<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486</id><updated>2012-01-15T00:46:07.094+05:30</updated><category term='साहित्य'/><category term='कविता'/><category term='गरीबी'/><category term='कहानी'/><category term='मौसम  बरसात'/><category term='रिपॊरताज   साहित़य'/><category term='kahani'/><category term='कथा-कहानी'/><category term='समारोह'/><title type='text'>कथा-कहानी</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 102, 255);"&gt;ओमप्रकाश तिवारी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;अम्मा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;----&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;- अरे नालायकों इसे क्यों उठा लाए? घायल बिल्ली के बच्चे को देखते ही अम्मा चीख पड़ीं।&lt;br /&gt;- अम्मा, यह रास्ते में पड़ा था। बच्चे बोले।&lt;br /&gt;- जो भी रास्ते में पड़ा मिलेगा, तुम सब उसे उठा लाओगे? अम्मा गुस्से में बोलीं।&lt;br /&gt;- इसे चोट लगी है। कौवे ने चोच मार-मार कर घायल कर दिया है। यह भाग नहीं सकता। बेचारा मर जाएगा। बच्चों ने अपने बचाव में तर्क दिया।&lt;br /&gt;- तो मैं क्या करूं?&lt;br /&gt;-अम्मा यह मर जाएगा। अम्मा के नाती ने वकालत की। उसकी दिली इच्छा थी कि अम्मा मान जाएं। अब तक अम्मा भी उसकेपास आ गई थीं। उन्होंने बिल्ली के बच्चे को देखा। घाव गहरा था और खून बह रहा था। अम्मा का दिल पसीज गया। उन्होंने पास खड़ी नातीन से कहा - यहां खड़ी-खड़ी मुंह क्यों देख रही है, जरा सरसों का तेल और हल्दी गरम करके ला।&lt;br /&gt;अम्मा ने बिल्ली के बच्चे को अपने हाथ में ले लिया। जो साड़ी पहनी हुईं थी उसी से बिल्ली के बच्चे का घाव को पोछने लगीं।&lt;br /&gt;-कहां मिला यह? अम्मा ने बच्चों से पूछा।&lt;br /&gt;-जंगल के किनारे, खेत को जाने वाले रास्ते में पड़ा था। एक कौवा इसे चोच मार रहा था।&lt;br /&gt;- तुम लोगों ने मारा नहीं कौवे को? अम्मा ने नाती से कहा।&lt;br /&gt;- कैसे मारता, हमें देखकर तो वह उड़ गया।&lt;br /&gt;- ढेला मारना था हरामी कोे। अम्मा ने गुस्से में कहा।&lt;br /&gt;इस बीच एक बच्चा कटोरी में पानी लेकर आया। अम्मा बिल्ली केबच्चे को पानी पिलाने लगीं। साथ ही कहती भी रहीं कि इसे उठाकर तो लाए हो, लेकिन क्या पी कर जिंदा रहेगा यह? अपने यहां दूध तो है नहीं।&lt;br /&gt;बच्चे जब बिल्ली केबच्चे को उठा कर लाए थे तो अम्मा किसी जरूरी काम से खेत जा रही थीं, लेकिन उसका घाव देखकर वह सब कुछ भूल गईं। उन्होंने बच्चे के घाव पर हल्दी तेल लगाया। उसे पानी पिलाया और जब उन्हें लगा कि वह नहीं मरेगा, तभी खेत को गईं। जाते समय बच्चों को हिदायत देती र्गइं कि इसका ख्याल रखना। कौआ यहां भी आ सकता है। कुत्ता भी इसे मार सकता है। इसलिए इसे किसी चीज से ढक देना। इसे खोजने इसकी मां भी आ सकती है। इसलिए कोई बिल्ली आए तो आने देना।&lt;br /&gt;अम्मा खेत में चली गईं। बच्चे बिल्ली के बच्चे की सेवा में लग गए। कोई उसे पानी पिलाता तो कोई उसकी पीठ सहलाता। कोई घाव में हल्दी-तेल लगाता।&lt;br /&gt;अम्मा जब खेत से लौटीं तो बच्चे उन्हें बताने लगे कि अम्मां बिल्ली का बच्चा अब चलने लगा है। वह जी जाएगा। अम्मा उसके लिए दूध नहीं ले सकती क्या? अम्मा पहले तो चुप रहीं, लेकिन दूध लेने की बात पर उन्हें गुस्सा आ गया।&lt;br /&gt;- रवि को पिलाने के  लिए दूध ले नहीं पा रहीं हूं। बिल्ली के बच्चे के लिए दूध खरीदूंगी।  रवि अम्मा का एक साल का नाती है। धनाभाव के कारण वे उसके लिए दूध की व्यवस्था नहीं कर पा रहीं थीं। उनकी एक भैंस गर्भवती है। लेकिन फिलहाल वे नाती के लिए दूध की व्यवस्था न होने से व्यथित हैं।&lt;br /&gt;बिल्ली के बच्चे को देखकर अम्मा को एक घटना याद आ गई।&lt;br /&gt;उस दिन अम्मा का छोटा बेटा एक घायल तोते केबच्चे को उठा लाया था। अम्मा ने उसकी सेवा करके उसे स्वस्थ कर दिया। बच्चा होने के कारण वह उड़ने के लायक नहीं था इसलिए अम्मा ने उसे पाल लिया। अम्मा ने तोते को पाल तो लिया, लेकिन उनके पास उसे रखने की समस्या थी। खुला छोड़े दें तो कुत्ते-बिल्ली खा जाएं। बाहर उड़ने के लिए छोड़ दें तो कौए या दूसरे पक्षी मार डालें। चोट ठीक होने तक उन्होंने उसे झौआ-खांची के नीचे ढंककर रखा, लेकिन इस तरह उसे अधिक दिन तक नहीं रखा जा सकता था। वैसे भी आदमियों केबीच रहने के कारण तोते की आदत भी आदमियों में रहने की हो गई थी। वह मिठ्ठू बोलने लगा था।&lt;br /&gt;अम्मा ही नहीं तोते को रखने के लिए पिंजरे की चिंता उनके बेटे को भी थी। अम्मा और उनका छोटो बेटा किसी न किसी बहाने से पिंजरा खरीदने केलिए पैसा बचा रहे थे।&lt;br /&gt;जिस दिन बेटा पिेंजरा लेकर आया अम्मा बहुत खुश हुईं। तोते के बच्चे को पिंजरे में बंद करकेपिंजरे को घर के दरवाजे के सामने टांग दिया। पिंजरा पाकर मिठ्ठू भी बहुत खुश हुआ। अब उसके पास पिंजरे में हमेशा कुछ-न-कुछ खाने-पीने के लिए जरूर रहता। दरवाजे से बाहर कोई निकलता तो उससे बातें जरूर करता। वह घर का अहम सदस्य बन गया। दिन में उसे पिंजरे से बाहर छोड़ दिया जाता तो वह इधर-उधर घूमकर फिर पिंजरे में आ जाता। इससे अम्मा को यकीन हो गया था कि वह कहीं नहीं जाएगा।&lt;br /&gt;उस दिन शाम का धुंधलका होते ही मिठ्ठू तेज-तेज आवाज में बोलने लगा। अम्मा उसके पास गईं और बड़ी देर तक उससे बातें करतीं रहीं। अम्मा को अपने पास देख मिठ्ठू शांत हो गया, लेकिन अम्मा केवहां से हटते ही वह फिर जोर-जोर से बोलने लगा। अम्मा फिर उसके पास आईं तो वह चुप हो गया। अम्मा को लगा कि मिठ्ठू उनके साथ खेल खेल कर रहा है। यह सोचकर वह मुस्कराते हुए वहां से चली गईं।&lt;br /&gt;लेकिन मिठ्ठू तो घबराया हुआ था। उसके घबराने का कारण था दरवाजे के पास चारपाई केनीचे बैठा बिल्ला। जिसकी आंखें हल्के अंधेरे में चमक रही थीं, जिसे अम्मा नहीं देख पा रहीं थीं और मिठ्ठू देख रहा था। मिठ्ठू को यह आशंका सता रही थी कि बिल्ला कहीं आज भी उस पर हमला न कर दे। इसलिए वह अपने पास अम्मा की उपस्थिति चाह रहा था पर इस बार अम्मा ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। उन्हें कोई जरूरी काम याद आ गया था।&lt;br /&gt;अम्मा केहटते ही चारपाई के नीचे छिपे बिल्ले ने पिंजरे पर हमला बोल दिया। इससे पिंजरे का दरवाजा खुल गया। उड़ने में अनाड़ी मिठ्ठू जान बचाने के लिए पिंजरे से बाहर निकल आया। उसका बाहर निकलना था कि बिल्ले ने उसकी गर्दन अपने मुंह में दाब ली। मिठ्ठू चीं-चीं करता रहा। जब तक अम्मा और घरवाले दौड़ते बिल्ला घर से निकल पास के जंगल में गायब हो गया। पीछे रह गया घड़ी के पेंडृलम की तरह झूलता तोते का पिंजरा....।&lt;br /&gt;अम्मा का छोटा बेटा लठ्ठ लेकर बिल्ले के पीछे भागा, पर बिल्ला उसके हाथ नहीं आया। थक हार कर बेटा वापस आ गया।&lt;br /&gt;उस दिन अम्मा के घर में मातम छा गया। लगा जैसे परिवार का कोई सदस्य मर गया हो। भोजन बना, अम्मा को छोड़कर सभी ने भारी मन से भोजन किया। अम्मा खाने बैठीं तो खाया नहीं गया और रोने लगीं। वह मुंह जूठा करकेचारपाई पर लेट र्गइं और सारी रात उन्हें नींद नहीं आई। जब भी आंख लगती मिठ्ठू उनके सामने आ जाता।&lt;br /&gt;इस घटना के बाद से अम्मा और उनके छोटे बेटे के दिल में बिल्ली जाति के प्रति नफरत पैदा हो गई। इसके बाद तो उनकी मौजूदगी में कोई बिल्ला या बिल्ली घर में घुसने ही नहीं पाता।&lt;br /&gt;आज एक नन्हें मासूम घायल बिल्ली के बच्चे को देखते ही अम्मा को मिठ्ठू की याद आ गई। इसी की तरह वह भी आया था।&lt;br /&gt;अम्मा ने फैसला लिया कि जब तक बिल्ली की बच्चा चलने-फिरने और अपनी रक्षा करने में समर्थ नहीं हो जाता, तब तक वह इसी घर में रहेगा। धीरे-धीरे बिल्ली के बच्चे का घाव भर गया और वह चलने-फिरने लगा। अम्मा ने उसके लिए दूध की भी व्यवस्था कर दी।&lt;br /&gt;रात को उसे या तो ढक दिया जाता या कोई आदमी उसे अपने पास लेकर सोता। दिन में उसे खांची या झौआ के नीचे ढक दिया जाता ताकि कुत्ता या बिल्ला उस पर हमला न कर सकें। अम्मा को उम्मीद थी कि उसकी मां एक-न-एक दिन उसे खोजते हुए जरूर आएगी। इसीलिए उन्होंने बच्चों को यह हिदायत दे रखी थी कि बिल्ली आए तो बच्चे के पास जाने देना ताकि वह अपने बच्चे को अपने साथ ले जा सके।&lt;br /&gt;एक दिन शा को अम्मा खेत र्से आइं और आंगन में चारपाई डालकर बैठ र्गइं। यहीं पर उनकी बड़ी बेटी भी बैठी थी, जो आज ही ससुराल से आई थी। अम्मा उसी से बातें कर रही थीं। तभी एक बिल्ली घर में आई। उसे देखते ही अम्मा ने बच्चों को अगाह किया कि देखो बिल्ली आई है, इसे बच्चे के पास जाने देना। यह भी देख लेना कि कहीं यह बिल्ला न हो। बिल्ला हो तो उसे बच्चे के पास जाने मत देना, नहीं तो वह उसे मार डालेगा। इस पर उनकी बेटी ने कहा कि लगती तो बिल्ली ही है। यह लोग अभी चर्चा कर ही रहे थे कि वह उस कमरे में घुस गई, जहां बिल्ली का बच्चा रखा था। अम्मा ने सोचा कि चूंकि वह उस घर में घुसी है इसलिए बिल्ली ही होगी। उन्होंने बच्चों से बिल्ली के बच्चे को खोल देने को कहा। बच्चों ने उनकी आज्ञा का पालन किया। बिल्ली कमरे में घुसने के बाद अंधेरे में छिप गई थी। जब बच्चों ने बिल्ली के बच्चे को खोला तो वह आंगन की तरफ बढ़ने लगा। अभी वह अम्मा की चारपाई तक आया ही था कि बिल्ली के वेश में घुसा जंगली बिल्ले ने उस पर हमला बोल दिया और बच्चे की गर्दन मुंह में दबा कर भाग खड़ा हुआ। बच्चा म्याऊं-म्याऊं करता रह गया।&lt;br /&gt;यह देखकर सभी सकते में आ गए। तत्काल किसी को कुछ नहीं सूझा। जब तक बच्चे बिल्ले का पीछा करते वह घर से निकल कर पास के जंगल में गायब हो चुका था।&lt;br /&gt;निराश अम्मा चारपाई पर धड़ाम से गिर पड़ीं। लेटे-लेटे ही बोलीं कि इसीलिए कह रही थी कि इसे मत पालो। मर जाने दो। आखिर मर ही गया न। इतने दिन तक परेशान होते रहे और वह मुआ एक ही झटके में काम तमाम कर गया। उन्हें बिल्ली के बच्चे के साथ मिठ्ठू की भी याद आ गई और उस रात उन्होंने फिर खाना नहीं खाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपर्क : 61, शक्तिविहार, फेस-1, माजरा, देहरादून।&lt;br /&gt;मोबाइल : ९७५९१८९५५९   9536901397&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-8623664157277064763?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/8623664157277064763/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=8623664157277064763' title='0 Comments'/><link rel='edit' 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दिवस के रूप मे मनेगी योगेश की जयंती</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बाढ़ । मगही कवि स्व. योगेश्वर सिंह योगेश की पुण्यतिथि समारोह के मौके पर बीती रात नीरपुर गांव मे अखिल भारतीय मगही-कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन की अध्यक्षता साहित्यकार (magahi akadami ke adhyaksh) उदय शंकर ने की जबकि संचालन मगही के चर्चित कवि रामाश्रय झा ने किया। सम्मेलन मे बिहार व यूपी की विभिन्न जगहो से आये साहित्य- काव्य के कई दिग्गज पुरोधा शामिल हुए। कवियो की व्यंगात्मक व समाजिक कुरितियो पर प्रहार करती काव्य रस की सुर सरिता मे श्रोतागण देर रात तक झूमते रहे। हिसुआ से आये चर्चित कवि दीनबंधु, कवि कारू गोप, जयराम जी, व गोपालगंज के पंकज जी समेत अन्य साहित्यकारो ने सामाजिक अव्यवस्था पर चोट करती कविता पाठकर लोगो को मंत्र मुग्ध कर दिया। इस मौके पर कवि योगेश फाउंडेशन के द्वारा मगही मंडल के अध्यक्ष व वरिष्ठ साहित्यकार डा. रामनंदन जी को 2010 का योगेश शिखर सम्मान प्रदान किया गया। एक साथ जुटे मगही साहित्य के दिग्गजो ने इस मौके पर घोषणा किया कि कवि स्व. योगेश की जयंती 23 अक्टूबर को मगही दिवस के रूप मे मनाया जायेगा। समापन समारोह को संबोधित करते हुए मृत्युंजय कुमार ने कहा कि कवि योगेश जी की 1950 के दशक की दुर्लभ पांडुलिपियां मगही मंडल व बिहार सरकार को de देंगे ताकि मगही साहित्य का प्रचार प्रसार व्यापक रूप से हो सके।&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-6371483356105874379?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/6371483356105874379/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=6371483356105874379' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/6371483356105874379'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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href="http://1.bp.blogspot.com/_8Y0oEqUypS4/ScP5MVEiruI/AAAAAAAAAHs/LJxAWJPGQKM/s1600-h/Oil_Painting_Color_Melody.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 199px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_8Y0oEqUypS4/ScP5MVEiruI/AAAAAAAAAHs/LJxAWJPGQKM/s200/Oil_Painting_Color_Melody.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5315365975437258466" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;मित्र,&lt;br /&gt;आपके शहर से गुजर रहा था&lt;br /&gt;ट्रेन में बैठा&lt;br /&gt;ट्रेन भाग रही थी&lt;br /&gt;उससे भी तेज गति से भाग रही थीं मेरी यादें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यादें जो ढूह बन गईं थीं&lt;br /&gt;भरभरा कर गिर रही थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितने हसीन थे वो दिन, वो पल&lt;br /&gt;जब हम बैठकर&lt;br /&gt;घंटों बातें किया करते थे&lt;br /&gt;वे दिन और आज का दिन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यादों का पहाड़&lt;br /&gt;सीने पर लिए जी रहे हैं&lt;br /&gt;फिर रहे हैं&lt;br /&gt;इस शहर से उस शहर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच बताना मेरे दोस्त&lt;br /&gt;बीते दिनों की यादों में&lt;br /&gt;कभी मेरा चेहरा उभरता है?&lt;br /&gt;मेरे दिल में तो मचता है हाहाकार&lt;br /&gt;और आंखों से टपक पड़ते हैं आंसू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचता हूं&lt;br /&gt;क्या बीते दिन लौटेंगे?&lt;br /&gt;काश! लौट पाते बीते दिन!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे यार, क्या हमारी यादें जंगल बन जाएंगी?&lt;br /&gt;हम क्या इन्हें गुलशन नहीं बना सकते ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;(बिछड़े दोस्तों के नाम )&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-241591385599431364?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/241591385599431364/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=241591385599431364' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/241591385599431364'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/241591385599431364'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='यादें'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_8Y0oEqUypS4/ScP5MVEiruI/AAAAAAAAAHs/LJxAWJPGQKM/s72-c/Oil_Painting_Color_Melody.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-2664624783516529593</id><published>2008-10-07T18:54:00.003+05:30</published><updated>2008-10-07T19:04:30.994+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>कहानी  -  कोढ़ी का नल</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:130%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;अन्तिम&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; भाग &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;--&lt;br /&gt;उसने नल की तरफ देखा। अब वहां चिड़ियां नहीं थीं। उसने इधर-उधर निगाह &lt;span&gt;दौ&lt;/span&gt;डाई। चिड़ियां पास के नीम के पेड पर फुदक-फुदक कर चहक रही थीं। नल पे़ड की छाया में निर्विकार भाव से खड़ा था। उसका हत्था नीचे की तरफ लटका हुआ था...।&lt;br /&gt;रामनाथ नल पर गया। अपनी चादर को भिगोया और वापस आकर चारपाई पर गीली चादर को &lt;span&gt;ओ&lt;/span&gt;ढकर लेट गया। गीले कपड़े से उसे गर्मी से &lt;span&gt;थो&lt;/span&gt;डी राहत महसूस हुई। हल्की-हल्की हवा भी चलने लगी थी और सूरज भी पश्चिम दिशा की तरफ बढ़ने लगा था।&lt;br /&gt;गर्मी से &lt;span&gt;थोडी&lt;/span&gt; राहत मिली तो रामनाथ नींद की आगोश में समा गया।&lt;br /&gt;दो पथिकों के वार्तालाप ने उसकी नींद को &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt;डा। पथिक कहीं से आ रहे थे। उन्हें प्यास लगी थी। नल को देखा तो पानी पीने लगे।&lt;br /&gt;- यार किसी पुण्यात्मा ने यह नल लगवाया होगा। राहगीरों को पानी पीने से तृप्ति मिली तो उनके उद्गार बाहर आ गए।&lt;br /&gt;- सो तो है ही भाई। आज के जमाने में तो लोग नल घर के अंदर लगवाते हैं। बाहर लगवा भी दिए तो हत्था निकाल कर रख देते हैं। दूसरे राहगीर ने पहले वाले की बात को आगे बढ़ाया और आगे बढ़ लिए।