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कविता : बरसो मेघ खूब बरसो

हे मेघ
बरसो खूब बरसो
इतना कि दरिया उफ़न जाय
ताकि साफ हो जाय
उसके तन-मन की गंदगी
तालाबों में भर जाय पानी
ताकि भूमिगत जल का बढ़ जाये स्तर
पक्षियों को मिले पानी
भटकना न पड़े जानवरों को
पानी की तलाश में
किसान की फसलें भी लहलहा उठें
उपवन भी हो जाय हराभरा
मगर यह भी ध्यान रखना
गिर न जाय किसी गरीब का घर
बह न जाय किसी की झोपड़ी
एक गुजारिश यह भी है मेघ
उस जगह थोड़ा ज्यादा बरसना
जहाँ से निकल रही हो गंदगी
झूठ-फरेब-नफरत की सरिता
इनके उद्गम पर ही खूब बरसना
ताकि इन्हें मिले महासागर में जलसमाधि
उस अंहकारी ज्वालामुखी पर
झमाझम बरसना बादल
ताकि वह तर हो जाय
और फिजा में बहें
सीली-सीली हवाएं
उस कारखाने पर भी बरसना
जहाँ बन रहा है तानाशाही बम
उसे तुम ही नष्ट कर सकते हो
एक बार फिर बन जाओ सुनामी
बचा लो धरती को बंजर होने से
हिरोशिमा-नागासाकी होने से
उस गैस भंडार को बहा ले जाओ
जिससे घटित होता है भोपाल कांड
कुदरत को नहीं चाहिये
परमाणु ऊर्जा वाला विकास
कुदरत को चाहिए बादल
जो उसे बना दे मेघालय
उसकी गोद को कर दे हराभरा
नदियों-झरनों से भर दे आँचल
@ ओमप्रकाश तिवारी

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