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अंधेरे कोने : पथरीली जमीन पर सपनों की खेती

हिंदी जो एक भाषा ही नहीं संस्कृति भी है। अमर मानता है कि एक भाषा का मरना एक सभ्यता का खत्म हो जाना होता है। हिंदी एक सभ्यता है। जिस पर उसे गर्व है। यह देश में सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। इसके बाद ही अंग्रेजी का नंबर आता है। वह भी संख्या में काफी कम है। 

अंधेरे कोने

भाग पांच
पथरीली जमीन पर सपनों की खेती

अमर अनिल के कमरे पर पहुंचा ही था कि मंझले बेटे का एसएमएस आ गया।
डैडी, आई वांट चेंज माई स्कूल। बीकॉज दिस स्कूल एसएसटी सब्जेक्ट नॉट टीच इन इंग्लिश। यू know, आई एम वीक इन हिंदी।
एसएमएस पढ़कर अमर की समझ में नहीं आया कि वह क्या प्रतिक्रिया दे। उसे खुशी थी कि बेटे का अंग्रेजी ज्ञान अच्छा है लेकिन दुख इस बात का था कि हिंदी कमजोर है। उसने सोचा कि अंग्रेजी न आने की वजह से जो शर्मिंदगी, बेइज्जती और जिल्लत उसने उठाई है वह बेटे को नहीं उठानी पड़ेगी। लेकिन वह यह भी नहीं चाहता कि बेटे हिंदी को भूल ही जाएं।
हिंदी जो एक भाषा ही नहीं संस्कृति भी है। अमर मानता है कि एक भाषा का मरना एक सभ्यता का खत्म हो जाना होता है। हिंदी एक सभ्यता है। जिस पर उसे गर्व है। यह देश में सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। इसके बाद ही अंग्रेजी का नंबर आता है। वह भी संख्या में काफी कम है। यह सही है कि अंग्रेजी सत्ता की भाषा है और आज के उदारीकरण व वैश्वीकरण के युग में अंग्रेजी के बिना किसी का विकास नहीं हो सकता। इसके बावजूद हिंदी की अपनी अहमियत है। इससे भारतीयों की अस्मिता जुड़ी हुई है। यह भारतीयों की पहचान है। कोई अपनी पहचान को कैसे खत्म कर सकता है? यह और बात है कि अंग्रेजी की गुलाम मानसिकता के कारण इस देश मंे हिंदी को वह गौरव नहीं मिल पाया है जिसकी वह हकदार है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह हिंदी को त्याद दे। यदि ऐसा सभी करने लगे तो इस देश से हिंदी खत्म हो जाएगी। इसी के साथ एक सभ्यता और एक संस्कृति भी समाप्त हो जाएगी।
दरअसल, आज मामला भाषा का नहीं संस्कृति का हो गया है। सभ्यताओं के टकराव के इस युग में दो सभ्यताएं कहीं खामोशी से तो कहीं हिंसक तरीके से एक दूसरे से संघर्ष कर रही हैं। हमारे देश में एक सत्ता की संगिनी है तो एक आम जनता की। यह आम जनता और सत्ता के बीच का भी संघर्ष है। यही कारण है कि हिंदी प्रदेश मंे जानाधार वाली एक राजनीतिक पार्टी जब अपने चुनावी घोषणा पत्र मंे अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करने की बात करती है तो दूसरी पार्टियां उस पर टूट पड़ती हैं। अन्य सियासी दल कहते हैं कि यह दल देश को पिछली सदी में ले जाना चाहता है। यह विकास और प्रगति का विरोधी है। यदि यह दल सत्ता में आया तो हमारे युवा अंतराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा से वंचित हो होकर कुएं के मंेढक हो जाएंगे। ऐसे में उन्हें रोजगार नहीं मिलेगा।
दूसरे दलों का बयान अमर को गाली और अश्लील लगा। उसने सोचा कि महज चुनावी घोषणा से ही ये दल कैसे बौखला गये हैं। यदि इसे अमल में ला दिया गया तो क्या होगा? ऐसी भाषा का इस्तेमाल वह राजनीतिक दल भी कर रहा था जो कि खुद को राष्ट्रवादी कहता है। जो हिंदी-हिंदू और हिंदुस्तान का नारा लगता है। क्या यह दोगलापन नहीं है? वे राजनीतिक दल भी विरोध में खड़े हो गये जो इस देश के विकास का श्रेय लेते नहीं अघाते। ऐसे राजनीतिक दलों की राष्ट्रीय निष्ठा हमेशा शक के दायरे में रहती है।
वर्तमान सत्ताधारी दल तो पैदा ही अंग्रेजों की गांेद से हुआ है। इसकी स्थापना भी एक अंग्रेज ने की। बहुत दिनों तक यह अंग्रेजों के लिए सेफ्टीवाल्ब का काम करता रहा। आजाद देश में भी इसने अंग्रेजों की बनाई नीतियों को ही लागू किया। इसका दोगलापन अब भी जारी है। इस दल में अंग्रेजी दा लोगों को ही वरीयता दी जाती है। ऐसे लोग सरकार और पार्टी में उंचे पदों पर पहुंच जाते हैं। हिंदी भाषा की उपेक्षा करना इसने अपना जन्मसिद्ध अधिकार बना लिया है। यह और बात है कि आज यह सत्ता में है तो हिंदी भाषी प्रदेशों की वजह से ही। एक दो हिंदी भाषी राज्यों में इसकी औकात कमजोर हो गई है। वहां यह अपने को जमाने का प्रयास कर रही है। लेकिन सफलता नहीं मिल रही है। शायद इन प्रदेशों की जनता ने इसके चरित्र को समझ लिया है। उनका भी स्वाभिमान जाग गया हो। जिस व्यक्ति में अपनी भाषा के प्रति स्वाभिमान न हो उसकी देशभक्ति पर संदेह होता है। हिंदी भाषियों का विवेक और स्वाभिमान जिस दिन जाग गया वह अपने लिए अलग राष्ट्र की मांग जरूर करेंगे।
इसमें दो राय नहीं कि इस देश का अगला विभाजन भाषा के नाम पर ही होगा। अभी तक तो इस देश में भाषा के नाम पर राज्य बनते रहे हैं, लेकिन अब देश बनेंगे। भूमंडलीकरण में यदि देश गांव बन गए हैं, तो कई गांव मिलकर एक देश बन जाएंगे। उपेक्षा की पीड़ा से ऐसा जलजला आता है कि समुद्र की जगह पहाड़ और पहाड़ की जगह समुद्र बन जाता है। हिंदी की उपेक्षा से यदि ऐसा जलजला आ जाए तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
यह सही है कि इस देश में आरंभ से ही सत्ता और आम जनता की भाषा अलग रही है। सत्ताधारी लोग अपनी विशेषता कायम रखने के लिए अलग भाषा का चयन करते हैं और व्यवहार में लाते रहे हैं, ताकि उनकी तथाकथित विशिष्टता बनी रही। उनकी सत्ता भी बनी रहे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। सत्ताधारी भी बदले और फिर उनकी भाषा भी। पहले यहां संस्कृत विशिष्ट भाषा थी। तब आम आदमी पाली और प्राकृत भाषा का इस्तेमाल करता था। फिर चक्र घूमा। उर्दू सत्ता की भाषा बन गई। उसके बाद अंग्रेज आए तो अंग्रेजी सत्ता की भाषा बन गई। लेकिन अंग्रेजों के जाने के बाद इस देश की सत्ता की भाषा अंग्रेजी ही बनी हुई है।
अंग्रेजों ने हमें आजादी नहीं दी। उन्होंने सत्ता का हस्तांतरण किया। फिर जाते-जाते हमें धर्म-जाति, और भाषा के नाम पर भी विभाजित कर गये। उनकी इसी नीति का अनुपालन हमारे सत्ताधारियों ने भी किया। जिसका परिणाम है कि आज देश की एक राष्ट्रभाषा नहीं है। ऐसा राष्ट्र  खुद पर कैसे गर्व कर सकता है? दूसरों के टुकड़ों पर पलने वाला क्या स्वाभिमानी हो सकता है?