&lt;br /&gt;रामनाथ के कानों में पुण्यात्मा शब्द &lt;span&gt;गूंज&lt;/span&gt;  रहा था। वह सोचने लगा कि मैं भी पुण्यात्मा &lt;span&gt;हूँ&lt;/span&gt; । तो मैं पापी नहीं &lt;span&gt;हूँ&lt;/span&gt; । वह भावुक होने लगा। लेकिन तुरंत उसके दिमाग में यह विचार आया कि  या मुझे पुण्यात्मा कहने वाले लोग यदि यह जानते कि यह नल मेरा है यानी एक &lt;span&gt;को&lt;/span&gt;ढी का तो  या तब भी यह लोग पुण्यात्मा कहते? यही नहीं तब शायद यह लोग इस नल का पानी ही न पीते? रामनाथ इन्हीं विचारों में उलझा था कि उसे नल केपास से बाल्टी रखने की आवाज आई। उसने नल की तरफ देखा तो वहां पर अपने पड़ोसी की लड़की को बाल्टी लिए खड़ी पाया। रामनाथ को आश्चर्य हुआ। वह उठकर बैठ गया। सोचने लगा कि यह बच्ची मेरे नल पर पानी भरने आई है। ऐसी  या बात हो गई।  या इसके घरवालों ने भेजा है? लगता है कि गलती से आ गई है। शायद इसे अपने पिता की भावनाएं नहीं मालूम हैं। इसके पिता तो मेरा मुंह भी नहीं देखना चाहते। यह मेरे नल से पानी भरेगी?&lt;br /&gt;रामनाथ चिंतामग्न था और लड़की दो बाल्टी पानी भर कर चली गई। सूरज ढल गया था। गर्मी कम हो गई थी। मंद-मंद हवा चलने लगी थी। रामनाथ को फिर नींद आ गई। इस बार उसकी आंख खुली तो देखा नल पर भीड़ लगी है। लाइन में बाल्टियां रखी हुई हैं। &lt;span&gt;पंक्ति&lt;/span&gt;बद्ध लोग अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उसी लाइन में रामनाथ की घरवाली भी खड़ी है...। रामनाथ को आश्चर्य हुआ। अपनी ही नल पर पानी भरने के लिए लाइन में लगना पड़े...। उसे गुस्सा आ गया। अपनी चीज का उपयोग करने के लिए लाइन में खड़ा होना पड़े वह भी उन लोगों के बीच जो उससे नफरत करते हैं...। अभी सब को भगा देता &lt;span&gt;हूँ&lt;/span&gt; । गुस्से के मारे वह पसीने से भीग गया...।&lt;br /&gt;- विमली की अम्मा। वह गुस्से में चीख पड़ा। उसकी आवाज सुनकर नल पर खड़े सभी लोग सहम गए...।&lt;br /&gt;रामनाथ की आवाज सुनकर उसकी घरवाली उसके पास आ गई तो वह एक बर फिर चीखा।&lt;br /&gt;- यह सब  या है?&lt;br /&gt;नल पर खड़े लोग फिर सहम गए...। कई लोग तो अपनी बाल्टी उठाने लगे...।&lt;br /&gt;- सरकारी नल खराब हो गया है। इसलिए...।&lt;br /&gt;- हमने ठेका ले रखा है  या? रामनाथ ने अपनी घरवाली की बात को बीच में ही काट दिया।&lt;br /&gt;- पागल हो गए हो  या?&lt;br /&gt;- हां, मैं पागल हो गया &lt;span&gt;हूँ&lt;/span&gt; । यह कहकर रामनाथ उठा और नल की तरफ चल पड़ा।&lt;br /&gt;- देखो, किसी को कुछ मत कहना। रामनाथ को नल की तरफ जाते देख उसकी घरवाली ने उसे समझाने के लहजे में कहा। जवाब में रामनाथ कुछ नहीं बोला। उसे नल पर आता देख सभी लोग अपना-अपना बर्तन उठाकर चलने का उपक्रम करने लगे तो बोल पड़ा।&lt;br /&gt;- आप लोग पानी भर कर ही जाएं। बस मुझे जरा यह गमछा गीला करना है और दो घूंट पानी पीना है, यदि आप लोग इजाजत दें तो....।&lt;br /&gt;कोई कुछ नहीं बोला। जो जहां था खड़ा रहा। रामनाथ पानी पीने लगा तो एक ने नल चला दिया। रामनाथ ने गमछा भिगोया और घर की तरफ चल पड़ा।&lt;br /&gt;लौटते हुए वह खुश था...। सूर्य की गर्मी से तप रही धरती पर वह नंगे पैर चल रहा था, लेकिन उसे तपन का एहसास भी नहीं हो रहा था...।     -&lt;span&gt;समाप्त&lt;/span&gt;-&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;पहले&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;हिस्से&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;लिए&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;यहाँ&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;क्लिक&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;करें&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;- &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://katha-kahani.blogspot.com/2008/10/blog-post.html"&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;कहानी  -  कोढ़ी का नल - &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;भाग&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://katha-kahani.blogspot.com/2008/10/blog-post_04.html"&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;कहानी  -  कोढ़ी का नल - &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;भाग&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;दो&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://katha-kahani.blogspot.com/2008/10/blog-post_06.html"&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;कहानी  -  कोढ़ी का नल - &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;भाग&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;तीन&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-2664624783516529593?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/2664624783516529593/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=2664624783516529593' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/2664624783516529593'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/2664624783516529593'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2008/10/blog-post_07.html' title='कहानी  -  कोढ़ी का नल'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-3724780463158046110</id><published>2008-10-06T17:32:00.003+05:30</published><updated>2008-10-06T17:41:51.628+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>कहानी     कोढ़ी  का नल</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:130%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भाग तीन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- क्या  सोच रहे हो? कितनी बार कहा है कि नल पर मत जाया करो। लेकिन मेरी सुनते ही नहीं। रामनाथ की घरवाली ने पानी से भरी बाल्टी जमीन पर रखते हुए कहा।&lt;br /&gt;- क्यों न जाऊं? नल  या उनके बाप का है?  या मैं आदमी नहीं हूँ ? रामनाथ अभी तक जिस गुस्से को पानी की तरह पी रहे थे उसे पत्नी पर उलच दिया।&lt;br /&gt;- कहावत है कि शूद्र की गगरी दाना, शूद्र पड़ा उताना। आजकल कमाई हो रही है तो इनकी आंखों पर चर्बी चढ़ गई है।&lt;br /&gt;- तब मैं कोढ़ी  नहीं था जब यह लोग यहां आकर बसे थे और हमसे ही मांग कर पानी पीने थे? रामनाथ ने पत्नी से सवाल किया। हालांकि यह प्रश्न वह उन लोगों से पूछना चाहते थे।&lt;br /&gt;- आदमी का मतलब निकल जाता है तो उसकी चाल ऐसे ही बदल जाती है।&lt;br /&gt;- कोई बात नहीं। ईश्वर ने चाहा तो कभी मेरा भी व त आएगा। तू एक काम कर, मेरा गमछा भिगा दे। मैं बाजार होकर आता हूँ ।&lt;br /&gt;- बाजार किसलिए?&lt;br /&gt;- दवा लेनी है और वैसे ही चिक (मांस बेचने वाला कसाई) से पैसा लेकर नल (हैंडपंप) ले आता हूँ । अब नहीं दिखाना इनको अपना मुंह ।&lt;br /&gt;- नल तो बहुत महंगी आएगी। इतने पैसे?&lt;br /&gt;- हां, तीन बकरी बेचनी पड़ेगी।&lt;br /&gt;- फिर बचेंगी  क्या ?&lt;br /&gt;- जो बचेंगी बहुत हैं। अब मुझसे सहा नहीं जाता।&lt;br /&gt;-  ठीक है, लेकिन जल्दी आना। न हो विमली को साथ लेते जाओ।&lt;br /&gt;- पैरों की अभी उंगलियां ही कटी हैं। इतना अपंग भी नहीं हूँ  पगली।&lt;br /&gt;रामनाथ ने नल (हैंडपंप) लगवा लिया। चमनगंज के लिए यह एक अनोखी घटना थी। जिसने सुना उसी को आश्चर्य हुआ। रामनाथ कोढ़ी  ने नल लगवा लिया! अच्छा रामनाथ ने नल लगवा लिया...। साला पैसा कहां से लाया? अरे उसकी औलादों को नहीं देखते कितनी गोरी हैं...। जितने मुंह उतनी बातें। तमाम तरह की घटिया बातों से लोगों ने चमनगंज के वायुमंडल को दूषित कर दिया...। ऐसा नहीं था कि इन बातों से रामनाथ अंजान था। ऐसी बातें उसके कानों तक पहुंचतीं तो वह तिलमिला जाता, लेकिन गालियों का रामायण पाठ करने के सिवा कुछ कर न पाता। कहता कि सालों को मेरे खाली खूंटे  नहीं दिखते।&lt;br /&gt;---&lt;br /&gt;जेठ का महिना और दोपहर का समय। गर्मी अपनी जवानी का एहसास कराने के लिए फिल्मी नायिका की तरह अश्लील नृत्य कर रही है। ऐसे में रामनाथ के लिए परेशानी और बढ़ गई है। बीमारी की वजह से उसे गर्मी बर्दाश्त नहीं होती। लगता है जैसे बदन में आग लग गई है। इसलिए वह अपने काले नंगे बदन पर एक भीगा कपड़ा हमेशा लपेटे रहता है। इस समय उसका भीगा कपड़ा सूख गया है।&lt;br /&gt;वह चारपाई पर उठकर बैठ गया है। निगाह खाली खूंटे पर चली गई और दिमाग खराब हो गया। गाली देने के बाद उसने इधर-उधर देखा। दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आया। केवल दोपहर सांय-सांय करती नजर आई। जहां तक नजर गई धूप ही धूप दिखाई पड़ी। उसकी आंखें सिकुड गईं  और लाल-पीला सा दिखाई पड़ने लगा। उफ! गर्मी बहुत है। लगता है जान लेकर ही रहेगी। रामनाथ बुदबुदाया और ऊपर देखने लगा। नीम के पेड की डालों और पत्तों से छन-छन कर सूर्य की किरणें उसकी चारपाई पर आ रही थीं। उसने चारपाई को उस तरफ खींच लिया जिधर छाया घनी थी। चारपाई छाया में करने के बाद रामनाथ नल की तरफ बढ़ा। चार कदम चलने के बाद उसके पैर रुक गए। नल के आस-पास के गढ्डों में रुके पानी में चिड़ियां चहचहा कर नहा और पानी पी रही थीं। मेरे जाने से उन्हें उड़ना पड़ेगा यही सोचकर रामनाथ नल के पास नहीं गया। वह चारपाई पर आकर बैठ गया और प्रेम भाव से चिड़ियों को पानी पीते देखने लगा। चिड़ियां अपने में मस्त दुनिया से बेखबर पर आत्मरक्षा के लिए सजग थोडे से गंदे पानी में प्रसन्ता पूर्वक स्नान करते हुए खेल रही थीं।&lt;br /&gt;रामनाथ को यह दृश्य बड़ा प्यारा लगा। इस तन्मयता में वह यह भी भूल गया कि उसके घावों पर मि खयां बैठी हैं। मक्खियों  ने घावों से खून निकाल दिया। दर्द से तड़प कर उसने घावों पर हाथ रख दिया और कई मक्खियाँ  मौत के मुंह में समा गईं। &lt;span&gt;मक्खियों&lt;/span&gt; के मरने से उसे दुश्मन को मार गिराने जैसा आनंद मिला। लेकिन &lt;span&gt;मक्खियाँ&lt;/span&gt;  उसका पीछा छोड ही नहीं रही थीं। उसे बड़ी कोफ्त हुई। वह सभी मि खयों को मार देना चाहता था, लेकिन यह काम उसके वश में नहीं था। फिर भी वह काफी देर तक प्रयास करता रहा। तंग आकर अपने घावों को कपड़े से बांध लिया और &lt;span&gt;मक्खियों&lt;/span&gt; को एक भद्दी सी गाली दी।&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;जारी .....&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-3724780463158046110?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/3724780463158046110/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=3724780463158046110' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/3724780463158046110'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/3724780463158046110'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2008/10/blog-post_06.html' title='कहानी     कोढ़ी  का नल'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-8416904551107417524</id><published>2008-10-04T19:03:00.002+05:30</published><updated>2008-10-04T19:06:32.252+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>कहानी कोढ़ी  का नल</title><content type='html'>&lt;span&gt;&lt;/span&gt;भाग दो&lt;br /&gt;---&lt;br /&gt;बहुत पहले यहां जंगल हुआ करता था। जिसमें ढाक के पेड़ बहुतायत में थे। इनके अलावा बबूल और कटाई की झांडियां थीं। जहां इनका वास नहीं था वह जमीन ऊसर थी। उसमें रेह पैदा होती थी। जिसमें घास भी नहीं उगती। इस बौने जंगल में जहां सांप-बिच्छू रहते थे, वहीं जंगली सूअर और गीदड़ जैसे प्राणी भी रहते थे। इन्हीं के बीच दो घर मनुष्यों के थे, जिन्हें दूसरे गांव के लोग वनप्राणी कहते थे। जब जमींदारी का जमाना था तो इनके पूर्वज कहीं से आकर यहां बस गए थे। पहले यह एक ही घर थे, लेकिन खानदान की वृद्धि हुई तो दो हो गए। इन्हें वनप्राणी इसलिए कहा जाता था,  योंकि इन्होंने यहां बसने के बाद और किसी इनसान को बसने ही नहीं दिया। जिसने भी कोशिश की उसे मुंह  की खानी पड़ी। हालांकि जंगली जानवरों से मुकाबले के लिए इन्हें समाज की जरूरत थी, लेकिन वन संपदा का बंटवारा न हो जाए इसलिए यह लोग इस जगह को आबाद नहीं होने दे रहे थे।&lt;br /&gt;समय के साथ यह वनप्राणी भी बदले। इन्हें भी समाज की जरूरत महसूस हुई। इसके बाद इन्होंने यहां पर लोगों को बसने की इजाजत दी।&lt;br /&gt;यहां पर बसने वाले दूसरे गांवों के फालतू लोग थे। फालतू इसलिए कि इन्हें अपने गांवों में बाहर ही बसने की इजाजत थी। ये दलित थे, जिन्हें अछूत समझा जाता था। अधिकतर लोग इनका छुआ पानी तक नहीं पीते थे। इनमें से अधिकतर भूमिहीन थे। यह लोग अपने गांव से उत्पीड़ित थे। इस जंगल में खुली जगह की आस में आकर बसने लगे। हालांकि यह वनप्राणी भी सवर्ण थे और इन्हें भी दलितों से कोई लगाव नहीं था, लेकिन इनकी मजबूरी थी कि और किसी जाति का व्यि त यहां पर बसने को तैयार नहीं था।&lt;br /&gt;यहां बसने सबसे पहले आया था शरीर से अपंग रामनाथ। उसके पूरे शरीर में कोढ़ था और वह कोई भी काम कर पाने में असमर्थ था। उसकी पत्नी थी और दो सुंदर बेटियां। जिनके सहारे वह जीवन व्यतीत कर रहा था। अपने मूल गांव से यहां आकर बसने में उसकी जाति और बीमारी ही खास वजह थी।&lt;br /&gt;पहले का दो घरों वाला वनगंज अब तीस घरों वाला चमनगंज हो गया है। पहले के दो घरों को छोड़ दिया जाए तो यहां के सभी निवासी रामनाथ की जाति के ही हैं। ऊपरी तौर पर लोगों में भले ही एकता दिखती हो लेकिन रामनाथ के प्रति लोगों में घृणा की ही भावना है। इसकी वजह है उसकी बीमारी।&lt;br /&gt;वैसे तो रामनाथ किसी से कोई वास्ता नहीं रखता है लेकिन इसका  या किया जाए कि इन सबके पीने के पानी के लिए केवल एक ही साधन है, वह है सरकारी नल। यह भी इनके वोट बैंक की वजह से ग्राम प्रधान ने लगवा दिया, नहीं तो पहले वनप्राणियों के खेत की सिंचाई वाले खंडहर हो चुके कुएं से ही इनका काम चलता था। यहां से पानी भरने के बदले में इन्हें समय-समय पर वनप्राणियों के यहां बेगार करनी पड़ती थी।&lt;br /&gt;रामनाथ के लिए पहले वाली ही स्थिति सही थी। जब से सरकारी नल लगा है तब से उसकी मुसीबतें बढ़ गई हैं।&lt;br /&gt;जारी .....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-8416904551107417524?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/8416904551107417524/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=8416904551107417524' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/8416904551107417524'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/8416904551107417524'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2008/10/blog-post_04.html' title='कहानी कोढ़ी  का नल'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-2011644171982326091</id><published>2008-10-02T18:54:00.004+05:30</published><updated>2008-10-02T19:02:16.654+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>कहानी कोढ़ी का नल</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-size:130%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भाग एक &lt;span&gt;&lt;/span&gt;  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;--------&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;सूरज जागने के लिए मसमसा ही रहा था कि रामनाथ उठ गया। परिवेश में ठंडी हवा तारी थी, जिससे रामनाथ का बिना कपड़े वाला बदन सिहर जा रहा था। पेडों पर चिड़ियां चहचहा रही थीं। एक्का दुक्का आदमी दिशा-मैदान के लिए हाथ में पानी का लोटा लिए बीड़ी का धुआं उगलते-निगलते और खांसते-खकारते जा रहे थे।&lt;br /&gt;दिशा-मैदान से वापस आने के बाद रामनाथ पानी लेने के लिए नल पर चला गया। इस समय वहां पानी भरने के लिए चार-छह लोग पहले से ही खड़े थे। उन लोगों को सुबह-सुबह रामनाथ का नल पर आना अच्छा नहीं लगा। लोगों ने मुंह तो बिचकाया ही अपनी घृणा को दबा भी नहीं पाये।&lt;br /&gt;- आज का दिन ठीक नहीं गुजर सकता। उनमें से एक ने अपने उद्गार व्य त किए।&lt;br /&gt;- सुबह-सुबह कोढी-कलंदर का मुंह देखने के बाद दिन भर अन्न नहीं मिलता। दूसरे ने टिप्पणी की जो रामनाथ के दिल में तीर सी लगी। एक अनजान दर्द से उसका शरीर सिहर गया।&lt;br /&gt;- हाथ-पैर नहीं हैं फिर भी घूमने की इतनी तमन्ना। एक की और झन्नाटेदार टिप्पणी जो रामनाथ को थप्पड़ सी लगी।&lt;br /&gt;- आदमी को खुद ही सोचना चाहिए। दूसरों का दिन इस तरह से खराब नहीं करना चाहिए।&lt;br /&gt;नल पर उपस्थित लोग इस तरह आपस में बोलते रहे। रामनाथ सोचता रहा। बीमार हो जाने से आदमी  या इतना मनहूस हो जाता है? उसके मन में आया कि वह कहे कि न मिले तुम्हें खाना, न गुजरे तुम्हारा दिन सहीसलामत  लेकिन मैं रोज सुबह आऊंगा, पर वह बोल नहीं पाया। शब्द उसके हलक में फंस कर रह गए। हाथ में बाल्टी लिए खड़ा रहा और सोचता रहा कि ईश्वर ने  या जिंदगी दे दी है। हर कोई घृणा करता है। मुझे देखकर लोगों को उबकाई आती है। सब अपने कर्मों का फल है। ऐसा सोचकर उसने अपने जलते कालेजे को शांत करने की कोशिश की। लोग कहते हैं कि जो बहुत पाप करता है वहीं कोढी होता है। तो  या मैं पूर्व जन्म में अत्याचार करने वाला जमींदार था या राजा? कुछ ऐसा ही रहा होऊंगा, पंडित राधेश्याम और जगेश्वर प्रसाद सिंह की तरह आदमी को जिंदा जलाने वाला और कमजोर लोगों को सताने तथा उनकी बहू-बेटियों की अस्मत लूटने वाला। यदि ऐसा होता तो धरती कोढ़ियों से भर जाती। हो सकता है मैंने इससे भी बड़ा पाप किया हो। भगवान भी बड़े अन्यायी हैं। पूर्व जनम की सजा अब दे रहे हैं...।