
इस कहानी को पहले तीन भागों में आप लोगों के सामने प्रस्तुत कर चुका हूँ । अब आप लोगों की सुविधा के लिए पूरी कहानी एक साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
मेरी बेचैनी :
हालांकि वह सपना था, लेकिन उसे भुला पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है। ऐसा नहीं है कि मैं सपना नहीं देखता। सपना देखता भी हूँ और उन्हें सुबह होते ही या फिर एक-दो दिन में भूल भी जाता हूँ , लेकिन यह सपना मौका पाते ही मेरे दिलो-दिमाग पर हावी हो जाता है। इस सपने की कशिश, इसका मीठा दर्द और गुलाबी एहसास मेरे जेहन में हमेशा बना रहता है। मौका मिलते ही सोचने पर विवश कर देता है कि या इसका संबंध मेरी निजी जिंदगी से है? यह सवाल उठते ही मैं सपने के एक-एक तार को जोडने लगता हूँ । फिर भी ऐसी कोई तस्वीर नहीं बनती, जिससे यह लगे कि सपने का संबंध मेरी निजी जिंदगी से है।
यह भी सच है कि कई सपनों का संबंध इंसान के जीवन से होता है। कई बार स्मृतियां, जिन्हें हम अपने चेतन में भूल चुके होते हैं, वे सपने के रूप में हमारी चेतना में शामिल हो जाती हैं। तो या मैं किसी को भूल रहा हूँ ? इतनी लंबी जिंदगी भी तो नहीं है। हो सकता है कि बचपन या किशोर-वय की कोई स्मृति है, जो अब सपने के रूप में सामने आई है। बचपन और किशोर-वय की तो अधिकांश बातों और घटनाओं को हम विस्मृत ही कर देते हैं। लेकिन बचपन में या किसी लड़की से प्यार किया जा सकता है? किशोर-वय में जरूर हो जाता है, लेकिन प्रेम जैसी भावना और कोमल एहसास को भुलाया जा सकता है? मेरे अंदर से ही आवाज आती है। दुष्यंत भी शकुन्तला से प्यार करके भूल गए थे। शकुन्तला के साथ बिताए प्यार भरे लम्हों को दुष्यंत ने विस्मृति के पत्थर से कुचल दिया था। ऐसा तो उन्होंने शाप के कारण किया था। मैंने खुद से ही सवाल किया, पर उन्हें तो नहीं पता था कि वह किसी ऋषि के शाप के कारण शकुन्तला को विस्मृत कर रहे हैं। तो या मैं शापित हूँ ? हो सकता है। आज के जमाने में वैदिक युग की बातें। सब बकवास है। प्रकृति की जटिलता अनंत है। इसी कारण आदमी ने भगवान की रचना कर डाली। जब देश की आबादी करोड में भी नहीं थी, तभी 33 करोड देवता बना डाले हमारे पूर्वजों ने। यह जटिलता तब भी थी, अब भी है। पत्थर अब भी करोडों लीटर दूध पी जाते हैं। गरीब की आह और पीड़ित की बद्दुआ ही आधुनिक श्राप है। स्वभाव भर बदला है। मैंने तो किसी को नहीं सताया फिर मुझे कौन श्राप देगा? ऐसा हर इंसान को लगता है। यदि उसे ऐसा न लगे तो वह ऐसा काम ही न करे। ऐसा काम ही न करे तो उसके सपने इतने डरावने न हों। आज बहुत से इनसान हैं जो रातों को इसलिए नहीं सो पाते, योंकि उनके सपने इतने डरावने होते हैं कि जागने पर भी वे उनका पीछा नहीं छोडते। मेरा सपना तो डरावना नहीं है। जानता हूँ , इसीलिए कह रहा हूँ , अपनी स्मृतियों को खंगालो। अपने ही द्वंद्व से मैं पस्त हो गया। हालांकि मुझे याद नहीं, लेकिन यह मानने को विवश हो जाता हूँ कि किसी को प्यार करके शायद मैं भूल गया हूँ ....।