यह देश आज़ाद होकर भी आजाद नहीं है। मानसिक गुलामी से इसे मुक्ति नहीं मिली। आश्चर्य की यही मानसिक गुलाम आज हमारे ऊपर शासन कर रहे हैं। आयातित संस्कृति हमारी संस्कृति को विकृत करके खत्म करने को उतावली है। मानसिक गुलामों ने सत्ता पर कब्जा कर लिया है। जाहिर है कि देश को मानसिक गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए ऐसे लोगों से लड़ाई लड़नी पड़ेगी। हिंदी को यदि सम्मान दिलाना है तो उसे सत्ता की भाषा बनाना होगा। हालांकि इस बहुभाषी देश में यह मुमकिन नहीं लगता लेकिन देश की आधी आबादी की भाषा यदि हिंदी है तो लोकतंत्र का तकाजा कहता है कि इसे देश की राष्ट्रभाषा मान लिया जाए। देश की जो दूसरी क्षेत्रीय भाषाएं हैं उनका भी सम्मान बना रहे। यह भी जरूरी है। हालांकि जिस भू-भाग में हिंदी बोली जाती है। वह भी क्षेत्रीय बोलियों से मिलकर बना है। यदि अपनी मातृ बोलियों को जिंदा रखते हुए हिंदी प्रदेशों के लोग हिंदी को स्वीकार कर सकते हैं तो दूसरे प्रदेशों के लोग अपनी बोली-भाषा को बनाये रखते हुए भी हिंदी को अपना सकते हैं। इसमें किसी को विरोध या दिक्कत नहीं होनी चाहिए।
पंजाबी अपने कारोबार के सिलसिले मंे पूरे देश में फैले हैं। हिंदी प्रदेशों में यह अपनी मां बोली गुरुमुखी को जिंदा रखते हुए हिंदी ही नहीं उस क्षेत्र की बोली को भी स्वीकार कर लेते हैं। इनकी यही सहजता और उदारता इस कौम को विश्व भर में फैलने-फूलने की राह प्रशस्त कर रही है। इससे कुछ तो सबक लिया जा सकता है।
ऐसा नहीं है कि अपने चुनावी घोषणा पत्र में हिंदी की हिमायत करने वाला दल सत्ता में आने पर इसे लागू कर ही देगा। चुनाव के समय इस देश में राजनीतिक दल ऐसी घोषणाएं करते ही हैं। यह जरूरी नहीं होता कि वह सत्ता में आने पर उस पर अमल भी करें। इसके बावजूद जिस तरह दूसरे दलों ने इस पर हायतौबा मचाई वह आश्चर्यजनक है और उनकी मानसिकता को भी सामने ला दिया। अब तो इस दल का मुखिया भी इस पर सफाई देता फिर रहा है। यही नहीं अंग्रेजी के एक अखबार ने इस पर एक सर्वे भी करवा कर छाप दिया। उसका कहना है कि हिंदी हार्टलैंड ने ही इस दल के घोषणा पत्र को खारिज कर दिया।
हम जानते हैं कि सर्वे कैसे किये जाते हैं। अपनी बात को मनवाने के लिए आजकल चतुर-सुजान लोग एक सर्वे करते-कराते हैं। फिर दावे के साथ अपनी मानसिकता अपने तर्क को लोगों पर थोपने का प्रयास करते हैं। अंग्रेजी अखबार ने ऐसा किया तो समझ में आता है। हिंदी के अखबारों ने भी इस नेता की खिल्ली उड़ाई। इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या हो सकती है कि आप जिस भाषा की कमाई पर ऐश कर रहे हैं उसका ही मजाक उड़ा रहे हैं। हिंदी फिल्मों के अभिनेता और अभिनेत्रियों की तरह हिंदी अखबारों का यह चरित्र शर्मनाक और चिंताजनक है।
हिंदी फिल्मों के एक्टरों से अमर को इसीलिए नफरत है। वह खाते तो हिंदी की हैं और गिटर-पिटर अंग्रेजी मंे करते हैं। यही नहीं अंग्रेजी संस्कृति को फलने-फूलने और बढ़ावा देने का काम भी करते हैं। अमर ने सोचा कि यदि कभी हिंदी को लेकर क्रांति होती है तो ऐसे लोगों को अपना पहला वर्ग शत्रु मान कर चलना होगा। ऐसे दोगले चरित्र वाले लोग समाज में न ही रहें तो बेहतर रहता है।
- कहां खो गये? अनिल ने कहा तो अमर चौंका।
- कहीं नहीं यार, बेटे का एसएमएस आया है।
- क्या लिख दिया?
- कह रहा है स्कूल बदलना है।
- क्यों?
- उसका कहना है कि इस स्कूल में सामाजिक विज्ञान की पढ़ाई हिंदी माध्याम से होती है और उसकी हिंदी कमजोर है।
- अच्छा। भेड़ के घर भेड़िया पैदा हो गया। डैडी अंग्रेजी विरोधी और बेटा अंग्रेजीदा।
- बेटा, मैं अंग्रेजी विरोधी नहीं हूं। मैं अंग्रेजी मानसिकता का विरोध करता हूं।
- एक ही बात है।
- यदि लोहा-लोहे को काटता है तो हमें उसे हथियार बनाना ही होगा।
- नेताओं वाले बयान दे रहे हो।
- दरअसल, हमारे देश में दिक्कत यही है। यहां अंग्रेजी का विरोध करने वाले ही अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने मंे आगे रहते हैं। सागर ने कहा।
- हां, तुम्हारी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। इस देश की शिक्षा प्रणाली ही ऐसी है कि आदमी ऐसा करने के लिए विवश है। एक तरफ सत्ता की भाषा अंग्रेजी है। उसमें रोजगार है तो दूसरी तरफ हिंदी पिछड़ों की भाषा बना दी गई है। उसमें रोजगार नहीं है। ऐसे में आम आदमी की मजबूरी है कि वह भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ाए। आम लोगों की इसी मजबूरी का लाभ निजी स्कूल उठा रहे हैं। अंग्रेजी माध्यम के नाम पर मनमानी फीस लेेते हैं। गली-गली में निजी स्कूल खुल गये हैं। गांवों तक में अपनी पैठ बना ली है। लेकिन सभी स्कूल बच्चों को अंग्रेजी ही पढ़ा रहे हैं। ऐसा भी नहीं हैं। आदमी की आर्थिक हैसियत के हिसाब से स्कूल भी हैं। विशिष्ट लोगों के लिए विशिष्ट और आम लोगों के लिए आम। फर्क तो तब भी बना ही रहता है। ऐसे में आम आदमी चाह कर भी अपने बच्चों को विशिष्ट लोगों के बच्चों की श्रेणी में नहीं ला पाता।
- बेटा यहां तो राजा का बेटा राजा हुआ है। डाक्टर की संतान डाक्टर होती है और इंजीनियर की इंजीनियर। आईएएस की आईएएस। नेता की नेता। परिवारवाद या वंशवाद यहां की संस्कृति है। स्कूल भी इसी का अनुपालन करते हैं। करते क्या हैं। जब समाज का वर्गीकरण हो गया है तो स्कूलों का भी हो गया है। जो जिस वर्ग से है वह उसी वर्ग के स्कूल में अपने बच्चों को पढ़ा पाता है।
- कहने को हमारे देश में लोकतंत्र है। सरकार को जनता चुनती है और यह सरकार जनता के लिए होती है। लेकिन मुट्ठी भर लोग अपने हितों के लिए बहुसंख्यक लोगों के भाग्यविधाता बने बैठे हैं। आखिरकार कब तक चलेगा ऐसे?
- यह सवाल तो अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में फंस गया है। बचेगा या मारा जाएगा। यह देखने वाली बात है।
- खैर, यह तो मानोगे कि अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम से पढ़ा रहे हो? जिसका मतलब है कि इस व्यवस्था को स्वीकार करते हो। अनिल ने कहा।
- सवाल स्वीकार और अस्वीकार का नहीं है। एक व्यवस्था आप पर थोप दी गई है। उससे आपको मुक्ति पानी है। व्यवस्था कोई कपड़ा तो है नहीं कि आदमी उतार कर फेंक दे और आजाद हो जाए। इससे मुक्ति तो सतत चलने वाली प्रक्रिया है। ऐसे में मैं अपने बच्चों को कूपमंडूक क्यों बनाऊं? जो दर्द, जो जिल्लत मैंने झेली है उसे मेरे बच्चे क्यों झेलें? बावजूद इसके मैंने उन्हें कभी महंगे अंग्रेजी स्कूल में नहीं पढ़ाया। क्योंकि मेरी हैसियत उस लायक नहीं थी। जहां वे पढ़ रहे हैं वहां के हिसाब से योग्य बनें यह कोशिश हमेशा रही। यह भी नहीं किया कि बच्चों को डंडा लेकर अंग्रेजी पढ़ाता हंू। उन्होंने जो पढ़ा अपने विवेक और स्कूल से ही हासिल किया है। मैंने लोगों की तरह कभी अपने बच्चों से यह नहीं कहा कि माई सन् दिस इज ए मैंगो। यह पेड़ नहीं ट्री है। यह काउ का मिल्क है। मैंने हमेशा उन्हें यही बताया कि यह गाय का दूध है। यह मछली है। यह अंडा है और यह सब्जी है। हाथ-पैर भी हिंदी में बताए। उन्हें संस्कार देने में कमी नहीं की। यदि वे इंडियन बन भी जाएं तो उनके अंदर भारतीयता बनी रहेगी। इतना मुझे विश्वास है।
अमर को बीते दिन याद आ गये। अप्रैल का महीना था। धूप बहुत तेज थी। लग रहा था जैसे आग बरस रही हो। सामान्य जन की हालत यह थी कि वह न तो घर में रह सकते थे न ही बाहर निकल सकते थे। घर में रहें तो गर्मी, बाहर निकलें तो धूप बोनस में। ऐसे में अमर भी घर से बाहर कम ही निकलता लेकिन आज उसे बच्चों को लेने स्कूल जाना पड़ा। घर से बाहर निकलते ही धूप ने जोरदार स्वागत किया। आंखें तेज रोशनी के कारण मिचमिचा गईं। बदन पर जैसे किसी ने आग डाल दी।
गर्मी को कोसता वह आगे बढ़ रहा था कि एक गली के  मोड़ पर दो बच्चे टट्टी करते दिखाई पड़े। पहले तो अमर ने अनदेखी करनी चाही लेकिन अचानक लगा कि ये तो उसकेे बच्चे लग रहे हैं। वह उनकेे पास गया तो हक्का-बक्का रह गया। वे दोनों उसी के बच्चे थे, जिन्हें लेने वह स्कूल जा रहा था। उसके बच्चे उसे इस हाल में मिलेंगे उसने कल्पना भी नहीं की थी। उसके लिए यह किसी हादसे के समान था। अमर के आंखों की सामने अपने स्कूल के दिनों का एक दृश्य कौंध गया। उसकी बोलती बंद थी। बच्चे डर के मारे भीगे कुत्ते की तरह सिकुड़ गये थे। कमर के नीचे दोनों का पैंट लटक रहा था। दोनों सहमे बच्चों की आंखें अमर को देख रहीं थीं। जिससे हीनता-दीनता और असहयता टपक रही थी।
- यार तुम लोग स्कूल में कर लेते या फिर घर आकर करते? इस तरह रास्ते में करते हुए शर्म नहीं आती?
