Friday 20 March 2009

यादें

मित्र,
आपके शहर से गुजर रहा था
ट्रेन में बैठा
ट्रेन भाग रही थी
उससे भी तेज गति से भाग रही थीं मेरी यादें

यादें जो ढूह बन गईं थीं
भरभरा कर गिर रही थी

कितने हसीन थे वो दिन, वो पल
जब हम बैठकर
घंटों बातें किया करते थे
वे दिन और आज का दिन

यादों का पहाड़
सीने पर लिए जी रहे हैं
फिर रहे हैं
इस शहर से उस शहर

सच बताना मेरे दोस्त
बीते दिनों की यादों में
कभी मेरा चेहरा उभरता है?
मेरे दिल में तो मचता है हाहाकार
और आंखों से टपक पड़ते हैं आंसू

सोचता हूं
क्या बीते दिन लौटेंगे?
काश! लौट पाते बीते दिन!

मेरे यार, क्या हमारी यादें जंगल बन जाएंगी?
हम क्या इन्हें गुलशन नहीं बना सकते ?

(बिछड़े दोस्तों के नाम )

Tuesday 7 October 2008

कहानी - कोढ़ी का नल

अन्तिम भाग
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उसने नल की तरफ देखा। अब वहां चिड़ियां नहीं थीं। उसने इधर-उधर निगाह दौडाई। चिड़ियां पास के नीम के पेड पर फुदक-फुदक कर चहक रही थीं। नल पे़ड की छाया में निर्विकार भाव से खड़ा था। उसका हत्था नीचे की तरफ लटका हुआ था...।
रामनाथ नल पर गया। अपनी चादर को भिगोया और वापस आकर चारपाई पर गीली चादर को ढकर लेट गया। गीले कपड़े से उसे गर्मी से थोडी राहत महसूस हुई। हल्की-हल्की हवा भी चलने लगी थी और सूरज भी पश्चिम दिशा की तरफ बढ़ने लगा था।
गर्मी से थोडी राहत मिली तो रामनाथ नींद की आगोश में समा गया।
दो पथिकों के वार्तालाप ने उसकी नींद को तोडा। पथिक कहीं से आ रहे थे। उन्हें प्यास लगी थी। नल को देखा तो पानी पीने लगे।
- यार किसी पुण्यात्मा ने यह नल लगवाया होगा। राहगीरों को पानी पीने से तृप्ति मिली तो उनके उद्गार बाहर आ गए।
- सो तो है ही भाई। आज के जमाने में तो लोग नल घर के अंदर लगवाते हैं। बाहर लगवा भी दिए तो हत्था निकाल कर रख देते हैं। दूसरे राहगीर ने पहले वाले की बात को आगे बढ़ाया और आगे बढ़ लिए।
रामनाथ के कानों में पुण्यात्मा शब्द गूंज रहा था। वह सोचने लगा कि मैं भी पुण्यात्मा हूँ । तो मैं पापी नहीं हूँ । वह भावुक होने लगा। लेकिन तुरंत उसके दिमाग में यह विचार आया कि या मुझे पुण्यात्मा कहने वाले लोग यदि यह जानते कि यह नल मेरा है यानी एक कोढी का तो या तब भी यह लोग पुण्यात्मा कहते? यही नहीं तब शायद यह लोग इस नल का पानी ही न पीते? रामनाथ इन्हीं विचारों में उलझा था कि उसे नल केपास से बाल्टी रखने की आवाज आई। उसने नल की तरफ देखा तो वहां पर अपने पड़ोसी की लड़की को बाल्टी लिए खड़ी पाया। रामनाथ को आश्चर्य हुआ। वह उठकर बैठ गया। सोचने लगा कि यह बच्ची मेरे नल पर पानी भरने आई है। ऐसी या बात हो गई। या इसके घरवालों ने भेजा है? लगता है कि गलती से आ गई है। शायद इसे अपने पिता की भावनाएं नहीं मालूम हैं। इसके पिता तो मेरा मुंह भी नहीं देखना चाहते। यह मेरे नल से पानी भरेगी?
रामनाथ चिंतामग्न था और लड़की दो बाल्टी पानी भर कर चली गई। सूरज ढल गया था। गर्मी कम हो गई थी। मंद-मंद हवा चलने लगी थी। रामनाथ को फिर नींद आ गई। इस बार उसकी आंख खुली तो देखा नल पर भीड़ लगी है। लाइन में बाल्टियां रखी हुई हैं। पंक्तिबद्ध लोग अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उसी लाइन में रामनाथ की घरवाली भी खड़ी है...। रामनाथ को आश्चर्य हुआ। अपनी ही नल पर पानी भरने के लिए लाइन में लगना पड़े...। उसे गुस्सा आ गया। अपनी चीज का उपयोग करने के लिए लाइन में खड़ा होना पड़े वह भी उन लोगों के बीच जो उससे नफरत करते हैं...। अभी सब को भगा देता हूँ । गुस्से के मारे वह पसीने से भीग गया...।
- विमली की अम्मा। वह गुस्से में चीख पड़ा। उसकी आवाज सुनकर नल पर खड़े सभी लोग सहम गए...।
रामनाथ की आवाज सुनकर उसकी घरवाली उसके पास आ गई तो वह एक बर फिर चीखा।
- यह सब या है?
नल पर खड़े लोग फिर सहम गए...। कई लोग तो अपनी बाल्टी उठाने लगे...।
- सरकारी नल खराब हो गया है। इसलिए...।
- हमने ठेका ले रखा है या? रामनाथ ने अपनी घरवाली की बात को बीच में ही काट दिया।
- पागल हो गए हो या?
- हां, मैं पागल हो गया हूँ । यह कहकर रामनाथ उठा और नल की तरफ चल पड़ा।
- देखो, किसी को कुछ मत कहना। रामनाथ को नल की तरफ जाते देख उसकी घरवाली ने उसे समझाने के लहजे में कहा। जवाब में रामनाथ कुछ नहीं बोला। उसे नल पर आता देख सभी लोग अपना-अपना बर्तन उठाकर चलने का उपक्रम करने लगे तो बोल पड़ा।
- आप लोग पानी भर कर ही जाएं। बस मुझे जरा यह गमछा गीला करना है और दो घूंट पानी पीना है, यदि आप लोग इजाजत दें तो....।
कोई कुछ नहीं बोला। जो जहां था खड़ा रहा। रामनाथ पानी पीने लगा तो एक ने नल चला दिया। रामनाथ ने गमछा भिगोया और घर की तरफ चल पड़ा।
लौटते हुए वह खुश था...। सूर्य की गर्मी से तप रही धरती पर वह नंगे पैर चल रहा था, लेकिन उसे तपन का एहसास भी नहीं हो रहा था...। -समाप्त-
पहले के हिस्से के लिए यहाँ क्लिक करें-
कहानी - कोढ़ी का नल - भाग एक
कहानी - कोढ़ी का नल - भाग दो
कहानी - कोढ़ी का नल - भाग तीन