सपना :
तुम मुझे भूल गए, पर मैं नहीं। उसने कहा तो मैं अवाक रह गया। भला प्यार भी भूलने वाला एहसास है। सोचता हूँ पर बोल नहीं पाता।
- यह देखो, तुमने कई पत्र भी लिखे हैं। एक अन्य महिला, जो शायद उसकी भाभी है, कई लिफाफे मेरी तरफ बढ़ा देती है। एक भी लिफाफा खोला नहीं गया है। लेकिन उनके ऊपर जो लिखावट है वह मेरी ही है।
- यह तो खोल कर पढ़े भी नहीं गए हैं? मैंने उस महिला से पूछा।
- प्रेम पढ़ने का मोहताज नहीं होता। वह महसूस किया जाता है। मैंने तुम्हारी आंखों में देखकर ही महसूस कर लिया था, पहली ही नजर में। उसके बाद तो ये पत्र या तुम्हारे मुंह से निकले अल्फाज, सब बेमानी हैं। प्रेम में यदि शब्दों की जरूरत पड़ जाए या उसे लिखकर इजहार करना पड़े तो वह कोमल एहसास कहां रहा जाता है? फिर तो वह भौतिक हो जाता है। अलौकिक कहां रह पाता है? मैंने अपने प्रेम की अलौकिकता को बरकरार रखा है। इसलिए तुम्हारे इन पत्रों को नहीं पढ़ा। जानती हूँ , इसमें तुमने अपनी मजबूरियों का उल्लेख किया होगा। उन्हें सिद्ध करने के लिए तमाम तर्क भी दिए होंगे, लेकिन तुम मुझसे प्रेम करते हो, इसके प्रमाण हैं ये पत्र। बेशक तुम नहीं आए, लेकिन तुम्हारे पत्र तो आए। मैंने इसी में ही तुम्हारी मूरत देख ली। मैं तो प्रेम दीवानी हूँ , मीरा की तरह। मीरा के लिए जब यह जरूरी नहीं था कि भगवान कृष्ण सशरीर उपस्थित हों , तो मेरे लिए भी जरूरी नहीं है कि तुम सशरीर मेरे सामने रहो। मैंने तुमसे प्रेम किया है। दिल में बसाया है। इसके बाद तुम कहीं भी रहो, मेरे लिए कोई फर्क नहीं पड़ता। उसने कहा था और मैं अभिभूत था। प्रेम की ऐसी पराकाष्ठा। उसने मीरा बनके मुझे कृष्ण बना दिया। मुझ तुच्छ को ऐसा सम्मान। कृष्ण तो भगवान हैं। वे मीरा की भावनाओं को जानते-समझते थे। मैं तो इनसान हूँ । अपनी ही भावनाओं से अनजान, फिर उसकी कोमल भावनाओं के एहसास को कैसे समझ सकता था। मैं भौचक था।
- तुम शादी करके अपने बीवी-बच्चों के साथ खुश हो, पर यह पगली तुम्हारे प्यार में कुं आरी बैठी है। कैसे बीतेगा इसका जीवन? उसकी भाभी ने कहा था।
मुझे कोई जवाब नहीं सूझा। मैं चुप ही रहा। मेरी चुप्पी में मेरे अपराध की स्वीकृति भी थी। वह अपराध जिसके बारे में मैं अनभिज्ञ था।
ऱ्यह गांव ऊंची जाति वालों का। उन्होंने हमारा जीना हराम कर दिया है।
-जीना हराम कर रखा है?