- स्कूल की लैट्रिन बहुत गंदी रहती है।
- गंदी रहती है तो घर आकर करते?
- बहुत जोर की लगी थी।
दोनों बच्चों ने एक साथ कहा और अमर को लगा जैसे किसी ने उसे जोरदार चांटा मार दिया है। कभी उसके द्वारा बोला गया वाक्य उसी की खोपड़ी पर फेंक दिया गया था।
उस समय अमर चौथी कक्षा में पढ़ता था। प्राथमिक पाठशाला थी तो गांव में ही लेकिन उसके घर से करीब एक किलोमीटर दूर। स्कूल गांव के पूर्वी छोर पर था तो उसका घर पश्चिमी छोर पर। विद्यालय मंे शौच आदि की कोई व्यवस्था नहीं थी। बच्चे पेशाब खेतों में करते थे लेकिन शौच के लिए उन्हें काफी दूर भटकना पड़ता था। स्कूल से दूर दो तालाब थे। हालांकि गर्मी में यह भी सूख जाते थे। ऐसे में बच्चों के लिए शौच की समस्या काफी विकट हो जाती थी। स्कूल में एक हैंडपंप था जो अक्सर खराब रहता। बच्चों को पीने के पानी के लिए विद्यालय के पास के घरों में जाना पड़ता था। लेकिन गर्मियों में शौच आदि करना पड़ गया तो बच्चों की हालत खराब हो जाती थी। शौच के बाद अक्सर उन्हें पानी का काम मिट्टी के ढेले से चलाना पड़ता था। बेचारे घर जाकर तुरंत नहाते फिर अपने आपको पवित्र महसूस करते। यही वजह थी कि गर्मियों में बच्चे इस बात को छिपाते कि वह शौच करके आ रहे हैं। यदि किसी बच्चे के बारे में पता चल जाता तो वह बच्चों के बीच हंसी का पात्र बन जाता। सभी उसे चिढ़ाते। जबकि पांचवीं तक पढ़ने में हर बच्चा एक नहीं कई बार इस हालत से गुजर चुका होता था। इस तरह उस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे ‘हगनहा’ साबित हो चुके होते।
अमर तो एक दिन रंगे हाथ पकड़ लिया गया।
वह अपने दोस्त के साथ स्कूल जा रहा था कि रास्ते में उसे जोर का दबाव महसूस हुआ। पहले तो उसने टालने का प्रयास किया लेकिन जब लगा कि कपड़े खराब हो जाएंगे तो वह पीठ पर लदा बस्ता फेंक कर एक सरपत के झुरमुट की आड़ में बैठ गया। चढ्ढी का खोलना था कि भड़भड़ की आवाज से फिजा गूंज गई। इस पर उसका दोस्त चिल्लाया।
- साले, घर से करके आया कर। अब रास्ते में पानी कहां से मिलेगा?
- अबे पानी की सोचते तो कपड़ा खराब हो जाता।
- अच्छा, ठीक है। धीरे से भड़भड़ा। नहीं तो कोई सुन लेगा। फिर साले ‘हगनहा’ कह कर चिढ़ाएंगे।
- कपड़ा खराब हो जाता तो? न घर जा पाते न स्कूल।
- ठीक है। अब मुझे भी लग गई। कहते हुए अमर का दोस्त भी बस्ता फेंक कर एक सरपत के झुरमुट की आड़ में बैठ गया।
इनका बस्ता रास्ते में देखकर गांव का एक दूसरा लड़का जोकि स्कूल जा रहा था सारा माजरा समझ गया। उसे शरारत सूझी। वह जोर से बोला।
-कौन है बे? रास्ते में बस्ता फेंक कर कहां हो तुम? अमर और उसके दोस्त ने चुप रहना बेहतर समझा। वह लड़का भी समझ गया कि बस्ता फंेक कर साले हग रहे हैं। लेकिन सामने नहीं आना चाहते। वह मजा लेने के मूड में आ गया।
- सालों बाहर निकलो नहीं तो बस्ता लेकर जा रहा हूं। अब तक अमर और उसके दोस्त ने मिट्टी के ढेले से पानी का काम ले लिया था। लिहाजा चड्डी का नाड़ा कसते हुए बाहर आ गये। उस स्कूल में पढ़ने वाले अधिकतर बच्चे चड्डी बनियान और नंगे पैर ही स्कूल जाते। पायजामा-शर्ट और जूते-चप्पल में तो कोई-कोई दिखता.....।
- क्यों चिल्ला रहा है बे? दोनों ने लगभग एक साथ कहा।
- अच्छा, तो तुम लोग हो?
- हां, हम हैं। तुम्हें क्यों तकलीफ हो रही है?
- वहां क्या कर रहे थे?
- तुझसे मतलब? तुम्हारे बाप की बाग है?
- अबे हगनहा, बाप पर मत जाना। वह लड़का जोर से गरजा। मुझे पता है कि तुम दोनों क्या कर रहे थे?
- तो फिर गांड़ क्यों मरा रहा है?
- गंडमरौल तो तुम दोनों कर रहे थे।
- तू भी मराएगा साले-मादर चो.....। दोनों एक साथ उस पर टूट पड़े।
इसी बीच तीन-चार लड़के और आ गये। उन्होंने इन्हें किसी तरह छुड़ाया। जब छुड़ाने वाले लड़कों ने पूछा कि मामला क्या है तो वह लड़का फिर बोल पड़ा कि दोनों साले बस्ता रास्ते फेंक कर गांड़मराउल खेल रहे थे।
- मादर चो... गाली देगा तो.... कहते हुए अमर और उसका दोस्त फिर उस पर झपटे लेकिन लड़कों ने दोनों को पकड़ लिया।
- साफ-साफ बताओ तुम दोनांे क्या कर रहे थे? उनमें से एक लड़का बोला जो उनसे बड़ा था और ताकतवर भी। इस पर अमर और उसके दोस्त उसका हाथ पकड़ कर उस झुरमुट के पास ले गये जहां उन्होंने शौच किया था। ताजी टट्टी को दिखाते हुए दोनों ने कहा कि यह कर रहा था और यह साला अपनी मां...।
वह लड़का मुस्कुराते हुए वापस आया और बोला।
- सभी स्कूल चलो। दोनों टट्टी कर रहे थे। सालो तुभ भी तो करते हो। फिर इन्हें क्यों परेशान कर रहे हो?
उसका इतना कहना था कि कुछ बच्चे हगनहा-हगनहा कहते हुए भाग लिए। अमर और उसके दोस्त शर्म से पानी-पानी हो गये।
- पापा चलो न। अमर के बच्चों ने कहा तो वह अतीत से वर्तमान में आ गया लेकिन उसे लग रहा था कि उसके कान के पास अब भी हगनहा-हगनहा ही गूंज रहा है। घर पहुंचते ही अमर नेहा पर बरस पड़ा।
- इन सब को सुबह लैट्रिन कराकर नहीं भेजती?
- कराती तो हूं।
- कराती तो इनका यह हाल रहता।
- क्या हुआ?
- हुआ क्या? गली में बैठकर लैट्रिन कर रहे थे। चलो पानी से धोओ।
नेहा दोनों बच्चों को टॉयलट में ले गई।
- ये लोग इस तरह रास्ते में हगेंगे तो लोग क्या कहेंगे?
- हगनहा। नेहा ने तपाक से कहा तो अमर को लगा जैसे उसके गाल पर जोरदार झापड़ पड़ा है। वह अपने एक हाथ से गाल को सहलाने भी लगा।
- इसीलिए मैं कह रहा था कि इनका नाम किसी अच्छे स्कूल में लिखवा दें।
- तो क्या होता?
- इस तरह रास्ते में हगते तो नजर न आते।
- लैट्रिन लगेगी तो करेंगे ही।
- ऐसे ही रास्ते में?