&lt;br /&gt;- बाल्टी मुझे दो, तुम घर चलो। घरवाली की आवाज सुनकर रामनाथ की तंद्रा टूटी। उसने अपने से लंबी घरवाली के चेहरे को गर्दन उठाकर देखा और चुपचाप घर की तरफ चल दिया।&lt;br /&gt;वैसे तो अपमान सहने की उसकी आदत सी हो गई थी लेकिन अपमान करने वाला कोई बड़ा आदमी हो तो बर्दाश्त किया जाए। अब तो रोज कुआं खोदकर पानी पीने वालों ने भी उसका अपमान कर दिया था। इस कारण वह बेहद उदास हो गया। उसका मन खूब जोर-जोर से रोने को कह रहा था। लेकिन वह खुद को जज्ब किए हुए था। वह सोच रहा था कि बड़े-बड़े लोगों ने अपमानित किया और अब...। हे भगवान कैसी जिंदगी दे दी तूने। रामनाथ ने गहरी सांस ली।&lt;br /&gt;घर के सामने आया तो छोटी वाली बेटी बकरियों को चारा डाल रह थी। बकारियां जल्दी-जल्दी जुगाली करते हुए चारा खा रही थीं। एकाएक उसके दिमाग में प्रश्न उठा। नल कितने में लग जाएगा? पंड़ित घनश्याम ने दो हजार में लगवाया था। यानी तीन बकरी बेचनी पड़ेगी और नल लग जाएगा। यदि तीन बेच दिया तो बचेंगी दो। फिर दो मंे  या होगा? दो बहुत हैं। उनके बच्चे हैं। धीरे-धीरे फिर कई हो जाएंगी। रामनाथ को राह मिल गई। अपमान से मिले जख्म पर मरहम सा लगा और कह गए। - नल लगवा लेता हंू फिर बताता हंू सालों को।&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:100%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;जारी ....&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-2011644171982326091?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/2011644171982326091/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=2011644171982326091' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/2011644171982326091'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/2011644171982326091'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='कहानी कोढ़ी का नल'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-2404736093370980187</id><published>2008-09-27T23:04:00.005+05:30</published><updated>2008-09-27T23:20:48.217+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>अभियुक्त</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_8Y0oEqUypS4/SN5x4v2yXaI/AAAAAAAAAGU/qmG3VMQIjzI/s1600-h/love.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://1.bp.blogspot.com/_8Y0oEqUypS4/SN5x4v2yXaI/AAAAAAAAAGU/qmG3VMQIjzI/s320/love.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5250759435293449634" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(204, 0, 0);font-size:130%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;इस कहानी को पहले तीन भागों में आप लोगों के सामने प्रस्तुत कर चुका &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;हूँ&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; । अब आप लोगों की सुविधा के लिए पूरी कहानी एक साथ प्रस्तुत कर रहा &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;हूँ&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; । &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255);font-size:180%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;मेरी बेचैनी : &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हालांकि वह सपना था, लेकिन उसे भुला पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है। ऐसा नहीं है कि मैं सपना नहीं देखता। सपना देखता भी  हूँ और उन्हें सुबह होते ही या फिर एक-दो दिन में भूल भी जाता हूँ , लेकिन यह सपना मौका पाते ही मेरे दिलो-दिमाग पर हावी हो जाता है। इस सपने की कशिश, इसका मीठा दर्द और गुलाबी एहसास मेरे जेहन में हमेशा बना रहता है। मौका मिलते ही सोचने पर विवश कर देता है कि  या इसका संबंध मेरी निजी जिंदगी से है? यह सवाल उठते ही मैं सपने के एक-एक तार को जोडने लगता हूँ । फिर भी ऐसी कोई तस्वीर नहीं बनती, जिससे यह लगे कि सपने का संबंध मेरी निजी जिंदगी से है।&lt;br /&gt;यह भी सच है कि कई सपनों का संबंध इंसान के जीवन से होता है। कई बार स्मृतियां, जिन्हें हम अपने चेतन में भूल चुके होते हैं, वे सपने के रूप में हमारी चेतना में शामिल हो जाती हैं। तो  या मैं किसी को भूल रहा हूँ ? इतनी लंबी जिंदगी भी तो नहीं है। हो सकता है कि बचपन या किशोर-वय की कोई स्मृति है, जो अब सपने के रूप में सामने आई है। बचपन और किशोर-वय की तो अधिकांश बातों और घटनाओं  को हम विस्मृत ही कर देते हैं। लेकिन बचपन में  या किसी लड़की से प्यार किया जा सकता है? किशोर-वय में  जरूर हो जाता है, लेकिन प्रेम जैसी भावना और कोमल एहसास को भुलाया जा सकता है? मेरे अंदर से ही आवाज आती है। दुष्यंत भी शकुन्तला से प्यार करके भूल गए थे। शकुन्तला  के साथ बिताए प्यार भरे लम्हों को दुष्यंत ने विस्मृति के पत्थर से कुचल दिया था। ऐसा तो उन्होंने शाप के कारण किया था। मैंने खुद से ही सवाल किया, पर उन्हें तो नहीं पता था कि वह किसी ऋषि के शाप के कारण शकुन्तला  को विस्मृत कर रहे हैं। तो  या मैं शापित हूँ ? हो सकता है। आज के जमाने में वैदिक युग की बातें। सब बकवास है। प्रकृति की जटिलता अनंत है। इसी कारण आदमी ने भगवान की रचना कर डाली। जब देश की आबादी करोड में भी नहीं थी, तभी 33 करोड देवता बना डाले हमारे पूर्वजों ने। यह जटिलता तब भी थी, अब भी है। पत्थर अब भी करोडों लीटर दूध पी जाते हैं। गरीब की आह और पीड़ित की बद्दुआ ही आधुनिक श्राप है। स्वभाव भर बदला है। मैंने तो किसी को नहीं सताया फिर मुझे कौन श्राप देगा? ऐसा हर इंसान को लगता है। यदि उसे ऐसा न लगे तो वह ऐसा काम ही न करे। ऐसा काम ही न करे तो उसके सपने इतने डरावने न हों। आज बहुत से इनसान हैं जो रातों को इसलिए नहीं सो पाते,  योंकि उनके सपने इतने डरावने होते हैं कि जागने पर भी वे उनका पीछा नहीं छोडते। मेरा सपना तो डरावना नहीं है। जानता हूँ , इसीलिए कह रहा हूँ , अपनी स्मृतियों को खंगालो। अपने ही द्वंद्व से मैं पस्त हो गया। हालांकि मुझे याद नहीं, लेकिन यह मानने को विवश हो जाता हूँ  कि किसी को प्यार करके शायद मैं भूल गया हूँ ....।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सपना :&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;तुम मुझे भूल गए, पर मैं नहीं। उसने कहा तो मैं अवाक रह गया। भला प्यार भी भूलने वाला एहसास है। सोचता हूँ  पर बोल नहीं पाता।&lt;br /&gt;- यह देखो, तुमने कई पत्र भी लिखे हैं। एक अन्य महिला, जो शायद उसकी भाभी है, कई लिफाफे मेरी तरफ बढ़ा देती है। एक भी लिफाफा खोला नहीं गया है। लेकिन उनके ऊपर जो लिखावट है वह मेरी ही है।&lt;br /&gt;- यह तो खोल कर पढ़े भी नहीं गए हैं? मैंने उस महिला से पूछा।&lt;br /&gt;- प्रेम पढ़ने का मोहताज नहीं होता। वह महसूस किया जाता है। मैंने तुम्हारी आंखों में देखकर ही महसूस कर लिया था, पहली ही नजर में। उसके बाद तो ये पत्र या तुम्हारे मुंह  से निकले अल्फाज, सब बेमानी हैं। प्रेम में यदि शब्दों की जरूरत पड़ जाए या उसे लिखकर इजहार करना पड़े तो वह कोमल एहसास कहां रहा जाता है? फिर तो वह भौतिक हो जाता है। अलौकिक कहां रह पाता है? मैंने अपने प्रेम की अलौकिकता को बरकरार रखा है। इसलिए तुम्हारे इन पत्रों को नहीं पढ़ा। जानती हूँ , इसमें तुमने अपनी मजबूरियों का उल्लेख किया होगा। उन्हें सिद्ध करने के लिए तमाम तर्क भी दिए होंगे, लेकिन तुम मुझसे प्रेम करते हो, इसके प्रमाण हैं ये पत्र। बेशक तुम नहीं आए, लेकिन तुम्हारे पत्र तो आए। मैंने इसी में ही तुम्हारी मूरत देख ली। मैं तो प्रेम दीवानी हूँ , मीरा की तरह। मीरा के लिए जब यह जरूरी नहीं था कि भगवान कृष्ण सशरीर उपस्थित हों , तो मेरे लिए भी जरूरी नहीं है कि तुम सशरीर मेरे सामने रहो। मैंने तुमसे प्रेम किया है। दिल में बसाया है। इसके बाद तुम कहीं भी रहो, मेरे लिए कोई फर्क नहीं पड़ता। उसने कहा था और मैं अभिभूत था। प्रेम की ऐसी पराकाष्ठा। उसने मीरा बनके मुझे कृष्ण बना दिया। मुझ तुच्छ को ऐसा सम्मान। कृष्ण तो भगवान हैं। वे मीरा की भावनाओं को जानते-समझते थे। मैं तो इनसान हूँ । अपनी ही भावनाओं से अनजान, फिर उसकी कोमल भावनाओं  के एहसास को कैसे समझ सकता था। मैं भौचक था।&lt;br /&gt;- तुम शादी करके अपने बीवी-बच्चों के साथ खुश हो, पर यह पगली तुम्हारे प्यार में कुं आरी बैठी है। कैसे बीतेगा इसका जीवन? उसकी भाभी ने कहा था।&lt;br /&gt;मुझे कोई जवाब नहीं सूझा। मैं चुप ही रहा। मेरी चुप्पी में मेरे अपराध की स्वीकृति भी थी। वह अपराध जिसके बारे में मैं अनभिज्ञ था।&lt;br /&gt;ऱ्यह गांव ऊंची जाति वालों का। उन्होंने हमारा जीना हराम कर दिया है।&lt;br /&gt;-जीना हराम कर रखा है?&lt;br /&gt;-हां, वे उसके चरित्र पर उंगली उठाते हैं। कहते हैं यह गांव के लड़कों को बिगाड़ रही है। हम ठहरे नीच जाति के। उनका मुकाबला नहीं कर सकते। उन्होंने इसका बाहर निकलना दूभर कर दिया है। उनका कहना है कि इसने पाप किया है। यह इस गांव में नहीं रह सकती है। वह महिला रुआंसी हो गई। उसकी आंखों में आंसू भर आए। उसने अपने आंसू आंचल से पोंछते हुए कहा कि दरअसल उनकी निगाह इस पर है...। यह उन्हें घास नहीं डालती तो इसे कलंकित करके गाँव  से निकाल देना चाहते हैं...।&lt;br /&gt;इसके बाद सपने में सब कुछ गड्मड् हो जाता है। पता चलता है कि लड़की गांव वालों के डर से अपनी बहन के यहां रहने के लिए गई है। मुझे आया जानकर कोई उसे लेने जाता है। मैं उससे मिलने के लिए व्यग्र हो जाता हूं। सोचता हूं, वह मेरे सामने होगी तो मैं  या बातें करूंगा।  या कहूंगा उससे। मेरी समझ में कुछ नहीं आता, लेकिन मैं रोमांचित हूं उससे मिलने की कल्पना मात्र से ही। व्यग्रता कुछ ऐसी, जैसे मैं पहली बार किसी स्त्री के संपर्क में आऊंगा।&lt;br /&gt;इसी बीच वहां भगदड़ मच जाती है। चारों तरफ अफरातफरी मच जाती है। मारकाट होने लगती है। मैं आतंकित हो जाता हूं। उसकी भाभी कहती है कि यह सब उनकी चाल है। वे तुम दोनों को मिलने नहीं देना चाहते। इसीलिए दंगा भड़का दिया। वे तुम दोनों को मार देना चाहते हैं। मेरा डर गायब हो जाता है। मैं मुकाबले के लिए दृ़ढप्रतिज्ञ हो जाता हूं। वह मुझे भागने के लिए कहती है। एक भीड़ मेरी तरफ बढ़ती है। उनके हाथों में हथियार हैं, लेकिन उनकी श ल आदमी जैसी नहीं है। हालांकि उनके दो हाथ-पैर हैं, लेकिन चेहरा जानवरों जैसा है। डरावना। मैं सोचता हूं यह किस लोक के वासी हैं। मुझे  यों मारना चाहते हैं? मुझे मारकर उन्हें  या मिलेगा? मैं अविचल खड़ा हूं। वह मेरी तरफ आ रहे हैं। उसकी भाभी भयभीत कभी मुझे देखती है तो कभी भीड़ को। वह चिल्लाती है कि यहां से भाग जाओ। ये लोग तुम्हें मार डालेंगे।&lt;br /&gt;-भागते कायर हैं। अकारण किसी को मारने वाले भी कायर होते हैं। कायरों से भागा नहीं जाता। उनका मुकाबला किया जाता है।&lt;br /&gt;-तुम अकेले हो, वे बहुत हैं।&lt;br /&gt;-वे डरे हुए हैं। डरे हुए लोग चाहें जितनी हिंसा करें वह विजयी नहीं हो सकते।&lt;br /&gt;मुझे भागता नहीं देख महिला भाग जाती है, लेकिन थोडी ही देर में वह एक भीड़ के साथ उपस्थित होती है। उनके भी हाथों में हथियार हैं। इनकी शक्ल आदमियों जैसी है। यह भीड़ मेरे पीछे आकर खड़ी हो जाती है। उन्हें देखकर जानवरों की शक्ल वाली भीड़ रुक जाती है।&lt;br /&gt;माहौल में तनावपूर्ण शांति पसर जाती है। इसी बीच दो युवक मोटरसाइकिल से आते हैं। एक पर वह लड़की बैठी होती है। मोटरसाइकिल रुकते ही वह दौडकर मेरे पास आती है। मैं उसे सीने से लगा लेता हूं।&lt;br /&gt;-तुम इसे लेकर भाग जाओ। एक युवक मोटरसाइकिल लेकर मेरे पास आकर कहता है।&lt;br /&gt;-मैं  यों भाग जाऊं? मैंने  या गलत किया है?&lt;br /&gt;ऱ्यह बहस का समय नहीं है।&lt;br /&gt;-तो भागने का भी नहीं। भागकर जीवन नहीं जिया जा सकता। आज यहीं तय होगा कि हमें जीना है या मरना। मैं लड़की के चेहरे की तरफ देखता हूं। उसके चेहरे पर मिलन का सुख है, मरने का कोई भय नहीं। मैं आश्वस्त हो जाता हूं।&lt;br /&gt;इसी बीच पुलिस आ जाती है। सभी पुलिस वालों को देखते हैं। पुलिस के जवान अपनी-अपनी गाड़ियों से उतर कर पोजीशन ले लेते हैं। उनका अधिकारी जोर से बोलता है।&lt;br /&gt;-अपने आपको हमारे हवाले कर दो। मेरी समझ में नहीं आता कि वह किसे हवाले करने को कह रहा है। पुलिस अधिकारी हमारे पास आता है।&lt;br /&gt;-तुम दोनों को गिरफ्तार किया जाता है।&lt;br /&gt;- यों?&lt;br /&gt;-गांव की शांति भंग करने के लिए।&lt;br /&gt;-आरोप निराधार है। शांति हमने नहीं भंग की।&lt;br /&gt;-तुम्हें जो कुछ भी कहना है अदालत में कहना। पुलिस अधिकारी ने कहा। हम चुपचाप उसके साथ चल देते हैं।&lt;br /&gt;अगले दिन हमें अदालत में पेश किया जाता है।&lt;br /&gt;सरकारी वकील जज से कहता है कि इन दोनों ने गांव की शांति भंग की है।&lt;br /&gt;-आरोप निराधार है जज साहब। मैं प्रतिवाद करता हूं। - मैंने तो केवल प्यार किया है।&lt;br /&gt;ऱ्यही तो इनका गुनाह है योर आनर&lt;br /&gt;- प्यार करना तो गुनाह नहीं होता जज साहब?&lt;br /&gt;-प्यार करना ही गुनाह है योर आनर?  योंकि इनके प्यार करने से गांव की शांति भंग हुई। सवर्ण होते हुए इसने दलित युवती से और दलित होते हुए इसने सवर्ण युवक से प्रेम किया। इससे दोनों समुदायों में तनाव व्याप्त हो गया। स्थिति विस्फोटक हो गई। लोग मारकाट पर उतर आए। वह तो समय पर पुलिस पहंुच गई नहीं तो लाशों का ढेर लग जाता योर आनर।&lt;br /&gt;सरकारी वकील चुप हो जाता है। मैं अवाक हूं। समझ में नहीं आता कि  या कहूं। अदालत अपना फैसला सुनाती है।&lt;br /&gt;- गवाहों के बयान और सुबुतों को देखते हुए अदालत इस निर्णय पर पहंुची है कि चूंकि अभियु तों ने गंभीर अपराध किया है इसलिए इन्हें बामश कत उम्रकैद की सजा सुनाई जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255);font-size:180%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सपने से बाहर : &lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;मेरी&lt;/span&gt; नींद टूट जाती है। मेरा शरीर पसीने से भीगा होता है। मैं सपने के बारे में सोचने लगता हूं। यह कैसा सपना है?  या मैं इसे भुला पाऊंगा? इसके बाद मैं सो नहीं पाता। बाहर चिड़िया चहचहाने लगती हैं। खिड़की से बाहर देखता हूं तो अंधेरा भाग रहा होता है...। भोर का उजाला खिड़की के रास्ते घर में प्रवेश कर रहा होता है...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;और वह तस्वीर:&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;उस दिन सुबह मैं विस्तर से उठकर छत पर चला गया। टहलते हुए सपने को बार-बार याद करने लगा। तभी पूरब दिशा में सूरज निकलता दिखाई दिया। मुझे सूरज की जगह किसी लड़की का चेहरा नजर आया॥। चेहरा इतना धुंधला था कि मेरी समझ में नहीं आया कि वह किसका चेहरा है। रात में देखे गए सपने को और उगते सूरज में चस्पा लड़की की तस्वीर को मिलाकर देखता हूं तो बेचैनी और बढ़ जाती है। कभी लगता है कि मैं दुष्यंत हूं। फिर लगता है कृष्ण...। फिर लगता है कि नहीं, &lt;span style="color: rgb(51, 102, 255);"&gt;मैं&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255);"&gt;तो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255);"&gt;अभि&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255);"&gt;युक्त&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255);"&gt;हूँ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255);"&gt; ..&lt;/span&gt;..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-2404736093370980187?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/2404736093370980187/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=2404736093370980187' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/2404736093370980187'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/2404736093370980187'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2008/09/blog-post_27.html' title='अभियुक्त'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_8Y0oEqUypS4/SN5x4v2yXaI/AAAAAAAAAGU/qmG3VMQIjzI/s72-c/love.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-8515196897760598038</id><published>2008-09-24T18:38:00.000+05:30</published><updated>2008-09-24T18:43:34.255+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मौसम  बरसात'/><title type='text'>मौसम की पहली बरसात</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_8Y0oEqUypS4/SNo8zOpLqaI/AAAAAAAAAF4/wWZuD6cBkfI/s1600-h/barsat1.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer;" src="http://4.bp.blogspot.com/_8Y0oEqUypS4/SNo8zOpLqaI/AAAAAAAAAF4/wWZuD6cBkfI/s320/barsat1.