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उधार की जिंदगी

कहानी


ओमप्रकाश तिवारी


वह फोन पर पिता जी से बातें कर रहा था। हाल-चाल पूछने के बाद जैसे ही उसके पिता ने कहा कि हो सके तो कुछ पैसे...। आगे का शब्द पिता जी बोल भी न पाए कि वह फट पड़ा -पैसा-पैसा-पैसा, आप या समझते हैं? मेरे पास पैसों का पे़ड लगा है? या मैंने छापाखाना लगा रखा है?

उधर से डरी सहमी आवाज आई -तुम्हारी मां बीमार...। वा य फिर अधूरा छाे़ड दिया गया, योंकि बोलने वाला जानता था कि आगे के शब्द सुने ही नहीं जाएंगे। हुआ भी यही। वह फिर चिल्ला पड़ा -तो मैैं या करूं? जान दे दूं? आप मेरी मजबूरी को यों नहीं समझते? उधर से हताश-निराश पिता जी की आवाज आई -तो फोन रखता...। पिता जी का वा य पूरा होने से पहले ही उसने फोन रख दिया...।
पैसा देकर वह पीसीओ से बाहर आ गया। उसे बेहद गुस्सा आ रहा था, लेकिन उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह गुस्सा किस पर है। पिता जी पर? अपने आप पर? हालात पर? वह जानता है कि घर पर पैसे की जरूरत है, हमेशा रहती है और यह स्वाभाविक भी है, योंकि मां बीमार रहती है। भतीजे-भतीजियां पढ़ रहे हैं। पिता जी की भी तबियत ठीक नहीं रहती है। बड़े भाई बेरोजगार हैं। खेती है, जो खाने भर का ही आनाज पैदा करती है। कभी सिंचाई तो कभी बुवाई और कभी कटाई का काम लगा ही रहता है। कभी डीजल के लिए तो कभी ट्यूबवेल खराब होने पर पैसे की जरूरत बनी ही रहती है। कभी खाद के लिए पैसे चाहिए तो कभी मजदूरी देने के लिए। मौसम और बीमारियों के प्रकोप से फसल भी कभी-कभार चौपट हो ही जाती है। तब खाने के लिए अनाज भी खरीदना पड़ता है। लेकिन वह या करे? पिछले माह ही उसकी श्रीमती जी ने एक भोले-भाले शिशु को एक निजी अस्पताल में जन्म दिया। पहले से ही कंगाल चल रहा वह एकाएक कर्ज के दलदल में फंस गया। उस समय उसकी मां उसके साथ ही थीं। वह जानती हैं कि वह कर्ज में डूबा हुआ है।

उसका हर काम कर्ज से ही होता है। उधार की जिंदगी जीना उसकी नियति-सी बन गई है। पिछला कर्ज चुका नहीं पाया होता है कि अगले कर्ज की नौबत आ जाती है। ऐसे में बार-बार कर्ज कौन दे? इस समय उसकी चिंता यही है कि वह दोस्तों का कर्ज कैसे चुकाए? वह बैंक से कर्ज लेकर दोस्तों का कर्ज चुकाने की सोच रहा है।

या कहा आपने? वह नौकरी नहीं करता? नहीं साहब, नौकरी करता है। उसे ठीक-ठाक वेतन भी मिलता है, लेकिन खर्च के हिसाब से कम ही है। ठीक-ठाक है फिर भी कम है? यही पूछना चाहते हैं न आप? बता रहा हूं भाई। उसे आठ हजार रुपये हर माह वेतन मिलता है। इसी मेंं उसे अपने बीवी और तीन बच्चों का खर्च चलाने के अलावा गांव में रह रहे माता-पिता का भी ख्याल रखना पड़ता है। शहर में वह किराये के मकान में रहता है। दो बच्चे पढ़ रहे हैं। मोटरसाइकिल उसने बैंक से कर्ज लेकर ली है। आठ हजार रुपये की वेतन रूपी चादर से वह पैर ढकता है तो सिर खुल जाता है और सिर ढकता है तो पैर...।