Monday 6 October 2008

कहानी कोढ़ी का नल

भाग तीन

- क्या सोच रहे हो? कितनी बार कहा है कि नल पर मत जाया करो। लेकिन मेरी सुनते ही नहीं। रामनाथ की घरवाली ने पानी से भरी बाल्टी जमीन पर रखते हुए कहा।
- क्यों न जाऊं? नल या उनके बाप का है? या मैं आदमी नहीं हूँ ? रामनाथ अभी तक जिस गुस्से को पानी की तरह पी रहे थे उसे पत्नी पर उलच दिया।
- कहावत है कि शूद्र की गगरी दाना, शूद्र पड़ा उताना। आजकल कमाई हो रही है तो इनकी आंखों पर चर्बी चढ़ गई है।
- तब मैं कोढ़ी नहीं था जब यह लोग यहां आकर बसे थे और हमसे ही मांग कर पानी पीने थे? रामनाथ ने पत्नी से सवाल किया। हालांकि यह प्रश्न वह उन लोगों से पूछना चाहते थे।
- आदमी का मतलब निकल जाता है तो उसकी चाल ऐसे ही बदल जाती है।
- कोई बात नहीं। ईश्वर ने चाहा तो कभी मेरा भी व त आएगा। तू एक काम कर, मेरा गमछा भिगा दे। मैं बाजार होकर आता हूँ ।
- बाजार किसलिए?
- दवा लेनी है और वैसे ही चिक (मांस बेचने वाला कसाई) से पैसा लेकर नल (हैंडपंप) ले आता हूँ । अब नहीं दिखाना इनको अपना मुंह ।
- नल तो बहुत महंगी आएगी। इतने पैसे?
- हां, तीन बकरी बेचनी पड़ेगी।
- फिर बचेंगी क्या ?
- जो बचेंगी बहुत हैं। अब मुझसे सहा नहीं जाता।
- ठीक है, लेकिन जल्दी आना। न हो विमली को साथ लेते जाओ।
- पैरों की अभी उंगलियां ही कटी हैं। इतना अपंग भी नहीं हूँ पगली।
रामनाथ ने नल (हैंडपंप) लगवा लिया। चमनगंज के लिए यह एक अनोखी घटना थी। जिसने सुना उसी को आश्चर्य हुआ। रामनाथ कोढ़ी ने नल लगवा लिया! अच्छा रामनाथ ने नल लगवा लिया...। साला पैसा कहां से लाया? अरे उसकी औलादों को नहीं देखते कितनी गोरी हैं...। जितने मुंह उतनी बातें। तमाम तरह की घटिया बातों से लोगों ने चमनगंज के वायुमंडल को दूषित कर दिया...। ऐसा नहीं था कि इन बातों से रामनाथ अंजान था। ऐसी बातें उसके कानों तक पहुंचतीं तो वह तिलमिला जाता, लेकिन गालियों का रामायण पाठ करने के सिवा कुछ कर न पाता। कहता कि सालों को मेरे खाली खूंटे नहीं दिखते।
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जेठ का महिना और दोपहर का समय। गर्मी अपनी जवानी का एहसास कराने के लिए फिल्मी नायिका की तरह अश्लील नृत्य कर रही है। ऐसे में रामनाथ के लिए परेशानी और बढ़ गई है। बीमारी की वजह से उसे गर्मी बर्दाश्त नहीं होती। लगता है जैसे बदन में आग लग गई है। इसलिए वह अपने काले नंगे बदन पर एक भीगा कपड़ा हमेशा लपेटे रहता है। इस समय उसका भीगा कपड़ा सूख गया है।
वह चारपाई पर उठकर बैठ गया है। निगाह खाली खूंटे पर चली गई और दिमाग खराब हो गया। गाली देने के बाद उसने इधर-उधर देखा। दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आया। केवल दोपहर सांय-सांय करती नजर आई। जहां तक नजर गई धूप ही धूप दिखाई पड़ी। उसकी आंखें सिकुड गईं और लाल-पीला सा दिखाई पड़ने लगा। उफ! गर्मी बहुत है। लगता है जान लेकर ही रहेगी। रामनाथ बुदबुदाया और ऊपर देखने लगा। नीम के पेड की डालों और पत्तों से छन-छन कर सूर्य की किरणें उसकी चारपाई पर आ रही थीं। उसने चारपाई को उस तरफ खींच लिया जिधर छाया घनी थी। चारपाई छाया में करने के बाद रामनाथ नल की तरफ बढ़ा। चार कदम चलने के बाद उसके पैर रुक गए। नल के आस-पास के गढ्डों में रुके पानी में चिड़ियां चहचहा कर नहा और पानी पी रही थीं। मेरे जाने से उन्हें उड़ना पड़ेगा यही सोचकर रामनाथ नल के पास नहीं गया। वह चारपाई पर आकर बैठ गया और प्रेम भाव से चिड़ियों को पानी पीते देखने लगा। चिड़ियां अपने में मस्त दुनिया से बेखबर पर आत्मरक्षा के लिए सजग थोडे से गंदे पानी में प्रसन्ता पूर्वक स्नान करते हुए खेल रही थीं।
रामनाथ को यह दृश्य बड़ा प्यारा लगा। इस तन्मयता में वह यह भी भूल गया कि उसके घावों पर मि खयां बैठी हैं। मक्खियों ने घावों से खून निकाल दिया। दर्द से तड़प कर उसने घावों पर हाथ रख दिया और कई मक्खियाँ मौत के मुंह में समा गईं। मक्खियों के मरने से उसे दुश्मन को मार गिराने जैसा आनंद मिला। लेकिन मक्खियाँ उसका पीछा छोड ही नहीं रही थीं। उसे बड़ी कोफ्त हुई। वह सभी मि खयों को मार देना चाहता था, लेकिन यह काम उसके वश में नहीं था। फिर भी वह काफी देर तक प्रयास करता रहा। तंग आकर अपने घावों को कपड़े से बांध लिया और मक्खियों को एक भद्दी सी गाली दी।
जारी .....