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5249575166455556514" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:100%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;कई दिनों से सूरज की आंच में&lt;br /&gt;तप रही थी धरती&lt;br /&gt;तवे पर रोटी की तरह पक रहे थे प्राणी&lt;br /&gt;बादलों को जरूर इन पर तरस आया होगा&lt;br /&gt;अपनी सेना लेकर आ गए मैदान में&lt;br /&gt;दे दी सूर्य को चुनौती&lt;br /&gt;घबराकर रोने लगा भाष्कर&lt;br /&gt;और मोतियों की तरह&lt;br /&gt;गगन से गिरने लगी बंूदें&lt;br /&gt;गर्मी से विकल मानव&lt;br /&gt;निकल आया घरों से&lt;br /&gt;रिमझिम बरसात में चुराने लगा नमक&lt;br /&gt;पसीने के रूप में जिसे&lt;br /&gt;छीन लिया था सूरज ने&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-8515196897760598038?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/8515196897760598038/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=8515196897760598038' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/8515196897760598038'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/8515196897760598038'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2008/09/blog-post_24.html' title='मौसम की पहली बरसात'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_8Y0oEqUypS4/SNo8zOpLqaI/AAAAAAAAAF4/wWZuD6cBkfI/s72-c/barsat1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-7148758838207799883</id><published>2008-09-19T02:10:00.000+05:30</published><updated>2008-09-19T02:11:49.339+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>झूठा निकला प्रस्तोता</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 204, 0);"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;टीवी स्क्रीन पर प्रस्तोता&lt;br /&gt;कहता है मुस्करा कर&lt;br /&gt;खबरों का सिलसिला जारी है&lt;br /&gt;लेकिन एक छोट से ब्रेक के बाद&lt;br /&gt;ब्रेक छोटा नहीं होता&lt;br /&gt;इसके दबाव में छोटी हो जाती हैं खबरें&lt;br /&gt;विज्ञापन के दावों की तरह&lt;br /&gt;प्रस्तोता भी झूठा निकला&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-7148758838207799883?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/7148758838207799883/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=7148758838207799883' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/7148758838207799883'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/7148758838207799883'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2008/09/blog-post_18.html' title='झूठा निकला प्रस्तोता'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' 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धुले बाल&lt;br /&gt;करीने से गर्दन और कंधों पर बिखेर कर&lt;br /&gt;लैपटाप की स्क्रीन पर&lt;br /&gt;उभरे शब्दों को देखकर&lt;br /&gt;अपने खिले चेहरे पर&lt;br /&gt;उदासी का भाव लाते हुए&lt;br /&gt;न्यूज चैनल की महिला एंकर ने पढ़ी यह खबर&lt;br /&gt;गरीबी से बेहाल&lt;br /&gt;एक बाप ने&lt;br /&gt;महज पांच सौ रुपये में&lt;br /&gt;बेच दिया अपना बेटा&lt;br /&gt;स्क्रीन पर उभरती है&lt;br /&gt;गरीब बाप की तस्वीर&lt;br /&gt;उसका घर&lt;br /&gt;उसका गांव&lt;br /&gt;दर्शक कुछ सोच पाता&lt;br /&gt;जान पाता&lt;br /&gt;स्क्रीन पर हाजिर हो जाती है मुस्कराती हुई एंकर&lt;br /&gt;कहती है&lt;br /&gt;खबरों का सिलसिला जारी है&lt;br /&gt;लेकिन एक एक छोटे से ब्रेक के बाद&lt;br /&gt;अब स्क्रीन पर एक दस साल का बच्चा&lt;br /&gt;खेल रहा है क्रिकेट&lt;br /&gt;मारता है शॉट&lt;br /&gt;टूटती है एक आलीशान घर की खिड़की&lt;br /&gt;खुश होता है घर का मालिक&lt;br /&gt;एक अन्य घर मालिक कहता है लड़क से&lt;br /&gt;मेरी खिड़की नहीं ताे़डेगा सचिन&lt;br /&gt;सचिन मारता है शॉट&lt;br /&gt;टूटती है खिड़की&lt;br /&gt;वह भी होता है खुश&lt;br /&gt;उनकी खुशी से हौंसला बुलंद होता है सचिन का&lt;br /&gt;वह मारता है शॉट&lt;br /&gt;टूटतीं हैं और खिड़कियां&lt;br /&gt;मकान मालिक कहते हैं&lt;br /&gt;सचिन कल को स्टार बनेगा तो अपना ही नाम होगा&lt;br /&gt;यह किसी बीमा कंपनी का विज्ञापन है&lt;br /&gt;जो कहना चाहती है&lt;br /&gt;दूरदर्शी लोग भविष्य की सोचते हैं&lt;br /&gt;जो अभी करेगा निवेश&lt;br /&gt;कल वही फायदे में रहेगा&lt;br /&gt;अभी निवेश करने के लिए कहां से लाए पैसा&lt;br /&gt;पांच सौ रुपये में&lt;br /&gt;बेटा बेच देने वाला बाप?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-1730346763036993136?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/1730346763036993136/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=1730346763036993136' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/1730346763036993136'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/1730346763036993136'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='मजबूर बाप'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_8Y0oEqUypS4/SNFp0z3lTvI/AAAAAAAAAFQ/eUGT3TkMoQY/s72-c/cooking.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-2794790590448354053</id><published>2008-06-06T01:26:00.000+05:30</published><updated>2008-06-06T12:54:00.102+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कथा-कहानी'/><title type='text'>लड़की</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;कहानी &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;----&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;लड़की &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;-----&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;- ओमप्रकाश तिवारी &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;सुबह होते ही घर के मर्द बारातियांे को चाय-नाश्ता कराने में मशगूल हो गए। औरतें उसे तैयार करने में जुट गइंर्। कहने को सभी को उसे विदा करने की खुशी है, लेकिन सभी उदास हैं। वह तो रोए ही जा रही है। पिछले एक हफ्ते से रो रही है फिर भी आंसू हैं कि सूखने का नाम ही नहीं ले रहे। बहनें सोच रही हैं कि इस बेटी को विदा करने के बाद मां-पिता जी बेटियों के भार से मु त हो जाएंगे। बुआ सोच रही हैं कि भैया ने इस बेटी को विदा करके गंगा नहा लिया। मां सोच रही है कि उसके कलेजे का टुकड़ा अपने घर जाकर सुखी रहे। एक अज्ञात भार उतरने का जहां उन्हें संतोष है, वहीं तमाम आशंकाआें का भार उनकी छाती पर बढ़ता जा रहा है। ससुराल वाले उसके साथ पता नहीं कैसा बर्ताव करंेगे? दामाद जी कैसे होंगे? सास कैसी होगी? कहीं दहेज को लेकर बखे़डा न खड़ा कर दें। यह सोचते ही उनकी रूह कांप गई। दहेज के लिए घटी वह तमाम घटनाएं सवान की घटा की तरह मन-मानस पर छा गइंर् और दिमाग की नसें बिजली की तरह गड़गड़ाने लगीं...। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;उसकी आठ, दस और बारह साल की भतीजियां भी उदास हैं। वे आज खेल नहीं रही हैं। न ही अपनी बुआ के पास जा रही हैं,  योंकि बुआ रो रही है। इस कारण उन्हें भी रोना आ रहा है। वे बुआ को दीदी कहती हैं,  योंकि उनका बड़ा भाई जब से बोलना शुरू किया, इस बुआ को दीदी ही कहता आ रहा है। उसी का अनुशरण वे भी कर रही हैं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- दीदी रो  यों रही हैं? सबसे छोटी वाली ने अपनी बड़ी बहन से पूछा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- अपने घर जा रही हैं न इसलिए । बड़ी बहन के इस उत्तर से छोटी का कौतूहाल और बढ़ गया। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- उनका घर तो यही है, फिर किस घर जा रही हैं? उसके सवाल का जवाब बड़ी बहन की समझ में नहीं आया। जवाब मझली ने दिया।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- अपने दूल्हे के घर जा रहीं हैं।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- दूल्हा  या होता है? छोटी ने फिर सवाल दागा। बड़ी फिर सोच में पड़ गई। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- दूल्हे का मतलब पति होता है। मझली ने जवाब दिया। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- पति  या होता है? छोटी ने फिर प्रश्न दागा।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- पति का मतलब हसबेंड होता है। बड़ी को छोटी के सवालों से गुस्सा आ गया। - कब से दिमाग खाए जा रही है। तेरी समझ में कुछ नहीं आएगा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;ज्यों-ज्यों लड़की की डोली (कार) में बैठने का समम नजदीक आ रहा था, वह दहाड़े मार कर रोने लगी थी। उसे देखकर ऐसा लगता जैसे कोई कसाई गाय को काटने के लिए ले जा रहा हो...। कभी वह मां से लिपटती तो कभी बहनों से। उसके सामने जो भी पड़ जाता उसके पांव पकड़ लेती और अपना साथ न छु़डाने का निवेदन करती। हर कोई उसे गले लगा लेता। रोता और सांत्वना देता कि यह तो रीति है।  या कर सकते हैं। न चाहते हुए भी सभी चाहते कि वह ससुराल जाए।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;लड़की को पकड़ कर कार में बिठा दिया गया। इस दौरान उसका विरोध और तीव्र हो गया। उसे लेकर उसकी एक बहन और नाइन कार में बैठी, तब जाकर उसे संभाला जा सका। कार में बैठने के बाद भी वह कोशिश कर रही थी कि वह बाहर आ जाए। उसे लेकर जैसे ही कार आगे बढ़ी कई हाथ एक साथ आगे बढ़े और स्थिर हो गए...। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;उसके जाने के बाद घर वालों को घर विरान लगने लगा। द्वार पर खाली चारपाइयां उन पर पड़े बेतरतीब तकिये। खाली कुर्सियां और इधर-उधर बिखरे दोने, पत्तल ओर कुल्हड़ देखकर लगता कि कोई लुटेरा लूटपाट करके भाग गया हो। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;लड़की के दोनों भाई कुर्सी पर बैठ गए तो पिता चारपाई पर लेट गए। उनकी शरीर में अथाह पीड़ा उतर आई। लगा किसी ने शरीर का सारा खून निचाे़ड लिया हो। लड़की के चाचा भी एक चारपाई पर पसर गए। सभी थके थे, लेकिन स्वयं को किसी अज्ञात भार से मु त समझ रहे थे...। पिता की यह चौथी और अंतिम बेटी थी। इसलिए बेटी की विदाई की जहां उन्हें पीड़ा थी, वहीं यह सोचकर हल्का महसूस कर रहे थे कि चलो बेटियों के भार से मुि त मिली...। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;लड़की के बड़े भाई की चिंता बढ़ गई थी। वह सोच रहा था कि इतना खर्च शादी-ब्याह में होता है तो वह अपनी तीन-तीन बेटियों की शादी कैसे करेगा? प्राइवेट नौकरी आज है कल नहीं। छोटा भाई गौने में आए खर्च को जाे़डने लगा। चाचा की भी दिलचस्पी इसी में थी। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- मैं तो तीस हजार रुपये का कर्जदार हो गया। बड़े ने कहा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- बीस का तो मैं भी हो गया हंू। छोटे ने कहा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- इस लड़की ने तो तबाह कर दिया भाई। चाचा ने कहा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- इतना खर्च करने के बावजूद भी सालों का मुंह सीधा नहीं हुआ। पिता जो अभी तक लेटे हुए थे उठकर बैठते हुए बोले। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- अरे उनका  या। उन्हें तो मिल रहा था तो कम ही लगेगा। चाचा ने कहा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- लड़की सुखी रहे, जो हुआ सो हुआ। पिता को लड़की के भविष्य की चिंता हुई। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- उसे कुछ हुआ तो छोडूंगा नहीं सालों को। छोटे ने दांत पीसते हुए कहा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- खून मत जला, सब ठीक होगा। चाचा ने छोटे को समझाया। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;छोटा अपनी इस बहन को बहुत प्यार करता है। अनजाने में ही उसके दिमाग में एक भय घुस गया है कि उसकी यह बहन ससुराल मेंं सुखी नहीं रहेगी। उसके ससुराल वाले उसे दहेज के लिए परेशान करेंगे। जिंदा जला भी सकते हैं। अपने अवचेतन में व्याप्त इस भय के कारण उसने भरसक प्रयास किया कि उसकी यह बहन पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बन जाए, लोकिन उसके तमाम प्रयासों के बावजूद वह आठवींं से आगे नहीं पढ़ पाई। उसके पढ़ाने के तर्क पर मां-बाप कहते कि लड़की जात है,  या करेेगी पढ़कर? कौन सी उसे नाकरी करनी है। उसने अपने मां-बाप को बहुत समझाया पर वह समझने को तैयार ही नहींं हुए। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;छोटा घर के अंदर गया तो देखा उसकी तीनों बड़ी बहनें आंगन में बैठी छोटी की तारीफ कर रही हैं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- काफी मेहनती है बेचारी। कोई भी काम बिना न नकुर के कर देती है। उसके रहते अम्मा-बाबू को काफी राहत थी। अब बड़ी दि कत होगी। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- गाय थी गाय।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- पता नहीं ससुराल मेंं  या होगा उसका? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- पता नहीं सास कैसी होगी? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- जेठानी का  या स्वाभाव होगा? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- मेरा तो जी धड़क रहा है। पता नहीं ससुराल मेंं कैसा व्यवहार होगा उसके साथ। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- ठीक ही बीतेगी रे। हमारी नेहा कोई ऐसी-वैसी लड़की नहीं है। गुणों की खान है। सभी का दिल जीत लेगी।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;बहनें अपनी बातों में मशगूल थीं तभी उनके पास उनकी तीनों भतीजियां आ गइंर्। उन्हें देखकर एक बोली - ये बेचारी ऐसी उदास हैं जैसे इनकी मां ही चली गई। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- मां ही थी इनकी। इनकी मम्मी तो शहर चली जातीं थीं। पीछे तो वही संभाली थी। जैसी देखभाल इनकी उसने की, इनकी मां भी नहीं कर पाती। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;छोटा बड़ी देर तक इनकी बातें सुनता रहा। फिर आंगन में पड़ी चारपाई पर लेट गया। बड़ी बहनों की बातें सुनकर वह सोच में पड़ गया कि आज जिसके ससुराल जाने पर यह इतनी उदास हैं, उसी ने जब इस धरती पर जन्म लिया था तो यही बहुत नाराज थीं। उसे डायन कह रही थीं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;वह अतीत के पन्ने पलटने लगा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;तब वह दस साल का रहा होगा। उस दिन वह रात में सो रहा था, लेकिन उसकी नींद अचानक टूट गई। देखा उसकी चारपाई पर बैठी तीनों बहनें किसी को कोस रही हैं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- रंडी को यही घर मिला था। किसी और घर में पैदा हो जाती। भूखों मरेगी तो पता चलेगा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- उसका  या कसूर है, जब भगवान ही नाराज हों। उसे ही नहींं सूझा कि जिस घर में पहले ही तीन लड़कियां हों, वहां एक को और  यों भेजा जाए? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- अम्मा -बाबू की तो किस्मत ही खराब है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- बेचारे बाबू का तो रोयां-रोयां बिक जाएगा हम लोगों की शादी-गौना करते-करते। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- लड़की होना कितना बड़ा गुनाह है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- सो तो है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- हमारे भाइयों की तो किस्मत ही खराब है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- हमारे लिए बेचारे दर-दर की ठोकरे खाएंगे। मेहनत से जो कमाएंगे वह हमारी शादी-ब्याह में खर्च हो जाएगा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- दादी मां कहती थीं कि बकरी का चरा सरपत और बेटियांे का चरा घर जल्दी नहीं पनपता। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- यह घर भी नहीं पनपेगा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- सही कह रही है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- ये रंडी मरेगी भी तो नहीं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- मरना होता तो पैदा  यों होती। दादी मां कहती थीं कि भाग्यवानों की बेटियां मरती हैं। गरीब की बेटियां नहीं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- मैं तो इसे कभी गोद नहींं लूंगी। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- मैं तो सोच रही हूं कि उसे गोद मेंं लेकर उसका गला टीप (घोंट) दूं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;-सोच तो मैं भी रहीं हंू, पर ऐसा कर नहींं सकती। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;-  यों नहीं कर सकती? