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झूठा निकला प्रस्तोता

टीवी स्क्रीन पर प्रस्तोता
कहता है मुस्करा कर
खबरों का सिलसिला जारी है
लेकिन एक छोट से ब्रेक के बाद
ब्रेक छोटा नहीं होता
इसके दबाव में छोटी हो जाती हैं खबरें
विज्ञापन के दावों की तरह
प्रस्तोता भी झूठा निकला

Comments

कथा कहानी पढ़ने पहुंचा था, किव महोदय गले पड़ गए। वैसे सामियक और सटीक है।
Udan Tashtari said…
बहुत सटीक रचना है, यथार्थ.
seema gupta said…
"ya very right and true, it happens always, "

Regards
Unknown said…
khoob .............
aaj to patarkarita hi bemani lagti hai.
dabaw wahan bhi hain. dabaw yahan bhi hai

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यादें

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कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं टूट रहा-

कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं टूट रहा- -मृत्युंजय कुमार यह इक्कीसवीं सदी हैइसलिए बदल गई हैं परिभाषाएंबदल गए हैं अर्थसत्ता के भीऔर संस्कार के भी।वे मोदी हैं इसलिएहत्या पर गर्व करते हैंजो उन्हें पराजित करना चाहते हैंवे भी कम नहींबार बार कुरेदते हैं उन जख्मों कोजिन्हें भर जाना चाहिए थाकाफी पहले ही।वे आधुनिक हैं क्योंकिशादी से पहले संभोग करते हैंतोड़ते हैं कुछ वर्जनाएंऔर मर्यादा की पतली डोरी भीक्योंकि कुछ तोड़ना ही हैउनकी मार्डनिटी का प्रतीकचाहे टूटती हों उन्हें अब तकछाया देनेवाली पेड़ों कीउम्मीद भरी शाखाएंशायद नहीं समझ पा रहे हैंवर्जना और मर्यादा का फर्क।