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अंधेरे कोने : गगन कुसुम की ख्वाहिशें

अनु को रात भर नींद नहीं आई। पूरी रात करवटें बदलती रही। अपनी इस बेचैनी का कारण वह समझ नहीं पा रही थी। उसे लग रहा था कि कुछ है जो वह पाना चाहती है...। कुछ है जो उसके पास नहीं है...। उसे लगता कि वह एक खाली बर्तन है...। एक स्टेचू है।

अंधेरे कोने
 
भाग दो
गगन कुसुम  की ख्वाहिशें -

अनु को रात भर नींद नहीं आई। पूरी रात करवटें बदलती रही। अपनी इस बेचैनी का कारण वह समझ नहीं पा रही थी। उसे लग रहा था कि कुछ है जो वह पाना चाहती है...। कुछ है जो उसके पास नहीं है...। उसे लगता कि वह एक खाली बर्तन है...। एक स्टेचू है।
हालत यह थी कि वह कई बार बिस्तर से उठ कर बॉलकनी पर गई। वहां से गली में देखती। स्ट्रीट लाइटों की पीली रोशनी उसे बीमार लगती। आसमान की तरफ देखती तो असंख्य तारे टिमटिमाते नजर आते। चांद अपनी चांदनी के साथ गगन विहार कर रहा होता। वह एक अनजानी ईर्षा से भर जाती।
फिर बिस्तर पर आ जाती और सोने का प्रयास करती लेकिन नींद न आती। करवटें बदलती और जब बिस्तर शरीर में चुभने सा लगता तो फिर बॉलकनी पर आ जाती। इस तरह उसकी पूरी रात कट गई। सुबह के चार बजे नींद आई।
पार्क में, रेस्टोरेंट में, मेट्रों में, बस में, वह पूरा दिन किसकी के साथ घूमती है। कभी रूठती है तो कभी प्रेमभरी बातें करती है। उसके साथ सिनेमा देखने जाती है। हॉल के अंदर वह उसे किस करती है।
सपने को देखते हुए अनु कसमसा रही थी कि बहादुर चाय लेकर आ गया।
- अनु दी आठ बज गए हैं। बहादुर की आवाज सुनकर अनु एक झटके से उठती है। घड़ी पर निगाह डालती है। घड़ी की सुइयां आठ बजा रही होती हैं। वह बहादुर से पूछती है कि कोई आया तो नहीं था? जवाब ना में मिलता है तो वह अपना मोबाइल देखती है। वहां कोई मिस्ड कॉल नहीं है। वह चाय उठाकर पीने लगती है, और सपने के बारे में सोचती है। कैसा सपना था? ये कैसी चाहत थी? सपने में घटी घटना की आनंद की अनुभूति से रोमांचित होकर मुस्करा देती है। सपने भी कभी-कभी गगन कुसमु को आंचल में डाल देते हैं...।
सपने में जिस लड़के के साथ घूम रही थी उसके चेहरे को याद करती है लेकिन कोई तस्वीर नहीं बनती। वह उस लड़के के धड़ पर कई चेहरे रखती है लेकिन किसी से उसे संतुष्टि नहीं होती।
चाय खत्म करके उठती है और वॉशवेशन पर मुंह धोती है। शीशे में चेहरे को गौर से देखती है। उसे अपने गालों पर दांतों के निशान का एहसास होता है...। अधरों को देखती है तो वे सुर्ख लगते हैं। वह लरज जाती है...। उसके मंुह से अनायास ही निकल जाता है-बदतमीज...।
वह बाथरूम में घुस जाती है। स्नान घर में लगे आदमकद शीशे में खुद को निहारती है। कभी आगे तो कभी पीछे। कभी दाएं तो कभी बाएं से शरीर का अवलोकन करती है। फिर नाइट सूट उतार देती है।
अपने शरीर को अनु आईने में गौर से देखती है। उसे एक अजीब से आनंद की अनुभूति होती है। उसे अपनी खूबसूरती पर गुमान था लेकिन अब वह अपने सुंदर और सुडौल तन पर गर्वान्वित महसूस कर रही थी।
उसे लगा कि कोई बाथरूम में है। वह चौक जाती है। उसे किसी पुरुष के हंसने की आवाज सुनाई पड़ती है। वह हड़बड़ा कर नाइट सूट से तन को ढक लेती है। उसे कोई दिखाई नहीं देता। वह थोड़ी देर तक सावधान की मुद्रा में रहती है फिर उसे यकीन हो जाता है कि कोई नहीं है। वह मुस्कराती है। खुद से कहती है कि अनु तुझे क्या हो गया है?
वह फिर नाइट सूट फेंक देती है। बदन को शीशे में निहारती है और इठलाती हुई शॉवर को चालू कर देती है। कोई गीत गुनगुनाते हुए शॉवर की फुहारांे में भीगने लगती है। बड़ी देर तक वह पानी में भीगती रहती है। सोचती है कि काश कोई साथ में नहाता...।
अनु बाथरूम से निकलती है तो घड़ी नौ बजा रही होती है। सोचती है क्या हो गया है मुझे? बदन तौलिए से पोछने के बाद फटाफट अंडरगारमेंट पहनती है। कपड़ा पहनने के लिए अलमारी खोलती है तो सोच में पड़ जाती है कि क्या पहनूं?
कपड़ों से अलमारी भरी पड़ी है। सलवार-सूट पहनूं कि जींस की पैंट, टी-शर्ट या शर्ट? रंग कौन सा हो? साड़ी पहनूं क्या? स्कर्ट, टी-शर्ट या टॉप बेहतर रहेगा? विभिन्न तरह के रंगों में विभिन्न तरह के कपड़ों से उसकी निगाहें गुजरती हैं पर उसे कोई पसंद नहीं आता। बड़ी देर तक वह असमंजस में पड़ी रहती है। फिर सोचती है कि साड़ी पहननी चाहिए। लेकिन जैसे ही वह साड़ी निकालने को होती है मन में विचार आता है कि आजकल साड़ी कौन पहनता है? साड़ी पहन कर तो अम्मां लगूंगी। टिपिकल इंडियन वूमेन। टॉप और मिनी स्कर्ट सही रहेगा। लेकिन इसके लिए भी उसका दिमाग तर्क खोज लाता है। नहीं, यह अधिक माडर्न हो जाएगा। सलवार सूट सही रहेगा। वह सलवार सूट निकाल लेती है। लेकिन जब पहनने को होती है तो मन में विचार आता है कि इसे पहनकर तो बहन जी लगूंगी। यार अनु तू क्या कर रही है? जींस और शर्ट पहन। न बहन जी न अम्मां न माडर्न। एक ऐसा वस्त्र जो सबको पसंद आएगा।
वह नीली जींस और सफेद शर्ट पहनती है।
बताए गये पते पर पहुंच कर अमर ने डोर बेल बजाई। उसकी निगाह गेट पर टंगी पट्टी पर जाती है। उस पर लिखा है कुत्तों से सावधान। वह डर जाता है। तभी दरवाजा खुलता है। गेट खोलने वाली अनु होती है। उसे देखकर मुस्कराता हैं। अनु मुस्कुराते हुए हॉय बोलती है। एक दूसरे को देखकर दोनों अजीब से आनंद की अनुभूति करते हैं।
अनु सोचती है कि पूछे कि अब आ रहे हो? लेकिन पूछती है कि मकान मिलने में परेशानी तो नहीं हुई?
- नहीं। यह इलाका मेरा जाना-पहचाना है। बस थोड़ा बदल गया है।
- जाना पहचाना है? अपनी जुल्फों को झटके से पीछे की तरफ करती हुई अनु ने सवाल किया।
- इस इलाके में मेरा आना-जाना रहा है। आज से दस-बारह साल पहले।
- अच्छा तो आप पहले दिल्ली में थे?
- हां।
अमर तीन मंजिली कोठी की भव्यता में खो जाता है। उसकी निगाह कोठी के जिस भी भाग पर पड़ती है वहीं चिपक सी जाती है। उसे हर तरफ सम्पन्नता चमकती नहीं टपकती नजरी आती है। लॉन में जंजीरों से चार कुत्ते बंधे हैं। सभी विदेशी नस्ल के हैं। बहुत ही डरावने। छोड़ दिये जाएं तो आदमी को फाड़ डालें। अमर सहम गया। खुद से ही पूछा कि कहां आ गया हूं?
