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खुशी बाजार में नहीं मिलती

कहानी

ओमप्रकाश तिवारी

पत्र में लिखे हर शब्द किसी गोले की तरह उसके मन-मष्तिस्क में पर प्रहार कर रहे थे। हर वा य के साथ शरीर का र त-संचार बढ़ता ही जा रहा था। ठंड का मौसम था, लेकिन उसके माथे पर पसीने की बंदूें साफ-साफ देखी जा सकती थीं।

पत्र पढ़ने के बाद उसने उसे माे़डकर जेब के हवाले कर दिया और बेचैनी में कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। इधर-उधर देखा सभी साथी या तो अपने काम में तल्लीनता से लगे थे या फिर किसी साथी से बातचीत में। एक पल को उसे लगा कि दुनयिा में सभी खुश हैं, सिवा उसके।
वह माथे पर हाथ फेरता हुआ आफिस से बाहर निकल आया और कैंटीन पर आकर खड़ा हो गया। चाय का आर्डर देने के बाद वह वहीं चहल-कदमी करने लगा। अमूमन इस समय कैंटनी पर कोई न कोई साथी मिल जाता था, लेकिन आज कोई नहीं मिला। वह टहलते हुए ही सोचने लगा। मां की तबीयत खराब है। शरीर में खून की कमी है। ताकत का इंजेक्षन लगता है तो ठीक रहती हैं। अभी तीन माह पहले घर गया था तो मां का इलाज करवाया था, लेकिन इलाज पूरा नहीं हो पाया था। तीन-चार हजार रुपये खर्च करने के बाद पैसे की कमी इलाज में आड़े आ गई। मां भी चलने-फिरने लगी तो अभाव ने लापरवाही का रूप ले लिया। वह फिर शहर आ गया। तब से आज तक वह पैसा नहीं भेज पाया। पिता जी ने लिखा है कि तुम्हारी मां के इलाज के अलावा भी बहुत खर्चे हैं। कैसे या करें मेरी तो समझ में ही नहीं आता।

मेरी भी तो समझ में नहीं आता कि या करें कि हर माह इतना पैसा बच जाए कि घर भी भेजा जा सके और अपनी भी जरूरतें पूरी हो सकें। पिता जी शायद सोचते हैं कि मैंं यहां आराम से हंू। पैसा बैंक में जमा कर रखा है। वह यह नहीं जानते कि मेरा बेटा पिछले दिनों हर शनिवार महज इसलिए या तो मार खाता रहा या फाइन भरता रहा या दो चार पीरियड खड़ा रहता, योंकि मैं उसकी शनिवार की ड्रेस के अनुरूप एक सफेद जूता नहीं खरीद पाया था। ऐसा एक-दो नहीं, पूरे चार महीने तक हुआ था। हर शनिवार वह स्कूल से रोता हुआ आता। जब वह घर आता तो उससे नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं होती। मुझसे तो वह कुछ नहीं कहता, लेकिन अपनी मां से रो-रोकर खूब लड़ता है। उसके बाद श्रीमती जी मुझे कोसतीं। कई बार तो इस मामले पर हम दोनों में खूब झगड़ा भी हुआ। एक दिन जब मैं उसे किसी दोस्त से पैसे उधार लेकर जूता ला दिया तो उसे देखकर वह ऐसा खुश हुआ मानो उसकी झोली में जूता नहीं चांद-तारे आ गए हों। आजकल उसकी एक साइकिल की मांग है। जिसे मैं टाल रहा हंू। लेकिन मां के इलाज के लिए पैसा भेजना तो नहीं टाल सकता। कुछ करना ही पड़ेगा।

इस बीच कैंटीन वाले ने चाय बनाकर उसे दे दी। इस दौरान एक दोस्त भी वहीं आ गया। दोस्त ने उसकी परेशानी का कारण पूछा तो उसने बाता दिया। दोस्त उसे कुछ पैसे देने के लिए तैयार हो गया। वह खुश हो गया। इतना कि लगा ही नहीं कि थाे़डी देर पहले वह निराशा और उदासी के समुद्र मेंं गोते लगा था। परेशानी और तनाव उसके चेहरे कपूर की तरह गायब हो गई। वह हंसी-मजाक में मशगूल हो गया और तनाव रहित होकर आकर काम करने लगा।