- क्या करें बेचारे, जब रास्ते में लग गई तो।
- रास्ते में इसलिए लग गई क्योंकि स्कूल का टॉयलट गंदा था। वहां इन लोगों ने किया नहीं। सोचे कि घर चलकर करेंगे और घर तक दबाव झेल नहीं पाये तो रास्ते में हल्का होने लगे। घटिया और सस्ते स्कूल से क्या उम्मीद कर सकते हैं? गांव के स्कूल से भी बदतर होते हैं यह।
- तो कहां से लाते बीस हजार रुपये? कॉपी-किताब और जूते व बस का किराया अलग से।
अमर चुप हो गया। यह सत्य था कि उसके पास तीस हजार रुपये नहीं हो पाए इसीलिए दोनों बच्चों का नाम अच्छे स्कूल में नहीं लिखवा पाया। यदि कर्ज लेेकर नाम लिखवा भी देता तो स्कूल की फीस भरना उसके बूते के बाहर की बात थी। एक हिंदी दैनिक में कनिष्ठ उपसंपादक की क्या औकात? वह भी तब जबकि अपने बच्चों के साथ परिवार की भी जिम्मेदारी हो।
इसी साल उसने कई स्कूलों का चक्कर लगाया लेकिन जो अच्छे थे वह उसके बजट से बाहर थे और जो बजट में थे उनका हाल सरकारी स्कूल से भी बदतर था। वह मन मसोस कर रह गया। उसके बच्चे जिस स्कूल में पढ़ते थे वहीं पढ़ने लगे।
- क्या सोच रहे हो?
- कुछ नहीं। नेहा के सवाल पर अमर ख्यालों से बाहर आया।
- फिर एकाएक चुप क्यों हो गये? नेहा ने पूछा।
- सोच रहा था कि मेरे बेटों का भविष्य क्या होगा? आगे चलकर क्या बन पाएंगे? यदि सब कुछ ऐसा ही चलता रहा तो यह भी मेरी तरह हाशिए पर पड़े रहेंगे। प्रतियोगी और प्रतिस्पर्द्धी जमाने में लंगड़ी शिक्षा के सहारे ये कैसे दौड़ पाएंगे और आगे निकल पाएंगे? कई बार सोचता हूं तो अपनी इस बेबसी पर खुद ही तरस आता है। कल्पना करो एक तरफ मेरे बच्चे होंगे, जो ऐसे स्कूल में पढ़ रहे हैं जहां लैट्रिन तक की समुचित व्यवस्था नहीं है। एक तरफ वे बच्चों होंगे जो एअरकंडिशन कमरों में पढ़ रहे हैं। इनकी और उनकी बराबरी कैसे हो सकती है? मलाईदार पदों पर बैठे लोग कहते हैं कि वह अपनी प्रतिभा के दम पर वहां तक पहुंचे हैं। लेकिन क्या यह सच है? क्या मेरे बेटों में प्रतिभा नहीं है? क्या मुझमें प्रतिभा नहीं है? लेकिन नहीं जो सुविधा इन्हें या मुझे मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिली या नहीं मिल पा रही है। इसलिए मैं पीछे रह गया। इसीलिए मेरे बच्चे भी पीछे रह जाएंगे। सवाल प्रतिभा का नहीं सवाल अवसर और सुविधा का होता है।
अमर को याद आया कि एक टीवी चैनल ने आरक्षण पर बहस आयोजित की। उसका एंकर बार-बार टैलेंट की बात कर रहा था। इस पर एक प्रतिभागी ने कह दिया कि जनाब आप कितने टैलेंटेड थे यह मैं जानता हूं। कालेज मंे हमेशा पिछली सीट पर बैठते थे और कामचलाउ अंकों से पास होते थे लेकिन आज एक प्रमुख चैनल में एंकरिंग कर रहे हो। यह सब प्रतिभा के दम पर नहीं हुआ है। आपको अवसर मिला तो यहां हो। किसी और को मिलता तो वह भी यहां होता। बताते हैं कि टीवी चैनल से इस एपीसोड का प्रसारण ही नहीं किया।
कमजोर लोगों को आरक्षण दिया ही जाना चाहिए। बेशक यह जातिगत नहीं आर्थिक हो। वैसे भी जब यह आर्थिक होगा तो वही लोग इसमें आएंगे जो जातिगत आरक्षण के दायरे में आते हैं। लेकिन तब किसी भी जाति के क्रिमीलेयर इस दायरे से बाहर हो जाएंगे। हालांकि यह सुविधा बिना भ्रष्टचार के लागू हो जाए इसकी उम्मीद करना भी बेवकूफी होगी। इस व्यवस्था में सुधार की आशा करना तेज हवा मंे दीपक जलाने जैसा है।
हमारे बच्चे पीछे रह जाएंगे क्योंकि मैं पीछे रह गया। मैं पीछे रह गया क्योंकि मेरे पिता पीछे रह गये। यह पिछड़ापन पीढ़ीदर पीढ़ी चला आता है। आज मैं अच्छे अंग्रेजी मीडियम वाले स्कूल मंे पढ़ा होता तो मुझे भी अच्छी नौकरी मिल जाती। अच्छी नौकरी मिलती तो बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाता। फिर वह भी अच्छी नौकरी हासिल कर लेते। मैंने प्राइमरी स्कूल में पढ़ाई की, जहां बच्चों को साक्षर किया जाता है, ताकि सरकार यह आंकड़ा प्रस्तुत कर सके कि देश में इतने प्रतिशत साक्षर हैैं। साक्षर होकर आदमी क्या करे जब उसे बेहतर काम ही नहीं मिलेगा? शिक्षा तो ऐसी होनी चाहिए जो बेहतर काम दे। यह सरकार का दायित्व बनता है कि वह अपने प्रत्येक नागरिक को इस लायक बनाए कि वह बेहतर जीवन जी सके। लेकिन हमारी सरकार ऐसा करना ही नहीं चाहती। न तो वह शिक्षा पर खर्च करना चाहती है न ही वह ऐसी शिक्षा नीति बनाना चाहती है जिसमें सभी का भला हो। वह तो समाज का वर्गीकरण बनाए रखना चाहती है। यह सब इसलिए है क्योंकि सत्ता पर क्रीमीलेयर लोगों का ही कब्जा है। यह वर्ग कभी नहीं चाहता कि कोई उन्हें चुनौती दे। उनकी क्रीम में हिस्सा मांगे।
- इसमें आप क्या कर सकते हैं? यह सब तो भाग्य का खेल है? नेहा ने अपना विचार प्रकट किया।
- जी नहीं। भाग्य का लिखा किसी को कुछ नहीं मिलता। यह सब इस तंत्र का खेल है। यह व्यवस्था ही ऐसी है कि आदमी भाग्यवादी हो जाता है। जबकि हकीकत में ऐसा होता नहीं है। यदि सभी को समान अवसर और सुविधा मिले तो सभी उन्नति कर सकते हैं। लेकिन यहां तो अवसरों और सुविधाओं पर एक तबका ही कुंडली मार कर बैठ गया है। वह कदापि नहीं चाहता कि कोई उसमें हिस्सेदारी के लिए मांग करे या कोशिश भी करे। यही कारण है कि सरकारी स्कूलों को बर्बाद किया जा रहा है और पब्लिक स्कूलों को बढ़ावा दिया जा रहा है। यहीं से सत्ता के लिए ‘प्रजा’ और ‘राजा’ तैयार किये जाते हैं।
- अमर यार, आजकल तुम ख्यालों में बहुत रहने लगे हो। आखिर माजरा क्या है? कहीं कोई चक्क्र-वक्कर तो नहीं चल रहा है? अनिल ने कहा तो अमर को लगा कि वाकई वह यहां होकर भी यहां नहीं है। लेकिन आजकल उसके साथ घटनाएं ऐसी घट रही हैं कि वह न चाहते हुए भी स्मृति प्रवाह में बह जाता है। वैसे भी अतीत कैसा भी रहा हो उससे बचा नहीं जा सकता है। वह यादांे के रूप मंे आदमी के साथ छाये की तरह चलता है। कभी आदमी उसकी छाया में राहत महसूस करता है। कभी स्मृतियां शूल की तरह चुभती हैं।
- कोई जवाब नहीं दिया भाई? अनिल ने फिर टोका।
- ऐसी कोई बात नहीं है। एक बात याद आ गई थी।
- बात या कोई और? अनिल ने हंसते हुए सवाल किया।
- स्कूल के दिनों की एक घटना याद आ गई थी।
- उन दिनों की घटना अभी तक याद है?
- कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिसे आदमी पूरी उम्र नहीं भूल पाता। चाहे वह बचपन की ही क्यों न हों। ऐसी घटनाएं आदमी के दिमाग में इस तरह फीड हो जाती हैं कि वह उन्हें चाहकर भी डिलीट नहीं कर पाता। समय-समय पर वह अपने वजूद का एहसास कराती रहती हैं। एक तरह से आदमी के अंदर स्मृतियों की नदी प्रवाहित होती रहती है। यह वह घटनाएं होती हैं जिनका जिंदगी पर गहरा असर पड़ता है। जो आदमी की जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट भी होता है। 
वे दोनों बातें कर ही रहे थे कि अनिल से एक पत्रकार मित्र मिलने आ गया। उसके आते ही अनिल उससे मुखातिब हो गया।
- आजकल आफिस नहीं जा रहे हो? अनिल ने आगांतुक मित्र से सवाल किया।
- मैंने नौकरी छोड़ दी।
- क्यांे?