वह घर के अंदर आ चुके थे। ड्राइंगरूम में महंगे सोफे की तरफ इशारा करते हुए अनु ने बैठने के लिए कहा। वह ड्राइंगरूम को निहारते हुए बैठ गया। बैठते ही सोफे में धंस गया। अब तक वह इतने महंगे सोफे पर नहीं बैठा था। ड्राइंगरूम की खिड़कियों पर आसमानी रंग का महंगा पर्दा टंगा है। ड्राइंगरूम के एक तरफ एक बड़ा पर्दा टंगा है जिसके उस पार घर का दूसरा पोर्सन। सामने की दिवाल पर पेंटिंग टंगी है। उसमें किसी चित्रकार का नाम लिखा है पर वह पढ़ नहीं पा रहा था। पेंटिंग में क्या बनाया गया है इसे भी वह नहीं समझ पा रहा था। अभी वह उसे समझने का प्रयास कर ही रहा था कि अनु के मम्मी पापा आ गये। अनु ने दोनों से अमर का परिचय कराया।
- ये अमर हैं। बहुत अच्छे राइटर हैं। जर्नालिस्ट भी।
- अंग्रेजी में लिखते हैं? अनु के पिता रमेश ने पूछा।
- नहीं। अमर और अनु ने एक साथ जवाब दिया।
- डैडी ये लिखते तो हिंदी में हैं लेकिन बहुत बढ़िया लिखते हैं। अनु ने कहा।
- हिंदी में चाहे जितना बढ़िया लिखो उसका कोई मतलब नहीं होता। अनु की मम्मी कविता ने कहा।
- कौन पूछता है हिंदी-फिंदी को। अनु के पिता ने घृणा व्यक्त की। अमर को बुरा लगा।
अनु को समझ में नहीं आया कि क्या प्र्रतिक्रिया दे। उसे लगा कि मम्मी-डैडी अमर का अपमान कर रहे हैं।
- ऐसी बात नहीं है डैडी। हिंदी में बढ़िया लिखा जा रहा है और उसकी कद्र भी हो रही है। आखिर हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है।
- बस कहने के लिए राष्ट्रभाषा है। जिसे केवल हिंदी आती है, वह इस देश में पीछे रह जाता है। उसे लोग बेवकूफ समझते हैं।
अनु के डैडी ने कहा तो अमर ने सोचा इसे मुझसे बेहतर कौन समझ सकता है।
उसे एक घटना याद आई। वह बस से यात्रा कर रहा था। एक आदमी की कंडक्टर से कुछ कहासुनी हो गई। कंडक्टर ने उसे गालियां दीं। वह आदमी उसे समझाने का प्रयास करता रहा लेकिन जब बात बढ़ती ही गई तो उस आदमी ने अंग्रेजी में कंडक्टर को बड़ी गालियां दीं। उसके मुंह से अंग्रेजी के शब्दों का निकलना था कि कंडक्टर की घिग्घी बंध गई। वह चुप हो गया। एकदम से सरेंडर कर दिया। वह आदमी बड़ी देर तक उसे अंग्रेजी में सुनाता रहा और कंडक्टर सुनता रहा। बीच-बीच में कहता रहा कि गलती हो गई सर, माफ कर दो। बच्चे की जान लोगे क्या?
- अभी तक कितनी किताबेें लिखी हैं? अनु की मम्मी ने सवाल किया तो वह उन्हें देखने लगा।
- दो उपन्यास, दो नाटक और दो कहानी संग्रह छप चुके हैं। एक उपन्यास पर काम कर रहे हैं। आज कल स्क्रिप्ट लिख रहे हैं। अमर के बोलने से पहले ही अनु ने बड़े उत्साह से बताया।
- इतना लिखने के बाद भी आपको कोई नहीं जानता। यही आप अंग्रेजी में लिखे होते तो बात ही कुछ और होती। अनु के डैडी ने कहा।
- इतनी किताबों से कितनी रायल्टी मिलती होगी? अनु की मम्मी ने सवाल किया।
अमर को लगा कि कहां आकर फंस गये। यहां तो नंगा ही किया जा रहा है।
- आप ऐसे सवाल क्यों कर रही हो? अनु ने तीखे अंदाज में कहा। वह मां-बाप को संकेत देना चाह रही थी उनके सवाल अमर को अच्छे नहीं लग रहे हैं और उसे भी। लेकिन उसके मम्मी-पापा तो अड़े बैठे थे। उनकी तरफ से सवालों की गोली दनादन चलती रही और अमर घायल होता रहा।
- तू तो बड़ी तारीफ कर रही है? ऐसे लग रहा है जैसे इनकी सारी किताबें पढ़ चुकी है? कविता ने अनु से कहा।
- हां, कुछ पढ़ी हैं। कुछ पढ़ रही हूं।
- मैंने तो तुझे कभी हिंदी की किताब पढ़ते नहीं देखा।
- सब कुछ दिखा कर ही पढ़ा जाता है क्या? फिर आप लोगों के पास मैं क्या पढ़ रही हंू यह देखने की फुर्सत ही कहां है। अधिकतर किताबें तो मैं आफिस में पढ़ लेती हंू। अनु गुस्से में बोली
- तू इनकी वकील क्यों बन रही है? अनु की मम्मी ने मुस्कराते हुए अनु से पूछा।
- मम्मा कुछ बातें होती हैं जो वैसे नहीं कही जातीं, जैसे कि आप लोग कह रहे हैं। यह घर आए मेहमान की बेइज्जती है।
- ओ हो, हमारी अनु तो अच्छी-खासी हिंदी बोलने लग गई। जानते हो अमर, यह घर पर भी हिंदी नहीं बोलती। पता नहीं कितनी बार कहा होगा कि आई हेट हिंदी। स्कूल में हमेशा हिंदी में ही कम नंबर आते रहे। अनु के डैडी ने कहा, तो अमर ने अनु की तरफ देखा। अनु के चेहरे  पर शर्म मिश्रित झेप थी...।
- आप मेरी पोल खोल कर ठीक नहीं कर रहे हैं डैडी। यह मेरी इंसल्ट है। आपको अपनी बेटी का सम्मान करना चाहिए। अनु को लगा कि यह वार्ता और चली तो वह रो देगी।
- अच्छा बाबा माफ करना, हम लोग आफिस चलते हैं। अपने इस दोस्त से कहना कि हिंदी छोड़कर अंग्रेजी में लिखे। नाम कमाये और पैसा भी। आखिरकार अंग्रेजी इंटरनेशनल लैंग्वेज है और हिंदी गांव गंवार की..।
- डैडी। अनु चीखी थी। आप इंसल्ट कर रहे हैं।
- ठीक है भाई, मैं चलता हंू। माफ करना अमर यदि कुछ गलत कह गया हूं तो।
रमेश और कविता दफ्तर के लिए चले गये। उनके जाने के बाद अनु ने अमर से कहा कि मैं अपने मम्मी-डैडी की तरफ से मांफी मांगती हूं।
- इसमें माफी मांगने की क्या बात है? ठीक ही तो कह रहे थे। जो वह कह रहे थे, उसे मैं भोग रहा हूं। कल ही मैं इसलिए रिजेक्ट कर दिया गया क्योंकि मुझे अंग्रेजी नहीं आती।
- वाकई यह बहुत शेमफुल है।
- मेरा अंग्रेजी का अज्ञान?
