन यह काम उसके वश में नहीं था। फिर भी वह काफी देर तक प्रयास करता रहा। तंग आकर अपने घावों को कपड़े से बांध लिया और मक्खियों को एक भद्दी सी गाली दी।
जारी .....

Saturday 4 October 2008

कहानी कोढ़ी का नल

भाग दो
---
बहुत पहले यहां जंगल हुआ करता था। जिसमें ढाक के पेड़ बहुतायत में थे। इनके अलावा बबूल और कटाई की झांडियां थीं। जहां इनका वास नहीं था वह जमीन ऊसर थी। उसमें रेह पैदा होती थी। जिसमें घास भी नहीं उगती। इस बौने जंगल में जहां सांप-बिच्छू रहते थे, वहीं जंगली सूअर और गीदड़ जैसे प्राणी भी रहते थे। इन्हीं के बीच दो घर मनुष्यों के थे, जिन्हें दूसरे गांव के लोग वनप्राणी कहते थे। जब जमींदारी का जमाना था तो इनके पूर्वज कहीं से आकर यहां बस गए थे। पहले यह एक ही घर थे, लेकिन खानदान की वृद्धि हुई तो दो हो गए। इन्हें वनप्राणी इसलिए कहा जाता था, योंकि इन्होंने यहां बसने के बाद और किसी इनसान को बसने ही नहीं दिया। जिसने भी कोशिश की उसे मुंह की खानी पड़ी। हालांकि जंगली जानवरों से मुकाबले के लिए इन्हें समाज की जरूरत थी, लेकिन वन संपदा का बंटवारा न हो जाए इसलिए यह लोग इस जगह को आबाद नहीं होने दे रहे थे।
समय के साथ यह वनप्राणी भी बदले। इन्हें भी समाज की जरूरत महसूस हुई। इसके बाद इन्होंने यहां पर लोगों को बसने की इजाजत दी।
यहां पर बसने वाले दूसरे गांवों के फालतू लोग थे। फालतू इसलिए कि इन्हें अपने गांवों में बाहर ही बसने की इजाजत थी। ये दलित थे, जिन्हें अछूत समझा जाता था। अधिकतर लोग इनका छुआ पानी तक नहीं पीते थे। इनमें से अधिकतर भूमिहीन थे। यह लोग अपने गांव से उत्पीड़ित थे। इस जंगल में खुली जगह की आस में आकर बसने लगे। हालांकि यह वनप्राणी भी सवर्ण थे और इन्हें भी दलितों से कोई लगाव नहीं था, लेकिन इनकी मजबूरी थी कि और किसी जाति का व्यि त यहां पर बसने को तैयार नहीं था।
यहां बसने सबसे पहले आया था शरीर से अपंग रामनाथ। उसके पूरे शरीर में कोढ़ था और वह कोई भी काम कर पाने में असमर्थ था। उसकी पत्नी थी और दो सुंदर बेटियां। जिनके सहारे वह जीवन व्यतीत कर रहा था। अपने मूल गांव से यहां आकर बसने में उसकी जाति और बीमारी ही खास वजह थी।
पहले का दो घरों वाला वनगंज अब तीस घरों वाला चमनगंज हो गया है। पहले के दो घरों को छोड़ दिया जाए तो यहां के सभी निवासी रामनाथ की जाति के ही हैं। ऊपरी तौर पर लोगों में भले ही एकता दिखती हो लेकिन रामनाथ के प्रति लोगों में घृणा की ही भावना है। इसकी वजह है उसकी बीमारी।
वैसे तो रामनाथ किसी से कोई वास्ता नहीं रखता है लेकिन इसका या किया जाए कि इन सबके पीने के पानी के लिए केवल एक ही साधन है, वह है सरकारी नल। यह भी इनके वोट बैंक की वजह से ग्राम प्रधान ने लगवा दिया, नहीं तो पहले वनप्राणियों के खेत की सिंचाई वाले खंडहर हो चुके कुएं से ही इनका काम चलता था। यहां से पानी भरने के बदले में इन्हें समय-समय पर वनप्राणियों के यहां बेगार करनी पड़ती थी।
रामनाथ के लिए पहले वाली ही स्थिति सही थी। जब से सरकारी नल लगा है तब से उसकी मुसीबतें बढ़ गई हैं।
जारी .....