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- हत्या का पाप लगेगा न? दादी मां कहती थींं कि किसी की हत्या की जाती है तो वह भूत बनता है। भूत बनकर वह मारने वालों से बदला लेता है। यह तो चु़डैल बनेगी। जीना हराम कर देगी। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- हां, यह तो है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- तो  या इसके मरने का कोई उपाय नहीं है? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- है न। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;-  या? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- यह बीमार पड़े और इसका इलाज ही न करवाया जाए। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- पहले यह बीमार तो पड़े। इलाज तो ऐसे भी नहीं हो पाएगा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;इनकी बातें सुन-सुनकर छोटा तंग हो गया था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह लोग किसके बारे मेंं बातें कर रही हैं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- तुम सब किसकी बातें कर रही हो? न सो रही हो न सोने दे रही हो। उसने अपनी बहनों से कहा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- अरे मामा, तुम्हें सोने की पड़ी है। उधर देवी जी आ गई हैं तुम्हारी नींद उड़ाने। बहनों ने कहा तो उसे बात समझ में नहीं आई। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- कैसी देवी जी? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- अब तुम चार बहनों के भाई हो गए हो। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- तो  या हुआ? तुम सब इतनी परेशान  यों हो? सोओ न। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- हां, तू तो सोएगा ही। जब जागेगा तो पता चलेगा....। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;वह सोच ही रहा था कि उसका ध्यान भंग किया उसकी छोटी भतीजी के इस सवाल ने कि दीदी कहां चली गइंर्? जो अपनी एक बुआ से पूछ रही थी। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- अपने घर।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- उनका घर तो यही है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- यह तो उसका मायका है पगली। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- रेनू कह रही थी कि दीदी अपने दूल्हे के घर गइंर्। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;उसकी बात सुनकर सभी बहनें जोर से हंस पड़ीं और एक साथ बोलीं कि अच्छा ऐसा रेनू ने कहा।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- दीदी दूल्हे केयहां  यों गइंर्? छोटी के प्रश्न पर सभी असमंजस में पड़ गइंर्। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- जब तू बड़ी हो जाएगी तो खुद ही समझ जाएगी। उनमें से एक ने कहा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- रेनू कहती है कि बड़ी होने पर मुझे भी दूल्हे के यहां जाना होग? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- सही कहती है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- मैं तो दूल्हे-उल्हे के यहां नहीं जाती। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- जाना तो पड़ेेगा बच्ची। उनमें से एक ने लंबी सांस लेते हुए कहा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;- नहीं...नहीं... मैं नहीं जाऊं गी। वह पैर पटक कर जोर-जोर से रोने लगी और जमीन पर लोटने लगी। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-2794790590448354053?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/2794790590448354053/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=2794790590448354053' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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भगवान</title><content type='html'>पूर्व प्रधानमंत्री की मौत पर चिंतित शि तमान&lt;br /&gt;---------------------------&lt;br /&gt;एक विकासशील देश के पूर्व प्रधानमंत्री की मौत की खबर सुनकर दुनिया के देशों पर अपनी दादीगीरी की धौंस जमाने वाले देश के राष्ट्रपति की चिंताएं बढ़ गइंर्। उस व त वह सोने जा रहा था, जब उसे यह समाचार मिला कि तरभा देश के पू र्व प्रधानमंत्री वरा का देहांत हो गया। उसकी चिंता का कारण वरा की मौत नहीं, बल्कि अपने देश के पूर्व राष्ट ्रपति का फोन पर दिया यह आदेश था कि वरा को स्वर्ग में स्थान दिलाने की व्यवस्था करो। वह हमारा खास आदमी था। हमने जो कहा उसने किया। आज हमारी नीतियां तरभा सहित तमाम देशों में लागू हो रही हैं तो उसका श्रेय वरा को ही जाता है। मैंने वरा को वचन दिया था कि उसे नरक में नहीं जाने देंगे। वह डरा हुआ था जब मैंने उसे अपनी नीतियां तरभा देश में लागू करने के लिए कहा था। उसका कहना था कि ऐसा करके वह नरक में जाएगा। तब मैंने उसे आश्वस्त किया था कि उसे नरक में नहीं जाने दंेगे। &lt;br /&gt;- यह नरक-स्वर्ग  या बला है? कारीमा देश के वर्तमान राष्ट ्रपति शबू ने अपने देश केपूर्व राष्ट ्रपति से कहा।&lt;br /&gt;- जब वरा ने स्वर्ग और नरक की बात कही थी तो मेरी भी समझ में नहीं आया था, लेकिन यह सोचकर आश्वासन दे दिया कि कहीं भी हो हम खोज निकालंेगे। आखिरकार हमसे कौन बच पाया है? जो यह स्वर्ग-नरक बच जाता? वैसे भी हमारे लिए तो शर्म की बात थी कि हम स्वर्ग-नरक को ही नहीं जानते। हमने ठान लिया तो हम जानेंगे ही। &lt;br /&gt;- जाना कैसे आपने?&lt;br /&gt;- चूंकि यह मामला धार्मिक लगता था इसलिए मैंने सबसे पहले तरभा के एक चर्चित धर्मगुरु को पकड़ा। उसने बताया कि उसके धर्म में मान्यता है कि धरती पर अच्छा काम करने वाला स्वर्ग जाता है और बुरा काम कने वाला नरक लोक में। स्वर्ग जाने वाले को सारी सुख-सुविधाएं मुफ्त में बिना काम किये मिलती हैं और नरक में जाने वाले को बहुत सारे कष्ट  भोगने पड़ते हैं। नरक का राष्ट ्रपति यमराज है और स्वर्ग का इंद्र है।&lt;br /&gt;- ऐसा भी कोई देश है इस धरती पर? &lt;br /&gt;-ऐसा ही सवाल मंैने भी उस धर्मगुरु से किया था। इस पर वह हंसा था। उसका कहना था कि यह सब बकवास है। &lt;br /&gt;- फिर तुम्हारे धर्म में लोग नरक जाने से डरते  यों हैं? वह स्वर्ग ही  यों जाना चाहते हैं? मैंने उससे पूछा था। &lt;br /&gt;- यह सब हम धर्मगुरुआें का फैलाया भ्रम है। हम स्वर्ग का लालच देकर और नरक का डर दिखाकर ही जनता को अपने वश में करते हैं। उन पर शासन करते हैं। मेहनत जनता करती है, ऐश हम करते हैं। यह कह कर वह धर्मगुरु मुस्कराया था। उसकी मुस्कान में मुझे साजिश नजर आई। मुझे लगा कि वह सच बताना नहीं चाहता। उसकी बातों पर मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था। मेरे मन में सवाल उठा कि उसकी झूठ पर लोग यकीन  यों करेंगे? उस देश में लोग सदियों से ऐसा यकीन करते आ रहे हंै तो जरूर इसमें सचाई होगी। मंैने अपनी खुफियां एजेंसियों को स्वर्ग-नरक की खोज में लगा दिया। एक दिन इन्होंने स्वर्ग और नरक को खोज ही निकाला। &lt;br /&gt;- जैसे मैंने कराइ में रासायनिक हथियार खोज निकाले। शबू ने उत्तसाहित होकर कहा।  &lt;br /&gt;- नहीं, यह तो तुम्हारा और तुम्हारी खुफिया एजेंसियों का झूठा प्रचार है। तुम वहां के विशाल तेल भंडार पर कब्जा करना चाहते थे। जिसमें मद्दास रोड़ा बना था। इसलिए उसकी सत्ता को गिराना था। उसकेलिए तुम्हें कोई बहाना चाहिए था। सो तुम्हारी खुफिया एजेंसियों ने वैसा ही किया, जैसा तुम चाहते थे। लेकिन स्वर्ग-नरक है। यह सच है। वरा नरक में नहीं जाएगा। यह भी सच है। हालांकि उसकी सेवा करने के लिए नरक के राष्ट ्रपति ने पूरी व्यवस्था कर ली है। लेकिन अब तुम्हें वरा को स्वर्ग पहुंचाना है। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाओगे तो यह तुम्हारी नहीं, हमारे देश की आज तक की सबसे बड़ी और शर्मनाक पराजय होगी। &lt;br /&gt;ऱ्यदि ऐसा है तो मैं अभी व्यवस्था करता हूं। शबू ने कह तो दिया, लेकिन उसकी चिंता बढ़ गई। वह बेचैन हो गया। उसने अपने सुरक्षा सलाहकार को तत्काल तलब किया। वह पल भर मेंं हाजिर भी हो गया। दोनों ने सलाह-मश्विरा करने के बाद अपनी खुफिया एजेंसी केचीफ को बुलाया। चीफ केसामने जैसे ही शबू ने सारी बात रखी वह मुस्कुराया।&lt;br /&gt;- तुम हंस रहे हो? शबू गुस्से में बोला।&lt;br /&gt;- हंस इसलिए रहा हूं कि जिस काम के लिए आप परेशान हैं, वह हो जाएगा, बल्कि हो गया होगा। मिस्टर वरा को स्वर्ग के कर्मचारी इज्जत से ले जा रहे होंगे।&lt;br /&gt;- ऐसा कैसे हो सकता है?&lt;br /&gt;- ऐसी व्यवस्था मंैने कर दी है।&lt;br /&gt;- बिना मुझसे पूछे?&lt;br /&gt;- आपसे  या पूछना? आप भी तो वही करते, सो जो देशहित में था उसे मैंने कर दिया। &lt;br /&gt;- अच्छी बात है, लेकिन कोई काम करने से पहले पूछ लिया करो भाई। आखिरकार मैं राष्ट ्रपति हूं। &lt;br /&gt;- जी, आगे से ध्यान रखेंगे। यह कह कर करीमा देश की खुफिया एजेंसी का चीफ चला गया। उसके बाद शबू का सलाहकार भी चला गया। शबू भी निश्चिंत हो चुका था। वह अपने वेडरूम में सोने चला गया। &lt;br /&gt;धर्मगुरु को यमराज का फोन&lt;br /&gt;--------------------&lt;br /&gt;तरभा देश के एक धर्मगुरु स्नान करने केबाद पूजा करने जा रहे थे कि उनका मोबाइल बज उठा। पूजा में बिघ्न उन्हें अच्छा नहीं लगा। मुंह से बेसाख्ता निकला कि ससुरा यह यंत्र व त-बेव त अपना मुंह खोल देता है। अब इसका गला टीपना पड़ेगा। उन्होंने मोबाइल उठाया और उसकी स्क्रीन पर दिख रहे नंबर को देखकर चकरा गए। कहां का नंबर हो सकता है? किसका फोन हो सकता है? यही सोचते हुए फोन को आन करके कान से लगा लिए। &lt;br /&gt;- महाराज आपके होते हुए  या हो रहा है! उधर से अवाज आई।&lt;br /&gt;-  या हो रहा है? &lt;br /&gt;- आपको पता नहीं है? &lt;br /&gt;-नहीं भाई, मुझे कुछ नहीं मालूम। &lt;br /&gt;- मालूम नहीं है या मुझे बेवकूफ बना रहे हो?&lt;br /&gt;-  या बकवास कर रहे हो? कौन हो तुम?&lt;br /&gt;-अच्छा! तो अब मुझे भी नहीं जानते।&lt;br /&gt;-हां, नहीं जानता। कौन हो तुम?&lt;br /&gt;-मैं यमराज हूं। उधर से एक गर्वीली और गंभीर आवाज आई। उत्तर सुनकर धर्मगुरु हंस पड़े। बोले -तू यमराज है? देख साफ-साफ बता, फिल्मी डायलाग मत बोल। तेरे जैसे मेरे पास कई यमराज हंै....। &lt;br /&gt;- जानता हूं, लेकिन मैं असली यमराज हूं। नरक लोक का मालिक। &lt;br /&gt;- मुझे नरक में ले जाना चाहता है?&lt;br /&gt;-अभी तो नहीं, लेकिन अपका भी नंबर आएगा। आपके कर्म भी नरक में जाने वाले ही हैं। &lt;br /&gt;-  या बकवास कर रहा है? किस नरक की बात कर रहा है? कहां होता है यह? स्वर्ग-नरक तो हमारी काल्पनिक संरचना हैं। यथार्थ में ऐसा कोई लोक नहीं है। हम धर्मगुरुआें ने समाज पर शासन करने के लिए स्वर्ग-नरक की कल्पना की है। इस लोक के सारे पात्र भी काल्पनिक हैं। फिर तू कहां से आ गया?&lt;br /&gt;ऱ्यह ठीक है कि स्वर्ग-नरक आपकी कल्पना की देने हैं, लेकिन अब यह हकीकत में बदल गया है। कारीमा देश ने इसे मूर्त रूप प्रदान कर दिया है। कारीमा आपके देश की नीतियों में हस्तक्षेप तो करता ही था, अब आपके धर्म मंे भी टांग अड़ाने लगा है। यह आपके लिए ठीक नहीं है। &lt;br /&gt;-तू अपनी बकवास बंद कर और यह बात अच्छी तरह से समझ ले कि कल्पना कभी यथार्थ में नहीं बदलती। &lt;br /&gt;- यह तो ठीक है, लेकिन अब न तो मैं, न ही मेरा लोक काल्पनिक रह गया है। मैं और मेरा लोक एक हकीकत हैं। &lt;br /&gt;- तू अपनी बकवास से बाज नहीं आएगा? &lt;br /&gt;- मैं कोई बकवास नहीं कर रहा। आज आपके देश के पूर्व प्रधानमंत्री वरा की मौत हुई। उनके कर्मों के अनुसार उन्हें नरक में जाना था, लेकिन उन्होंने मरने से पहले ही कारीमा के राष्ट्रपति से यह सुनिश्चित करवा लिया था कि उन्हें नरक में जाने से बचाया जाए। इसलिए आज जब मेरे दूत उन्हें नरक में ला रहे थे तो कारीमा देश के सैनिकों ने हमला कर उन्हें छु़डा लिया और स्वर्ग लोक के लिए चल पड़े। &lt;br /&gt;- फिर किस बात के यमराज हो तुम? &lt;br /&gt;- कारीमा का राष्ट्रपति मुझसे भी बड़ा यमराज है। उसके सैनिकों की इस हरकत के बाद मैंने उससे बात कि तो बोला चुपचाप वही करो जो मैं कहता हूं, नहीं तो तुम्हारा अस्तित्व ही खत्म कर दूंगा। तुम्हारे यहां लोगों को जो यातनाएं दी जाती हैं, वह आमानवीय हैं। यह सब मानवाधिकार का उल्लंघन है। मैं इस आरोप में तुम्हें गिरफ्तार करके जेल में सड़ा दूंगा और तुम्हारे लोक की सत्ता अपने किसी गुलाम के हाथ में दे दूंगा। तुम्हारे लिए बेहतर यही होगा कि तुम चुपचाप मेरी बात मान लो, नहीं तो तुम्हारा हश्र भी म ास जैसा कर दूंगा।&lt;br /&gt;-बनते यमराज हो और डर गए? यमराज की बात सुनकर धर्मगुरु के शरीर में सुरसुरी सी होने लगी थी। &lt;br /&gt;- जब आपकी पूरी दुनिया उसके इशारों पर नाच रही है तो मेरी  या बिसात? वैसे भी अभी तक तो मैं काल्पनिक लोक का एक पात्र था। आज मेरा वजूद है तो उसकी वजह से। फिर भी मैंने उससे कहा कि तुम भी तो कराइ के सैनिकों के साथ अमानवीय व्यवहार कर रहे हो। कराइ पर झूठ बोलकर हमला किया। अपने स्वार्थ की लिए हर जगह टांग अड़ाते हो। इतना सुनना था कि शबू बिफर पड़ा। बोला कि मैं जो करता हूं वही सही होता है। मैं जिसे सच मानता हूं, वही उचित होता है। तुम कल्पना से यथार्य में मेरी वजह से आए हो। इसको भूलना नहीं। भूल जाओगे तो दुनिया तुम्हें भूल जाएगी।&lt;br /&gt;ऱ्यमराज की बात सुनकर धर्मगुरु सन्न रह गए। उनकी समझ में नहीं आया कि  या कहें। उन्होंने हकलाते हुए कहा कि तुम चिंता न करो। मैं देखता हूं। कह कर उन्होंने फोन काट दिया।&lt;br /&gt;यमराज की बात सुनकर धर्मगुरु चिंता में पड़ गए। उन्होंने तो सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी हो जाएगा। वह पूजा करना भूल गए। उन्होंने सोचा नया भगवान तो पुराने भगवान से भी अधिक शि तशाली है...। अब इसकी पूजा करनी होगी? यदि इसने सचमुच में स्वर्ग और नरक को यथार्थ में ला दिया है तो इससे बढ़ी चिंता और इससे बड़ा भगवान और कौन हो सकता है...? &lt;br /&gt;धर्मगुरु की अंगुलियां मोबाइल पर लिखे अंकों पर दौड़नें लगीं। उन्होंने जल्दी-जल्दी अपने समकक्ष धर्माचार्यों को इसकी जानकारी दी और बैठक बुला ली। सब कुछ तय हो जाने के बाद उन्होंने राहत की सांस ली। &lt;br /&gt;निर्धारित समय और स्थान पर सभी धर्मगुरु एकात्रित हुए। समस्या पर विचार-विमर्श आरंभ हुआ। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि यह कैसे हो गया? इसका निराकरण  या है?  &lt;br /&gt;-इस मामले में हमें उद्योगपतियों से बात करनी चाहिए। वे सरकार पर दबाव बनाकर कारीमा के राष्ट्रपति को रोक सकते हैं। एक धर्मगुरु ने अपनी लंबी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा।&lt;br /&gt;ऱ्यह असंभव है। माना कि उद्योगपतियों की हम पर अपार श्रद्धा है लेकिन वह हमारी बात  यों मानने लगे? उनकी भी तो कारीमा देश की बहुराष्ट्रीय कंपनियांे से साठ-गांठ है। वे भी तो उनके दबाव में हैं। जो खुद ही दबाव में हो वह किसी की  या मदद कर सकता है? और किसी पर  या दबाव डालेगा? यह सही है कि पंूजीपति राजनेताआें को चुनाव लड़ने के लिए चंदा देते हैं, लेकिन बदले में सरकार से अपने स्वार्थ के अनुकूल नीतियां बनवाते हैं। आज राजनेता जो फैसले ले रहे हैं, सबमें इनकी सहमति जरूरी होती है। ऐसे में इनसे मदद की उम्मीद करना ही बेकार है। यही नहीं यदि हमने अपने डर को इनके सामने व्य त कर दिया तो यह निडर हो जाएंगे। यदि इन्होंने हमसे डरना छाे़ड दिया तो हमें धन कहां से मिलेगा? अभी यह हमें धन इसलिए देते हैं,  योंकि यह हमारे रचे गए झूठ से डरते हैं। इसी का यदि खुलासा हो गया तो यह हमें गुरु तो दूर नौकर भी नहीं रखेंगे। मेरी समझ में हमारा इनकी शरण में जाना उचित नहीं होगा। अपना विचार व्य त करने के बाद दूसरा धर्मगुरु चुप हो गया। &lt;br /&gt;- हमें राजनेताआें से बात करनी चाहिए। एक अन्य धर्मगुरु ने सुझाव दिया। &lt;br /&gt;ऱ्यह भी संभव नहीं है। जो बात उद्योगपतियों पर लागू होती है, वही नेताआें पर भी। वैसे भी यह लोग कारीमा के राष्ट्रपति से पूछे बिना कोई काम नहीं करते। यह तो खुद ही दबाव में हैं। यदि इन्हें वरा वाली बात ज्ञात हो गई तो अनर्थ ही हो जाएगा। इसके बाद तो ये हमारा काम ही लगा देंगे। अभी तो ये हमारी शरण में इसलिए आते हंै, कयोंकि हमसे डरते हैं। हमारे बनाए संसार पर विश्वास करते हैं। हमारे रचे भगवान में इनकी आस्था है। आस्था इसलिए है  यांेकि हमारा भगवान शि तशाली है। वह कुछ भी कर सकता है। उसके प्रकोप से भयभीत रहते हैं। जब इन्हें यह ज्ञात हो जाएगा कि हमारे बनाए लोक सच नहीं थे, लेकिन अब उसे किसी और ने सच बना दिया है। यही नहीं उन्हें स्वर्ग में पहंुचाने के लिए नया देवता अवतरित हो गया है तो यह हमें लात मारने में एक सेकेंड की भी देरी नहीं करेंगे। &lt;br /&gt;-फिर उपाय  या है?&lt;br /&gt;-मेरे ख्याल से हमें चुप रहना चाहिए। इस मु े पर हम अपनी तरफ से अपनी क्षमतानुसार जो कर सकते हैं, करते रहें।  