दो बच्चे थे तो तीसरा पैदा करने की या जरूरत थी? आपका सवाल सही है, लेकिन उसकी श्रीमती जी की इच्छा थी कि एक बेटी हो जाए। लेकिन बेटी के च कर में बेटा हो गया। आप भी सोच रहे होंगे कि अजीब महिला है। आज जबकि लोग बेटी पैदा ही नहीं करना चाहते। कई तो पैदा होने के बाद मार देते हैं। यहां-वहां फेंक आते हैं। ऐसे में उसे बेटी चाहिए। हां साहब, उसका कहना है कि बिना बेटी के कोख पवित्र नहीं होती। इसे आप उसकी मूर्खता भी कह सकते हैं, लेकिन आज के जमाने में बेटी पैदा करने की इच्छा रखने वाली महिलाएं कितनी हैं? कितने दंपति हैं जो बेटी पैदा करना चाहते हैं? आज जबकि देश का लिंगानुपात गड़बड़ा गया है, ऐसे में उनकी जैसी महिलाआें की हिम्मत की दाद नहीं देनी चाहिए? लेकिन इससे तो वह कंगाल हो गया? उसका पूरा बजट चौपट हो गया। हां, यह बात आपकी सही है, लेकिन पत्नी की इच्छा का सम्मान भी तो कोई बात होती है।