- मैं बेवकूफों के साथ काम नहीं कर सकता। किसी को कुछ आता-जाता है नहीं और बनते विद्वान हैं।
- तुमको किसी से क्या लेना-देना। अपना काम करते।
- कैसे करता यार? कल तक जो मुझसे जूनियर था उसे उठाकर मेरा प्रभारी बना दिया गया।
- आपसे जीनियस रहा होगा।
- घंटा जीनियस है। चापलूस और चुगलखोर है। पंूछ न होते हुए भी हिलाता रहता है। साला कुत्ता।
- यही तो आधुनिक विद्वता है। आजकल आफिसों में जिसके पास अदृश्य दुम हिलाने का गुण है वही योग्य है। उसी का परमोशन, उसी का इंक्रीमेंट होता है। बॉस भी यही चाहता है कि उसके सामने सभी दुम हिलाते रहें। दुम न हिलाने वाले को कोई भी बॉस पसंद नहीं करता। बॉसों को आदमी नहीं कुत्ता चाहिए जो दोनों जैसा व्यवहार और काम करे।
- यदि आपको तरक्की चाहिए तो बॉस से मेलजोल बढ़ाना ही पडे़गा। बॉस से काम हो न हो उसके केबिन में जाकर उसकी पसंद की बात करनी ही होगी। यदि ऐसा कर सकते हैं तो आप अच्छे काम करने वाले हैं। नहीं कर सकते तो आप बेकार हैं। फिर आप बॉस से कोई उम्मीद न करें।
- काबलियत तो कोई बात होती है।
- किस काबलियत की बात कर रहे हो! आप में केवल बॉस को खुश करने की काबलियत होनी चाहिए। काम वह करो जो बॉस को पसंद हो। आप काबिल हैं। आखिर काबलियत का प्रमाण पत्र भी तो बॉस ही देता है।
अमर को याद आया कि जब उसने एक संस्थान ज्वाइन किया था तो एक पुराने वरिष्ठ साथी ने एक दिन उसे सलाह दी थी कि बॉस के घर चले जाओ। एक दो बार गये तो वह मेहरबान हो जाएंगे। फिर जीवन में तरक्की ही तरक्की करना। उस समय अमर को उनकी बात बड़ी अजीब लगी। उसने उस पर अमल नहीं किया। लेकिन कुछ दिन बाद ही उसके साथ ज्वाइन करने वाले एक परिचित ने बताया कि वह बॉस के घर गया था। एक बढ़िया बोतल लेता गया। अपना तो काम बन गया। इसके बाद अमर भी बॉस के घर एकदिन महंगी मिठाई लेकर पहुंच गया। उसका भी एक काम बॉस बहुत दिनों से नहीं कर रहे थे। घर जाने के दूसरे-तीसरे दिन ही बुलाकर कहा कि अमर तुम्हारा काम हो गया है। इसके बाद तो अमर को यकीन हो गया कि आज की तरक्की में बॉस के घर की परिक्रमा कितनी महत्वपूर्ण है। जिसने किया उसे प्रतिफल मिलता है। जिसने नहीं किया वह क्या पाएगा? आखिरकार ‘फल’ पाने के लिए ‘कर्म’ तो करना ही पड़ता है। बॉस को भगवान और उसके घर को मंदिर समझो।
- जिस अखबार में मैं काम करता था। वह अखबार मतदाताआंे को वोट देने के लिए जागरूक कर रहा है। विज्ञापन छाप कर अभियान चलाये हुए है। जानते हो क्यों? अनिल के दोस्त ने कहा। 
- क्यों?
- एक पार्टी से मोटी रकम ली है। उस राजनीतिक दल का मानना है कि देश में एक खास वर्ग है जो वोट करने नहीं जाता। यह वर्ग ही उस पार्टी का वोटर है। यदि यह वोटिंग कर दे तो वह सत्ता प्राप्त कर लेगी। इसके लिए इस अखबार के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। जहां उस पार्टी को भ्रम है कि एक खास वर्ग उसका समर्थक है वहीं इस अखबार के मालिक को भी भ्रम है कि यह खास वर्ग ही उसका रीडर है।
- यह तो सही है कि देश का एक वर्ग वोटिंग नहीं करता।
- क्यों करे मतदान? क्या मिलता है उसे? जिसके वोट से लोग सांसद बनते हैं वह तो लखपति से पांच सालों में करोड़पति बन जाते हैं और जो उन्हें वोट देता है वह वहीं का वहीं रह जाता है। बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरसता हुआ। फिर क्यों वोटिंग करने जाए? धूप-ठंड बरसात में लाइन लगा कर क्यों वह किसी को करोड़पति-अरबपति बनने का मौका दे?
- लोग वोटिंग नहीं करते फिर भी तो सांसद और विधायक चुने ही जाते हैं।
- हां, चुने जाते हैं। और आगे भी चुने जाते रहेंगे। लेकिन इसका कोई मतलब नहीं होता। वे जनप्रतिनिधि नहीं होते। दरअसल, यह लोग जिसके चंदे के दम पर जीतकर आते हैं उसके ही प्रतिनिधि होते हैं। एक समय आएगा कि जनता ऐसी व्यवस्था को उखाड़ फेकेगी। आज जो कहा जाता है कि हमारे देश में लोकतंत्र मजबूत हुआ है। हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं। यह घमंड किसलिए? पचास प्रतिशत लोग भी वोट नहीं डालते और कहा जाता है कि बहुमत की सरकार बनी है। इस लोकतंत्र में ऐसी बहुमत की अवधारणा सबसे बड़ा धोखा है। और तो और ‘भारतीयों’ के मत से चुने जाने वाले लोग ‘इंडियन’ के लिए काम करते हैं। यह बात भारत के लोग समझने लगे हैं। जिस दिन यह विरोध पर उतर आए मुट्ठी भर इंडियन के लिए परेशानी खड़ी हो जाएगी। मुगलों, अंग्रेजों के शासन को उखाड़ फेंका है तो ‘इंडियन’ के शासन को भी खत्म होना होगा।
- कहते तो आप ठीक हैं। अनिल के दोस्त ने अमर की बात का समर्थन किया। लेकिन जिन्हें आप भारतीय कह रहे हैं ये हैं बड़े लिजलिजे। इनमें स्वाभिमान की कमी है। इनको अपनी भाषा-संस्कृति पर गर्व करना नहीं आता। यह लोग हमेशा इंडियन बनने की फिराक में रहते हैं। इंडियन तो बन नहीं पाते और भारतीय भी नहीं रह पाते। इनकी हालत त्रिशंकु जैसी हो जाती है। न जमीन में न आसमान मेें। ऐसे लोगों से क्या उम्मीद की जाए?
- लोग हैं तो उम्मीद करनी पड़ेगी। इस वर्ग को किसी न किसी दिन एहसास होगा ही होगा। इसके बाद जो विप्लव आएगा इस देश में उसे कोई नहीं रोक पाएगा। रोकने लिए चाहे जो षड्यंत्र रचा जाए।
कहते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था अपनी कब्र खुद खोदती है। हो सकता है कि यह ऐसा करती हो लेकिन एक कहावत बहुत प्रचलित है कि जो दूसरों के लिए कब्र खोदता है उसके लिए कब्र भी खोदनी नहीं पड़ती। वह अपनी ही खोदी कब्र में दफन हो जाता है। इस व्यवस्था का कुछ ऐसा ही हश्र होगा। जिनके लिए यह व्यवस्था कब्र खोद रही है वह एक दिन इसे दफन कर देंगे।
- यह व्यवस्था दफन हो न हो मैं तो हो गया। यह सागर था।
- क्यों? क्या हुआ?
- नौकरी से निकाल दिया गया।
- क्यांे?
- क्योंकि मुझे अंग्रेजी नहीं आती।
- इतने सालों से काम कर रहे थे तो अंग्रेजी आती थी?
- पहले मैं लोकल डेस्क पर काम करता था। यहां अंग्रेजी की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन अब मुझे जनरल डेस्क पर लगा दिया गया। वहां खबरों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करना पड़ता है। इस मामले मंे मेरा हाथ तंग है।
- लोकल डेस्क पर खराब काम तो नहीं कर रहे थे। वहां से हटाने का मतलब क्या है?
- निकालने का बहाना जो चाहिए था। मंदी का दौर है। अखबार छंटनी करके लागत में कमी कर रहा है। ऐसे में मेरे जैसे लोग निशाना बन रहे हैं।
- मेरी समझ में नहीं आता, हिंदी के अखबार में अंग्रेजी का क्या काम?
- जब तक इस देश मंे अंग्रेजी सत्ता की भाषा रहेगी हर जगह उसकी सत्ता चलेगी। हिंदी के अखबार उतने संवाददाता नहीं रखते जितनी जरूरत होती है। खबरों के लिए वह न्यूज एजेंसी पर निर्भर रहते हैं। एजेंसी में भी अंग्रेजी की लेते हैं। जबकि हिंदी की भी एजेंसी होती है। हिंदी की एजेंसी के बारे में इनकी राय होती है कि यह गुणवत्ता में अंग्रेजी के मुकाबले कमतर होती है। हिंदी एजेंसियों की सर्विस धीमी है। ऐसा एसलिए होता है क्योंकि न्यूज एजेंसियां भी अंग्रेजीदा संवाददाता रखती हैं। उनके यहां खबरंे पहले अंग्रेजी में लिखी जाती हैं फिर उनका हिंदी में अनुवाद किया जाता है। विडंबना देखिये कि कोई खबर हिंदी से अंग्रेजी में नहीं लिखी जाती। सभी किस्म की खबरें अंग्रेजी से हिंदी में लिखी जाती हैं। ऐसा क्यों भाई? क्या हिंदी के पाठक इतने दोयमदर्जे के हैं? धंधा आप हिंदी के नाम पर कर रहे हैं। सामग्री अुनवाद की दे रहे हैं। अनुवाद चहे जितना बढ़िया हो लेकिन मौलिकता जैसी जीवंतता और ताजगी नहीं ला सकता। इस तरह हिंदी के पाठक ऊंट-पटांग अनुवाद में खबर पढ़ने को मजबूर हैं। हिंदी पाठकों से हिंदी के नाम पर यह धोखाधड़ी है।
अरे भाई यदि आप हिंदी भाषी संवाददाता नहीं रख सकते तो जरूरी है न्यूज एजेंसी या अखबार चलाना?