राजनेता, उद्योगपति और आम जनता में धर्म का प्रचार तेज करना होगा। धर्म से जु़डी चमात्कारिक घटनाआें को तेजी से प्रसारित करना होगा। इन्हें बताना होगा कि अधर्मी होते जा रहे हैं। इसका परिणाम यह होगा कि नरम में जाएंगे। जहां इन्हें बहुत यातना सहनी पड़ेगी। इनके बुरे कर्मों के कारण भगवान नाराज हो जाएंगे तो इनका सपना छिन्न-भिन्न हो जाएगा। हम लोगों को कुछ चमत्कार भी करने होंगे। ताकि इनकी आस्था हम पर और हमारे धर्म पर बनी रहे। खास करके उद्योगपतियों और राजनेताआें को भयभीत करके ही हम उनसे अपना मन चाहा काम करवा सकते हैं। &lt;br /&gt;- लेकिन इससे  या होगा?&lt;br /&gt;-जब हम उद्योगपतियों और राजनेताआें से यह कहेंगे कि वह जो नीतियां कारीमा देश के दबाव में लागू कर रहे हैं, वह ठीक नहीं है। उससे जनता को परेशानी हो रही है। समाज में विसंगतियां बढ़ रही हैं। लोगों में असंतोष बढ़ रहा है। सांस्कृतिक पतन हो रहा है। लोग अराजक होते जा रहे हैं। धर्म पर से आस्था खत्म होती जा रही है। ऐसी स्थिति में पूरी व्यवस्था चरमरा सकती है। जनता व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह कर सकती है। यदि यह सब ऐसे ही चलता रहा तो ऐसी नीतियों के निर्माताआें को नरक में जाना पड़ेगा। इससे भयभीत होकर नेता कारीमा के राष्ट्रपति पर दबाव बनाएंगे। उनके इस प्रेशर से तंग आकर शबू हमसे बात करेगा। हम उसकी मदद करने के एवज में अपना स्थान स्वर्ग में सुनिश्चित करा लेंगे। इस तरह हमारा काम भी हो जाएगा और किसी को खबर तक नहीं लगेगी। &lt;br /&gt;- लेकिन शबू हमसे बात  यों करेगा? &lt;br /&gt;-  योंकि वह जानता है कि धार्मिक समस्या का निराकरण धर्मगुरुआें के पास ही है। &lt;br /&gt;सभी धर्मगुरु एकमत हो गए। इसके बाद सभी अपने-अपने आश्रामों के लिए चले गए। निश्चिंत होकर पूजा-पाठ और प्रवचन देने लगे। यही नहीं नरक के भय से मु त होने के बाद इन धर्मगुरुआें ने जमकर मदिरा पान किया और स्वर्ग की जिस मस्ती की कल्पना उन्होंने की थी उसे अपने आश्रमों में साकार कर दिया...। स्वर्ग की अप्सराएं अपने हुस्न से इन्हें मदहोश करने लगीं...। राजनेताआें, नौकरशाहों, उद्योगपतियों और बदमाशों का इनके यहां मजमा लगने लगा। यह लोग भोग-विलास में लिप्त हो गए। यदि इनके खिलाफ कोई अवाज उठती तो इनके पाले बदमाश उनकी हत्या कर देते। राजनेता और नौकरशाह उन्हें कानूनी पचड़ों से बचा लेते...। इस तरह जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा वाली व्यवस्था अपने स्वर्णयुग कमें पहंुच गई....। &lt;br /&gt;स्वर्ग लोक में यातना गृह&lt;br /&gt;---------------&lt;br /&gt;शबू के सैनिक वरा को स्वर्ग लोक में लेकर पहुंचे तो हड़कंप मच गया। स्वर्ग लोक में एक ऐसी आत्मा पहुंची थी जिसके बारे में किसी स्वर्ग लोक कर्मी को जानकारी नहीं थी। इस आत्मा के साथ-साथ सशरीर पहुंचे सैनिक उनके आश्चर्य को और बढ़ा रहे थे। अभी तक स्वर्ग में आने वाली आत्मा को स्वर्ग के देवदूत ससम्मान लाते थे। पहली बार ऐसा हुआ था कि कोई आत्मा अपने साथ सशरीर आदमी लेकर आई थी। &lt;br /&gt;स्वर्ग के पहरी ने जब द्वार खोलने से मना किया तो शबू के सैनिक जबरन घुस गए। द्वारपालों को खूब मारा-पीटा भी। इसकी खबर मिलते ही स्वर्ग के राजा आग बबूला हो उठा। उनके नियम को अभी तक किसी ने चुनौती नहीं दी थी। आज ऐसी हिमाकत किसने कर दी। वरा को सैनिकों सहित राजा के दरबार में लाया गया।&lt;br /&gt;-कौन हो तुम लोग ? किसे लेकर आए हो?  या चाहते हो?&lt;br /&gt;-हम लोग कारीमा देश के सैनिक हैं। तरभा के पूर्व प्रधानमंत्री वरा की आत्मा लेकर आए हैं। हमारे राष्ट्रपति का आदेश है कि वरा अब यहीं रहेंगे।&lt;br /&gt;-लेकिन वरा के लिए स्वर्ग में तो कोई जगह नहीं है। इन्हें नरक में ही जाना होगा।&lt;br /&gt;-वरा यहीं रहेंगे। इनके लिए आपको यहीं जगह बनानी होगी नहीं तो.....। &lt;br /&gt;- नहीं तो  या? &lt;br /&gt;- नहीं तो हम आप और आपके इस लोक का अस्तित्व ही खत्म कर देंगे। शायद आपको नहीं पता कि अभी तक आप कल्पना लोक के काल्पनिक राजा थे। मेरे देश के राजा ने आपको और आपके इस वैभव को मूर्त रूप दिया है। आप हमारी बौद्धिक संरचना और संपत्ति हैं। &lt;br /&gt;ऱ्यह आपकी गलतफहमी है महोदय। मेरा अस्तिव मूर्त रूप में पहले से ही था। तुमने कोई संरचना नहीं की है, न ही हम तुम्हें जानते हैं। यदि मैं यह मान भी लूं कि तुमने मुझे और मेरे लोक को सृजित किया है तो भी यह सच है कि मैं या मेरा लोक या मेरी व्यवस्था सदियों पुरानी है। &lt;br /&gt;-हम बहस नहीं करते। सच चाहे जो भी हो, वरा यहीं रहेंगे&lt;br /&gt;ऱ्यदि मैं इनकार कर दूं तो?&lt;br /&gt;-तो हम आपको बर्बाद कर देंगे।&lt;br /&gt;-चूंकि मैं शांति में विश्वास करता हंू और हिंसा में मेरा विश्वास नहीं है इसलिए मेरे पास तुम्हारी तरह न तो सेना है न ही हथियार। सो मैं वरा को रख लेता हूं, लेकिन इन्हें धरती पर किये गए अपने कर्मों की सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी। &lt;br /&gt;-वरा यहीं रहेंगे। इसके बाद तुम्हें जो करना हो करो। हमारा काम था इन्हें यहां तक पहुंचाना। आगे तुम जानो और यह वरा। यह कहकर कारीमा के सैनिक चले गए। उनके जाने के बाद वरा को घबराहट होने लगी। उसका दम फूलने लगा। &lt;br /&gt;- इसकी रहने की व्यवस्था यातना गृह में कर दी जाए। राजा ने आदेश दिया तो दो देवदूत वरा को ले जाकर एक कमरे में छोड़ दिए।  &lt;br /&gt;कमरे की दीवरें चांदनी की तरह सफेद थीं। उन पर कुछ भी नहीं टंगा था। एक कोने में एक टीवी सेट लगा था। कमरे में एक बेड था। उस पर बिस्तर लगा था। वह लंबी यात्रा के कारण वरा थक गया था। बेड पर आंख बंद करके लेट गया और सोचने लगा कि यह कैसा स्वर्ग लोक है? सुना था यहां तो बहुत अराम होता है? कष्ट होता ही नहीं। फिर इस यातना गृह का  या मतलब? वह सोच ही रहा था कि कमरे में केवल अधोवस्त्र पहने एक स्त्री ने प्रवेश किया। &lt;br /&gt;-सो गए  या वरा? अपना नाम स्त्री की आवज में सुनकर वरा चौंका। सामने औरत को देखकर बैठ गया।&lt;br /&gt;-थकान के कारण झपकी लग गई थी। वह सकुचाते हुए बोला। &lt;br /&gt;-कैसा लग रहा है? स्त्री ने पूछा।&lt;br /&gt;-ठीक है, लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आई की स्वर्ग में यातना गृह का  या मतलब? &lt;br /&gt;-धीरे-धीरे सब समझ जाओगे। स्त्री मुस्कुराई और अपने अधोवस्त्रों को उतार कर फेंक दिया। वरा ने आंखें बंद कर लीं। &lt;br /&gt;- या कर रही हो? वरा के मुंह से बरबस ही निकल गया। स्त्री ने वरा के प्रश्न का कोई जवाब न देकर उससे चिपट गई। हाथों से वरा की छाती को सहलाया, होंठों को वरा के होंठों पर रख दिया। कुछ ही पल में वे निढाल होकर अलग हो गए...। स्त्री उठी अपने अधोवस्त्रों को पहना और चली गई, चुपचाप। उसके जाने के बाद फिर एक स्त्री आई। उसने भी वरा के साथ वही किया जो पहली स्त्री कर गई थी। उसके जाने के बाद फिर एक स्त्री आई और उसने भी वही सब किया जो उससे पहले वाली औरतों ने किया था। बाद वाली औरत चुपचाप नहीं गई।&lt;br /&gt;-वरा स्वर्ग लोक अच्छा लग रहा है? स्त्री ने अधोवस्त्रों को पहनते हुए पूछा।&lt;br /&gt;वरा कुछ नहीं बोला। उसकी समझ में ही नहीं आया कि  या जवाब दे। इससे पहले कि वह कुछ बोलता युवती ने अपना अगला सवाल दाग दिया।  &lt;br /&gt;-ऐसे ही स्वर्ग लोक की कल्पना की थी ना तुमने? &lt;br /&gt;वरा फिर चुप रहा। &lt;br /&gt;-तुमने मुझे पहचाना?&lt;br /&gt;-नहीं।&lt;br /&gt;- मैं तुम्हारे देश की लड़की हूं। हमें यहां इसी काम के लिए लाया गया है। मेरी तरह यहां न जाने कितनी लड़कियां हैं। सब जबरन पकड़कर लाई गई हैं। यहां सबसे यही काम कराया जाता है। किसी के लिए हमारा शरीर याताना दायक है, तो किसी के लिए मनोरंजन का साधन। जब हमारी जवानी ढल जाती है तो हमें जहर देकर मार दिया जाता है। वरा से कुछ बोला नहीं गया। वह चुप रहा। &lt;br /&gt;-ऐसा  यों किया वरा तुमने? जिस स्वर्ग को तुमने अपने लिए खरीदा वह नरक से भी बदतर है। तुमने अपने देश के लाखों-करोड़ों लोगों को जीते जी नरक में धकेल दिया। अपने सुख के लिए। तुम्हें  या सुख मिला? जानते हो यह हमारा स्वर्ग लोक नहीं है। यह कारीमा देश की बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बनाया स्वर्ग लोक है। यहां धरती के देशों के तुम्हारे जैसे लोग आते हैं। उनके साथ ऐसा ही बर्ताव किया जाता है। यह एक चाल है। अभी इस कमरे में जो हुआ, उसकी फिल्म बनाई गई है। उसे यह कंपनी दुनिया भर में बेचेगी और पैसा कमाएगी। यह सुनकर वरा का चेहरा काला पड़ गया। दर्द का समुद्र उसके चेहरे पर हिलोरे लेने लगा। दर्द के सागर की उत्पात मचातीं लहरें उसकी चेतना को झकझोर रही थीं। &lt;br /&gt;लड़की ने कमरे में लगा एक स्वीच दबाया तो टीवी सेट पर जो तस्वीर उभरी उसे देखकर वरा का मुंह खुला रह गया। थोड़ी देर पहले जिन तीन लड़कियों से उसने शारीरिक संबंध बनाए थे उसी की फिल्म चल रही थी। वरा ने माथा पकड़ लिया। -कृपया इसे बंद कर दो। &lt;br /&gt;-चैनल बदलने से कोई फायदा नहीं होगा,  योंकि यहां पर अधिकतर ऐसी ही फिल्में दिखाई जाती हैं। आपकी तसल्ली के लिए मैं चैनल बदलती हूं। &lt;br /&gt;लड़की चैनल बदलने लगी, लेकिन सभी चैनलों पर वैसी ही फिल्म चल रही थी। लड़की चैनल पर चैनल बदलती रही। एकाएक उसकी अंगुलियांे ने हरकत करनी बंद कर दी। टीवी स्क्रीन पर जो दृश्य चल रहा था उसे देखकर वह अवाक थी। &lt;br /&gt;-वरा यह देखो। वरा भी देखने लगा। एक गोल मेज के ईद-गिर्द सात लोग सूट-बूट पहने बैठे हैं। उनकी निगाहें उस कमरे में लगे एक टीवी पर टिकी हैं। दूर-दूर तक फैली गंदी बस्तियों को कैमरा अपने दामन में समेट रहा है। उसकी सूक्ष्म निगाह हर एक बस्ती की प्रत्येक वस्तु और गतिविधियांे को टटोल रही है। बस्ती के लोग मैले-कुचैले कपड़ों में इधर-उधर आ-जा रहे हैं। कुछ लोग आपस में लड़ रहे हैं। गंदे-गंदे बच्चे फटे कपड़े पहने मिट्टी में लोट-पोट रहे हैं। बस्ती में ऐसा एक भी आदमी नहीं है जिसे तंदुरुस्त कहा जा सके। बहुत सारे लोग तो बीमार हैं, फिर भी कोई न कोई काम कर रहे हैं। कैमरा दुनिया के तमाम देशों की ऐसी तमाम बस्तियों में घूमता है और फिर अपना रुख बदल लेता है। अब उसकी जद में हजारों नवयुवकों की भीड़ है। सभी नारे लगा रहे हैं। कैमरा पूरी दुनिया में ऐसी भीड़ को ढ़ूंढकर अपने अंदर कैद करता है और दिखाता है।&lt;br /&gt;- मलीन बस्ती वाले तो हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते, लेकिन यह युवकों की भीड़ हमारे लिए खतरा है। गोल मेज के ईद-गिर्द बैठे उन सातों में से एक ने कहा। यह दृश्य यही लोग देख रहे थे। इसी समस्या पर विचार -विमर्श के लिए यह लोग बैठे थे। &lt;br /&gt;-खतरा हमें इन युवकों से ही नहीं, मलीन बस्ती से भी है। समझदारी इसी में है कि हम इन खतरों को समूल नष्ट कर दें।&lt;br /&gt;-हम इन सब को काम तो दे नहीं सकते। वैसे भी जब कारखानों में कंप्यूटरयुक्त रोबेट लगाए हों तो आदमी के लिए काम कहां बचता है? इस धरती पर ऐसे लोग फालतू हैं। इनका मिट जाना ही ठीक है। इन्हें मार देना चाहिए।&lt;br /&gt;-नहीं, यह हमारी समस्या का निदान नहीं है। यदि हमने इन्हें मार दिया तो हम भी मर जाएंगे। धरती पर यह लोग हैं इसलिए हम हैं, हमारी व्यवस्था है। हमारा साम्राज्य है। इन्हीं से हैं हमारी सुख-सुविधाएं। &lt;br /&gt;-लेकिन यह हमारे खिलाफ हैं। इनका इस्तेमाल हमारे विरोधी कर रहे हैं। इन्हें सबक सिखाना ही होगा।&lt;br /&gt;- हमें इनका इस्तेमाल करना होगा।&lt;br /&gt;- हम इन्हें मौत तो नहीं दे सकते, न ही इनका जीवन सुधार सकते हैं। यदि ऐसा करने लगे तो हमें भारी नुकसान होगा। लेकिन हमें इन्हें काम तो देना ही होगा। हमें अपना चेहरा थोड़ा मानवीय और थोड़ा उदार बनाना होगा। इससे हमारी अलोचना कम होगी और हमारा काम भी बन जाएगा। हमारे विरोधी गोलबंद भी नहीं हो पाएंगेे।&lt;br /&gt;- लेकिन हमें करना  या होगा?&lt;br /&gt;- हमें करना यह चाहिए कि कुछ कल्याणकारी योजनाएं चलाएं। समाज कल्याण के लिए बेरोजगारी भत्ता वगैरह दें। कुछ ऐसे करखाने चलाएं जहां इन्हें काम मिल सके। &lt;br /&gt;-इससे  या होगा? &lt;br /&gt;-इससे यह इस व्यवस्था से जु़डे रहेंगे। हम इन्हें सपने दिखाएंगे। इन्हें हम बताएंगे कि तुम भी धनी बन सकते हो पर इन्हें बनने नहीं देंगे। सपने कराे़डों लोग देखेंगे पर पूरा किसी एक का ही होगा। लेकिन उसी चक्कर में सभी इस व्यवस्था में जिंदा रहेंगे। &lt;br /&gt;-हंू, समझा! जैसे अभी आप कह रहे थे कि तरभा और नची भविष्य के विकासति देश हैं, लेकिन उन्हें बनने नहीं देंगे। &lt;br /&gt;-आपने बिलकुल सही पकड़ा। दुनिया में शि तशाली तो हमारी बिरादरी ही रहेगी। हमारी खुफिया एजेंसी यह विश्लेषण तरभा और नची के लिए ही नहीं, बल्कि हमारे लिए किया है। हमेंं सावधान करने के लिए। हम इन्हें विकसित देश कभी नहीं बनने देंगे, लेकिन इन्हें इसका एहसास भी नहीं होने देंगे कि हम इनके विकास में बाधा हैं। आखिरकार यह लोग हैं तभी तो हम हैं। हा हा हा।&lt;br /&gt;सभी हंसते हैं - हा हा हा हा हा हा हा । &lt;br /&gt;- तो हां, हमें धरती के उन लोगों को, जिन्हें अभी हमने स्क्रीन पर देखा अपने लिए उपयोग करना होगा। उन्हें लालच देकर, सपने दिखाकर छोटे-मोटे काम देकर। इस तरह वह जिंदा रहेंगे, लेकिन हमारे लिए।  &lt;br /&gt;-मैं इससे सहमत नहीं हूं। ऐसे लोगों को पालना बेवकूफी होगी। ये हमारी तर की में व्यवधान हंै और हमारी सभ्यता पर कलंक।  &lt;br /&gt;- लेकिन आप भूल रहे हैं कि यह हमारी जरूरत हैं। सस्ते श्रम के लिए, हमारी सेना के लिए, दवाआें के प्रयोग केलिए हम इनका इस्तेमाल करते हैं। यह नहीं रहेंगे तो हम इन कामों के लिए आदमी कहां से लाएंगे? यह हमारे लिए वस्तु हैं। इनका हमें उपयोग करना है, वस्तु की तरह, लेकिन मानवीय तरीके से। आखिरकार हम भी इंसान हैं। &lt;br /&gt;-टीवी स्क्रीन से सातों महानुभाव गायब हो गाए। लड़की ने उन्हें चैनल बदलकर खोजने की कोशिश की पर नाकाम रही। स्क्रीन पर फिर अश्लील फिल्म चलने लगी। खीज कर उसने टीवी बंद कर दिया।&lt;br /&gt;-देखा आपने? इनकी सोच कितनी घातक और घिनौनी है। आप जैसे सत्ताधारियों को लालच देकर यह लोग पूरी दुनिया में अपनी मनमानी चला रहे हैं। लोग भूख से, प्यास से, गंदगी से, बीमारी से मर रहे हैं, लेकिन इनको किाी की परवाह नहीं है। वैसे तो यह मानवाधिकार के ठेकेदार बनते हैं, लेकिन सब दिखावे के  लिए। आज यह लोग अपनी योजना में कामयाब हैं तो आप जैसे लोगों की वजह से। लड़की ने वरा की तरफ गुस्से से देखा। &lt;br /&gt;ऱ्यह अपने मंसूबे में कामयाब नहीं होंगे। वरा ने कहा। &lt;br /&gt;-होंगे नहीं, हो गए हैं। लड़की ने मुस्कुराकर कहा। उसने टीवी चालू कर दिया। &lt;br /&gt;ऱ्यह देखिए आपके देश की तस्वीर।&lt;br /&gt;टीवी स्क्रीन पर महानगरों का अलीशान इलाका उभरता है। बहुमंजिली शानदार कोठियां, साफ-सुथरी सड़क, उन पर दौड़ती महंगी गाड़ियां, गाड़ियों में महंगे कपड़े पहनकर बैठे लोग। उनके हाथों मेंं कंप्यूटर और कान में मोबाइल फोन लगा है। वह गाड़ियों में भी काम कर रहे हैं। (दृश्य को दिखाते हुए कोई कमेंटरी भी करता चल रहा है) यह लोग हमेशा काम करते दिखते हैं। मौज-मस्ती भी खूब करते हैं। होटल जाते हैं, और एक रात में कई लड़कियां बदलते हैं। लड़कियां जो एक रात के लिए लाखों लेती हैं। होटल वाले इनके इन क्रिया-कलापों की फिल्म बनाते हैं और उसे बेचकर कराे़डों रुपये कमाते हैं। धनबलियों के इन कारनामों को मलीन बस्ती वाले भी देखते हैं और मस्त हो जाते हैं। धनबलियों के इन इलाकों में राजनेता, उद्योगपति, नौकरशाह रहते हैं। इनकेयहां आते हैं धर्मगुरु। सत्ता, पैसा, धर्म और बाहुबल का गठजाे़ड क्रूरता का तां़डव करता है। आम जनता को अपने हाल पर छाे़डकर ये सभी ऐय्याशी में मस्त रहते हैं। धर्मगुरुआें के आश्रामों में बाझ औरतें गर्भवती हो जाती हैं। धर्मगुरु शाम को भगवान की आरती के बाद रंगीन दुनिया में खो जाते हैं, जहां होती हैं कई निर्वस्त्र औरतंे और उन्हें पाठ पढ़ाते धर्मगुरु। &lt;br /&gt;धर्मगुरु पैसों वालों को साक्षात दर्शन देते हैं जबकि गरीबों को आश्रम में लगे टीवी सेट पर। धर्मगुरु के चेलों की नजर आश्रम में आने वाली लड़कियोें, औरतों की चुनरियों पर होती है। जो जंच गई, वह गायब हो जाती है और रात को धर्मगुरु के रंगशाला में मिलती है। निर्वस्त्र धर्मगुरु उन्हें काम केगुण सिखाते हैं फिर उसकी फिल्म बनती है और बिकती है पूरी दुनिया मेें। उससे भी कमाया जाता है पैसा। महानगर के इस इलाके में वे लोग भी रहते हैं जो राजनेताआें और धर्मगुरुआें और पैसे वालों केलिए हत्या, लूटपाट और मारपीट करते हैं। उनका अच्छा-खासा दबदबा है। ऐसे लोगों के गुर्गे मलीन बस्तियों मेंं रहते हैं। इनके आका कभी नहींं पकड़े जाते, जबकि यह जो करते हैं आका के कहने पर करते हैं।