Saturday 4 October 2008

कहानी कोढ़ी का नल

भाग दो
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बहुत पहले यहां जंगल हुआ करता था। जिसमें ढाक के पेड़ बहुतायत में थे। इनके अलावा बबूल और कटाई की झांडियां थीं। जहां इनका वास नहीं था वह जमीन ऊसर थी। उसमें रेह पैदा होती थी। जिसमें घास भी नहीं उगती। इस बौने जंगल में जहां सांप-बिच्छू रहते थे, वहीं जंगली सूअर और गीदड़ जैसे प्राणी भी रहते थे। इन्हीं के बीच दो घर मनुष्यों के थे, जिन्हें दूसरे गांव के लोग वनप्राणी कहते थे। जब जमींदारी का जमाना था तो इनके पूर्वज कहीं से आकर यहां बस गए थे। पहले यह एक ही घर थे, लेकिन खानदान की वृद्धि हुई तो दो हो गए। इन्हें वनप्राणी इसलिए कहा जाता था, योंकि इन्होंने यहां बसने के बाद और किसी इनसान को बसने ही नहीं दिया। जिसने भी कोशिश की उसे मुंह की खानी पड़ी। हालांकि जंगली जानवरों से मुकाबले के लिए इन्हें समाज की जरूरत थी, लेकिन वन संपदा का बंटवारा न हो जाए इसलिए यह लोग इस जगह को आबाद नहीं होने दे रहे थे।
समय के साथ यह वनप्राणी भी बदले। इन्हें भी समाज की जरूरत महसूस हुई। इसके बाद इन्होंने यहां पर लोगों को बसने की इजाजत दी।
यहां पर बसने वाले दूसरे गांवों के फालतू लोग थे। फालतू इसलिए कि इन्हें अपने गांवों में बाहर ही बसने की इजाजत थी। ये दलित थे, जिन्हें अछूत समझा जाता था। अधिकतर लोग इनका छुआ पानी तक नहीं पीते थे। इनमें से अधिकतर भूमिहीन थे। यह लोग अपने गांव से उत्पीड़ित थे। इस जंगल में खुली जगह की आस में आकर बसने लगे। हालांकि यह वनप्राणी भी सवर्ण थे और इन्हें भी दलितों से कोई लगाव नहीं था, लेकिन इनकी मजबूरी थी कि और किसी जाति का व्यि त यहां पर बसने को तैयार नहीं था।
यहां बसने सबसे पहले आया था शरीर से अपंग रामनाथ। उसके पूरे शरीर में कोढ़ था और वह कोई भी काम कर पाने में असमर्थ था। उसकी पत्नी थी और दो सुंदर बेटियां। जिनके सहारे वह जीवन व्यतीत कर रहा था। अपने मूल गांव से यहां आकर बसने में उसकी जाति और बीमारी ही खास वजह थी।
पहले का दो घरों वाला वनगंज अब तीस घरों वाला चमनगंज हो गया है। पहले के दो घरों को छोड़ दिया जाए तो यहां के सभी निवासी रामनाथ की जाति के ही हैं। ऊपरी तौर पर लोगों में भले ही एकता दिखती हो लेकिन रामनाथ के प्रति लोगों में घृणा की ही भावना है। इसकी वजह है उसकी बीमारी।
वैसे तो रामनाथ किसी से कोई वास्ता नहीं रखता है लेकिन इसका या किया जाए कि इन सबके पीने के पानी के लिए केवल एक ही साधन है, वह है सरकारी नल। यह भी इनके वोट बैंक की वजह से ग्राम प्रधान ने लगवा दिया, नहीं तो पहले वनप्राणियों के खेत की सिंचाई वाले खंडहर हो चुके कुएं से ही इनका काम चलता था। यहां से पानी भरने के बदले में इन्हें समय-समय पर वनप्राणियों के यहां बेगार करनी पड़ती थी।
रामनाथ के लिए पहले वाली ही स्थिति सही थी। जब से सरकारी नल लगा है तब से उसकी मुसीबतें बढ़ गई हैं।
जारी .....