- यही नहीं अखबार वाले या टीवी चैनल वाले अनुवादक तो रख लेते हैं। अक्सर होता यह है कि अनुवादक की या तो अंग्रेजी बढ़िया होती है या हिंदी। दोनों भाषा का ज्ञान बहुत कम को होता है। जिसे होता है वह अच्छे पैसे की मांग करता है और मीडिया में हालत यह है कि अच्छा पैसा देने के नाम से मंदी छा जाती है। कई अखबारों में तो ऐसे-ऐसे अनुवादक काम कर रहे हैं जिन्हें न ढंग से हिंदी आती है न ही अंग्रेजी। ऐसे में होता यह है कि अर्थ का अनर्थ हो जाता है। लेकिन साहब अंग्रेजी की बीमारी है। उसका इलाज नहीं है।
- मैंने देखा है कई अनुवाद करने वाले बेचारे नेट पर अनुवाद की साइट या फिर दूसरी जगहों से टीपते रहते हैं। नेट न हो तो ऐसे लोग अनुवाद कर ही न पाएं। कई बार यह लोग अपनी गलतियों को नेट पर किसी साइट में देखकर सुधारते हैं।
- यह इनकी कमजोरी नहीं विवशता है। नौकरी करनी है तो यह सब तो करना ही पड़ेगा।
- इस देश में अंग्रेजी दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बेशक बन गई लेकिन अब भी अधिकतर लोग हिंदी या स्थानीय भाषा ही बोलते और समझते हैं। ऐसे में यदि अंग्रेजी थोपी जाएगी तो उन्हें दिक्कत तो होगी ही।
- यही नहीं कई लोगों को अंग्रेजी के साथ हिंदी या स्थानीय भाषा भी आती है लेकिन यह जरूरी नहीं है कि जितनी अच्छी उन्हें हिंदी आती है उतनी ही बढ़िया उनकी अंग्रेजी भी हो। अंग्रेजी को बहुत सारे लोगों ने मजबूरी में आत्मसात किया है। यदि हिंदी भाषा भी रोजगार की और सत्ता की भाषा बन जाए तो कोई अंग्रेजी को पूछेगा भी नहीं। बेशक वह अंतरराष्टीय भाषा मानी जाती है।
- फिर तो विदेश जाने के लिए ही लोग अंग्रेजी सीखेंगे। या फिर अनुवादक बनने के लिए।
- हिंदी मीडिया में पत्रकारों से अंग्रेजी का टेस्ट लिया जाता है। यदि अंग्रेजी आती है और हिंदी कमजोर है तब भी उसे नौकरी पर रख लिया जाता है। अब ऐसा व्यक्ति क्या अनुवाद करेगा? जो करेगा उसकी क्या दशा होती होगी।
- आज यह धारणा बन गई है कि अंग्रेजी का ज्ञान रखने वाला ही सफल होगा लेकिन ऐसा भी नहीं है।
नौकरी के लिए सिफारिश भी तो जरूरी है। मीडिया में तो जातिवाद, क्षेत्रवाद, जमकर चलता है। मजे की बात तो है यह कि ऐसे तमाम वादों के ध्वजवाहक ही जब लिखते हैं तो क्या लिखते हैं। नैतिकता के उपदेश में कलम तोड़ देते हैं। कोई इनसे पूछे कि साहब आप लोग आपनी जिंदगी मंे जो लिखा है उसका कितना अनुपालन करते हैं। बंगले झांकने लगेंगे। तमाम दावे और उपदेश धरे के धरे रह जाते हैं।
- यह भी कैसी विडंबना है कि शोषण और अन्याय का विरोध करने वाले खुद उसी में लिप्त होते हैं। कुछ पीड़ित होते हैं तो कुछ शोषक के रूप में शोषण और अन्याय की इन्तहा ही पार कर देते हैं। बड़े पदों पर बैठे लोग अपना वेतन बढ़वाने के लिए अपने अधीनस्थकर्मियों का वेतन नहीं बढ़ने देते। यही नहीं जब उत्पादन लागत काम करने की बात आती है तो गाज छोटे और निचले स्तर के कर्मचारियांे पर गिराई जाती है। यह सब वहां होता है जो अपने आपको लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहता है।
- कहीं न कहीं उसे यह भी भ्रम हो गया है कि वह है तो लोकतंत्र है।
- भ्रम नहीं, यह सही है। भ्रष्ट लोकतंत्र को बनाये रखने में यह चौथा पाया भी अपनी भलाई समझता है। यह भी तभी तक फल-फूल रहा है जब तक यह भ्रष्ट तंत्र है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर क्या-क्या खेल नहीं होता। खबरें रोकी जाती हैं। दबाई जाती हैं। पक्ष और विपक्ष में छापी और उछाली जाती हैं। बड़ा विज्ञापन छपता है तो उसके खिलाफ खबरें नहीं छपंेगी। डर यही कि कंपनी विज्ञापन नहीं देगी। यदि ऐसा हो रहा है तो क्या यही है चौथा स्तंभ? यदि यही है तो क्या ऐसा होना चाहिए?
- आज मीडिया मिशन नहीं व्यवसाय है।
- फिर चौथा स्तंभ होने का दंभ क्यों? राजनीति के जातिकरण, अपराधीकरण और व्यवसायीकरण पर मीडिया हायतौबा क्यांे मचाता है? उसे तो खुद अपने गिरेबां मंे झांकने की जरूरत है। कबीरदास ने कितना सटीक कहा है कि बुरा को देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय। जो दिल झांका आपना मुझसा बुरा न कोय।
- जिसका खुद नैतिक पतन हो गया हो वह किसी को नैतिकता का पाठ कैसे पढ़ा सकता है?
- यार ऐसा नहीं है। इन तमाम बातों के सही होते हुए भी यह सच है कि मीडिया में कुछ लोग अभी भी सच्चे और ईमानदार हैं।
- हां, इससे इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन ऐसे लोगों की संख्या कम है। ऐसे लोग मुख्यधारा में भी कम हैं। जहां हैं वहां की हालत कुछ बेहतर जरूर है।
- अभी एक नया टीवी चैनल खुला है। उसने अपने पत्रकारों और मिडिया कर्मियों को मॉडलों की तरह रैंप पर कैटवॉक करवाया।
- ऐसी बातें भी सुनने को मिल रही हैं कि कुछ चैनल अपने यहां लड़कियों की नियुक्ति सिर्फ इसलिए करते हैं कि हर रात अलग-अलग लड़की के साथ यौन सुख ले सकें।
- एक टीवी चैनल का मालिक तो अपने केबिन में अपने यहां कार्यरत लड़कियों को बैठाकर अश्लील बातें करता है। फिर उसी में से किसी एक को ऐश करने के लिए ले जाता है।
- लड़कियां ऐसे कैसे मान जाती हैं?
- कुछ तो मजबूर होती हैं। कुछ अपने देह का अर्थशास्त्र खुद निर्मित करती हैं। उन्हें लगता है कि यदि देह के इस्तेमाल से पद-प्रतिष्ठा और पैसा मिल रहा है तो इसमें हर्ज ही क्या है?
- ऐसी लड़कियों का तर्क होता है कि क्या मैं घिस जाउंगी।
- बेशक घिसती नहीं हैं लेकिन अभी एक मैगजीन में एक सर्जन का बयान पढ़ा है। उसका दावा है कि आजकल लड़कियां अपनी वैजाइना की सर्जरी करवाती हैं। इसमें मीडिया से जुड़ी लड़कियां अधिक होती हैं। यदि घिसती नहीं हैं तो संगमपथ की सर्जरी क्यों?