- नहीं यार, अच्छी स्टोरी और स्क्रिप्ट होते हुए भी सिलेक्ट न करना यह शेमफुल है। उन्हें काम तो हिंदी में ही करना है, सीरियल भी हिंदी में बनाएंगे। फिर ऐसी हरकत समझ में नहीं आई। मैंने आपकी स्क्रिप्ट पढ़ी है। बहुत ही अच्छी है। और भी कई लोग तारीफ कर रहे थे। कई तो डरे हुए थे कि यदि आपका सलेक्शन हो गया तो उनकी छुट्टी हो जाएगी। अनु एक सांस में कह गई।
अनु बोल रही थी तो अमर ने उसे गौर से देखा। उसे गेट पर देखते ही उसका दिल धक् करके रह गया था लेकिन वह उसे उस समय भर निगाह देख नहीं पाया। अभी उसकी निगाह फिर पड़ी तो आंखें हटने का नाम ही नहीं ले रहीं। नीली टाइट जींस और सफेद शर्ट में वह काफी खूबसूरत लग रही है। लंबे-काले बाल जो खुले हुए हैं और बार-बार चेहरे पर आ जाते हैं, जिन्हें वह अपने गोरे हाथों से पीछे करती है। अमर को अच्छे लगे।
अमर उसे गौर से देख रहा है, इसे अनु ने भी महसूस किया। उसने भी देखा कि अमर नीली जींस और सफेद शर्ट में है। उसने सोचा हमारी पसंद एक सी है। इसी बीच अनु उठकर जाने लगी तो अमर ने उसे गौर से देखा। उसे संस्कृत के महाकवि कालीदास की उपमा याद आई जो उन्होंने शकंुतला के लिए की थी। केले के तने जैसी जांघों वाली। टाइट जींस में अनु भी कालिदास की शंकुतला लग रही थी। चुस्त वस्त्र के कारण अनु की शारीरिक संरचना काफी आकर्षक लग रही थी।
अमर कई दिनों से दिल्ली में है। इस दौरान वह देख रहा है कि यहां की लड़कियां टाइट जींस उसके ऊपर शर्ट या टी-र्शट या टॉप पहन रही हैं। तभी से वह सोच रहा है कि पहनावा भी कितनी जल्दी बदल जाता है। कुछ साल पहले तक इसी दिल्ली में लड़कियां सलवार सूट की दीवानी थीं और आज जींस की पैंट और शर्ट की। उसने गौर से देखा था और सोचा भी था कि लड़कियों की टाइट पैंट और शर्ट सौंदर्य की नई परिभाषा गढ़ रही है। कालिदास ने शंकुतला के लिए सौंदर्य की जो परिभाषा गढ़ी थी उसे आज की लड़कियां साकार कर रही हैं। ये मौका उन्हें किसने दिया? समाज ने या बाजार ने? शायद बाजार ने समाज को उदार बना दिया है। यह भी हो सकता है कि पुरुष अपने नयनसुख के लिए उदार हो गया हो। चुस्त और छोटे कपड़ों में जो नारी सौंदर्य प्रगट हो रहा है उसके लिए तो पुरुष हमेशा से लालायित रहा है। अब यदि यह मौका उसे बाजार दे रहा है तो उदार होने में उसे क्या दिक्कत है? हो सकता है कि यह मेरी दकियानूसी सोच हो लेकिन कालिदास की शकंुतलाओं के सौंदर्य का भरपूर लाभ बाजार से लेकर पुरुष समाज तक उठा रहा है। इस वस्त्र के कारण लड़कियों के चेहरे की अहमियत कम हो गई है। हालांकि यह फैशन भी सभी लड़कियों पर आकर्षक नहीं लगता। कइयों की हालत तो हास्यास्पद होती है। यह वस्त्र छहररी और सुडौल काया की मांग करता है। मोटी और बहुत पतली लड़कियों पर यह फैशन नहीं फब्ता। शायद यही वजह है कि लड़कियों और महिलाओं में अपने शरीर को लेकर जागरूकता बढ़ी है। वह जिम जाने लगी हैं। बाजार इसका भी लाभ उठा रहा है।
अमर को कालिदास की केले के तने वाली उपमा यों ही याद नहीं आई थी। उसने गौर किया था कि टाइट पैंट पहने वाली लड़कियों के कमर के निचले भाग को पुरुष अधिक देखते हैं। साड़ी और सलवार सूट पहनने वाली लड़कियों के चेहरे और ब्रेस्ट को देखते हैं। सलवार और साड़ी में औरत का यह भाग ढका होता है लेकिन टाइट पैंट में ढका होकर भी नंगा होता है। उनके शरीर का पूरा भूगोल, पूरी शारीरिक संरचना स्पष्ट दिखाई पड़ती है।
ऐसी पोशाकें पुरुषों को सदा आकर्षित करती रही हैं। इससे उनके संयम को चुनौती मिलती है। अधिकतर पुरुष इस तरह के परिधान में लड़कियों को देखते हैं तो वह वर्चुअली संसार निर्मित कर लेते हैं। हालांकि चुस्त शर्ट-पैंट पहनकर लड़कियों ने पुरुषवादी समाज की सदियों पुरानी नैतिकता को चुनौती दी है। इसे नारी की आजादी के रूप में भी देखा जा सकता है।
अमर यह सोच ही रहा था कि सामने से लैपटॉप लिए अनु आती दिखी। उसकी निगाह उसके चेहरे नहीं शरीर पर टिकी रही। थोड़ी देर पहले जो केश उसे लुभा रहे थे अब वह गौण हो गये थे। अनु को टाइट पैंट में देखकर उसे फिर महाकवि कालिदास की केले के तने वाली उपमा याद आई...।
इससे पहले कि वह वर्चुअल स्पेस निर्मित करता अनु उसके सामने थी। लैपटॉप को टेबल पर रखते हुए बोली कि इसमें मेरी बहुत सारी रचनाएं हैं। जिन्हें मैं आपको दिखाना चाहती हूं।
- अंग्रेजी में होंगी?
- हां।
- फिर मैं कैसे पढ़ पाउंगा?
- क्या आपको बिल्कुल भी अंग्रेजी नहीं आती?
- ऐसा मान सकती हैं।
- मैं नहीं मान सकती। आप जिस पेशे में हैं उसमें भी तो अंग्रेजी की जरूरत पड़ती है।
अनु ने अमर की दुखती रग को दबा दिया था। अमर को लगा जैसे उसके कलेजे में खंजर घांेप दिया गया हो। उसने असहनीय दर्द का अनुभव किया। उसके चेहरे पर भी पीड़ा के भाव दिखे। यह ऐसा दर्द था जिसे वह व्यक्त नहीं कर सकता था...।
- हां, पड़ती है।
- फिर आप कैसे कह रहे हैं कि आपको अंग्रेजी नहीं आती?
- कम से कम आपको तो यकीन करना चाहिए। आपको पता है कि जिस कंपनी से आप जुड़ी हैं उससे मैं नहीं जुड़ पाया तो क्यों?
- मुझे यकीन नहीं हुआ। मैं सोचती थी कि आपने किसी सिद्धांत के तहत ऐसा किया होगा।
- मतलब?
- अकसर कुछ लोग अपना एक नजरिया सेट कर लेते हैं फिर उसी के आधार पर वह अपनी लाइफ स्टाइल भी बना लेते हैं।
- मसलन?
- जैसे कि हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान।
यह बात अनु ने कही तो अमर सकपका गया। यह मुझे क्या समझ रही है?
- आप कहना चाहती हैं कि मैं दक्षिणपंथी हूं? रूढिवादी हूं? कट्टरपंथी हंू?
- नहीं मेरा मतलब यह नहीं है। मैं कहना चाहती हूं कि राइटर लोग अक्सर सिद्धांतवादी हो जाते हैं। कोई चीज वह तय कर लेते हैं तो उस पर अड़ जाते हैं। कहीं आप ने भी तय कर लिया हो कि अंग्रेजी का बहिष्कार करना है इस्तेमाल नहीं करना है।
- ऐसा सिद्धांत किस काम कि आदमी का विकास ही अवरुद्ध कर दे। हां, अपनी कमजोरी को सिद्धांत का नाम देना आसान है। मैं चाहूं तो कह सकता हूं कि यह मेरा सिद्धांत है। लेकिन सच यह है कि मुझे अंग्रेजी नहीं आती।
अब तक अनु ने लैपटॉप ऑन कर दिया था। स्क्रीन पर कुछ फाइलें भी खोल दी थीं। सामने जो दिख रहा था वह अंग्रेजी के अक्षर थे।
अनु सोफे पर अमर से सट कर बैठी थी। उसके बाल खुले थे जो बार-बार आगे की तरफ आ जाते। जिन्हें कभी वह हटाती और कभी न हटाती। जब बाल चेहरे पर आ जाते तो अमर को यह उपमा याद आती - चांद बादलों से घिर गया है। वह सोचता कवि भी कितनी सटीक उपमा खोजकर लाते थे। इसकी काट तो आज तक कोई नहीं ढंूढ़ पाया। हां, शहरी लोग तो चांद को देख ही नहीं पाते। उनके लिए यह उपमा बेमानी और निरर्थक ही लगेगी लेकिन यदि किसी ने बादलों के बीच चांद को घिरते देखा होगा तो अनु के बालों में छिपे चेहरे के  सौंदर्य और उससे उत्पन्न कशिश को समझ सकता है।
- क्या सोचने लगे? यह मेरी कविता है। एक जगह पर कर्सर रोकते हुए अनु ने कहा। उसने अमर को देखा जो उसे देख रहा था। वह टेबल की तरफ थोड़ा झुकी थी जिस वजह से उसके उरोज शर्ट के नीचे से दिख रहे थे। अमर की निगाह वहीं चली गई थी।
- आप तो मुझे देख रहे हैं? मैं आपको अपनी पोएम और स्टोरी दिखा रही हूं।
- मैं समझता हंू कि इनसान के समझ में जो आए वही देखना चाहिए।
अमर का उत्तर सुनकर अनु ने अपने बदन में सरसराहट का अनुभव किया। उसे अच्छा लगा और मुस्कराते हुए  सोफे पर पीठ करके बैठ गई।
- आर यू नॉट इनट्रस्टेड माई पोयम एंड स्टोरी। सो, ओके। वही देखिए जिसे समझ सकते हैं।
अंदर से खुश अनु ने बाहर से नाराजगी का भाव प्रदर्शित किया। इस बीच अमर लैपटॉप की स्क्रीन को देखते हुए अंगुलियों से कर्सर चलाने लगा। अंग्रेजी के शब्दों को वह पढ़ने लगा। कुछ समझ में आ रहे थे कुछ नहीं। फिर भी उसने सोचा कुछ न कुछ पढ़कर कोई राय तो दी ही जा सकती है। जैसे हिंदी के समीक्षक अकसर करते हैं। कई दिग्गज तो बिना किताब पढ़े उसके ऐसे कसीदे काढ़ते हैं कि लिखने वाला भी हैरान रह जाता है। कई आलोचक बिना पढ़े ही ऐसी बखिया उधेड़ते हैं कि लेखक जब तक जीता है याद रखता है।
अनु सोच रही थी कि अमर उसे पसंद करता है। लेकिन क्या हम किसी मंजिल तक पहुंच पाएंगे? यह आदमी क्यों मुझे अपनी तरफ खींच रहा है? पहली मुलाकात से ही मुझे परेशान किये हुए है। एक बेचैनी मेरे अंदर भर दी है। क्या मैं इसे पा सकती हूं? क्या ऐसा करना उचित होगा? क्या यह प्रस्ताव देगा या मुझे पहल करनी होगी? यह किस तरह किया जा सकता हैै।
अमर के मोबाइल की घंटी बजी तो दोनों सचेेत हो गए। अमर ने फोन उठाया। उधर से उसकी पत्नी नेहा थी। हालचाल पूछ रही थी। कैसे हो? ठीक हो? काम बना कि नहीं? कब तक आ रहे हो? सभी सवालों का अमर संक्षिप्त जवाब दे रहा था। इसी बीच नेहा ने मोबाइल बेटे को पकड़ा दिया जो अमर से बात करने की जिद कर रहा था।
- हां, बेटा बताओ कैसे हो?