Thursday 2 October 2008

कहानी कोढ़ी का नल

भाग एक
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सूरज जागने के लिए मसमसा ही रहा था कि रामनाथ उठ गया। परिवेश में ठंडी हवा तारी थी, जिससे रामनाथ का बिना कपड़े वाला बदन सिहर जा रहा था। पेडों पर चिड़ियां चहचहा रही थीं। एक्का दुक्का आदमी दिशा-मैदान के लिए हाथ में पानी का लोटा लिए बीड़ी का धुआं उगलते-निगलते और खांसते-खकारते जा रहे थे।
दिशा-मैदान से वापस आने के बाद रामनाथ पानी लेने के लिए नल पर चला गया। इस समय वहां पानी भरने के लिए चार-छह लोग पहले से ही खड़े थे। उन लोगों को सुबह-सुबह रामनाथ का नल पर आना अच्छा नहीं लगा। लोगों ने मुंह तो बिचकाया ही अपनी घृणा को दबा भी नहीं पाये।
- आज का दिन ठीक नहीं गुजर सकता। उनमें से एक ने अपने उद्गार व्य त किए।
- सुबह-सुबह कोढी-कलंदर का मुंह देखने के बाद दिन भर अन्न नहीं मिलता। दूसरे ने टिप्पणी की जो रामनाथ के दिल में तीर सी लगी। एक अनजान दर्द से उसका शरीर सिहर गया।
- हाथ-पैर नहीं हैं फिर भी घूमने की इतनी तमन्ना। एक की और झन्नाटेदार टिप्पणी जो रामनाथ को थप्पड़ सी लगी।
- आदमी को खुद ही सोचना चाहिए। दूसरों का दिन इस तरह से खराब नहीं करना चाहिए।
नल पर उपस्थित लोग इस तरह आपस में बोलते रहे। रामनाथ सोचता रहा। बीमार हो जाने से आदमी या इतना मनहूस हो जाता है? उसके मन में आया कि वह कहे कि न मिले तुम्हें खाना, न गुजरे तुम्हारा दिन सहीसलामत लेकिन मैं रोज सुबह आऊंगा, पर वह बोल नहीं पाया। शब्द उसके हलक में फंस कर रह गए। हाथ में बाल्टी लिए खड़ा रहा और सोचता रहा कि ईश्वर ने या जिंदगी दे दी है। हर कोई घृणा करता है। मुझे देखकर लोगों को उबकाई आती है। सब अपने कर्मों का फल है। ऐसा सोचकर उसने अपने जलते कालेजे को शांत करने की कोशिश की। लोग कहते हैं कि जो बहुत पाप करता है वहीं कोढी होता है। तो या मैं पूर्व जन्म में अत्याचार करने वाला जमींदार था या राजा? कुछ ऐसा ही रहा होऊंगा, पंडित राधेश्याम और जगेश्वर प्रसाद सिंह की तरह आदमी को जिंदा जलाने वाला और कमजोर लोगों को सताने तथा उनकी बहू-बेटियों की अस्मत लूटने वाला। यदि ऐसा होता तो धरती कोढ़ियों से भर जाती। हो सकता है मैंने इससे भी बड़ा पाप किया हो। भगवान भी बड़े अन्यायी हैं। पूर्व जनम की सजा अब दे रहे हैं...।
- बाल्टी मुझे दो, तुम घर चलो। घरवाली की आवाज सुनकर रामनाथ की तंद्रा टूटी। उसने अपने से लंबी घरवाली के चेहरे को गर्दन उठाकर देखा और चुपचाप घर की तरफ चल दिया।
वैसे तो अपमान सहने की उसकी आदत सी हो गई थी लेकिन अपमान करने वाला कोई बड़ा आदमी हो तो बर्दाश्त किया जाए। अब तो रोज कुआं खोदकर पानी पीने वालों ने भी उसका अपमान कर दिया था। इस कारण वह बेहद उदास हो गया। उसका मन खूब जोर-जोर से रोने को कह रहा था। लेकिन वह खुद को जज्ब किए हुए था। वह सोच रहा था कि बड़े-बड़े लोगों ने अपमानित किया और अब...। हे भगवान कैसी जिंदगी दे दी तूने। रामनाथ ने गहरी सांस ली।
घर के सामने आया तो छोटी वाली बेटी बकरियों को चारा डाल रह थी। बकारियां जल्दी-जल्दी जुगाली करते हुए चारा खा रही थीं। एकाएक उसके दिमाग में प्रश्न उठा। नल कितने में लग जाएगा? पंड़ित घनश्याम ने दो हजार में लगवाया था। यानी तीन बकरी बेचनी पड़ेगी और नल लग जाएगा। यदि तीन बेच दिया तो बचेंगी दो। फिर दो मंे या होगा? दो बहुत हैं। उनके बच्चे हैं। धीरे-धीरे फिर कई हो जाएंगी। रामनाथ को राह मिल गई। अपमान से मिले जख्म पर मरहम सा लगा और कह गए। - नल लगवा लेता हंू फिर बताता हंू सालों को।
जारी ....

Saturday 27 September 2008

अभियुक्त




इस कहानी को पहले तीन भागों में आप लोगों के सामने प्रस्तुत कर चुका हूँ । अब आप लोगों की सुविधा के लिए पूरी कहानी एक साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ




मेरी बेचैनी :
हालांकि वह सपना था, लेकिन उसे भुला पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है। ऐसा नहीं है कि मैं सपना नहीं देखता। सपना देखता भी हूँ और उन्हें सुबह होते ही या फिर एक-दो दिन में भूल भी जाता हूँ , लेकिन यह सपना मौका पाते ही मेरे दिलो-दिमाग पर हावी हो जाता है। इस सपने की कशिश, इसका मीठा दर्द और गुलाबी एहसास मेरे जेहन में हमेशा बना रहता है। मौका मिलते ही सोचने पर विवश कर देता है कि या इसका संबंध मेरी निजी जिंदगी से है? यह सवाल उठते ही मैं सपने के एक-एक तार को जोडने लगता हूँ । फिर भी ऐसी कोई तस्वीर नहीं बनती, जिससे यह लगे कि सपने का संबंध मेरी निजी जिंदगी से है।
यह भी सच है कि कई सपनों का संबंध इंसान के जीवन से होता है। कई बार स्मृतियां, जिन्हें हम अपने चेतन में भूल चुके होते हैं, वे सपने के रूप में हमारी चेतना में शामिल हो जाती हैं। तो या मैं किसी को भूल रहा हूँ ? इतनी लंबी जिंदगी भी तो नहीं है। हो सकता है कि बचपन या किशोर-वय की कोई स्मृति है, जो अब सपने के रूप में सामने आई है। बचपन और किशोर-वय की तो अधिकांश बातों और घटनाओं को हम विस्मृत ही कर देते हैं। लेकिन बचपन में या किसी लड़की से प्यार किया जा सकता है? किशोर-वय में जरूर हो जाता है, लेकिन प्रेम जैसी भावना और कोमल एहसास को भुलाया जा सकता है? मेरे अंदर से ही आवाज आती है। दुष्यंत भी शकुन्तला से प्यार करके भूल गए थे। शकुन्तला के साथ बिताए प्यार भरे लम्हों को दुष्यंत ने विस्मृति के पत्थर से कुचल दिया था। ऐसा तो उन्होंने शाप के कारण किया था। मैंने खुद से ही सवाल किया, पर उन्हें तो नहीं पता था कि वह किसी ऋषि के शाप के कारण शकुन्तला को विस्मृत कर रहे हैं। तो या मैं शापित हूँ ? हो सकता है। आज के जमाने में वैदिक युग की बातें। सब बकवास है। प्रकृति की जटिलता अनंत है। इसी कारण आदमी ने भगवान की रचना कर डाली। जब देश की आबादी करोड में भी नहीं थी, तभी 33 करोड देवता बना डाले हमारे पूर्वजों ने। यह जटिलता तब भी थी, अब भी है। पत्थर अब भी करोडों लीटर दूध पी जाते हैं। गरीब की आह और पीड़ित की बद्दुआ ही आधुनिक श्राप है। स्वभाव भर बदला है। मैंने तो किसी को नहीं सताया फिर मुझे कौन श्राप देगा? ऐसा हर इंसान को लगता है। यदि उसे ऐसा न लगे तो वह ऐसा काम ही न करे। ऐसा काम ही न करे तो उसके सपने इतने डरावने न हों। आज बहुत से इनसान हैं जो रातों को इसलिए नहीं सो पाते, योंकि उनके सपने इतने डरावने होते हैं कि जागने पर भी वे उनका पीछा नहीं छोडते। मेरा सपना तो डरावना नहीं है। जानता हूँ , इसीलिए कह रहा हूँ , अपनी स्मृतियों को खंगालो। अपने ही द्वंद्व से मैं पस्त हो गया। हालांकि मुझे याद नहीं, लेकिन यह मानने को विवश हो जाता हूँ कि किसी को प्यार करके शायद मैं भूल गया हूँ ....।