- दरअसल, हर गलत आदमी अपने को सही ठहराने का तर्क गढ़ लेता है।
- इस व्यवस्था ने औरतों के लिए दरवाजा इसलिए नहीं खोला कि वह उदार हो गई है। उसका मकसद औरतों का शोषण करके खुद को मजबूत करना है। कामकाजी औरतों की संख्या बढ़ने से इस व्यवस्था को मजबूती मिलती है। उसे सस्ता श्रम मनचाही कीमत पर मिलता है। उसे औरत की देह मुफ्त में मिलती है। फिर औरतों के उपयोग के लिए तमाम वस्तुओं का बाजार विकसित होता है। आज की औरत उपभोग की वस्तु ही नहीं उपभोक्ता भी है। वह खुद बाजार में है। औरों को भी बाजार में खींचती है। और बाजार में रहेगी तो पुरुष और बच्चे खुद ही बाजार में पहंुच जाएंगे। कभी-कभी सच वह नहीं होता जो दिखता है। जो दिखता है सच उसके पीछे छिपा होता है।
- पिछले दिनों की बात है एक टीवी चैनल का एक वरिष्ठ पत्रकार अपने अधीन कार्यरत लड़की के साथ एटीएम से पैसे निकालने गया और उसी केबिन में लग गया। उसे यह भी ख्याल नहीं रहा कि एटीएम के केबिन में कैमरा लगा होता है। वह उनकी हरकत को न केवल देख रहा है रिकार्ड भी कर रहा है। हुआ वही। साहब की हरकत की फिल्म बन गई। बैंक ने सीधे चैनल मालिक से शिकायत की। इसके बाद साहब की नौकरी चली गई। हालांकि चार-छह माह बाद वह उसी चैनल में फिर नजर आने लगा।
- चैनलों में कार्यरत लड़कियों की तमाम तरह की कहानियां हैं। कई लड़के तो इनकी ब्लू सीडी लेकर घूमते हैं।
- एक हिंदी की साहित्यिक पत्रिका ने टीवी मीडिया पर विशेषांक निकाला तो वह सुपरहिट रहा। कारण यही कि उसमें टीवी मीडिया की अंदर की बातें उछाली गई थीं। उसकी सफलता को देखते हुए फिर और पत्रिकाओं ने मीडिया विशेषांक निकाला लेकिन उसके बाद उस स्तर पर कोई नहीं पहंुच सका। क्योंकि दिखने वाले सच के पीछे का सच कोई तलाश नहीं पाया और फिर सामने लाने का साहस नहीं दिखा पाया।
- जाहिर सी बात है जहां ग्लैमर है वहां यह एक हकीकत है।
- प्रिंट मीडिया भी इस मामले में कम नहीं है। एक अखबार के संपादक तो अपने पीए से ही आशिकी कर रहे थे। वह भी तब जब कि वह अपनी पहली पत्नी को तलाक देकर एक दूसरी लड़की से प्रेम विवाह कर चुके थे। अब यह तीसरा चक्कर था
- एक अखबार में प्रतिष्ठित पद पर कार्यरत एक वरिष्ठ पत्रकार को पुलिस ने एक लड़की के साथ अश्लील हरकत करते उनकी कार में ही पकड़ लिया था। बेचारे बड़ी मुश्किल से छूटे थे।
देश समाज और मीडिया पर इन दोस्तों की ऐसी बातचीत देर रात तक होती रही। इसी बीच इन लोगों ने मिलकर खाना बनाया और खाया। चूंकि इनमें से एक साथी बेरोजगार हो गया था और एक पहले से ही बेरोजगार था। एक का इंटरव्यू खराब हो गया था। एक तरह से सभी की पीड़ा समान थी।
ऐसे लोग यदि एक जगह एकत्रित हो जाएं तो वह भूख-प्यास, नींद को भूल जाते हैं। इनकी पीड़ा बातों के माध्यम से निकलकर इन्हें सुकून पहुचाती है। यही नहीं ऐसे दुखी लोग हर जगह नाकारात्मक पहलू को खोज लेते हैं। यदि वहां सकारात्मक पहलू होगा भी तो वह उस पर चर्चा नहीं करते।
आदमी अपनी पीड़ा के इर्दगिर्द ही अपने नजरिये को विकसित करता है। सफल आदमी को व्यवस्था में अच्छाइयां दिखाई देती हैं तो असफल आदमी को बुराइयां नजर आती हैं। सफल आदमी कहता है कि असफलता से ही सफलता निकलती है। आदमी को अपने खिलाफ जा रही परिथितियों को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करना चाहिए। ऐसे लोग सफल होने के लिए हर तिकड़म आजमाते हैं।
इसके विपरीत जिन्हें असफल कहा जाता है वह तिकड़मों से दूर रहते हैं शायद इसीलिए असफल भी रहते हैं। उन्हें व्यवस्था में बुराइयां ही दिखती हैं और वह उसे ठीक करने के लिए प्रयास करते हैं। बेशक वह हथियार नहीं उठा लेते लेकिन उनके द्वारा की गई व्यवस्था की आलोचना और समीक्षा परिर्तन की राह प्रसस्थ करने में सहायक तो होती ही है।
एक-एक करके सभी दोस्त सो गये।
सुबह अमर की आंख मोबाइल फोन की धुन से खुली। आंख मलते हुए हैंडसेट को उठाया तो देखा स्क्रीन पर अनु नाम छपा हुआ है। अब क्या आफत आ गई। सुबह-सुबह फोन कर दिया। अमर ने मन ही मन सोचा और स्क्रीन पर नाम देखता रहा। एक बार को सोचा की फोन काट दे लेकिन फिर सोचा अब जाग ही गया हूं तो मैडम की सुन ली जाए। उसने फोन ऑन कर दिया। उधर से नारी कंठ की मधुर आवाज कानों में संगीत की तरह प्रवेश करने लगी।
- गुड मार्निंग।
- मार्निंग।
- सो रहे थे?
- हां,
- डिस्टर्व कर दिया?
- नहीं। अमर की जुबान पर सच नहीं आया। जबकि इस समय फोन आना उसे अच्छा नहीं लगा था।
- रात नींद आ गई?
- हां।
अमर का जवाब सुनकर अनु को धक्का लगा। यह प्रश्न उसने भेद लेने के लिए किया था। वह जानना चाहती थी कि अमर के लिए जितनी बेचैनी वह महसूस कर रही है क्या उतनी ही बेचैनी उसके लिए वह भी महसूस कर रहा है। अमर के जवाब से उसकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। वह यह भी आशा कर रही थी कि अमर इसके बाद उससे सवाल करेगा कि क्या उसे नींद आई? लेकिन अमर ने ऐसा कुछ नहीं पूछा तो अनु भी कठोर हो गई। कहां उसने फोन किया था कि लंबी बातें करेगी लेकिन अमर के रवैये से वह भन्ना गई। उसे खुद पर ही गुस्सा आया।
- ओके, सो जाओ। कहकर अनु ने फोन काट दिया। वह बेहद गुस्से में थी और यह गुस्सा भी खुद पर ही था। वह क्यों ऐसे आदमी के लिए इतनी बेचैन है जो उसका हो ही नहीं सकता। इतने सालों तक उसने अपनी इच्छाओं का दमन किया है। प्यार की उमंग एक दो बार उठी लेकिन उसमें उसे सफलता नहीं मिली तो वह पढ़ाई में रम गई। फिर उसकी शादी हो गई। शादी में जो धोखा हुआ उसके बाद तो किसी पुरुष के लिए उसका नजरिया ही बदल गया। उसे प्यार-मोहब्बत और पुरुष नामक प्राणी से नफरत सी हो गई थी। लेकिन अमर को देखने के बाद उसकी भावनाएं भड़क गई हैं। उसे यकीन नहीं हो रहा है कि वह वही अनु है जो इतनी संयमित हुआ करती थी। अमर के लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार है। उसकी इस दशा पर उसे खुद भी यकीन नहीं हो रहा है।
अनु नाइट सूट में ही हाथ में मोबाइल लिए लॉन में आकर टहलने लगी।
सुबह की ठंडी हवा अच्छी लगी। हालांकि वह वातानुकूलित कमरे में सोई थी लेकिन प्राकृतिक हवा ने उसे मुग्ध कर दिया। उसने यह भी गौर किया कि ऐसी सुबह उसने पता नहीं कितने सालों बाद देखी है। वह लॉन में टहलने लगी और बार-बार हाथ में लिए मोबाइल फोन को देख लेती। अब तक रामकिशुन भी जग गये थे। वह लॉन में लगे पौधांे को पानी दे रहे थे। लॉन का कई चक्कर लगाने के बाद अनु उनके पास चली गई। उनके हाथों से पानी की पाइप लेकर पौधों को खुद ही नहलाने लगी। इस उपक्रम के दौरान वह रह-रह कर मोबाइल फोन की स्क्रीन को देख लेती। उसे थोड़ी-थोड़ी देर पर ऐसा लगता कि फोन की ट्यून बज रही है...।
अनु के फोन काट देने से अमर बेचैन हो गया। उसे लगा कि अनु उससे नाराज हो गई। बेशक अमर के दिल में अभी तक अनु के लिए वह भाव नहीं था जो अनु के दिल में उसने देखा था। लेकिन वह यह चहाता था कि अनु से उसकी बातचीत बनी रहे। वह अनु से एक खास दोस्ती की चाह रखने लगा था। उसे अनु वैचारिक रूप से गंभीर लगी थी। इसलिए उसकी रुचि उसमें हो गई थी। उसने सोचा कि उसे फोन करके पूछना चाहिए। यह सब सोचते हुए अपने दोस्तों को कमरे में सोता छोड़ वह बाहर निकल आया। घर के सामने ही एक पार्क था। वहां सुबह-सुबह बहुत सारे लोग खेल रहे थे। वह भी वहीं चला गया। पार्क में पहुंचते ही अनु को फोन मिलाया।
जब फोन की ट्यून बजी तो अनु पौधांे को पानी देना बंद कर चुकी थी। वह अब अंदर जा रही थी। सुहानी सुबह भी उसके मूड को सही नहीं कर पाई थी। मोबाइल की स्क्रीन पर अमर का नाम आया तो उसके दिल की धड़कनें तेज हो गईं। लेकिन वह गुस्से में थी। इसलिए तत्काल फोन नहीं उठाया। इसी बीच यह ख्याल आते ही कि कहीं कट गया और फिर अमर ने फोन नहीं किया तो। यह विचार आते ही उसने फोन उठा लिया।
- फोन क्यों काट दिया? अमर ने सवाल किया।
- किसी सोते आदमी को क्यों परेशान करूं?