- मैं रो रहा हूं। अपनी तोतली आवाज मैं चार वर्षीय बेटे ने कहा।
- मेरा बेटा रो क्यूं रो रहा है?
- आपकी याद आ रही है। बेटे ने कहा। चार साल के बच्चे ने यह बात इसलिए कही क्योंकि उसकी मम्मी उससे यह कहलावा रही थी।
- अरे-अरे मेरा बच्चा, मुझे याद कर रहा है। मैं भी तो अपने बच्चे को याद कर रहा हूं। अमर ने प्यार से कहा।
- जल्दी आ जाओ। बेटे ने कहा। इस वाक्य को भी उसकी मम्मी ने उससे कहलवाया। अमर समझ रहा था कि नेहा अपनी भावनाएं बेटे के माध्यम से व्यक्त करवा रही है। उसने बेटे से बातें की फिर बेटे की मम्मी से। बेटे की मम्मी ने आई लव यू कहा तो उसने भी उसे उसकी भाषा में जवाब दिया और फोन बंद कर दिया।
अमर के वार्तालाप से अनु को धक्का लगा। एक ही झटके में वह आसमान से जमीन पर आ गई। वह सोच रही थी कि अमर शादी-शुदा नहीं होगा।
- मिसेज का फोन था? अमर के फोन बंद करते ही अनु का पहला सवाल था। उसकी आवाज की खनक गायब थी और चेहरे पर उदासी काले बादल की तरह घिर आई थी। अमर को अब होश आया कि वह किसके साथ बैठा है। चूंकि बातों से स्पष्ट हो गया था कि फोन उसकी पत्नी का था। अब कोई बहाना भी नहीं चल सकता था। उसने स्वीकार कर लिया कि फोन उसकी पत्नी का था।
- कितने साल का बेटा है?
- चार साल का।
- कितने बच्चे हैं?
- तीन
- एक बेटा, दो बेटी या?
- नहीं, तीनों बेटे।
- बेटी क्यों नहीं?
- यह मेरे वश में नहीं है।
- वश में नहीं है या बेटी पैदा ही नहीं करना चाहते?
- न चाहने का तो कोई सवाल ही नहीं है। तीसरे नवाब तो बेटी की चाह में ही पैदा हुए हैं।
- बेटी के लिए चांस लेंगे?
- नहीं। अब नहीं।
- यदि तीनों बेटियां होतीं तो?
- तब भी नहीं।
- मुझे यकीन नहीं होता। इस देश में तो सभी चाहते हैं कि उनके बेटा ही हो। जब तक बेटा नहीं हो जाता चांस लेते हैं। कन्याओं के भू्रण की ही हत्या कर देते हैं।
- इसका मतलब यह नहीं है कि मैं भी वैसा ही हूं। यह सही है कि आज लोग लिंग परीक्षण कराकर बेटियों को जन्म से पहले ही खत्म कर देते हैं लेकिन मेरा केस उल्टा है। यदि मैं बेटी चाहूं तो मुझे लड़का भू्रण की हत्या करनी पड़ सकती है। मेरा मानना है कि बच्चे एक या दो। बेटा हों या बेटी।
- यह आप तब कह रहे हैं जबकि आपको तीनों बेटे हैं। यदि बेटियां होती तो यही नजरिया बदल जाता।
- हो सकता है। मैं भी इनसान हूं लेकिन फिलहाल नहीं लगता कि ऐसा होता। मगर इनसान कब क्या कर जाए कहना मुश्किल है।
- शादी जल्दी कर ली थी क्या?
- हां, क्या करता? हमारे गांव का रिवाज ही ऐसा है।
- क्या उम्र रही होगी उस समय?
- यही कोई 18-19 साल का था। अमर का जवाब सुनकर अनु को आश्चर्य हुआ।
- इतनी कम उम्र मंे?
- उस समय इसका एहसास भी नहीं था। माता-पिता ने तय कर दी। मैं भी दूल्हा बन गया। उस समय मेरे परिवार के लिए इससे बड़ी उपलब्धि और कोई नहीं थी। शायद मेरे लिए भी यह चांद को पाने से कम नहीं था।
दरअसल, हमारे गांव में कम उम्र में शादी करने का रिवाज है। वहां लड़कियों के अंग विकसित होने शुरू होते हैं कि उनके माता-पिता चिंतित हो जाते हैं और उनके लिए लड़का खोजने लगते हैं। लड़की 15-16 साल की उम्र में ससुराल चली जाती है।
- ऐसे पति-पत्नी सुहागरात को क्या करते हांेगे?
- वही जो पति-पत्नी करते हैं।
- इतनी कम उम्र में क्या जानते होंगे?
- ज्ञान विरासत में मिल जाता है। बड़े-बूढ़े सब बता देते हैं। वैसे भी इस उम्र तक दोनों का शारीरिक भूगोल बदल गया होता है। विकसित अंगों का कैसे कहां उपयोग करना है वह सब भलिभांति जानते हैं।
- कम उम्र में शादी तो कम उम्र में बच्चे पैदा होने लगते हैं।
- स्वाभाविक है। बच्चे पैदा होने में देरी हुई नहीं कि बड़े-बुजुर्ग आस-पड़ोस के लोग तंज करना आरंभ कर देते हैं। इसलिए नवदंपति जानबूझकर पहला बच्चा जल्दी पैदा करता है।
- उसके बाद तो लाइन ही लग जाती है? अमर को लगा कि यह बात उसी को लक्ष्य करके कही गई है। वह कसमसा कर रह गया।
- ऐसा क्यों करते हैं लोग?
- इसके कई सामाजिक-आर्थिक कारण हैं।
- क्या कारण हो सकते हैं?
- लड़की की उम्र बढ़ जाएगी तो उसके  योग्य वर नहीं मिलेगा। मिलेगा भी तो दहेज अधिक देना पड़ेगा। इसके अलावा बढ़ती उम्र के साथ लड़की कोई ऐसा-वैसा कदम उठा सकती है। ऐसे में मां-बाप की बदनामी और लड़की की जिंदगी बर्बाद हो जाती है। गांवों की सामाजिक संरचना ही ऐसी है। शिक्षा के अभाव में दुनिया भर  के रीति-रिवाज और परंपराएं सदियों से ढोए जा रहे हैं लोग।
अनु को अखबारों में पढ़ी वे खबरें याद आईं। गोत्र विवाद में लड़के-लड़की हत्या उसके मां-बाप-भाई ने ही कर दी। प्रेमी युगल की हत्या। प्रेमी युगल को पंचायत ने सजा सुनाई।
अमर को याद आया। उसने दसवीं की परीक्षा दी थी कि उसकी शादी हो गई। और दो साल बाद गौना भी आ गया। तब तक वह बारहवीं पास कर चुका था। जब वह 10वीं में था तो उसके गांव के उसकी उम्र के सभी लड़कों की शादी हो गई थी। उसके मां-बाप को लगने लगा था कि उनके बेटे की शादी नहीं होगी। अमर को देखने कई लड़की वाले आए थे लेकिन एक बार के बाद कोई दोबारा नहीं आता था। इसके लिए जिम्मेदार अमर के घर के आर्थिक हालात थे। पिता किसान और दादा भी किसान ही थे। घर का खर्च भी बड़ी मुश्किल से ही चल पाता था। हर साल कोई खेत का टुकड़ा बिक जाता। इस कारण अमर के परिवार की समाज में कोई साख नहीं थी। ऐसे परिवार में कौन अपनी लड़की देता? इस कारण अमर के माता-पिता को लगता था कि उनका बेटा कंुआरा रह जाएगा। वह किसी भी हालत में अमर की शादी कर देना चाहते थे।
अमर को भी लगने लगा था कि घर के आर्थिक हालत के कारण उसकी शादी नहीं हो पाएगी। ब्याह को लेकर वह भी बहुत उत्सुक था। पूरी उम्र कुंआरा रहने के डर से सहमा हुआ भी था। यह तो दिल्ली आने के बाद उसे एहसास हुआ कि उसने शादी जल्दी कर ली। फिर भी उसे यह एहसास था कि किन हालत में शादी की है इसे उसे नहीं भूलना चाहिए। काफी संघर्ष के बाद जब वह लेखक-पत्रकार के तौर पर स्थापित हो गया तब भी उसका नेहा के प्रति स्नेह वैसा ही बना रहा। बेशक वह अनपढ़ है लेकिन अमर उसे प्रेमिका की तरह ही चाहता और प्यार करता है।
- कहां खो गये? अमर के ख्यालों में खोया देख अनु ने टोका
- कहीं नहीं, कुछ बातें याद आ गईं थीं?