-हां, वे उसके चरित्र पर उंगली उठाते हैं। कहते हैं यह गांव के लड़कों को बिगाड़ रही है। हम ठहरे नीच जाति के। उनका मुकाबला नहीं कर सकते। उन्होंने इसका बाहर निकलना दूभर कर दिया है। उनका कहना है कि इसने पाप किया है। यह इस गांव में नहीं रह सकती है। वह महिला रुआंसी हो गई। उसकी आंखों में आंसू भर आए। उसने अपने आंसू आंचल से पोंछते हुए कहा कि दरअसल उनकी निगाह इस पर है...। यह उन्हें घास नहीं डालती तो इसे कलंकित करके गाँव से निकाल देना चाहते हैं...।
इसके बाद सपने में सब कुछ गड्मड् हो जाता है। पता चलता है कि लड़की गांव वालों के डर से अपनी बहन के यहां रहने के लिए गई है। मुझे आया जानकर कोई उसे लेने जाता है। मैं उससे मिलने के लिए व्यग्र हो जाता हूं। सोचता हूं, वह मेरे सामने होगी तो मैं या बातें करूंगा। या कहूंगा उससे। मेरी समझ में कुछ नहीं आता, लेकिन मैं रोमांचित हूं उससे मिलने की कल्पना मात्र से ही। व्यग्रता कुछ ऐसी, जैसे मैं पहली बार किसी स्त्री के संपर्क में आऊंगा।
इसी बीच वहां भगदड़ मच जाती है। चारों तरफ अफरातफरी मच जाती है। मारकाट होने लगती है। मैं आतंकित हो जाता हूं। उसकी भाभी कहती है कि यह सब उनकी चाल है। वे तुम दोनों को मिलने नहीं देना चाहते। इसीलिए दंगा भड़का दिया। वे तुम दोनों को मार देना चाहते हैं। मेरा डर गायब हो जाता है। मैं मुकाबले के लिए दृ़ढप्रतिज्ञ हो जाता हूं। वह मुझे भागने के लिए कहती है। एक भीड़ मेरी तरफ बढ़ती है। उनके हाथों में हथियार हैं, लेकिन उनकी श ल आदमी जैसी नहीं है। हालांकि उनके दो हाथ-पैर हैं, लेकिन चेहरा जानवरों जैसा है। डरावना। मैं सोचता हूं यह किस लोक के वासी हैं। मुझे यों मारना चाहते हैं? मुझे मारकर उन्हें या मिलेगा? मैं अविचल खड़ा हूं। वह मेरी तरफ आ रहे हैं। उसकी भाभी भयभीत कभी मुझे देखती है तो कभी भीड़ को। वह चिल्लाती है कि यहां से भाग जाओ। ये लोग तुम्हें मार डालेंगे।
-भागते कायर हैं। अकारण किसी को मारने वाले भी कायर होते हैं। कायरों से भागा नहीं जाता। उनका मुकाबला किया जाता है।
-तुम अकेले हो, वे बहुत हैं।
-वे डरे हुए हैं। डरे हुए लोग चाहें जितनी हिंसा करें वह विजयी नहीं हो सकते।
मुझे भागता नहीं देख महिला भाग जाती है, लेकिन थोडी ही देर में वह एक भीड़ के साथ उपस्थित होती है। उनके भी हाथों में हथियार हैं। इनकी शक्ल आदमियों जैसी है। यह भीड़ मेरे पीछे आकर खड़ी हो जाती है। उन्हें देखकर जानवरों की शक्ल वाली भीड़ रुक जाती है।
माहौल में तनावपूर्ण शांति पसर जाती है। इसी बीच दो युवक मोटरसाइकिल से आते हैं। एक पर वह लड़की बैठी होती है। मोटरसाइकिल रुकते ही वह दौडकर मेरे पास आती है। मैं उसे सीने से लगा लेता हूं।
-तुम इसे लेकर भाग जाओ। एक युवक मोटरसाइकिल लेकर मेरे पास आकर कहता है।
-मैं यों भाग जाऊं? मैंने या गलत किया है?