सपना :
तुम मुझे भूल गए, पर मैं नहीं। उसने कहा तो मैं अवाक रह गया। भला प्यार भी भूलने वाला एहसास है। सोचता हूँ पर बोल नहीं पाता।
- यह देखो, तुमने कई पत्र भी लिखे हैं। एक अन्य महिला, जो शायद उसकी भाभी है, कई लिफाफे मेरी तरफ बढ़ा देती है। एक भी लिफाफा खोला नहीं गया है। लेकिन उनके ऊपर जो लिखावट है वह मेरी ही है।
- यह तो खोल कर पढ़े भी नहीं गए हैं? मैंने उस महिला से पूछा।
- प्रेम पढ़ने का मोहताज नहीं होता। वह महसूस किया जाता है। मैंने तुम्हारी आंखों में देखकर ही महसूस कर लिया था, पहली ही नजर में। उसके बाद तो ये पत्र या तुम्हारे मुंह से निकले अल्फाज, सब बेमानी हैं। प्रेम में यदि शब्दों की जरूरत पड़ जाए या उसे लिखकर इजहार करना पड़े तो वह कोमल एहसास कहां रहा जाता है? फिर तो वह भौतिक हो जाता है। अलौकिक कहां रह पाता है? मैंने अपने प्रेम की अलौकिकता को बरकरार रखा है। इसलिए तुम्हारे इन पत्रों को नहीं पढ़ा। जानती हूँ , इसमें तुमने अपनी मजबूरियों का उल्लेख किया होगा। उन्हें सिद्ध करने के लिए तमाम तर्क भी दिए होंगे, लेकिन तुम मुझसे प्रेम करते हो, इसके प्रमाण हैं ये पत्र। बेशक तुम नहीं आए, लेकिन तुम्हारे पत्र तो आए। मैंने इसी में ही तुम्हारी मूरत देख ली। मैं तो प्रेम दीवानी हूँ , मीरा की तरह। मीरा के लिए जब यह जरूरी नहीं था कि भगवान कृष्ण सशरीर उपस्थित हों , तो मेरे लिए भी जरूरी नहीं है कि तुम सशरीर मेरे सामने रहो। मैंने तुमसे प्रेम किया है। दिल में बसाया है। इसके बाद तुम कहीं भी रहो, मेरे लिए कोई फर्क नहीं पड़ता। उसने कहा था और मैं अभिभूत था। प्रेम की ऐसी पराकाष्ठा। उसने मीरा बनके मुझे कृष्ण बना दिया। मुझ तुच्छ को ऐसा सम्मान। कृष्ण तो भगवान हैं। वे मीरा की भावनाओं को जानते-समझते थे। मैं तो इनसान हूँ । अपनी ही भावनाओं से अनजान, फिर उसकी कोमल भावनाओं के एहसास को कैसे समझ सकता था। मैं भौचक था।
- तुम शादी करके अपने बीवी-बच्चों के साथ खुश हो, पर यह पगली तुम्हारे प्यार में कुं आरी बैठी है। कैसे बीतेगा इसका जीवन? उसकी भाभी ने कहा था।
मुझे कोई जवाब नहीं सूझा। मैं चुप ही रहा। मेरी चुप्पी में मेरे अपराध की स्वीकृति भी थी। वह अपराध जिसके बारे में मैं अनभिज्ञ था।
ऱ्यह गांव ऊंची जाति वालों का। उन्होंने हमारा जीना हराम कर दिया है।
-जीना हराम कर रखा है?
-हां, वे उसके चरित्र पर उंगली उठाते हैं। कहते हैं यह गांव के लड़कों को बिगाड़ रही है। हम ठहरे नीच जाति के। उनका मुकाबला नहीं कर सकते। उन्होंने इसका बाहर निकलना दूभर कर दिया है। उनका कहना है कि इसने पाप किया है। यह इस गांव में नहीं रह सकती है। वह महिला रुआंसी हो गई। उसकी आंखों में आंसू भर आए। उसने अपने आंसू आंचल से पोंछते हुए कहा कि दरअसल उनकी निगाह इस पर है...। यह उन्हें घास नहीं डालती तो इसे कलंकित करके गाँव से निकाल देना चाहते हैं...।
इसके बाद सपने में सब कुछ गड्मड् हो जाता है। पता चलता है कि लड़की गांव वालों के डर से अपनी बहन के यहां रहने के लिए गई है। मुझे आया जानकर कोई उसे लेने जाता है। मैं उससे मिलने के लिए व्यग्र हो जाता हूं। सोचता हूं, वह मेरे सामने होगी तो मैं या बातें करूंगा। या कहूंगा उससे। मेरी समझ में कुछ नहीं आता, लेकिन मैं रोमांचित हूं उससे मिलने की कल्पना मात्र से ही। व्यग्रता कुछ ऐसी, जैसे मैं पहली बार किसी स्त्री के संपर्क में आऊंगा।