- बातें या कोई और?
- काफी समय हो गया मुझे चलना चाहिए। अमर ने प्रसंग बदल दिया।
अमर ने चलने की इजाजत मांगी तो अनु ने ब्रेकफास्ट करने का ऑफर दे दिया। अमर सहमत नहीं हो रहा था लेकिन तभी अनु का नौकर नाश्ता लेकर हाजिर हो गया।
- दीदी ब्रेकफास्ट यहीं रख दूं कि डाइनिंग टेबल पर? नौकर के सवाल पर अनु ने अमर की तरफ देखा। उधर से कोई जवाब नहीं मिला तो डाइनिंग टेबल पर रखने के लिए बोल दिया।
नाश्ते में मक्खन लगे ब्रेड के चार-चार पीस थे। एक गिलास दूध और एक गिलास जूस था। दोनों नाश्ता करने लगे। तभी अमर ने अनु के नौकर को अवाज दी। वह आ कर खड़ा हो गया।
- बहादुर तुमने नाश्ता कर लिया?
- नहीं साहब।
- कब करोगे?
- आप सब कर लो फिर कर लेंगे।
- नाश्ते में क्या लोगे?
उसने अनु की तरफ देखते हुए कहा। उसके दिमाग में यह सवाल उठा हुआ था कि यह साहब ऐसा क्यों पूछ रहा है? इस घर में तो पहली बार आया है। दी के साथ नाश्ता कर रहा है और मुझसे ऐसे सवाल कर रहा है। कुछ गलत बोल गया तो मेरी तो नौकरी चली जाएगी। वह सावधान हो गया।
- तुमने कोई जवाब नहीं दिया? जब अमर के प्रश्न का उत्तर बहादुर ने नहीं दिया तो उसने फिर पूछा।
- जी, किसका जवाब नहीं दिया?
- यही कि नाश्ते में क्या खाओगे?
- कुछ भी साहब।
- कुछ भी से मतलब?
- छोड़ो न साहब।
- अच्छा बताओ नाश्ते में तुम जूस पिओगे?
बहादुर ने कोई जवाब नहीं दिया। वह अनु की तरफ देखने लगा। कुछ इस भाव से कि इनसे मेरा पीछा छुड़ाओ।
- दूध पिओगे? अमर ने फिर सवाल दागा। इस बीच अनु ने आंखों से बहादुर को वहां से चले जाने का इशारा कर दिया।
- बहादुर से ऐसे सवाल करके आप क्या साबित करना चाहते हैं? अनु ने अमर से गुस्से में कहा। उसकी इच्छा हो रही थी कि वह दूध का गिलास अमर के सिर पर दे मारे। लेकिन उसने अपने आपको बहुत संभाला।
- कुछ नहीं। मैं तो यह जानना चाहता था कि बड़े घरों में लोगों को बढ़िया-बढ़िया खिलाने वाले नौकर क्या खाते हैं?
- अच्छा, तो क्या पता चला? अनु का गुस्सा और बढ़ गया। उसने सोचा यह आदमी ‘भारत’ में रहने के लायक है। इंडिया में इंट्री ही नहीं करने देनी चाहिए। अरुण ने इसके बारे में ठीक ही कहा था। ये पायजामा छाप लोग अपने अपको पता नहीं क्या समझते हैं?
- सॉरी, आईएम वेरी सॉरी। आपको बुरा लगा। मैं माफी चाहता हूं। अमर ने अनु के हाव भाव से अनुमान लगा लिया कि वह उबल रही है। उसने उसे कूल करने के लिए सॉरी बोल दिया। लेकिन अनु के चेहरे से क्रोध के भाव नहीं हटे।
- आप अच्छा लिखती हैं। संवेदनशील हैं। आप समझ सकती हैं कि मैंने उससे ऐसा सवाल क्यों किया? मेरा मतलब आपकी बेइज्जती करना नहीं था। मैं पेशे से पत्रकार हूं और लेखक भी। जहां कहीं करेक्टर मिलता है तो दिमाग में खुजली होने लगती है।
- बेहतर होगा कि इस बीमारी का इलाज करा लो। अनु उठकर चली गयी। अमर उसे जाते देखता रहा। उसकी निगाह उसके कमर के निचले भाग पर तब तक टिकी रही जब तक वह ओझल नहीं हो गई। उसके बाद वह भी उठकर वहीं आ गया और अनु के ठीक सामने सोफे पर बैठ गया। एक बार तो उसका मन किया कि वह अब यहां से चला जाए लेकिन फिर सोचा कि इस तरह बात बिगाड़ कर जाना ठीक नहीं है। वह डर भी रहा था कि कहीं अनु बेइज्जत करके न निकाल दे। उसके गुस्से को देखते हुए तो यही लग रहा था। अमर ने खुद को व्यस्त करने के लिए लैपटॉप पर अनु की पोएम पढ़ने लगा।
दो कविताएं पढ़ने के बाद अमर ने अनु से कहा।
- जितना मैं समझ पाया उसके आधार पर कह सकता हूं कि आप लिखती संुदर हैं। बिल्कुल अपनी तरह। अनु को अच्छा लगा लेकिन तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सोचने लगी। अब ये बच्चू लाइन पर आए हैं। खुशामद करने लगे हैं। सुंदर लिखती हो अपनी तरह। लेकिन चालाक कितना है। बात को घुमाकर कह रहा है। सामने वाला समझ भी जाए और बुरा भी न मानें।
- आपने इन्हें छपने के लिए नहीं भेजा? अनु ने कोई जवाब नहीं दिया। वह अपने बालों से खेलती रही। उसकी यह अदा अमर को अच्छी लगी लेकिन वह अब और रुकने के मूड में नहीं था।
- ठीक है भाई। माफ करना। गलती हो गई। यह कहते हुए उठ खड़ा हुआ। उसकी इस प्रतिक्रिया पर अनु भौचक रह गई। अरे साला। अब चल भी देगा। उसके दिमाग में यही सवाल उठा।
- ये अच्छी अदा है। पहले बेइज्जत करो फिर माफी मांग लो। अनु भी अपनी जगह पर खड़ी हो गई। उसके खड़ी होते ही अमर ठिठक गया।
- मुझे नहीं मालूम था कि यह बात आपको इतनी बुरी लगेगी। मेरा मतलब आपको बेइज्जत करने का नहीं था। कोई बेवकूफ ही होगा जो इतनी खूबसूरत लड़की की बेइज्जती करेगा।
- अच्छा। अनु मुस्करा पड़ी। आगे बढ़कर अमर का हाथ पकड़ लिया।
- बैठो। अपने गुनाह की सजा तो झेलो।
- जो सजा दें सरकार स्वीकार है। अमर ने भी हंसते हुए खुद को परिस्थितियों पर छोड़ दिया।
- इस लैपटॉप में कविताओं के अलावा स्टोरी भी हैं। उन्हें भी पढ़कर बताएं कि वे कैसी हैं। मेरी तरह की आपकी तरह। नयन मटकाते हुए अनु ने कहा।
अमर फिर बैठ गया। उसके समीप में अनु भी बैठ गई। टेबल पर रखे लैपटॉप को सामने खींचा और उसमें से स्टोरी की फाइल खोलने लगी। अमर ने लंबी सांस ली तो शैंपू की खुशबू से नाक भर गई। यह खुशबू अनु के बालों से आ रही थी।
अनु ने एक फाइल ओपन करके लैपटॉप की स्क्रीन अमर की तरफ कर दी। अमर उसे पढ़ने लगा। अनु भी वहीं बैठी रही। वह कभी अमर को देखती तो कभी लैपटॉप की स्क्रीन पर अपनी कहानी पढ़ने लगती। अमर के लिए यह बड़े मुश्किल भरे क्षण थे। एक तो अंग्रेजी में उसका ज्ञान तंग था तो दूसरे बगल में ऐसी लड़की बैठी थी जो अनुपम सुंदर थी। वह पढ़ने पर ध्यान लगाता तो निगाह अनु की तरफ चली जाती। इस तरह कुछ पढ़ता-कुछ देखता। कुछ समझा कुछ नहीं। लेकिन प्रतिक्रिया तो देनी थी। क्या प्रतिक्रिया देनी है यह तो वह पहले ही तय कर चुका था।  इसलिए वह पढ़ कम अनु को निहार अधिक रहा था। कर्सर जब कहानी के अंतिम शब्द पर पहुंचा तो उसने लंबी सांस लेते हुए कहा कि आपने इसे कहीं छपने के लिए नहीं भेजी?
- नहीं । अच्छी नहीं है क्या?