- यह बात तो फोन करने से पहले सोचना चाहिए था?
- मुझे क्या पता कि लोग दोपहर तक सोते हैं।
- मैडम यह दोपहर नहीं। सुबह के छह बज रहे हैं। हम रात में तीन बजे के बाद सोए हैं।
- क्यों? अनु ने सवाल किया। वह खुश हुई कि उसी की तरह अमर को भी नींद नहीं आई।
- मेरे एक दोस्त की नौकरी छूट गई है। इसी पर रात भर चर्चा होती रही। अमर का जवाब सुनकर अनु को लगा कि किसी ने उस पर पानी डाल दिया है।
- नौकरी क्यांे छूट गई?
- आर्थिक मंदी की सुनामी में उसकी न केवल नौकरी बह गई बल्कि उसके सारे सपने भी।
- ये तो बहुत बुरा हुआ।
- इससे बुरा और क्या होगा? लेकिन जब दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति संकट में हो और एक माह में पांच लाख लोगों की नौरियां जा रही हों तो हमारी बिसात ही क्या है?
- हां, ठीक कह रहे हो? वैसे आपका आज का क्या प्रोग्राम है? अनु ने बात को घुमा दिया।
- कुछ खास नहीं। बस एक जगह नौकरी मांगने जाना है।
- क्यों? आपकी भी नौकरी छूट गई क्या?
- छूटी नहीं है। एक जगह से बुलावा आया है।
- आपको मिल लेना चाहिए। और कोशिश करनी चाहिए की बात बन जाए। अनु को लगा कि यदि ऐसा हो जाए तो उसे अमर के करीब रहने के मौके अधिक मिलेंगे।
- जाऊंगा। बात बने न बने कुछ कह नहीं सकता।
- कोशिश करेंगे तो बात बन ही जाएगी।
- कोशिश तो करूंगा ही। इसी बीच अमर को एहसास हुआ कि वह रोमिंग पर है बातचीत लंबी खिंच गई है। उसने संवाद को खत्म करने की गर्ज से कहा कि ठीक है बाद में कॉल करते हैं।
- ओके बॉय टेक केयर। उधर से अनु ने कहा। लेकिन अमर में इन शब्दों को सुनने का धैर्य नहीं बचा था। उसने तत्काल फोन को डिसकनेक्ट कर दिया।
फोन करने के बाद अमर पार्क से कमरे में आ गया तो अनु लान में ही रामकिशुन से बातें करने लगी। अब उसका मूड सही हो गया था। उसका मन जोर-जोर से उछलने और कूदने को कर रहा था। न चाहते हुए भी उसने एक दो बार ऐसा किया भी। उसे खुश देखकर रामकिशुन को भी अच्छा लगा। उसने अनु को पहली बार इतना खुश देखा था। रामकिशुन अनु में आपनी बिटिया कनिका का रूप देखता है। वह जब भी अनु को देखता है उसे कनिका की याद आ जाती है।
रामकिशुन के पास भी यादांे का भरा पूरा जंगल है। जिसे अपनी छाती पर लिए घूम रहे हैं। हिंसक यादें उन्हें लहूलुहान करती रहती हैं।
- बिटिया, आज तो बहुत खुश हो?
- हां, अंकल बहुत खुश हूं? मेरा मन आसमान में उड़ने को कर रहा है।
उधर, अमर कमरे में आता है तो उसके सभी दोस्त चाय पी रहे होते हैं। वह भी किचन में जाकर अपने लिए चाय बनाता है और कप मंे डालकर दोस्तों के बीच बैठ जाता है। सभी चाय पी रहे हैं और अपने में खोए हैं। माहौल गमगीन है।
हालांकि यहां किसी की मौत नहीं हुई है लेकिन सन्नाटा उससे भी कहीं ज्यादा गहरा है। एक आदमी बेरोजगार हुआ है, जिसके तीन बच्चे हैं। जो पढ़ रहे हैं। पत्नी है, मां और बाप हैं। इन सब का खर्च कौन चलाएगा? बच्चे यदि न पढ़ पाए तो उनके सपनों का क्या होगा? कई सपने एक साथ भंवर में फंसे नजर आ रहे हैं।
अमर को अपने पुराने दिन याद आने लगे। अभी जिस संस्थान में वह नौकरी कर रहा है। उसमें उसने एक साल भी नहीं पूरे किये थे कि उसकी नौकरी पर छंटनी की तलवार लटकने लगी थी। उस समय उसकी भी रातों की नींद और दिन का चैन गायब हो गया था।
- ओमप्रकाश तिवारी
c @ omprakash tiwari

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परिवर्तन लाजमी है तो डरना क्यों? - ओमप्रकाश तिवारी मानव सभ्यता अंतरविरोधों के परमाणु बम जैसी है। इसके अंतरविरोध परिवर्तनशील बनाकर इसे आगे बढ़ाते हैं तो यही इसका विनाश भी करते हैं। मानव जाति का इतिहास गवाह है कि भूत में कई सभ्यताएं तबाह हो गईं जिनके मलबे से खाद-पानी लेकर नई सभ्यताओं ने जन्म लिया और फली-फूली हैं। यही वजह है कि मानव भविष्य को लेकर हमेशा चिंतित रहता है। उसकी अधिकतर योजनाएं बेहतर भविष्य के लिए होती हैं। लेकिन हर आदमी, हर समाज और हर सभ्यता व संस्कृति हमेशा बेहतर नहीं साबित होती। अक्सर इंसानी अनुमान धरे केधरे रह जाते हैं और भविष्य कुछ का कुछ हो जाता है। वामपंथी चिंतक कार्ल मार्क्स का आकलन था कि पूंजीवादी व्यवस्था अपनी तबाही के लिए खुद ही रास्ते बनाती है। यही वजह है कि एक दिन यह व्यवस्था तबाह हो जाएगी और इसके स्थान पर नई व्यवस्था सामने आएगी। नई व्यवस्था क्या होगी इसकी भी मार्क्स ने कल्पना की और बताया कि वह साम्यवादी व्यवस्था होगी। लेकिन ऐसा हुआ क्या? आज लगभग पूरी दुनिया में पूंजीवादी व्यवस्था है। सोवियत रूस जैसे देशों में साम्यवादी व्यवस्था आई भी तो वह पूंजीवादी व्यवस्था ...

कहानी कोढ़ी का नल

भाग दो --- बहुत पहले यहां जंगल हुआ करता था। जिसमें ढाक के पेड़ बहुतायत में थे। इनके अलावा बबूल और कटाई की झांडियां थीं। जहां इनका वास नहीं था वह जमीन ऊसर थी। उसमें रेह पैदा होती थी। जिसमें घास भी नहीं उगती। इस बौने जंगल में जहां सांप-बिच्छू रहते थे, वहीं जंगली सूअर और गीदड़ जैसे प्राणी भी रहते थे। इन्हीं के बीच दो घर मनुष्यों के थे, जिन्हें दूसरे गांव के लोग वनप्राणी कहते थे। जब जमींदारी का जमाना था तो इनके पूर्वज कहीं से आकर यहां बस गए थे। पहले यह एक ही घर थे, लेकिन खानदान की वृद्धि हुई तो दो हो गए। इन्हें वनप्राणी इसलिए कहा जाता था, योंकि इन्होंने यहां बसने के बाद और किसी इनसान को बसने ही नहीं दिया। जिसने भी कोशिश की उसे मुंह की खानी पड़ी। हालांकि जंगली जानवरों से मुकाबले के लिए इन्हें समाज की जरूरत थी, लेकिन वन संपदा का बंटवारा न हो जाए इसलिए यह लोग इस जगह को आबाद नहीं होने दे रहे थे। समय के साथ यह वनप्राणी भी बदले। इन्हें भी समाज की जरूरत महसूस हुई। इसके बाद इन्होंने यहां पर लोगों को बसने की इजाजत दी। यहां पर बसने वाले दूसरे गांवों के फालतू लोग थे। फालतू इसलिए कि इन्हें अपने गांव...

कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं टूट रहा-

कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं टूट रहा- -मृत्युंजय कुमार यह इक्कीसवीं सदी हैइसलिए बदल गई हैं परिभाषाएंबदल गए हैं अर्थसत्ता के भीऔर संस्कार के भी।वे मोदी हैं इसलिएहत्या पर गर्व करते हैंजो उन्हें पराजित करना चाहते हैंवे भी कम नहींबार बार कुरेदते हैं उन जख्मों कोजिन्हें भर जाना चाहिए थाकाफी पहले ही।वे आधुनिक हैं क्योंकिशादी से पहले संभोग करते हैंतोड़ते हैं कुछ वर्जनाएंऔर मर्यादा की पतली डोरी भीक्योंकि कुछ तोड़ना ही हैउनकी मार्डनिटी का प्रतीकचाहे टूटती हों उन्हें अब तकछाया देनेवाली पेड़ों कीउम्मीद भरी शाखाएंशायद नहीं समझ पा रहे हैंवर्जना और मर्यादा का फर्क।