ऱ्यह बहस का समय नहीं है।
-तो भागने का भी नहीं। भागकर जीवन नहीं जिया जा सकता। आज यहीं तय होगा कि हमें जीना है या मरना। मैं लड़की के चेहरे की तरफ देखता हूं। उसके चेहरे पर मिलन का सुख है, मरने का कोई भय नहीं। मैं आश्वस्त हो जाता हूं।
इसी बीच पुलिस आ जाती है। सभी पुलिस वालों को देखते हैं। पुलिस के जवान अपनी-अपनी गाड़ियों से उतर कर पोजीशन ले लेते हैं। उनका अधिकारी जोर से बोलता है।
-अपने आपको हमारे हवाले कर दो। मेरी समझ में नहीं आता कि वह किसे हवाले करने को कह रहा है। पुलिस अधिकारी हमारे पास आता है।
-तुम दोनों को गिरफ्तार किया जाता है।
- यों?
-गांव की शांति भंग करने के लिए।
-आरोप निराधार है। शांति हमने नहीं भंग की।
-तुम्हें जो कुछ भी कहना है अदालत में कहना। पुलिस अधिकारी ने कहा। हम चुपचाप उसके साथ चल देते हैं।
अगले दिन हमें अदालत में पेश किया जाता है।
सरकारी वकील जज से कहता है कि इन दोनों ने गांव की शांति भंग की है।
-आरोप निराधार है जज साहब। मैं प्रतिवाद करता हूं। - मैंने तो केवल प्यार किया है।
ऱ्यही तो इनका गुनाह है योर आनर
- प्यार करना तो गुनाह नहीं होता जज साहब?
-प्यार करना ही गुनाह है योर आनर? योंकि इनके प्यार करने से गांव की शांति भंग हुई। सवर्ण होते हुए इसने दलित युवती से और दलित होते हुए इसने सवर्ण युवक से प्रेम किया। इससे दोनों समुदायों में तनाव व्याप्त हो गया। स्थिति विस्फोटक हो गई। लोग मारकाट पर उतर आए। वह तो समय पर पुलिस पहंुच गई नहीं तो लाशों का ढेर लग जाता योर आनर।
सरकारी वकील चुप हो जाता है। मैं अवाक हूं। समझ में नहीं आता कि या कहूं। अदालत अपना फैसला सुनाती है।
- गवाहों के बयान और सुबुतों को देखते हुए अदालत इस निर्णय पर पहंुची है कि चूंकि अभियु तों ने गंभीर अपराध किया है इसलिए इन्हें बामश कत उम्रकैद की सजा सुनाई जाती है।
सपने से बाहर :
मेरी नींद टूट जाती है। मेरा शरीर पसीने से भीगा होता है। मैं सपने के बारे में सोचने लगता हूं। यह कैसा सपना है? या मैं इसे भुला पाऊंगा? इसके बाद मैं सो नहीं पाता। बाहर चिड़िया चहचहाने लगती हैं। खिड़की से बाहर देखता हूं तो अंधेरा भाग रहा होता है...। भोर का उजाला खिड़की के रास्ते घर में प्रवेश कर रहा होता है...।
और वह तस्वीर:
उस दिन सुबह मैं विस्तर से उठकर छत पर चला गया। टहलते हुए सपने को बार-बार याद करने लगा। तभी पूरब दिशा में सूरज निकलता दिखाई दिया। मुझे सूरज की जगह किसी लड़की का चेहरा नजर आया॥। चेहरा इतना धुंधला था कि मेरी समझ में नहीं आया कि वह किसका चेहरा है। रात में देखे गए सपने को और उगते सूरज में चस्पा लड़की की तस्वीर को मिलाकर देखता हूं तो बेचैनी और बढ़ जाती है। कभी लगता है कि मैं दुष्यंत हूं। फिर लगता है कृष्ण...। फिर लगता है कि नहीं, मैं तो अभियुक्त हूँ ....
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Regards