इसी बीच वहां भगदड़ मच जाती है। चारों तरफ अफरातफरी मच जाती है। मारकाट होने लगती है। मैं आतंकित हो जाता हूं। उसकी भाभी कहती है कि यह सब उनकी चाल है। वे तुम दोनों को मिलने नहीं देना चाहते। इसीलिए दंगा भड़का दिया। वे तुम दोनों को मार देना चाहते हैं। मेरा डर गायब हो जाता है। मैं मुकाबले के लिए दृ़ढप्रतिज्ञ हो जाता हूं। वह मुझे भागने के लिए कहती है। एक भीड़ मेरी तरफ बढ़ती है। उनके हाथों में हथियार हैं, लेकिन उनकी श ल आदमी जैसी नहीं है। हालांकि उनके दो हाथ-पैर हैं, लेकिन चेहरा जानवरों जैसा है। डरावना। मैं सोचता हूं यह किस लोक के वासी हैं। मुझे यों मारना चाहते हैं? मुझे मारकर उन्हें या मिलेगा? मैं अविचल खड़ा हूं। वह मेरी तरफ आ रहे हैं। उसकी भाभी भयभीत कभी मुझे देखती है तो कभी भीड़ को। वह चिल्लाती है कि यहां से भाग जाओ। ये लोग तुम्हें मार डालेंगे।
-भागते कायर हैं। अकारण किसी को मारने वाले भी कायर होते हैं। कायरों से भागा नहीं जाता। उनका मुकाबला किया जाता है।
-तुम अकेले हो, वे बहुत हैं।
-वे डरे हुए हैं। डरे हुए लोग चाहें जितनी हिंसा करें वह विजयी नहीं हो सकते।
मुझे भागता नहीं देख महिला भाग जाती है, लेकिन थोडी ही देर में वह एक भीड़ के साथ उपस्थित होती है। उनके भी हाथों में हथियार हैं। इनकी शक्ल आदमियों जैसी है। यह भीड़ मेरे पीछे आकर खड़ी हो जाती है। उन्हें देखकर जानवरों की शक्ल वाली भीड़ रुक जाती है।
माहौल में तनावपूर्ण शांति पसर जाती है। इसी बीच दो युवक मोटरसाइकिल से आते हैं। एक पर वह लड़की बैठी होती है। मोटरसाइकिल रुकते ही वह दौडकर मेरे पास आती है। मैं उसे सीने से लगा लेता हूं।
-तुम इसे लेकर भाग जाओ। एक युवक मोटरसाइकिल लेकर मेरे पास आकर कहता है।
-मैं यों भाग जाऊं? मैंने या गलत किया है?
ऱ्यह बहस का समय नहीं है।
-तो भागने का भी नहीं। भागकर जीवन नहीं जिया जा सकता। आज यहीं तय होगा कि हमें जीना है या मरना। मैं लड़की के चेहरे की तरफ देखता हूं। उसके चेहरे पर मिलन का सुख है, मरने का कोई भय नहीं। मैं आश्वस्त हो जाता हूं।
इसी बीच पुलिस आ जाती है। सभी पुलिस वालों को देखते हैं। पुलिस के जवान अपनी-अपनी गाड़ियों से उतर कर पोजीशन ले लेते हैं। उनका अधिकारी जोर से बोलता है।
-अपने आपको हमारे हवाले कर दो। मेरी समझ में नहीं आता कि वह किसे हवाले करने को कह रहा है। पुलिस अधिकारी हमारे पास आता है।
-तुम दोनों को गिरफ्तार किया जाता है।
- यों?
-गांव की शांति भंग करने के लिए।
-आरोप निराधार है। शांति हमने नहीं भंग की।
-तुम्हें जो कुछ भी कहना है अदालत में कहना। पुलिस अधिकारी ने कहा। हम चुपचाप उसके साथ चल देते हैं।
अगले दिन हमें अदालत में पेश किया जाता है।
सरकारी वकील जज से कहता है कि इन दोनों ने गांव की शांति भंग की है।
-आरोप निराधार है जज साहब। मैं प्रतिवाद करता हूं। - मैंने तो केवल प्यार किया है।
ऱ्यही तो इनका गुनाह है योर आनर
- प्यार करना तो गुनाह नहीं होता जज साहब?
-प्यार करना ही गुनाह है योर आनर? योंकि इनके प्यार करने से गांव की शांति भंग हुई। सवर्ण होते हुए इसने दलित युवती से और दलित होते हुए इसने सवर्ण युवक से प्रेम किया। इससे दोनों समुदायों में तनाव व्याप्त हो गया। स्थिति विस्फोटक हो गई। लोग मारकाट पर उतर आए। वह तो समय पर पुलिस पहंुच गई नहीं तो लाशों का ढेर लग जाता योर आनर।
सरकारी वकील चुप हो जाता है। मैं अवाक हूं। समझ में नहीं आता कि या कहूं। अदालत अपना फैसला सुनाती है।
- गवाहों के बयान और सुबुतों को देखते हुए अदालत इस निर्णय पर पहंुची है कि चूंकि अभियु तों ने गंभीर अपराध किया है इसलिए इन्हें बामश कत उम्रकैद की सजा सुनाई जाती है।


