वैसे तो हमारा संविधान धार्मिक आज़ादी का हक देता है। किसी भी नागरिक का यह मौलिक अधिकार भी है। लेकिन कई बार सरकारें और उसके समर्थित संगठन व लोग नागरिक अधिकारों का हनन करते हैं। उसमें भी दिक्कत तब होती है जब किसी समुदाय विशेष को निशाने पर लिया जाता है। कुछ नेताओं के हिन्दू मुस्लिम वैमनस्य की वजह से देश का बंटवारा हो गया। लेकिन यह नफरत गयी नहीं। कुछ संगठनों ने आज़ादी के बाद से ही नफरत फैलानी शुरू कर दी थी। कालांतर में वह सियासी दल बनाकर सत्ता में आ गए। उनके लिए संविधान कोई मायने नहीं रखता। नागरिककों के मूल अधिकारों का हनन वे अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझते हैं और ऐसा ही व्यवहार करते हैं। इसके लिए उनके पास अपने तर्क और तथ्य भी हैं जो वह स्वयं गड़ते हैं और कुतर्क करते है। जब इससे भी नहीं पर पाते तो हिंसक हो जाते है। मूलतः वे हिंसक ही हैं। मानवीयता का तो केवल चोला पहने हैं। यदि सार्वजनिक जगह में नमाज नहीं पढ़नी चाहिए तो शोभायात्रा या नगर कीर्तन भी नहीं निकलना चाहिए। एक के लिए धार्मिक आज़ादी दूसरे के लिए पाबंदी नहीं होनी चाहिए।
परिवर्तन लाजमी है तो डरना क्यों? - ओमप्रकाश तिवारी मानव सभ्यता अंतरविरोधों के परमाणु बम जैसी है। इसके अंतरविरोध परिवर्तनशील बनाकर इसे आगे बढ़ाते हैं तो यही इसका विनाश भी करते हैं। मानव जाति का इतिहास गवाह है कि भूत में कई सभ्यताएं तबाह हो गईं जिनके मलबे से खाद-पानी लेकर नई सभ्यताओं ने जन्म लिया और फली-फूली हैं। यही वजह है कि मानव भविष्य को लेकर हमेशा चिंतित रहता है। उसकी अधिकतर योजनाएं बेहतर भविष्य के लिए होती हैं। लेकिन हर आदमी, हर समाज और हर सभ्यता व संस्कृति हमेशा बेहतर नहीं साबित होती। अक्सर इंसानी अनुमान धरे केधरे रह जाते हैं और भविष्य कुछ का कुछ हो जाता है। वामपंथी चिंतक कार्ल मार्क्स का आकलन था कि पूंजीवादी व्यवस्था अपनी तबाही के लिए खुद ही रास्ते बनाती है। यही वजह है कि एक दिन यह व्यवस्था तबाह हो जाएगी और इसके स्थान पर नई व्यवस्था सामने आएगी। नई व्यवस्था क्या होगी इसकी भी मार्क्स ने कल्पना की और बताया कि वह साम्यवादी व्यवस्था होगी। लेकिन ऐसा हुआ क्या? आज लगभग पूरी दुनिया में पूंजीवादी व्यवस्था है। सोवियत रूस जैसे देशों में साम्यवादी व्यवस्था आई भी तो वह पूंजीवादी व्यवस्था ...
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