&lt;br /&gt;महानगर का यह इलाका मलीन बस्तियों से चारों तरफ से घिरा है। देखकर लगता है जैसे दरिद्रता के समुद्र में संपन्नता के टापू। शहर के प्रत्येक चौराहे पर बेरोजगारों की भीड़। सुबह अपने श्रम को बेचने के लिए चौराहों पर खड़े होते हैं लोग। बहुत सारे लोग इन्हें सपने दिखाते हैं और लूटकर फरार हो जाते हैं। यहां दिनोंदिन संपन्नता बढ़ रही है। उसी गति से असमानता और गरीबी भी बढ़ रही है। कुछ लोग इसकी चिंता करते हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है। वे संगठित नहीं हैं। कोशिश करते हैं संगठित होने की, तो उन्हें बिखेर दिया जाता है। सत्ता मानवीय चेहरे की आड़ में कू्रर से क्रूरतम हो गई है। सत्ता प्रमुख बहुत मीठा बोलता है, लेकिन उसका तंत्र ठीक उसके विपरीत काम करता है। &lt;br /&gt;- देखा आपने  या दशा हो गई आपके देश की? आप कहते हैं कि उनके मंसूबे कामयाब नहीं होंगे। लड़की ने कहा। &lt;br /&gt;ऱ्यह अपनी कब्र खुद खोद रहे हैं। अधिक दिन ऐसा नहीं चलेगा। इनकी चाल एक दिन तार-तार हो जाएगी। वरा ने जवाब दिया। &lt;br /&gt;- पता नहीं कब ऐसा होगा? कहते हुए लड़की वरा को गले लगा लेती है। &lt;br /&gt;-हम काफी देर से बातें कर रहे हैं। हमारी गतिविधियों पर उनकी निगाह है। हमें अपना काम करना होगा। नहीं तो हम मुसीबत में फंस जाएंगे। लड़की ने दबी जुबान से कहा और वरा को उत्तेजित करने के लिए उसके संवेदनशील अंगों पर अपना कोमल स्पर्श करने लगी।&lt;br /&gt;वे 'काम` में मग्न थे कि टीवी स्क्रीन से धमाके की आवाज सुनाई दी। वह झटके से अलग हो गए। देखा धरती के किसी देश में गरीबों ने विद्रोह कर दिया है। उन्होंने महानगरों के अलीशान कोठियों को तहस-नहस कर सत्ता अपने हाथ में ले ली है....। वरा लड़की की तरफ देखकर मुस्कुराता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- ओमप्रकाश तिवारी &lt;br /&gt;मुख्य उपसंपादक &lt;br /&gt;अमर उजाला, जालंधर- २१, &lt;br /&gt;मोबाइल : ०९९१५०२७२०९&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-6876279169180109542?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/6876279169180109542/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=6876279169180109542' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/6876279169180109542'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/6876279169180109542'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2008/05/blog-post.html' title='विखंडित चेहरे वाला भगवान'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-711232617930025271</id><published>2008-02-29T23:33:00.000+05:30</published><updated>2008-02-29T23:35:14.367+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>फैसला</title><content type='html'>कहानी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रणविजय सिंह सत्यकेतु &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरवाजे पर भीड़ देख समर को विश्वास हो गया कि बाबूजी गए। शायद इसीलिए नीतू ने उसे फोन पर केवल इतना बताया कि तुरंत आ जाएं बिना देरी किए। अभी तो दस दिन पहले गया था नीतू और मि की को गांव छोड़ने के लिए। बीमार-सीमार पड़े होते तो लोग टांग-टूंग कर उसके पास ले आते बाबूजी को इलाज केलिए। लेकिन लगता है उन्होंने इसका मौका ही नहीं दिया। जिंदगी भर कड़क रहे और अपनी अकड़ में ही चले गए। न किसी की सेवा ली और न एहसान। माना कि उससे उनकी नहीं पटती थी, लेकिन थे तो आखिर पिता ही। तो  या हुआ अगर वह चाहते थे कि उन जैसे बड़े जोतदार का बेटा किसी कार्यालय में बड़ा बाबू की नौकरी नहीं करे। यह उनका मिजाज था जो न बदल सकता था न बदला। उसने भी तो उनकी एक नहीं मानी। इकलौती औलाद था, दर्जन भर नौकर-चाकर। दो सौ एकड़ उपजाऊ जमीन, दर्जनों माल-मवेशी। ऐश करता। जैसी कि बाबूजी की दिली ख्वाहिश थी कि उनका बेटा मुस्तैदी से उनकी विरासत संभाले जिस पर गोतिया-दियाद की बुरी नजर लगी हुई है। मगर सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबूजी की बरगदी छाया से निकलने की छटपटाहट से ज्यादा उसे उनकी झूठी राजपूती अकड़ से निजात पाने की जिद थी। जिला सचिवालय में हेड  लर्क बनकर उसने अपने लिए सही में कोई तीर नहीं मारा था, लेकिन बाबूजी की शान को ध का जरूर पहुंचाया था। इस कारण वह न केवल बेटे की ओर से विर त हो गए थे, बल्कि खुलेआम उसे खानदान में जन्मा एक भ्रष्ट आत्मा कहते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीतू को शहर में साथ रखना और मि की को ऊंची तालीम दिलाना भी कभी बाबूजी केगले नहीं उतरा। लेकिन जब एक बार चुप्पी साध ली तो फिर निभा ही गए। आखिरी सांस लेने से पहले भी नहीं बुलाया कि देख लें एक नजर...क्षमा ही कर दें। नहीं, दुश्मन मान लिया तो मान लिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे-जैसे समर दरवाजे की ओर बढ़ रहा था, अपराध बोध से ग्रस्त होता जा रहा था। सैकड़ों लोगोंं की भीड़ का आक्रामक खुसर-फुसर और घूरती आंखें उसके कदमों पर भारी पड़ रही थीं। जैसे तेज धारा के विपरीत कदम रख रहा हो। लोग भी तो उसे कुलंगार और कपूत ही समझते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन दालान पर चढ़ते ही सामने बाबूजी बैठे मिल गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समर अचकचा गया। उसके ललाट सिकु़ड गए। दिमाग कौंधा और कलेजा धक से रह गया।...तो  या मायजी चली गइंर्। उसे लगा जैसे शरीर की सारी ऊर्जा निकल कर धरती में समा गई हो। अचानक पूरा शरीर ढीला पड़ गया हो। एक मायजी ही तो थीं जिनका चेहरा देखने और दुलार पाने के लिए न चाहते हुए भी वह घर लौटता था। मायजी थीं तो घर था, अब वह किसके लिए यहां आया करेगा। यह दुनिया तो उसके लिए पहले ही बेगानी थी, अब बिल्कुल वीरान हो गई। उसका बाबूजी की सामाजिक प्रतिष्ठा और उनकी निजी चाहत के खिलाफ जाना तो मायजी को भी रास नहीं आया था लेकिन अपनी  लर्की में ही अगर वह खुश था तो उन्हें कोई ऐतराज न था। कभी अपने मन की न कर पा सकने वाली शिक्षित, सलज्ज और समझदार मायजी ने उसके मन की खुशी को अपने तइंर् कबूल कर लिया था। कहती थीं, 'अच्छा ही हुआ तू अपने बाप की राह पर नहीं गया जो अपनी बदरंग होती हैसियत को दिखावे के ठाट-बाट के नील-टीनोपॉल से चमकाने की कोशिश में ही जिंदगी गुजारने को विवश हैं। कम-से-कम तू अपने मन की सुनता-करता तो है। चिंदी-चिंदी हुए खानदानी लिहाज को ढोने से आजादी मैं न सही, मेरी बहू तो पा सकी।` मि की की ऊंची तालीम को लेकर पिता से जारी मतभेद को लेकर समझाती थीं, 'बेटा, लड़ाई अपने लिए नहीं, आने वालों के लिए लड़ी जाती है। प की और स्थायी जीत उसी की होती है जो ऐसा सोचकर मैदान में उतरता है।` बाबूजी के भुनभुनाने और उसके लाख मना करने के बावजूद मायजी झोले में घी का ड?बा, अचार, ठेकुआ, लाय, चने का स?ाू और न जाने  या- या सहेज देती थीं। कहती थीं, 'मैंने तो दे दिया। अब चाहे खुद खाना चाहे राह चलते बांटना। जब तक सांस है झोला भरती रहूंगी, बाद में जाने  या होगा। एक तू तीतर, दूसरा तेरा बाप बटेर। ठाकुर जी ही रच्छा करेंगे।`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेटे को सामने आता देख बाबू सर्वदानंद पलंग से उठ खड़े हुए। ऊंचा कद, भरपूर काठी ७० पार करने पर जैसे और तन गई थी। चेहरे पर छाई बड़ी-बड़ी मूंछें आंखों के रौब को और ज्यादा असरदार बना रही थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता का रुख देख समर समझ गया कि मायजी के मरने का ठीकरा उसी के सिर फोड़ा जाएगा। लेकिन कम-से-कम ऐसे व त तो उन्हें संयमित रहना ही चाहिए। आशंकित समर आगे बढ़ता गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बौखलाए बाबू सर्वदानंद ने पैर छू रहे बेटे को आंगन की ओर गलियारे में खींचा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता के आक्रामक रुख से समर की सांसें फूलने लगीं। इस तरह सबके सामने बांह पकड़कर खींचे जाने से अपमानित महसूस कर रहा था। झुंझलाहट मेंं उसकेमुंह से निकला, 'हुआ  या?` &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबू सर्वदानंद ने दांत किटकिटाए, 'होने को अब रह ही  या गया है रे कुलंगार। हमसे बैर किया, वो भी ठीक था। लेकिन औरत की बातों में आकर खानदानी रसूख भूल जाएगा, सोचा न था। उलाहने का स्वर फूटा, 'जो न कराए औरत जात, राह छितराए रोटी भात।`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबूजी की वक्रोि त से समर आश्वस्त हुआ कि मायजी सलामत हैं। फिलहाल उनके निशाने पर उनकी पत्नी नीतू है। मन ही मन थाह लगाने की कोशिश की कि मामला कहां तक बिगड़ा हुआ हो सकता है। नीतू को बाबूजी पसंद नहीं करते थे, इसके लिए गाहे-बगाहे वह उलाहने देते ही रहते थे। लेकिन आज उनका रुख सामान्य नहीं है। यदि नीतू पड़ोस की किसी महिला से लड़ी होती तो बात इतनी नहीं बढ़ती। भीतरी दुराव चाहे जितनी हो, नीतू है तो आखिर उनकी बहू ही। टोले वालों को दरवाजे पर यूं मजमा नहीं लगाने देते बाबूजी। मायजी से लड़ी होती तो वही बात को दबा देतीं। लगता है नीतू ने बाबूजी की किसी तीखी बात का उसी अंदाज में जवाब दे दिया। बातों-बातों मेंं कहीं हिस्सेदारी की बात न कर गई हो। बाबूजी के बोल से तो यही निथड़ रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'पीढ़ियोंं की नाक झटके में कट गई।` बाबू सर्वदानंद की आंखों से अंगारे बरस रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समीर का सिर चकरा गया। तो  या नीतू ने ऐसा कुछ कर-कह दिया कि समाज में बाबूजी को नीचा देखना पड़ा? वह तो हमेशा ही समझाता रहता था नीतू को कि बाबूजी के कहे पर जब तक बहुत लाजिमी न हो, जबाव देने की सोचे ही नहीं। उनके अहं से निर्वाह केवल परहेज से संभव है। है वह उनकी बहू मगर बाबूजी मानते नहीं न। एक तो वह गरीब घर की बेटी थी, दूसरे उनके बेटे से प्रेम विवाह किया। ध का लगा था उनकी शान को, समाज में उन्हें बेटे-बहू के लिए उल्टी-सीधी बातें सुननी पड़ी थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहां तो बड़े जोतदारों-जमींदारों के यहां से मालामाल रिश्ते आते थे, कहां उनके इकलौते बेटे की शादी में बारात तक नहीं सजी। सोचा था रिश्ते-नातेदारों के अलावा गांव-जवारियों को न्यौत कर खूब जश्न मनाएंगे लेकिन वह तो समाज के लोगों के लिए एक शाम का भोज तक नहीं कर सके। इलाके के हजारों मुख से निकले तानों के तीर से मर्माहत बाबू सर्वदानंद ने उसकी ओर से मुख ही मोड़ लिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भन्ना गया समर। गुस्सा आया उसे नीतू पर। न सोचकर बोलती है न ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबू सर्वदानंद दांतों पर दांत और बौंकुरी पर हाथ की पकड़ मजबूत करते हुए बोले, 'कहा था कि चार-पांच दरजा पढ़ा कर छुट्टी करो। लड़की जात बहुत पढ़ेगी तो दिमाग फिर जाएगा। देह पर की ओढ़नी दुआर पर सुखाएगी। मगर नहीं...तुम्हें समझाने वाला कौन पैदा हुआ है। एक नहीं सुनी मेरी। कहा, जमाना बदल गया है। लौंडे-लौंडियों में अब कोई फर्क नहीं रहा।...अरे, मैं कहता हूं मूरख! बदल जाए सारी कायनात, लड़की की देह तो वही रहेगी? कौन पीर-प्रभु उसे झुठला देगा?`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समर के पैरों तले जमीन खिसकती नजर आई। अब उसकी समझ में असल बात आई कि बाबूजी और दरवाजे पर इकट्ठी भीड़ के निशाने पर उनकी बेटी मि की है। तो  या मि की ने दस दिनों में ही ऐसा कुछ कर दिया कि घर की इज्जत पर बन आई। उसकी कंपकंपी छूट गई। उसने तो हर तरह से मि की को समझा दिया था कि महीने भर की छुट्टी हंसी-खुशी बिता ले। जहां तक बाबूजी का विस्तार है, उनकी आंखें वहां तक की प की दीवारों को भी भेद डालती हैं। इसलिए यहां की दहलीज और दस्तूर का कोशिश भर खयाल रखे। यह मानकर चले कि यह उसके बाप का नहीं, बाप के बाप का घर है जहां हंसने-रोने का भी कायदा तय है। मि की ने भी उसे भरोसा दिलाया था कि वह...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जलालत के आंसू आंखों में मिर्ची की तरह लगे। लेकिन खुद को संभालने की कोशिश करते हुए पूछा, 'कुछ साफ भी तो करिए!`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'पहले चन्नर के पिल्ले का सिर फोड़ने की तैयारी करो`, बाबू सर्वदानंंद के आदेश में खून छलक रहा था। यह उनके विद्रोही और अपनी मर्जी से जीने वाले बेटे से जु़डा मसला था, वरना वह समर से पूछने-कहने तक का सब्र न करते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;' यों,  या किया उसने?` समर का दिल पिता के लहजे से बैठने लगा था। ऐसी अबस हालत पिता के सामने उसकी कभी नहीं हुई थी। जातीय दंभ से भीगे उसके जज्बाती पिता के हाथ आज ऐसी नाजुक डोर लग गई थी जिसे एक झटकेमें तोड़कर उसकीआजाद खयाली को धूल चटाने को उद्धत थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बाड़ी में आकर हरामजादे ने मि की का हाथ पकड़ लिया और चिट्ठी थमा दी।` उबल रहे थे सर्वदानंद के श?द।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;' या कह रहे हैं आप?` समर की विस्फारित आंखों में कातरता और अविश्वास हिलोरें मार रहे थे। दिमाग की नसें अपमान के खून से फूल कर उसकी चेतना के द्वार बंद कर रही थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बाप हूं तुम्हारा, झूठ बोलूंगा!` एक-एक श?द चबाया था बाबू सर्वदानंद ने गोया बेटे को धि कार रहे हों कि इतने नामर्द हो...ऐसे ऐतिहासिक मुद्दे को झुठलाने की कोशिश कर रहे हो जिस पर हमारी तलवारों ने खून की नदियां बहाई हैं। उसी रौ में बिफरे, 'उस पर से उस बि?ो भर की छोकरी की ये मजाल कि चिट्ठी किसी को दे नहीं रही है!`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हकलाए-अकबकाए समर की आंखों मेंे अपनी तर्जनी पर नाचती हिकारत को उड़ेलते हुए बाबू सर्वदानंद किटकिटाए, 'इसी भय से हमने एक-दो नहीं पांच-पांच बेटियों को जन्मते ही जमीन में गाड़ दिया था। वरना किस बात की कमी है हमारे पास...एक-एक को पैसे से तौल देता, लेकिन नहीं...जानता हूं कि बड़ी कु?ाी चीज होती है ये औरत जात। भौंकने-झिड़कने का नाटक कर मजमे लगाकर घूमती है द्वार-द्वार।` &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तमतमा गया समर। जी चाहा कि...। 'उफ् ...` पस्त मन समर ने आंखें मूंद ली, होठों को भींचा लिया और दे मारी मुट्ठी दीवार पर। अगले ही पल पिता को बिना कुछ कहे सनसनाता हुआ आंगन चला गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीतर दियादिनें-पड़ोसिनें अलग ही झौं-झौं कर रही थीं। समर को देख चुप होते-होते और बगलें दाबते-दाबते भी मि की के बारे में बहुत कुछ कह गइंर्। उन सब पर उखड़ती मगर अंगार नजर डालता समर अपने कमरे की ओर बढ़ गया। किवाड़ के पास ही मायजी सामने खड़ी थीं। बोलीं, 'ऐसे में होश खोना ठीक नहीं। सजा तब मिले जब गुनाह तय हो जाए। और गुनाह किसी की निजी पसंद-नापसंद से तय नहीं हो सकता। उसके लिए वाजिब कारण होने चाहिए। बाकी तुम खुद समझदार हो...और बेटी भी तुम्हारी ही है।`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किवाड़ के पीछे पलंग के सिरहाने पाए के सहारे खड़ी थी मि की। उतरे हुए चेहरे से जमीन को निहारे जा रही थी। कमरे में प्रवेश करने से पहले ही समर ने पायताने की तरफ लगे आदमकद शीशे में मि की को देख लिया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शीशे के बगल वाली कुर्सी पर झुंझलाई-सी बैठी नीतू से उसका सामना हुआ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पलंग के बीचोबीच समर ठिठक गया। नीतू कुर्सी से उठी नहीं। बड़ी-बड़ी आंखों से समर पर ऐतराज बरसाने लगी, 'कहा था, हमें जब तक यहां रखो, उतने दिन खुद भी रहो। वरना हमें अकेला छोड़ो ही नहीं। यहां के दिमाग में हम नहीं खप सकते। हर कदम बंदिशों के बारूदी सुरंग बिछे हैं। बिना खाद-पानी कयासों-तोहमतों की खेती होती है। या तो यहां के लोग जंगली हैं जो हमारी खुशमिजाजी को भी शक की नजर से देखते हैं या फिर हम अजूबे हैं जो इनके असली मकसद को समझते हुए भी झुठलाने का नाटक करते हैं।`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आवेश में खड़ी हो गई नीतू। मि की की तरफ इशारा करते हुए बोली, 'बहुत गलत नक्षत्र में पैदा हुई थी हरामजादी। अपनी जिद की अकेली है। लाख कहा कि दे दो चिट्ठी मांग रहे हैं तो। नहीं, दांत गड़ा कर बैठी है कि पापा को ही देगी। तो दो, आ गए पापा-झापा।` फुफकारती हुई नीतू कमरे से निकल गई। जाने से पहले इतना जरूर कह गई, 'किसी की अर्जी थामोगी तो फिर पूर्ति भी तो करनी पड़ेगी।`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्नी के विष बुझे श?दों को अपनी चुप्पी से झेल गया समर। उसकोअभी टोकने का मतलब होता एक दूसरा ही बखे़डा खड़ा करना। सो, वेगवती पत्नी को बिना किसी अवरोध के कमरे से बाहर निकल जाने दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समर ने मि की को देखा। वह उसे ही देख रही थी। डबडबाई हुई आंखें, कांपते होंठ और पलंग के पाए को खोदतीं उंगलियां उसकी बेचारगी जता रही थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समर आगे बढ़ा। मि की ने पाए को कसकर पकड़ लिया। समर उसके बिलकुल करीब आ गया। मि की की आंखें झरने लगीं। होंठ दयनीयता से फैल गए, 'मुझे यहां से ले चलिए पापा, मेरा दम घुट रहा है! बिना कुछ किए-धरे तोहमतें लगती हैं यहां। जो कुछ आपने सुना होगा दरवाजे पर, ऐसा कुछ नहीं हुआ है। आपकी कसम पापा! सच कहती हूं। हां, कैलू ने यह चिट्ठी जरूर दी थी मेरे हाथ, कल जब मैं दरवाजे पर बैठी थी। तब वहां न दादाजी थे और न ही कोई नौकर। नौकर खेतों पर गए थे, दादाजी पंचायत करने।`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मांगने पर तुमने वह चिट्ठी दादाजी को  यों नहीं दी? कठोर थे समर के श?द।