Skip to main content

शख्सियत : साहित्यकार शानी, काला जल उपन्यास लिखकर अमर हो गए..

Comments

Popular posts from this blog

यादें

मित्र, आपके शहर से गुजर रहा था ट्रेन में बैठा ट्रेन भाग रही थी उससे भी तेज गति से भाग रही थीं मेरी यादें यादें जो ढूह बन गईं थीं भरभरा कर गिर रही थी कितने हसीन थे वो दिन, वो पल जब हम बैठकर घंटों बातें किया करते थे वे दिन और आज का दिन यादों का पहाड़ सीने पर लिए जी रहे हैं फिर रहे हैं इस शहर से उस शहर सच बताना मेरे दोस्त बीते दिनों की यादों में कभी मेरा चेहरा उभरता है? मेरे दिल में तो मचता है हाहाकार और आंखों से टपक पड़ते हैं आंसू सोचता हूं क्या बीते दिन लौटेंगे? काश! लौट पाते बीते दिन! मेरे यार, क्या हमारी यादें जंगल बन जाएंगी? हम क्या इन्हें गुलशन नहीं बना सकते ? (बिछड़े दोस्तों के नाम )

संतान मोह और मानव सभ्यता

कविता ...... सन्तान मोह और मानव सभ्यता ....... क्या दो जून की रोटी के लिए जिंदगी पर जिल्लतें झेलता है इंसान? पेट की रोटी एक वजह हो सकती है यकीनन पूरी वजह नहीं हो सकती दरअसल, इंसान के तमाम सपनों में सबसे बड़ा ख्वाब होता है परिवार जिसमें माता-पिता नहीं होते शामिल केवल और केवल बच्चे होते हैं शामिल इस तरह हर युवा संतान की परिधि से बाहर हो जाते हैं माता-पिता जरूरी हो जाते हैं अपने बच्चे जब उनके बच्चों के होते हैं बच्चे तब वह भी चुपके से कर दिए जाते हैं खारिज फिर उन्हें भान होता है अपनी निरर्थकता का लेकिन तब तक हो गई होती है देरी मानव सभ्यता के विकास की कहानी संतान मोह की कारूण कथा है जहां हाशिये पर रहना माता-पिता की नियति है संतान मोह से जिस दिन उबर जाएगा इंसान उसी दिन रुक जाएगी मानव सभ्यता की गति फिर न परिवार होगा न ही घर न समाज होगा न कोई देश छल-प्रपंच ईर्षा-द्वेष भी खत्म बाजार और सरकार भी खत्म जिंदगी की तमाम जिल्लतों से निजात पा जाएगा इंसान फिर शायद न लिखी जाए कविता शायद खुशी के गीत लिखे जाएं... #omprakashtiwari

मौसम की पहली बरसात

कई दिनों से सूरज की आंच में तप रही थी धरती तवे पर रोटी की तरह पक रहे थे प्राणी बादलों को जरूर इन पर तरस आया होगा अपनी सेना लेकर आ गए मैदान में दे दी सूर्य को चुनौती घबराकर रोने लगा भाष्कर और मोतियों की तरह गगन से गिरने लगी बंूदें गर्मी से विकल मानव निकल आया घरों से रिमझिम बरसात में चुराने लगा नमक पसीने के रूप में जिसे छीन लिया था सूरज ने