ठंड का महीना है और वह बच्चों के लिए गर्म कपड़े नहीं बनवा पाया है। दोनों बच्चे फटा स्वेटर पहनकर स्कूल जाते हैं। घर पर भी पहनने के लिए ठीक से गर्म कपड़े नहीं हैं। वह खुद के लिए रजाई तक नहीं बनवा पाया है। कंबल-चादर आे़ढकर गुजारा कर रहा है। दो चारपाई है, एक पर श्रीमती जी और छोटा बच्चा और एक पर दोनों बड़े बच्चे सो जाते हैं और वह फर्श पर सोता है...।
अब उसे पिता जी के साथ किए व्यवहार पर अफसोस हो रहा है, लेकिन या करे, जानता है कि हाथ से छूटा तीर और मंुह से निकला शब्द वापस नहीं आता। पहले से दुखी यह प्राणी और दुखी हो गया...।
कमरे पर आते ही श्रीमती जी का सवाल।
- या कह रहे थे बाबू जी?
- बाबू जी को पैसा चाहिए। उसने लंबी सांस लेते हुए कहा। श्रीमती जी के पूछने से उसे फिर से गुस्सा आने लगा। थाे़डी देर पहले अपने जिस व्यवहार पर वह पश्चाताप कर रहा था उसे भूल गया।
- बाबू जी भी न हद करते हैं। शिशु को मालिश करते हुए श्रीमती जी ने कहा। वह अपने गुस्से को जज्ब करते हुए अखबार पढ़ने लगा।
या कहा आपने? अखबार पढ़ता है तो खरीदता भी होगा? हां भाई, लेकिन ऐसा वह शौक के लिए नहीं, बल्कि मजबूरी में करता है। पेशे से पत्रकार जो है। अखबार, पत्रिका और किताब पढ़ना तो उसकी पेशेगत मजबूरी है।
अखबार पढ़ते हुए अचानक उसकी निगाह बच्चे पर पड़ी तो वह कह उठा-साला पंडित कहता है कि तुम्हारा यह बेटा लकी है। तुम्हारी उन्नति करेगा, लेकिन यहां तो उल्टा हो रहा है। पैदा होते ही कर्ज में डुबो दिया नालायक ने।
-हे, मेरे बेटे को कोसो मत। श्रीमती जी ने आंखें तरेरीं।
-मारेगा बु़ढापे में लात तो पता चलेगा। उसने तंज किया।
- आप मार रहे हो अपने मां-बाप को लात?
-नहीं, मैं तो उन्हें निहाल कर रहा हूं। बीमार मां के लिए पैसे नहीं भेजना, लात मारना नहीं तो या है? एक हजार किलोमीटर दूर बैठा बाप फोन पर जब मां की बीमारी के बारे में बता रहा था तो उसी पर झल्ला बैठा। या इसी दिन के लिए पाला था उन्होंने?
-इसमें मेरे बेटे का या कसूर है?
-सारे बेटे ऐसे ही होते हैं। कमाने लगते हैं तो उन्हें अपना ही खर्चा भारी हो जाता है। मां-बाप बोझ लगने लगते हैं।
-मेरा बेटा ऐसा नहीं होगा।
-सारे मां-बाप यही सोचते हैं। एक तरह से अच्छा ही है कि उनका यह भ्रम बना रहता है। नहीं तो इस सृष्टि का पता नहीं या हो...।
वह बोल ही रहा था कि श्रीमती जी किचन में चली गइंर्। वह फिर से अखबार पलटने लगा, लेकिन उसका मन अखबार पढ़ने में नहीं लगा। उसे याद आया कि रात बहुत ठंड लगी थी। लाख कोशिशों के बाद भी वह इस माह की तनख्वाह में से रजाई नहीं बनवा पाया। इस साल ठंड भी बहुत पड़ रही है। अभी तो आधा दिसंबर ही बीता है। आगे या हाल होगा? उसे यह भी याद आया कि वह फर्श पर सोता है। रात बिस्तर पर बहुत सारे चींटें चढ़ जाते हैं। वह जिस मकान में रहता है वह बहुत पुराना है। उसमें चींटे बहुत निकलते हैं। न चाहते हुए भी दिन भर में सैकड़ों चीटें मर जाते हैं। चाहते हुए भी वह कमरा नहीं बदल पा रहा है। किराया कम होने के कारण वह इस मकान में रह रहा है।
तमाम विसंगतियों से घिरा यह इनसान सपने बहुत देखता है। वह रोमांचक कल्पनाएं भी करता है। अभी वह अखबार पढ़ना बंद करके सोच रहा है कि उसे कहीं से दस लाख रुपये मिल गए हैं। उन पैसों से वह गांव का अपना मकान बनवा रहा है। उसका गांव का मकान इस बरसात में गिर गया है। एक भतीजी की शादी कर रहा है। शहर में, जहां रह कर वह नौकरी कर रहा है, वहां पर एक मकान खरीद लिया है। भतीजे के लिए मोटरसाइकिल खरीद दी है और भाई के लिए गांव में किराने की दुकान खुलवा दी है। इससे पहले कि उसकी कल्पना और उड़ान भरती। सपने उसकी आंखों से जमीन पर आने लगते श्रीमती जी ने आवाज लगा दी।
-खाना नहीं खाना या? एक झटके में वह आसमान से धरती पर आ गया।
- यों नहीं खाना।
-बिना नहाए खाओगे?
-नहीं।
- फिर जल्दी नहाओ। खाना तैयार है।
वह नहाने चला गया। वह नहाता रहा और सपना देखता रहा..। वह खाना खाता रहा और सपना देखता रहा...।
खाना खाने के बाद श्रीमती से बोला कि मकान देखने जा रहा हूं।
-आप तो कह रहे थे कि कमरा बदलना ही नहीं है।
-कमरा नहीं, मकान देखने जा रहा हूं, खरीदने के लिए। वह मुस्कुराते हुए बोला।
- या?
-हां, सोच रहा हूं कि कोई ढाई-तीन लाख का मकान खरीद ही लूं।
- यह भी खूब रही, घर में नहीं दाने और अम्मां चली भुनाने। श्रीमती ने व्यंग्य किया।
-नहीं, मुंगेरी लाल के हसीन सपने। कहते हुए वह चला गया।
उसका एक दोस्त प्रापर्टी डीलर का काम करता है। उसके साथ उसने कई मकानों को देखा। शाम हो गई तो घर वापस आ गया। कमरे में प्रवेश करते ही श्रीमती का सवाल पत्थर की तरह दिमाग पर लगा।
-देख आए?
-हां।
- कोई पसंद आया?
-नहीं।
- यों?
- जब लेना ही नहीं तो पसंद आने का सवाल ही कहां उठता है।
-फिर देखने यों गए?
- यों ही, जानकारी बढ़ाने के लिए। खरीद नहीं सकता तो या देख भी नहीं सकता। देखने के पैसे थोड़े ही न लगते हैं।
-आप भी न हद करते हो। कहते हुए श्रीमती जी कमरे से निकलने लगीं तो उसने जेब से दो हजार रुपये निकाल उनके आगे कर दिए। पैसे देखकर वह रुक गईं। दिमाग में सवाल उठा तो पूछ भी लिया-किससे लिए?
- दोस्त से।
- या करना है?
- घर भेजना है।
-कौन सा दोस्त बचा था अभी तक...।
- वही, जिसने मकान दिखाए। प्रापर्टी डीलर रवि। लाखों का मकान खरीदवाएगा तो दो हजार रुपये कर्ज भी नहीं देगा...।
-आप भी न...
- हद करते हो...। श्रीमती जी के वा य को उसने पूरा किया और दोनों ठहाका मारकर हंस पड़े...। उनकी हंसी बड़ी देर तक कमरे में गूंजती रही...।


ओमप्रकाश तिवारी

Comments

बहुत दर्दनाक कहानी है...आपकी कहानी मे क आधा नही लिखा जा रहा है...

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