Skip to main content

मजबूर बाप


कोट-टाई पहने
मंुह पर महंगी क्रीम पोते
महंगे शैंपू से धुले बाल
करीने से गर्दन और कंधों पर बिखेर कर
लैपटाप की स्क्रीन पर
उभरे शब्दों को देखकर
अपने खिले चेहरे पर
उदासी का भाव लाते हुए
न्यूज चैनल की महिला एंकर ने पढ़ी यह खबर
गरीबी से बेहाल
एक बाप ने
महज पांच सौ रुपये में
बेच दिया अपना बेटा
स्क्रीन पर उभरती है
गरीब बाप की तस्वीर
उसका घर
उसका गांव
दर्शक कुछ सोच पाता
जान पाता
स्क्रीन पर हाजिर हो जाती है मुस्कराती हुई एंकर
कहती है
खबरों का सिलसिला जारी है
लेकिन एक एक छोटे से ब्रेक के बाद
अब स्क्रीन पर एक दस साल का बच्चा
खेल रहा है क्रिकेट
मारता है शॉट
टूटती है एक आलीशान घर की खिड़की
खुश होता है घर का मालिक
एक अन्य घर मालिक कहता है लड़क से
मेरी खिड़की नहीं ताे़डेगा सचिन
सचिन मारता है शॉट
टूटती है खिड़की
वह भी होता है खुश
उनकी खुशी से हौंसला बुलंद होता है सचिन का
वह मारता है शॉट
टूटतीं हैं और खिड़कियां
मकान मालिक कहते हैं
सचिन कल को स्टार बनेगा तो अपना ही नाम होगा
यह किसी बीमा कंपनी का विज्ञापन है
जो कहना चाहती है
दूरदर्शी लोग भविष्य की सोचते हैं
जो अभी करेगा निवेश
कल वही फायदे में रहेगा
अभी निवेश करने के लिए कहां से लाए पैसा
पांच सौ रुपये में
बेटा बेच देने वाला बाप?

Comments

कई दिनों से सूरज की आंच में
तप रही थी धरती
तवे पर रोटी की तरह पक रहे थे प्राणी
बादलों को जरूर इन पर तरस आया होगा
अपनी सेना लेकर आ गए मैदान में
दे दी सूर्य को चुनौती
घबराकर रोने लगा भाष्कर
और मोतियों की तरह
गगन से गिरने लगी बंूदें
khoobsurat laga yaha aanaa

Popular posts from this blog

यादें

मित्र, आपके शहर से गुजर रहा था ट्रेन में बैठा ट्रेन भाग रही थी उससे भी तेज गति से भाग रही थीं मेरी यादें यादें जो ढूह बन गईं थीं भरभरा कर गिर रही थी कितने हसीन थे वो दिन, वो पल जब हम बैठकर घंटों बातें किया करते थे वे दिन और आज का दिन यादों का पहाड़ सीने पर लिए जी रहे हैं फिर रहे हैं इस शहर से उस शहर सच बताना मेरे दोस्त बीते दिनों की यादों में कभी मेरा चेहरा उभरता है? मेरे दिल में तो मचता है हाहाकार और आंखों से टपक पड़ते हैं आंसू सोचता हूं क्या बीते दिन लौटेंगे? काश! लौट पाते बीते दिन! मेरे यार, क्या हमारी यादें जंगल बन जाएंगी? हम क्या इन्हें गुलशन नहीं बना सकते ? (बिछड़े दोस्तों के नाम )

कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं टूट रहा-

कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं टूट रहा- -मृत्युंजय कुमार यह इक्कीसवीं सदी हैइसलिए बदल गई हैं परिभाषाएंबदल गए हैं अर्थसत्ता के भीऔर संस्कार के भी।वे मोदी हैं इसलिएहत्या पर गर्व करते हैंजो उन्हें पराजित करना चाहते हैंवे भी कम नहींबार बार कुरेदते हैं उन जख्मों कोजिन्हें भर जाना चाहिए थाकाफी पहले ही।वे आधुनिक हैं क्योंकिशादी से पहले संभोग करते हैंतोड़ते हैं कुछ वर्जनाएंऔर मर्यादा की पतली डोरी भीक्योंकि कुछ तोड़ना ही हैउनकी मार्डनिटी का प्रतीकचाहे टूटती हों उन्हें अब तकछाया देनेवाली पेड़ों कीउम्मीद भरी शाखाएंशायद नहीं समझ पा रहे हैंवर्जना और मर्यादा का फर्क।

झूठा निकला प्रस्तोता

टीवी स्क्रीन पर प्रस्तोता कहता है मुस्करा कर खबरों का सिलसिला जारी है लेकिन एक छोट से ब्रेक के बाद ब्रेक छोटा नहीं होता इसके दबाव में छोटी हो जाती हैं खबरें विज्ञापन के दावों की तरह प्रस्तोता भी झूठा निकला