- जहां तक मैं समझ पाया हूं. रचना बहुत ही उम्दा है। यदि आप इसे किसी जगह छपने के लिए भेजी होती तो अब तक आप लेखिका बन गईं होंती। एक कहानी छपने के बाद तो आपको फुर्सत भी नहीं मिलती कहानियां लिखने के लिए इतनी डिमांड आने लगती।
- क्यांे मजाक कर रहे हो?
- भला मैं मजाक क्यों करूंगा?
- सच कह रहे हैं?
- सौ प्रतिशत।
- आप हिंदी में लिखतीं तो सभी पत्रिकाओं के संपादक आपको हाथों-हाथ लेते।
- मुझे या मेरी कहानी को? अनु ने चुहल की।
- दोनों को। मजाक नहीं कर रहा हूं। अभी हिंदी साहित्य में आपकी ही उम्र की एक लड़की की खूब धूम है। जिस पत्रिका को उठा लो इसमें उसकी कहानी मिल जाती है।
- काफी पॉपुलर हो गई होगी?
- पॉपुलर ! हालत यह है कि कई लोग उससे मिलने के लिए उसके घर पहुंच गए। लेकिन मोहतरमा हैं कि किसी से मिलती ही नहीं।
- क्यों?
- क्योंकि उस नाम की कोई लड़की है ही नहीं।
- क्या मतलब?
- यह किसी लेखक की बदमाशी है। वह लड़की के नाम से लिख रहा है। मजे की बात तो यह है कि लेखिका की तस्वीर भी छपती है।
- तस्वीर भी फर्जी है?
- हां, किसी विदेशी लड़की की प्रोफाइल बनाई गई है। लड़की की तस्वीर भी विदेशी ही है।
- किसी राइटर ने ऐसा क्यों किया?
- पत्रिकाओं के संपादकों की मानसिकता उजागर करने के लिए।
- मानसिकता मतलब?
- मेंटालिटी, दरअसल जिस लेखक ने ऐसा किया है, उसे तथाकथित बड़ी पत्रिकाओं के संपादक छापते नहीं थे। अधिकतर संपादकों पर आरोप है कि वह लड़कियों और महिलाआंे की रचनाएं बिना पढ़े ही छाप देते हैं लेकिन पुरुषों की रचनाएं पढ़ने की भी जहमत नहीं उठाते और कूड़े में फंेक देते हैं।
- अच्छा! तो इन मिस्टर ने लड़की के नाम से अपनी रचनाएं छपवाईं। और छपीं भी।
- न केवल छपीं बल्कि खूब तारीफ भी हुई।
- आपने भी पढ़ी होंगी?
- सभी तो नहीं लेकिन दो चार कहानियां जरूर पढ़ी हैं?
- क्या रचनाएं अच्छी नहीं हैं?
- हैं। लेकिन जितनी तारीफ की जा रही है उतनी नहीं। यह भी सच है कि लड़की के नाम से छपी हैं तो तारीफों के पुल बांधे जा रहे हैं। जिसे देखो वही प्रशस्ति पत्र लिख रहा है। लेकिन यही यदि लेखक के मूल नाम से छपती तो आज जो तारीफ कर रहे हैं वही पढ़ने की भी जहमत नहीं उठाते।
- अच्छा! ऐसा भी होता है?
- ऐसा ही होता है। इसीलिए तो कह रहा हूं कि लड़की होने का लाभ उठाओ।
- कल को कहीं सारे पीछे पड़ गये तो मैं क्या करूंगी?
- क्या करोगी। किसी से मिलना किसी से न मिलना। किसी का फोन उठाना किसी का न उठाना। किसी को जवाब देना किसी को नहीं। खाली होते हुए भी व्यस्त हो जाना। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।
- आप पहले क्यों नहीं मिले?
- मैं तो मिला ही था आपने ही नहीं पहचाना।
- क्या मतलब?
- मैं इस इलाके में नौकरी कर चुका हूं। आपके इस घर में भी आया हूं।
- क्या बात कर रहे हैं? इस घर में आये हैं और मैंने देखा ही नहीं।
- देखने की तो छोड़ो मेम साहब, आपने इस नाचीज को पीटा भी है।
- यह तो कमाल हो गया। साफ-साफ बताओ, पहेली न बुझाओ। अनु ने अमर का हाथ अपने हाथ में ले लिया। अमर को अच्छा लगा। उसने भी अनु के हाथ के ऊपर अपना हाथ रख दिया। अमर की यह हरकत अनु को अच्छी लगी।
आज से कोई पंद्रह साल पहले की बात है। आपके इस इलाके की बाजार में एक वीडियो लाइब्रेरी हुआ करती थी। उस समय वीसीआर चलते थे। अब की तरह सीडी या डीवीडी नहीं। मैं उसी वीडियो लाइब्रेरी में काम करता था। दुकान पर बैठता था जो कैसेट लेने आते उन्हें देता था। कुछ जगह साइकिल से कैसेट लेने भी जाता था। लोगबाग कैसेट ले जाकर रख लेते थे फिर उन्हें लेने भी जाना होता था। एक दिन आपकी सहेली ने एक कैसेट मुझसे मांगी। उन्होंने रामायण मांगी थी और मैंने ब्लू फिल्म की कैसेट दे दी थी।
- वो शैतान तुम हो? अनु के मुंह से अचानक यह वाक्य निकल गया।
- वह मेरी शैतानी नहीं थी मैडम। मेरा भोलापन था।
- अच्छा भोलापन था। कम उम्र की लड़कियों को ब्लू फिल्म की कैसेट देते थे और कह रहे हो भोलापन था।
- दरअसल, बात यह थी कि उस दुकान से रामायण और महाभारत के नाम से ग्राहक ब्लू या थ्री एक्स फिल्में ले जाते थे। उसमें व्यस्क-जवान, किशोर-किशोरियां भी शामिल थे।
लड़के-लड़कियां आते और रामायण मांग कर ले जाते। दुकान मालिक ने बताया था कि रामायण मांगें तो यही कैसेट देना। अलबत्ता तो हम देते नहीं थे। अक्सर ऐसे ग्राहकों को दुकान मालिक ही डील करता था। लेकिन उस दिन वह कहीं गया था और आप लोग आ धमके।
- और आपने रामायण पकड़ा दी। जो देखी मेरी सहेली की दादी ने।
- अच्छा। फिर तो बहुत पिटाई हुई होगी?
- पिटाई नहीं हुई। दादी ने कहा जाओ ऐसी ही दूसरी कैसेट लेकर आओ।
- लेकिन रामायण तो एक ही होती है। सहेली ने तर्क किया था। इस पर दादी ने कहा कि नहीं, रामायण की कई कैसेट हैं। जाकर कहना कि यह खराब है दूसरी रामायण दे दो। सहेली कैसेट लेकर मेरे घर आ गई। बोली चलो दादी के लिए रामायण की कैसेट लानी है। उस समय मैं नहा रही थी। सहेली बोर होने से बचने के लिए उस कैसेट को देखने लगी। मैं बॉथरूम से निकली तो देखा वह मुंह फाड़े फिल्म देख रही है। टीवी स्क्रीन पर जो चल रहा था उसे देखकर तो मेरी सांसें थम गईं। मैं चीखी, ये तू क्या कर रही है? वह बोली यह दादी की रामायण है। मैंने कहा रामायण ऐसी होती है क्या? बंद कर इसे। उसने मुझे भी सोफे में खींच लिया। बोली जब देख ही लिया है तो पूरी देखते हैं।
हम फिल्म देख ही रहे थे कि मम्मी आ गईं। उन्होंने भी वह देख लिया। फिर क्या था, हम दोनों की जमकर धुनाई हुई।
- और आप लोगों ने मुझे गली में पकड़ कर पीट दिया। कैसेट भी नहीं दी। मुझे अपने वेतन से भरनी पड़ी थी उसकी कीमत।
- जिंदगी में कैसी गलतफहमियां हो जाती हैं और कैसे-कैसे मोड़ आ जाते हैं। न मैंने सोचा था और न ही आपने सोचा होगा कि हम इस तरह मिलेंगे।
-लेकिन मैंने तो आपको पहचाना नहीं। आपने कैसे पहचान लिया?