सपने से बाहर :
मेरी
नींद टूट जाती है। मेरा शरीर पसीने से भीगा होता है। मैं सपने के बारे में सोचने लगता हूं। यह कैसा सपना है? या मैं इसे भुला पाऊंगा? इसके बाद मैं सो नहीं पाता। बाहर चिड़िया चहचहाने लगती हैं। खिड़की से बाहर देखता हूं तो अंधेरा भाग रहा होता है...। भोर का उजाला खिड़की के रास्ते घर में प्रवेश कर रहा होता है...।

और वह तस्वीर:
उस दिन सुबह मैं विस्तर से उठकर छत पर चला गया। टहलते हुए सपने को बार-बार याद करने लगा। तभी पूरब दिशा में सूरज निकलता दिखाई दिया। मुझे सूरज की जगह किसी लड़की का चेहरा नजर आया॥। चेहरा इतना धुंधला था कि मेरी समझ में नहीं आया कि वह किसका चेहरा है। रात में देखे गए सपने को और उगते सूरज में चस्पा लड़की की तस्वीर को मिलाकर देखता हूं तो बेचैनी और बढ़ जाती है। कभी लगता है कि मैं दुष्यंत हूं। फिर लगता है कृष्ण...। फिर लगता है कि नहीं, मैं तो अभियुक्त हूँ ....

Wednesday 24 September 2008

मौसम की पहली बरसात



कई दिनों से सूरज की आंच में
तप रही थी धरती
तवे पर रोटी की तरह पक रहे थे प्राणी
बादलों को जरूर इन पर तरस आया होगा
अपनी सेना लेकर आ गए मैदान में
दे दी सूर्य को चुनौती
घबराकर रोने लगा भाष्कर
और मोतियों की तरह
गगन से गिरने लगी बंूदें
गर्मी से विकल मानव
निकल आया घरों से
रिमझिम बरसात में चुराने लगा नमक
पसीने के रूप में जिसे
छीन लिया था सूरज ने