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कहानी : वे पल #विपरीत हालात में सुकून खोजने का मनोविज्ञान #hindistory

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यादें

मित्र, आपके शहर से गुजर रहा था ट्रेन में बैठा ट्रेन भाग रही थी उससे भी तेज गति से भाग रही थीं मेरी यादें यादें जो ढूह बन गईं थीं भरभरा कर गिर रही थी कितने हसीन थे वो दिन, वो पल जब हम बैठकर घंटों बातें किया करते थे वे दिन और आज का दिन यादों का पहाड़ सीने पर लिए जी रहे हैं फिर रहे हैं इस शहर से उस शहर सच बताना मेरे दोस्त बीते दिनों की यादों में कभी मेरा चेहरा उभरता है? मेरे दिल में तो मचता है हाहाकार और आंखों से टपक पड़ते हैं आंसू सोचता हूं क्या बीते दिन लौटेंगे? काश! लौट पाते बीते दिन! मेरे यार, क्या हमारी यादें जंगल बन जाएंगी? हम क्या इन्हें गुलशन नहीं बना सकते ? (बिछड़े दोस्तों के नाम )

कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं टूट रहा-

कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं टूट रहा- -मृत्युंजय कुमार यह इक्कीसवीं सदी हैइसलिए बदल गई हैं परिभाषाएंबदल गए हैं अर्थसत्ता के भीऔर संस्कार के भी।वे मोदी हैं इसलिएहत्या पर गर्व करते हैंजो उन्हें पराजित करना चाहते हैंवे भी कम नहींबार बार कुरेदते हैं उन जख्मों कोजिन्हें भर जाना चाहिए थाकाफी पहले ही।वे आधुनिक हैं क्योंकिशादी से पहले संभोग करते हैंतोड़ते हैं कुछ वर्जनाएंऔर मर्यादा की पतली डोरी भीक्योंकि कुछ तोड़ना ही हैउनकी मार्डनिटी का प्रतीकचाहे टूटती हों उन्हें अब तकछाया देनेवाली पेड़ों कीउम्मीद भरी शाखाएंशायद नहीं समझ पा रहे हैंवर्जना और मर्यादा का फर्क।

कहानी कोढ़ी का नल

भाग दो --- बहुत पहले यहां जंगल हुआ करता था। जिसमें ढाक के पेड़ बहुतायत में थे। इनके अलावा बबूल और कटाई की झांडियां थीं। जहां इनका वास नहीं था वह जमीन ऊसर थी। उसमें रेह पैदा होती थी। जिसमें घास भी नहीं उगती। इस बौने जंगल में जहां सांप-बिच्छू रहते थे, वहीं जंगली सूअर और गीदड़ जैसे प्राणी भी रहते थे। इन्हीं के बीच दो घर मनुष्यों के थे, जिन्हें दूसरे गांव के लोग वनप्राणी कहते थे। जब जमींदारी का जमाना था तो इनके पूर्वज कहीं से आकर यहां बस गए थे। पहले यह एक ही घर थे, लेकिन खानदान की वृद्धि हुई तो दो हो गए। इन्हें वनप्राणी इसलिए कहा जाता था, योंकि इन्होंने यहां बसने के बाद और किसी इनसान को बसने ही नहीं दिया। जिसने भी कोशिश की उसे मुंह की खानी पड़ी। हालांकि जंगली जानवरों से मुकाबले के लिए इन्हें समाज की जरूरत थी, लेकिन वन संपदा का बंटवारा न हो जाए इसलिए यह लोग इस जगह को आबाद नहीं होने दे रहे थे। समय के साथ यह वनप्राणी भी बदले। इन्हें भी समाज की जरूरत महसूस हुई। इसके बाद इन्होंने यहां पर लोगों को बसने की इजाजत दी। यहां पर बसने वाले दूसरे गांवों के फालतू लोग थे। फालतू इसलिए कि इन्हें अपने गांव...