- जब ब्रेकफास्ट कर रहा था तो वहां दीवाल पर आपकी एक तस्वीर टंगी देखी।
- उस समय में 10$2 में थी।
- मैं भी बारहवीं के बाद नौकरी करने गांव से दिल्ली आ गया था।
- नौकरी करते थे तो ऐसी फिल्में भी देखी होंगी? अनु ने मुस्कराते हुए सवाल किया।
- नहीं। दरअसल, वह जमाना वीसीआर का था। तब सभी के घरों में वीसीआर या वीसीपी नहीं हुआ करते थे। मेरा दुकानदार दुकान पर वीसीआर नहीं रखता था। और मेरी हैसियत वीसीआर रखने लायक नहीं थी। हम जैसे लोग तो उस समय वीसीआर किराये पर घर लाकर फिल्में देखते थे। हां, जिस मोहल्ले में मैं रहता था वहां लड़के अक्सर वीसीआर किराये पर ले आते। वह ब्लू फिल्में भी ले आते। लेकिन मैं कभी नहीं देख पाया, क्योंकि ऐसे लड़कों में मैं कभी शामिल नहीं हो पाया। आपका इलाका तो आज भी साफ सुधरा है। पहले भी रहता था। घर के बाहर पेड़-पौधे होते हैं। छत और बालकनी पर भी पौधों के गमले होते हैं। लेकिन हमारे मोहल्ले में हालत यह थी कि गली में खुली नालियां बहती थीं। उन नालियों में टट्टी बहती रहती थी। देख लो तो खाना खाने का दिल न करे। घरों को तो छोड़ दो गलियों तक में मक्खियां भनभनाती रहती थीं। लोग किसी तरह जगह लेकर मकान बना लेते लेकिन एक लैट्रिन बनवाने में फट जाती। शौचालय का मुंह नाली मंे खोल देते। वैसे तो मोहल्ले के लोग शौच के लिए यमुना के किनारे के खेतों, जंगलों और रेलवे लाइन की तरफ चले जाते लेकिन जिसका मकान होता वह इस गुमान में वहीं हगता कि वह मकान मालिक है। उसे जरा भी एहसास न होता कि वह क्या कर रहा है। जबकि उसी गली से वह भी निकलता था।
उस मोहल्ले में अब सीवर पड़ रहा है। शायद कुछ सुधार हो। लेकिन अब ऐसे इलाकों की गालियां सुरंग हो गईं हैं।
- सुरंग हो गई हैं?
- हां, एक तो दस और पांच फीट की गलियां थीं। ऊपर से मकान बनाने वालों ने दो-दो तीन-तीन फीट का छज्जा निकाल लिया। हालत यह हो गई कि दूसरी मंजिल पर जाकर आमने-सामने के घर आपस में भिड़ गए। नीचे गली सुरंग हो गई। ऐसे मकान अब तीन-तीन चार-चार मंजिला हो गये हैं। कुछ बिल्डरों ने बनाया और एक-एक मंजिल बेच दी। कुछ खुद मकान मालिकों ने बनाकर किराये पर दिये हैं। रात को सभी के घरों के आगे मोटर साइकिलों और सस्ती कारों की लाइन लग जाती है। कार-बाइक तो लगभग सब ने खरीद ली लेकिन उसे खड़ी कहां करें? उसके लिए तो जगह छोड़ी नहीं। लिहाजा बाहर गली में खड़ी करते हैं। गलियां कार-बाइकों से भर जाती हैं। फिर वहां चलना भी मुश्किल हो जाता है। यही नहीं, ऐसे मोहल्लों के मकान हिलते हैं। ट्रेन आती-जाती है तो उसके आसपास के मकान हिलने लगते हैं। मानो शिकायत कर रहे हों कि मुझे माफ करो बाप। जल्दी जाओ, मेरे ऊपर बहुत भार है।
यदि किसी दिन दिल्ली में सात या आठ रिएक्टर एस्केल का भूकंप आ गया तो ऐसी कालोनियां मलबे मंे बदल जाएंगी। वहां कोई नहीं बचेगा। चार इंच की दीवाल पर चार-पांच मंजिला बनी इमारतों में रहने वाले कितने जोखिम में हैं इसकी कल्पना करके ही मेरी तो रूह कांप जाती है।
- कमाल है यार। इतनी खतरनाक परिस्थितियों में लोग रह कैसे लेते हैं?
- क्या करें? उनके पास उपाय क्या है? मैं क्या कर सकता हूं? मेरे दोस्त क्या कर सकते हैं? उन्हंे इतनी सेलरी नहीं मिलती कि वह पॉश इलाके में किराये का घर या फ्लैट ले लें। जहां उनकी जिंदगी सुरक्षित होगी। जहां जगह साफ-सुथरी और कमरे हवादार होंगे। विश्वबैंक का कहना है कि भारत में 41.5 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। हमारी सरकार इतना भी नहीं मानती। उसका आंकड़ा 26 फीसदी पर रुक जाता है। वह भी तब जबकि गरीबी रेखा मापने का पैमाना बेहद घटिया है। सही तरीके से यदि आकलन किया जाए तो 50 फीसदी से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रही है। पांच साल पहले तब की सत्तारूढ़ सरकार ने इंडिया शाइनिंग का नारा दिया और चुनाव में मुंह की खायी। पार्टी का नारा गलत नहीं था। इंडिया तो चमक ही रहा था। तब भी और अब भी लेकिन ‘इंडिया’ की आबादी तो मुश्किल से 30 फीसदी भी नहीं है। फिर इंडियन वोट करने नहीं जाते। उन्हें इससे मतलब नहीं होता कि किसकी सरकार बनेगी। वह जानते हैं कि सरकार चाहे जिसकी बने उनके हित सुरक्षित हैं। मतदान करने तो भारत के 70 फीसदी लोगों में से ही लोग जाते हैं। सत्तारूढ़ दल का अंग्रेजी में नारा था इंडिया शाइनिंग और हिंदी में भारत उदय। इंडिया चमकता रहा, भारत का उदय होता रहा और पार्टी सत्ता से बेदखल हो गई।
ये जो पार्टी सत्ता में आई है। उसने भी इंडिया का ही ख्याल रखा जबकि वोट उसे भारत के लोगों ने दिया है। अब इस पार्टी का नारा है ‘जय हो’ जोकि एक फिल्मी गीत से लिया गया है। देखो कितनी जय होती है इसकी। पिछली बार जब शाइनिंग इंडिया का नारा दिया गया था, तो कोई नहीं कह रहा था कि यह पार्टी विपक्ष में बैठेगी। आज की सत्तारूढ़ दल की हालत खराब थी लेकिन भारतीयों ने इस पार्टी का उदय कर दिया। अब एक बार फिर सत्तारूढ़ दल के बारे में हवा बनाई जा रही है लेकिन फैंसला तो भारतीयों को करना है। इतना तो वे भी समझने लगे हैं कि पांच साल बाद आपकी उपेक्षा करने वालों को सबक सिखाने का मौका मिलता है तो क्यों न इसका उपयोग किया जाय। इसीलिए भारतीय वोट देने जाते हैं। वे सबक सिखाने के लिए वोट देते हैं। लेकिन कोई नेता या राजनीतिक दल सबक नहीं लेता है।
अचानक अनु सोफे पर लेट गई तो उसका सिर अमर की गोद में आ गया। अमर ने अनु के चेहरे की तरफ देखा। वहां कोई संकोच नहीं था लेकिन अमर की जुबान बंद हो गई। ऐसी स्थिति में उसकी समझ मेें नहीं आ रहा था क्या बोले। कहने के लिए उसके दिमाग में जो कुछ भी था वह सब इस एक कमांड से डिलीट हो गया।
- चुप क्यों हो गये? जारी रहिये। अनु ने आंख बंद किये हुए कहा।
- आपको नींद आ रही है। मैं कोई नेता थोड़े ही न हूं कि जारी रहूं।
- नींद नहीं आ रही। काफी देर से बैठी थी तो लेट गई। वैसे बोलते हुए अच्छे लगते हैं आप।
- बिना बोले सुअर लगता हूं कि बैल या भैंसा?
- सच कहूं? अनु एक झटके से उठकर बैठ गई।
- कहना तो सच ही चाहिए।
- लेकिन सच हर कोई सुनना पसंद नहीं करता न।
- सच कहने का तरीका सही होना चाहिए।
- तरीका ही तो नहीं सूझ रहा है।
- फिर जो सूझ रहा है वैसे ही कह दो।
- कह दूं? नाराज तो नहीं होंगे?
- नाराज होकर आपका क्या बिगाड़ लूंगा?
- नहीं ऐसी बात नहीं है। मैं आपको नाराज नहीं करना चाहती।
- फिर ऐसी बात सोची ही क्यों?
- सोची कहां, बस दिमाग में आ गई।
- आ गई तो कह दो।
- सांड़ लगते हो।
- सांड़ की फितरत जानती हो?
- नहीं, सड़क पर घूमते देखा है।
- और कुछ करते नहीं देखा है? अमर ने शरारतपूर्ण मुस्कान के साथ कहा और अनु की तरफ अर्थपूर्ण नेत्रों से देखा।
- गुस्से में आ जाए तो दौड़ा कर मारता है। एक बार एक सांड़ को आदमी को उठाकर फेंकते देखा है।
- और भी कुछ करता है सांड़? अमर के चेहरे पर अब भी शरारतपूर्ण मुस्कान थी। उसकी मंशा अनु भी समझ रही थी। लेकिन उसकी भी कोशिश यही थी कि जो कुछ भी कहना है अमर ही कहे।
- सांड़ है तो करता ही होगा?
- आपने नहीं देखा है?