वह आफिस से घर आया तो उसकी पत्नी ने बताया कि उन्होंने दो कमरों वाला एक मकान देखा है। सब कुछ सेपरेट है किसी से कोई लेना-देना नहीं होगा। श्रीमती जी इतनी खुश थीं कि वह उनकी खुशी छीनना मुनासिब नहीं समझा। बेटा भी खुशी में झूमता हुआ बोला कि डैडी कमरा बहुत बढ़िया है। नया बना मकान है। दीवालें चमक रहीं हैं। उन पर पेंट किया गया है, चूने की पुताई नहीं। दोनों कमरों में अलमारियां भी हैं, बिल्कुल नई। एक कमरा आपका हो जाएगा, एक मेरा और मम्मी का। फिर आप खूब पढ़ना-लिखना। आपको कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा। मुझे भी एक कुर्सी-मेज ला देना। उसे मैं अपने कमरे में लगा लूंगा। फिर खूब मन लगाकर पढूंगा। आप जब कंप्यूटर लेंगे तो उसे भी उसी कमरे में लगाना। मैं खूब बढ़िया चित्रकारी करूंगा। मैं बढ़िया पेंटिंग कर लेता हंू। मेरे कंप्यूटर के सर मेरी खूब तारीफ करते हैं। बेटा खुशी में बोलता ही जा रहा था। उसने कोई जवाब नहींं दिया। कमरेकी दीवारांे पर नजर डाला। पुरानी दीवालें बदरंगी लग रहींं थीं। एक अजीब सी उदासी दीवालोंं पर तारी थी, जो पूरे कमरे में छा जाती जा रही थी। उसे लगा कि इन दीवालों की जिंदगी भी उसी की तरह है।

रात को सोते व त उसने पत्नी को बताया कि घर से पिता जी का पत्र आया है। मां की तबीयत खराब है। कुछ पैसा भेजना होगा। कहां से भेजेंगे? पत्नी ने प्रश्न किया तो उसने बताया कि एक दोस्त से मांगा हंू। काम हो जाएगा। जवाब में पत्नी ने गुस्से में कहा कि आप उधार लेने से नहीं चूकते। हमेशा कर्ज में डूबे रहते हैं। वेतन मिलते ही कर्ज चुकाने में चला जाता है। फिर अगला काम कर्ज लेकर ही करना पड़ता है। पता नहीं कब तक ऐसा करते रहोगे। जवाब में उसने कहा कि कोई काम रुकता तो नहीं न। थाे़डा आगे पीछे हो ही जाता है। हां, कर्ज जरूर बना रहता है, लेकिन दे भी देता हंू। कभी-कभी इसकी वजह से कुछ दि कतें जरूर हो जाती हैं। लेकिन जिंदगी तो यह सब चलता ही रहता है। यह भी सही है कि इसकी वजह से जीवन में एक दबाव भी बना रहता है, जिसके कारण जिंदगी बदरंग सी बनी रहती है। लेकिन या किया जाए? अपने पास कोई और उपाय भी तो नहीं है। खर्चे इतने हैं कि उस हिसाब से कमाई नहीं है। लगे हाथ उसने यह भी कह दिया कि हम अभी कुछ महीने दो कमरों वाला घर नहीं ले सकते। पैसे की जरूरत है। मां का इलाज कराना जरूरी है। कुछ कर्ज भी देना है। इसलिए हमें अभी इस योजना को कुछ दिनों के लिए भूलना होगा। इतना सुनना था कि पत्नी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहंुच गया। वह करवट बदल कर लेट गई। वह समझाने की कोशिश करता रहा। कहता रहा कि हम कमरा लेंगे, लेकिन कुछ दिन और हमें इसी हाल में रहना होगा। कान पक गए आपकी यह बात सुनते-सुनते पत्नी ने पलटकर जवाब दिया। वह कुछ बोल नहीं पाया। यह बात इतनी सच थी कि उसे झूठ से ढका नहीं जा सकता था। वैसे भी झूठ बोलने के लिए जो जरूरी कौशल और कला चाहिए वह उसमंे नहीं है। उसकी पत्नी की तल्खी में हकीकत थी, लेकिन सच उससे आगे भी कुछ और था, जिससे अनजान न पत्नी थी, न ही वह। आराम की जिंदगी वह भी चाहता है। उसके लिए प्रयास भी करता है, लेकिन पर्याप्त संसाधन नहीं जुटा पाता। मौजूदा परिस्थितियों में जिम्मेदारियों और दायित्वयों का बोध भी है उसे। वह खुद के आराम के लिए इन्हें नहीं भुला सकता।
एक बार उसने पिता जी की बीमारी पर अपने बॉस से कुछ पैसे मांगे थे। बॉस ने पैसे तो नहीं दिए, लेकिन दिए ढेर सारे उपदेश। बॉस ने कहा था कि कहां से दोगे इतना पैसा। मां-बाप से कह दो कि तुम अपनी ही जरूरतें नहीं पूरी कर सकते। तुम्हें कहां से दें। वैसे भी तुम उधार बहुत लेते हो। इस कारण तुम तनाव मंे रहते हो। इसी वजह से तुम्हारा काम में भी मन नहीं लगता और गलतियां बहुत करते हो। इसके बाद मेरी डांट खाते हो और फिर और गलतियां करते हो। यों करते हो ऐसा? जितना मिलता है उसी में गुजारा यों नहीं करते? उस समय उसे अपने बॉस पर बहुत गुस्सा आया था। उसने डरते हुए ही सही, लेकिन कहा था कि मां-बाप को वह अपने हाल पर नहीं छाे़ड सकता। मैं हंू योंकि मेरे माता-पिता हैं। मैं हंू योंकि मेरे बच्चे हैं। बच्चे हैं, माता-पिता हैं, इसलिए मैं हंू। आपको पैसा नहीं देना, न दें, ऐसी बातें भी न करें। संतों के प्रवचन से किसी की जिंदगी नहींं चलती, योंकि वह कोरे उपदेश होते हैं। उसमें जीवन का सार तत्व नहीं होता। आप भी उपदेश दे रहें हैं। संत बनने का प्रयास कर रहे हैं। मेरी नजरों में संत से बड़ा ढोंगी और कोई नहीं होता। उपदेशक अपने ही उपदेश का पालन नहीं करता। यह एक हकीकत है और मैं इसे जानता हंू। उसकी बात सुनकर बॉस नाराज हो गया था। उसने और भी कटु वचन उसे कहे थे, लेकिन वह इसकेआगे कुछ नहीं बोला और वहां से चला गया। बॉस के केबिन से निकलते ही उसने अस्पुट स्वरों में कई भद्दी गालियां बॉस के लिए निकालीं। साला कहता है कि जितना मिलता है उतने में ही गुजारा करो। यह नहीं कहता कि गुजारे लायक वेतन दे दूं। ऐसे तो कहेगा कि मैं इस कंपनी के परिवार का सदस्य हंू। या ऐसे ही परिवार बनता और चलता है? सदस्य संकट में हो और मुखिया उपदेश देने में व्यस्त रहे।

सुबह वह फे्र श होने के लिए बाथरूम गया तो उसकी निगाह बाथरूम की दीवारों पर अनायास ही चली गइंर्। वैसे तो वह इन्हें रोज ही देखता है और सोचता है कि एक न एक दिन उसे इस बाथरूम से मुि त जरूर मिलेगी। लेकिन आज उसे बाथरूम की दीवारें बदली नजर आइंर्। पुताई के पपड़ी छाे़डने से उधड़ी दीवारों पर तरह-तरह के पक्षी, शेर, हाथी, ऊंट और गाय की आकृतियां नजर आइंर्। वह खुश हो गया, बोला यह तो कलाकारी है। चित्रकारी है। वह भसी मुफ्त की जोकि दीवारों के खराब होने के कारण बन गई हैं। उसे वही दीवारें अच्छी लगने लगीं, जो पहले खराब लगती थीं। उन दीवारों में उसे धड़कन सुनाई देने लगी। उदासी की जगह जीवंतता दिखाई पड़ने लगी। लगा वह उससे कुछ कह रही हैं। दीवारों पर बनी आकृतियां उससे बोल रही हैं, बातें कर रही हैं। वह खुशी से झूम उठा। जल्दी से बाथरूम से बाहर आया और पत्नी को बुलाकर ले गया। देखो, दीवारों पर हाथी, घाे़डे, शेर, चीता, मोर, कोयल के चित्र बने हुए हैं। यह देखो यह आदमी की आकृति और यह हनुमान जी की। पत्नी ने देखा और मुस्कराते हुए कहा-हां बना तो है। मैंने तो इस नजरिये से इन्हें कभी देखा ही नहीं। लेकिन मैंने देखा था। उनके बेटे ने कहा। डैडी, मैं तो रोज देखता हूं। इनसे बातें भी करता हूं। यह हाथी, मेरा साथी है। शेर मेरा दोस्त। मैं इनसे खूब बातें करता हूं्र। अपनी कंप्यूटर की लास में मैं इन्हीं जैसी आकृतियां बनाता हंू और सर मुझे शाबासी देते हैं। उसे आश्चर्य हुआ कि जो बात उसके बेटे ने पहले ही जान ली, वह यों नहीं जान पाया।

उस दिन वह खुशी-खुशी आफिस गया। शाम को घर आया तो कमरे का नजारा बदला-बदला हुआ था। लकड़ी की पुरानी अलमारी के ऊपर बहुत सारे रंगीन कार्टून और चित्र सजाए गए थे। उसकी सुंदरता में अलमारी का पुरानापन, उदासीपन गायब हो चुका था। वह चहक रही थी। दीवारों पर भी कई जगह चित्र और कार्टून टंग गए थे। दीवारें भी हंस रही थीं। यह सब उसके बेटे ने किया था। वह दीवारों और अलमारी को देखकर मुस्कराया और बेटे का माथा चूम लिया। उस समय उसकी पत्नी और उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन खुशी के......।


पूर्व में इरावती पत्रिका में प्रकाशित

Comments

Udan Tashtari said…
आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.

एक नया हिन्दी चिट्ठा भी शुरु करवायें तो मुझ पर और अनेकों पर आपका अहसान कहलायेगा.

इन्तजार करता हूँ कि कौन सा शुरु करवाया. उसे एग्रीगेटर पर लाना मेरी जिम्मेदारी मान लें यदि वह सामाजिक एवं एग्रीगेटर के मापदण्ड पर खरा उतरता है.

यह वाली टिप्पणी भी एक अभियान है. इस टिप्पणी को आगे बढ़ा कर इस अभियान में शामिल हों. शुभकामनाऐं.

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