- नहीं। आप बताओ।
- छोड़ो, नहीं देखा तो क्या कहना। अब गौर से देखना पता चल जाएगा।
- प्लीज बातओ न। अनु ने अमर का हाथ पकड़ लिया। यह लड़की कहां तक पहुंच जाना चाहती है? अमर ने खुद से सवाल किया।
- चुप क्यों हो, बताओ न? अनु ने फिर मनुहार की।
- बहुत बल्गर बात है। फिर मत कहना कि मुझे तमीज नहीं है या मैं शैतान हूं।
- कोई बात नहीं। आप बताओ।
- सांड़ न हो तो गाय बच्चा न दे।
- मुझे पता था कि यही कहोगे। लेकिन मान गये आपके कहने के अंदाज को।
- जो सोलह की उम्र में ब्लू फिल्म देखे उसमें इतनी समझ तो होती ही है।
- देखी नहीं थी। दिखाई गई थी मिस्टर। अनु खड़ी हो गई और अमर के माथे पर अंगुली से धक्का देते हुए बोली।
- मैं सब समझती हूं। पुरुषों की हर निगाह पहचानती हूं। बच्ची नहीं हूं।
- शादी की होती तो अम्मां हो गई होती। अमर ने कटाक्ष किया।
- इस बारे में कभी सोचा ही नहीं।
- कभी किसी से प्यार नहीं किया?
- मुझे पता था कि ये सवाल आप करेंगे। आखिर जेंट्स-जेंट्स होता है। वीमेन पर ट्रस्ट करना उसके नेचर में ही नहीं है। आई डोंट डिनाई। मैं इनकार नहीं कर सकती कि बत्तीस की उम्र में मुझे किसी से प्यार नहीं हुआ। आई थिंक कोई भी वीमेन या जेंट्स। ब्यॉय या गर्ल्स इससे बच भी नहीं सकता। इट इज ए नेचुरल प्रोसेस। आई विलीव दिस। आई थिंक दिस इज नॉट ए क्राइम। लव इज लव। लव इज गॉड। लव इज एवरीथिंग।
- ठीक है। लव इज लव। मैं भी मानता हूं कि दिस इज ए नेचुरल प्रोसेस। इस पर जोर नहीं चलता। कहते हैं न प्यार किया नहीं जाता हो जाता है। जब यह सच है तो आप नाराज क्यों हो गई?
- आई डोंट नाउ, बट दिस क्विश्चन इज रॉंग। क्या मतलब है इसका इस समय? मैं आपको सफाई क्यों दूं?
- अरे भाई आप कूल हो जाइये। मैंने आपसे कोई सफाई नहीं मांगी। मेरा क्या अधिकार है आप पर। कौन हूं मैं आपका? बातचीत चल रही थी। इस प्रसंग में यह सवाल उठ गया। आईएम सॉरी। इफ यू आर हर्ट।
- हर्ट। यू थिंक लाइक ए वीमेन। औरत बनके सोचो। तब पता चलेगा कि कितना हर्ट करता है ऐसा सवाल। किसी लड़की के पूरे वजूद पर सवाल खड़ा कर देता है यह सवाल। और आप कह रहे हैं सॉरी, इफ यू आर हर्ट। मैं पूछती हूं जब मैंने आपसे ऐसा सवाल नहीं किया तो आपने क्यों किया? किया तो किया और सॉरी भी बोल रहे हैं तो इफ और बट लगाकर। यू आर ए राइटर। आपको ऐसे सवाल शोभा नहीं देते।
- गलती हो गई। माफ कर दो। अमर ने अनु का हाथ पकड़ने की कोशिश करते हुए कहा।
- डोंट टच मी। अनु ने अपना हाथ हटाते हुए कहा।
अमर को लगा कि बात फिर बिगड़ गई। यह लड़की किस बात पर नाराज हो जाए पता ही नहीं चलता। सवाल इतना चुभ गया है तो इसके पीछे जरूर कोई राज होगा। अरे भाई नहीं बताना है तो न बताओ। हम कौन सा आपसे शादी करने जा रहे हैं। आपने बुलाया था मैं आ गया। मेरा आना भी शायद पुरुष का कुत्तापन ही है। मैडम ने कहा और मैं चला आया। क्या जरूरत थी आने की? लेकिन नहीं। लड़की से बात करने का मोह। उसके साथ कुछ क्षण बिताने की चाहत में चले आए। यह पुरुष भी न अजीब ही प्राणी है। उसे याद आया कि वह अपने दोस्त के साथ नोएडा में कहीं जा रहा था। ऑटो पकड़ना था। एक साथ दो ऑटो आए। एक खाली था और एक में कई लड़कियां बैठीं थीं। दोस्त खाली ऑटो में नहीं बैठा। जिसमें लड़कियां बैठी थीं उसमें जाकर बैठ गया। अमर ने कहा की यार खाली ऑटो में चलते हैं तो वह बोला यह देर करेगा। जगह-जगह रुकेगा। जब तक भर नहीं लेगा चलेगा नहीं। जो भरा है वह चलता रहेगा। इस शहर का उसे अनुभव था। अमर को लगा वह सही कह रहा है। उसकी बात में दम था लेकिन एक सच यह भी था कि उसमें लड़कियां बैठीं थीं। ऑटो से उतरने के बाद उसने कहा कि साले इतनी सुंदर-सुंदर लड़कियां उसमें बैठी थीं। उसमें बैठते कि उस उजड़े चमन में बैठते। उसकी बात सुनकर अमर मुस्करा दिया। पुरुष भी न। उसके मुंह से अनायास ही निकल गया था।
अनु सोच रही थी कि मेरा गुस्सा बेकार ही है। आखिरकार हम सभी एक दूसरे के अतीत को जानना ही चाहते हैं। मैं भी तो जानना चाहती हूं कि इसके कितने लड़कियों से अफेयर हैं या नहीं है। अफेयर होना कोई गलत तो नहीं है। हो ही जाता है। यह और बात है कि किसी-किसी का लंबा चलता है। किसी का ताउम्र तो किसी का चलता ही नहीं। किसी को धोखा मिलता है। कोई छला जाता है। लेकिन बच तो कोई नहीं पाता। इन्हीं महोदय को लो। पत्नी घर में है और यह यहां बैठे हैं। क्यों? कुछ न कुछ तो बात होगी ही। पता है कि शादीशुदा हैं लेकिन फिर भी आग से खेल रहे हैं। यह आकर्षण आग है। इसका पता तब चलता है जब इनसान इसमें जलने लगता है। उससे पहले तो इससे अच्छा एहसास शायद ही कोई लगता है। आदमी एक सुखद अनुभूति की चाह में ऐसे पथ पर चल पड़ता है जिस पर अक्सर कांटें ही मिलते हैं।
- अच्छा तो मैं चलता हूं।
अमर ने कहा तो अनु सकपका गई। विचारों का प्रवाह टूटा और देखा सामने अमर जाने के लिए खड़ा है। वह भी सोफे से उठ खड़ी हो गई। अमर के हाथों को पकड़ लिया और उससे खेलते हुए बोली।
-सॉरी। मुझे इस तरह रिएक्ट नहीं करना चाहिए था। दरअसल मुझे ऐसे सवालों से सख्त नफरत है। यही कारण है कि यदि कोई ऐसा सवाल करता है तो मैं खुद को काबू में नहीं रख पाती। आशा है कि मुझे समझने की कोशिश करोगे।
अमर उसे देखता रहा। उसकी इच्छा हुई कि वह अनु को बाहों में भर ले लेकिन वह डर रहा था कि कहीं यह भड़क न जाए। अनु भी चाह रही थी कि वह अमर के गले लग जाए लेकिन पहल करने से हिचक रही थी। अमर ने हिम्मत करके अनु के हाथों को चूम लिया। उसका इतना करना था कि अनु की हिचक भरभरा कर गिर गई। उसने लपकर अमर को अपने आगोश में भर लिया। अमर ने भी उसे अंगपाश में कसकर बांध लिया।
समुद्र में ज्वार-भाटा उठ रहा था। लहरें सीमा को पार करने को बेताब थीं।
- मेम साहब खाना लगा दूं? बहादुर ने आवाज दी। वह उनके पास ही आ गया था। यह सुनते ही दोनों झटके से अलग हो गए। लगा जैसे किसी ने सैकड़ों बाल्टी पानी उनके ऊपर डाल दिया हो। दोनों की बोलती बंद। अनु तो धम से सोफे पर बैठ गई। अमर की इच्छा हुई कि वह जल्दी से भाग जाए...।
- मैं भोजन नहीं करुंगा। चलता हूं। अमर ने अनु की तरफ देखते हुए कहा और दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा। अनु को भी लगा कि यह चला ही जाए तो ठीक है। मम्मी डैडी भी आने वाले हैं। वैसे तो बहादुर बताएगा नहीं लेकिन इसे यहां देखकर मम्मी-पापा भी बेवजह के सवाल कर सकते हैं। हालांकि मैं कह सकती हूं कि अपनी रचनाएं पढ़ा रही थी लेकिन फिर वे कहेंगे कि इसे तो अंग्रेजी आती नहीं।
अनु ने अमर को नहीं रोका। उसे छोड़ने के लिए उसके पीछे-पीछे चल पड़ी। गेट पर आकर उसने हाथ हिलाया और दोनों की आंखों ने संवाद किया।
- ओमप्रकाश तिवारी

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