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके पहले ही चिट्ठी देने को लेकर अनर्गल बातें टोले भर में फैला दी गइंर्। दादाजी ने भी चिट्ठी मांगने के पहले जो जी में आया कहा, जो नहीं कहना चाहिए वह भी। इसलिए मैंने तय किया कि चिट्ठी आपको ही दूंगी।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मि की के डर के विपरीत समर ने संयत भाव से वह चिट्ठी मांगी और पढ़ता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरवाजे पर सबके सब वैसे ही जमा थे। समर को आया देख कइयों ने पहलू बदले, कई दालान के और करीब आ गए। बाबू सर्वदानंद दोनों पैर लटकाए पलंग पर बैठे थे, दोनों हाथों से बौंकुरी को थामे हुए जैसे चढ़ाई से पूर्व शंखनाद सुनने भर को बैठे हों। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समर ने उन सबको करीब बुलाया जिन लोगों ने चन्नर दास के बेटे को मि की को चिट्ठी देते देखने का दावा किया था। समर के पूछने पर किसी ने बताया कि उसने दोनों को बांसबिट्टी में देखा तो एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए थे। किसी ने कहा कि उसने दोनों को रास्ते में पड़ते गड्ढे में गिटपिट करते देखा। किसी ने कहा कि उसने कैले को उनकी बाड़ी में पीछे से घुसते हुए देखा। उनके दियाद-रिश्तेदारों ने तो दहकते शोले का ही रूप धारण कर लिया। बोले, 'दोनों बाड़ी में लिपट-चिपट रहे थे। जब तक लाठी लाने दौड़े, कैला भाग गया। नहीं तो बाड़ी में ही भुट्टे की तरह कूट देते साले को।`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी अपनी-अपनी बातें कह कर समर की प्रतिक्रिया जानने के लिए उनका मुंह ताकने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समर बाकी को छोड़ बाबू सर्वदानंद से मुखातिब हुआ। न बाबूजी, न कोई और संबोधन। सीधे सवाल किया, 'यह वही चन्नर दास है न जिसने मरौत के दियारे पर डकैतों द्वारा कूटे जा रहे बाबू सर्वदानंद सिंह को अपनी जान पर खेलकर बचाया था? यह वही चन्नर दास है न जिसने खेत में धान रोप रही पत्नी और बेटे-बेटियों के सहारे अपने कंधों पर टांग कर नौकर-चाकरों और लठैतों से भरे दरवाजे पर सलामत छोड़ गया था बाबू सर्वदानंद सिंह को? यह वही चन्नर दास है न जिसने पिछले दस साल से किसी को बताया तक नहीं कि बावजूद इतने बड़े अहसान को मानने के आपने कैली के ?याह में दिए चार हजार रुपयों के एवज में उसकी तीन गछिया वाली दस कट्ठे की जमीन सूदभरने पर रख ली? मेरी नजर में तो चन्नर दास और उसके परिवार का कद ज्यादा बड़ा है। उनके बड़प्पन के आगे हम बौने साबित हुए हैं। आज उसकेबेटे का सिर फोड़ने के लिए आप इसलिए कह रहे हैं कि उसने मि की को पत्र दिया है?  यों दिया, किसलिए दिया, यह जानने की कोशिश किए बगैर उसके खिलाफ फरमान जारी कर दिया? कैलू और मि की को मौके पर देखने के इन सबके कहने में कोई तारतम्यता नहीं है, फिर भी आपने अपनी ही पोती पर वे सारी तोहमतें लगाइंर् जिन्हें किसी दुश्मन पर भी लगाने से पहले कोई इंसान सौ दफे सोचेगा।` &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेटे कातेवर देख बाबू सर्वदानंद ह के-ब के रह गए। समर रुका नहीं, वह टोले वालों से रूबरू हुआ, 'आप लोगों ने भुसिया टोले वालों से और चन्नर दास से टोला और पंचायत के झगड़े का बदला देने के लिए मेरी बेटी को मोहरा बनाया। बहुत गलत किया। मि की का ऊंची तालीम हासिल करना और शहर में रहना आप लोगों को पसंद नहीं है तो मुझे कहिए। सही-गलत का जवाब मैं दूंगा।... बिना सच जाने कुछ भी बोलने से पहले इतना भी नहीं सोचा कि उसके दिमाग पर इसका कितना बुरा असर पड़ेगा? सब दिन के लिए नफरत हो जाएगी आप सबसे।`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तो  या हम झूठ बोल रहे हैं?`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'झूठ-सच का फैसला करने के लिए विवेक चाहिए जिसे आप सबने जातीय अहंकार की दुकान में बेच खाया है। पहले अपने-अपने घरों में हो रहे अनर्थ को रोकिए, फिर बाहर का फैसला करने की हिम्मत जुटाइए।` गुस्से में समर आंगन चला गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहां खड़े लोग दुर-दुर करते हुए जाने लगे। बेटे की इस हरकत पर बाबू सर्वदानंद का गुस्सा घना होने लगा। दांतों पर दांत का दबाव बढ़ता गया। हथेली बौंकुरी की मूंठ को मसलने में जुट गई। आंखों से अंगारे बरसने लगे। दिमाग में विरि त के कीड़े डंक मारने लगे, 'आज फैसला होकर ही रहेगा।`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी पगड़ी के आगे आज फिर से उनका बेटा सीना ताने खड़ा था। स्मृति की कड़ाही में नफरत के छनौटे से घटनाआें को उलटने-पलटने लगे तो पाया कि अपनी पढ़ाई के समय से ही समर उनके फैसलों को चुनौती देता चला आ रहा है। फसल कटाई को लेकर भुसिया टोले के नए लड़कों के उकसाने पर मजदूरों ने १६ बोझ में एक बोझ की जगह १२ बोझ में एक बोझ की मजदूरी मांगी तो उन्होंने साफ मना कर दिया। उनकी छतरी के नीचे एकजुट होकर जोतदारों ने मजदूरों की गोलबंदी का विरोध किया। मगर इस मुद्दे पर बैठी पंचायत में समर ने ही मजदूरों की मांग को जायज ठहराया था। खेत में खड़ी फसल बर्बाद होने लगी तो मन मसोस कर जोतदारों ने मजदूरों की मांग मान ली लेनिक समर की हरकतों को लेकर उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी मां के श्राद्ध पर भोज करने से ही मना कर रहा था समर, लेकिन जब भोज होना प का हो गया तो इस बात पर अड़ गया कि दरवाजे पर पंगत हर जात की बैठेगी और शुरुआत दलितों से होगी। कर्ता के रूप में उ?ारीय धारण करने बावजूद वह लाठी लेकर दौड़े थे। कुटुंबियों ने बीच-बचाव किया तो ही समर चुप हुआ। लेकिन उसने भोज का एक दाना भी मुंह में नहीं लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके एकादशी निस्तारण के व त भी टंटा खड़ा किया समर ने। प्रकारांतर से उन्हें धर्मभीरू कहा, यज्ञ को फिजूल का खर्च बताया, और तो और भागवत कथावाचक से ही प्रतिवाद पर उतर आया। लोगों के सामने कितनी किरकिरी कराई थी कुलनाशक ने। यज्ञ होने तक घर से दूर चले जाने को नहीं कहते तो जरूर यह दानव धर्मनाश का करवाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठाकुरबाड़ी के पुजारी पर दुश्चरित्र होने का आरोप लगाने पर तो पूरा ब्राह्मण समाज समर के खिलाफ उनके सामने आ खड़ा हुआ था। उन्होंने लाख कहा कि वह पुजारी से माफी मांगे लेकिन समर अपनी बात से टस से मस नहीं हुआ। ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने के लिए उन्होंने खुद पुजारी से माफी मांगी थी। हालांकि कुछ दिन बाद अपनी ही बिरादरी की बहू के साथ गलत हरकत पर पुजारी को थाने में बंद होना पड़ा तो ब्राह्मणों ने समर मामले में उनसे अफसोस जताया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंचायत में इस बात को सबसे ज्यादा हवा समर ने ही दी थी कि बहुसंख्यक होने के नाते मुखिया दलितों में से ही कोई बने। पंचायत के इतिहास में पहली बार २००१ के चुनाव में दलितों की ओर से उम्मीदवार खड़ा हुआ था। हालांकि बड़जोरी के आगे जीत नहीं पाए, लेकिन चन्नर दास के पिता ने मुखिया पद पर अपना दावा ठोंककर सबको सन्नाटे में डाल दिया था। आज उसी चन्नर दास का बेटा उनकी इज्जत से खेलने पर उतारू है और उनका बेटा नालायकी पर उतर आया है। उन्होंने सोचा भी नहीं था उनके घर ऐसा भी कपूत पैदा होगा जिसे अपनी ही बेटी की आबरू का खयाल नहीं। लेकिन वह ऐसा नहीं होने देंगे। निकाल बाहर करेंगे घर से इस विभीषण को। ध्वस्त कर देंगे चन्नर दास और उसके लौंडे को। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ ही देर में नीतू और मि की को लेकर बाहर आ गया समर। साथ में सूटकेस और झोला देख बाबू सर्वदानंद की भौंहें सिकु़ड गइंर् गोकि उनका दांव ही उल्टा पड़ गया। बिना प्रणाम-पाती किए समर उनके सामने से निकल रहा था। आशंकित-आतंकित बाबू सर्वदानंद ने टोका-'कहां जा रहे हो?`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'वापस भागलपुर जा रहा हूं।`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अभी तो छुट्टी बाकी है?`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हां, मगर मुझे अपनी बच्ची का तमाशा नहीं बनाना है।`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'फिर कब आओगे?`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कह नहीं सकता।`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दरम्यान समर ने एक बार भी पिता की तरफ नहीं देखा। उसके तेवर से बाबू सर्वदानंद समझ गए कि समर फैसला कर चुका है। अपनी जिद का प का है, झुकेगा नहीं। आखिरी दांव खेला, 'मेरा आग-श्राद्ध करने तो आओगे?`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं आपका श्राद्ध करूंगा या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। लेकिन हमारी बेहतरी के लिए अब आपका मर जाना ही ठीक है। मैं उस खबर का इंतजार करूंगा ताकि आप जिन-जिन लोगों की जमीन पर कुंडली मारकर बैठे हैं, उन्हें लौटाकर माफी मांग सकूं।`&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हतप्रभ रह गए बाबू सर्वदानंद। आगे मुंह से न कोई बोल फूटे न दिमाग में कुछ सूझा। फूलती सांस को दबाने की कोशिश कर ही रहे थे कि मि की ने हाथ में कैलू की दी हुई चिट्ठी थमाई और पिता के पीछे जाकर खड़ी हो गई।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समर ने उलाहना दिया, 'है कोई गांव की ऊंची खून में ऐसा लड़का जिसने बोर्ड परीक्षा में कैलू से ज्यादा नंबर पाया हो! ढूंढे नहीं मिलेगा।` फिर बोला, 'चिट्टी भी वही दे सकता है जिसमें लिखने की तमीज हो। अपनी बात कहने का साहस हो। और कैलू के साहस को मेरा सलाम है।` समर मु़डा और चलता बना। पीछे नीतू और मि की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबू सर्वदानंद ज्यों-ज्यों चिट्ठी की लाइनें पढ़ते जा रहे थे, उनका शरीर झुकता जा रहा था। दियाद-पड़ोसी अपने-अपने दायरों से गर्दन उचका-उचका कर पराक्रमी पट्टीदार के चेहरे पर आ-जा रहे भावों को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिट्ठी यों थी, 'समर चाचा, बाबूजी बेकार की जिद पर अड़े हैं। आपसे अनुरोध कर रहा हूं कि तीनगछिया वाली जमीन लौटा दीजिए। उसी की उपज के जरिए किसी तरह बीए पास कर जाऊंगा तो कहीं  लर्क-अर्दली होकर परिवार को रोटी-दाल खिला सकूंगा। हमारे घरवाले तो मेरे अच्छे रिजल्ट को भी बाबूजी का आशीर्वाद मानते हैं और वह हैं कि हमें फूटी आंखों नहीं देखना चाहते। मैं कोर्ट-कचहरी नहीं जाना चाहता, लेकिन नई उम्मीदों को यूं ही नष्ट भी नहीं होने देना चाहता हूं। अब फैसला आपके ऊपर है। -आपका कैलू।` &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-रणविजय सिंह सत्यकेतु&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपादकीय विभाग, अमर उजाला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इलाहाबाद-२११००१.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मो. ९८३८३३२१९९&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-711232617930025271?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/711232617930025271/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=711232617930025271' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/711232617930025271'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/711232617930025271'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2008/02/blog-post_29.html' title='फैसला'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-2357367347830200030</id><published>2008-02-25T17:29:00.000+05:30</published><updated>2008-02-25T17:30:19.508+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>अलाप उर्फ दर्द-ए-धुआं</title><content type='html'>कहानी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कारखाने के मजदूरों को जैसे ही पता चला कि आज उन्हें वेतन नहीं मिलेगा, उनकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। कइयों के जेहन में यह सवाल एक साथ गंूजा कि आज रोटी नहीं मिलेगी? कइयों के आंखों के आगे भूख से विलखते अपने बच्चों की तस्वीर घूम गई। &lt;br /&gt;यह बरदाश्त की सीमा से बाहर था। कारखाने में पिछले चार महीने से काम नहीं है, लेकिन इसमें इनका  या दोष? माह की आज पंद्रह तारीख है और वेतन का कोई अता-पता नहीं है। मजदूरों को यह कंपनी इतना वेतन भी नहीं देती कि यदि एक माह वेतन न मिले तो उनका दैनिक काम चल जाए। लिहाजा हर श्रमिक के सामने जिंदगी-मौत का सवाल उठ खड़ा हो गया।   &lt;br /&gt;कंपनी के इस रवैये से कई श्रमिक काम छाे़ड कर जा चुके हैं। कंपनी भी यही चाहती है। ताकि वह इस कारखाने को आराम से बंद कर सके। श्रमिकों के रहते उसे इसे बंद करने में परेशानी हो रही है। मजदूर अपना हक मांगने लगते हैं। इसकी काट के लिए कंपनी ने यह तरीका खोजा है। उसने इस कारखाने का काम ही बंद कर दिया। लिहाजा मजदूर बेकार हो गए। फिर समय से वेतन देना बंद कर दिया, ताकि पेरशान होर श्रमिक खुद ही कंपनी छाे़डकर चले जाएं...। &lt;br /&gt;जब से उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की हवा चली है, तब से अधिकतर कारखानों का यही हाल है...। हर जगह से श्रमिकों की छंटनी की जा रही है। जो आराम से नौकरी नहीं छाे़डते उन्हें इसी तरह से प्रताड़ित किया जाता है...। श्रमिक संगठन विखर चुके हैं। श्रमिक आंदोलन दम ताे़ड चुका है। मजदूर दिशाहीन हो गए हैं। गाहे-बगाहे आंदोलन होते हैं, जिन्हें फै टरी मालिक सत्ता और पुलिस प्रशासन से मिलकर कुचल देते हैं। पुलिस इस तरह लाठियां भाजती है कि दूसरा श्रमिक आंदोलन होने में सालों लग जाते हैं...। यही नहीं, कई बार तो गु़डों तक सहारा लिया जाता है।  &lt;br /&gt;वेतन नहीं मिलने की घोषणा सुनते ही वह आपा खो बैठा। तेजी से दफ्तर में घुसा और कंपनी मालिक को फोन मिला दिया...।  &lt;br /&gt;-वाह! जनाब वाह! अच्छा न्याय किया आपने। तबीयत खुश हो गई। वफादारी की, मेहनत की ऐसी ही कीमत मिलनी चाहिए...। आप ठहरे पैसे वाले। हम ठहरे मजदूर। दुनिया आपकी मुट्ठी में है...। हमारे पास  या है? श्रम। उसकी भी कीमत आप लगाते नहीं हैं..। वैसे भी आपने हमारे साथ जो किया, वह कोई पहली घटना नहीं है। इतिहास साक्षी है...मेहनत करने वाले तो रोटी की जगह हवा ही खाते हैं...। कभी हवा खाई है आपने? नहीं न। खा कर देखो। हर माह हजारों रुपये जो डा टर को देते हो, बच जाएगा।  या स्वाद होता है...। लेकिन आप  या जानो। आप तो फाइव स्टार होटल में विदेशी व्यंजन खाते हो..। अपने कारखाने के मजदूरों को समय से वेतन भले ही न दो, लेकिन होटल में रंगरलियां मनाने पर लाखों खर्च करते हो। अपनी घरवाली को देखकर उल्टियां करते हो और होटल में....चलो छोड़ो।  या रखा है इन बातों में।&lt;br /&gt;हां-हां, आपका ही पैसा है। मैंने कब कहा कि हमारे पैसे को आप मौज-मस्ती पर उड़ाते हो, लेकिन बाबू जी, सच तो यह है कि उस पैसे में 'हमारा` भी हिस्सा होता है, जिसे आप हड़प जाते हैं और ऐय्यासी करते हैं...।&lt;br /&gt;हां, मैं मूर्ख हंू और पागल भी। बेवकूफ भी। ठीक है, बाबू जी, आपके कहने से, चिल्लाने से सच तो नहीं बदल जाएगा। हकीकत तो यही है कि आप परजीवी कीड़े हैं...। दूसरों का खून चूसकर अपनी सेहत बनाते हैं और ऐय्यासी करते हैं...।&lt;br /&gt;हां-हां पगला ही गया हूं? कोई भी पगला जाएगा। यदि उसके खून-पसीने की कमाई को कोई और खा जाएगा...। आप भी पगला जाएंगे। सचाई जानना चाहते हो तो हवा खाओ हवा। हवा जब अंदर जाती है तो पेट की अंतड़ियां फूल जाती हैं। पेट फूल जाता है तवे की रोटी की तरह। रोटी की हवा निकल जाती है। वह फुस्स हो जाती है, लेकिन हवा खाया हुआ पेट नहीं पचता। गुब्बारे की तरह फूला ही रहता है। आप हवाई जहाज में उड़ते हैं हमारा पैसा खा कर। हम हवा में उड़ते हैं हवा खा कर..। &lt;br /&gt;ठीक कहा आपने। हम मच्छर हैं। कम से कम आपको तो ऐसा ही लगेगा। ऊपर से देखने पर आदमी, आदमी को, आदमी नजर नहीं आता। हम भी जब हवा खा कर उड़ते हैं न तो हमें भी आप जैसे लोग आदमी नजर नहीं आते...। &lt;br /&gt;अरे साहब दारू पीकर नहीं बोल रहा हंू। आपको तो लगेगा ही। विदेशी जो पिये हो। हमारी झुग्गी में तो पानी भी नहीं आता। दारू कहां से मिलेगी? ये थूक लीला हंू अपना। पानी पिया हंू नाली का। नाली के पानी में कीड़े होते हैं। पेट में जाएंगे तो उत्पात मचाएंगे ही। नशा तो हो ही जाएगा। न उतरने वाला नशा। मरने के बाद उतरने वाला नशा। आपका  या ? आप तो विदेशी पीओ, विदेश घूमो और ऐश करो। काम के लिए हम हैं न। अभी हमारे शरीर में बहुत खून है। चूसो, जितना चूस सकते हो...। &lt;br /&gt; या? मैं बदतमीजी कर रहा हंू? हो सकता है आप सही कह रहे हों। आप ही बताइए, जब हम स्कूल ही नहीं गये तो तमीज कहां से सीखें? मां-बाप ने पढ़ाने की बहुत कोशिश की पर कर्म उनके खोटे निकले। वह मेहनत करते रहे, तमीज कोई और सीखता रहा...। एक बाबा आए उन्हें ज्ञान दे गए कि कर्म करो, फल की इच्छा मत करो। उन्होंने इस पर अमल किया। कर्म किया फल की इच्छा ही नहीं की। नतीजा यह हुआ कि उनके कर्म का फल कोई और खा गया...। उसका बेटा स्कूल गया। तमीज सीख गया...। किसी के कर्म का फल खाने के लिए..। रह गए हम। अनपढ़-गंवार, जाहिल-काहिल, बदतमीज-बददिमाग आदि-आदि आप जो भी कहें। &lt;br /&gt; या कहा आपने? बहुत बोलता हंू।  या करूं साहब। ले देकर यह जुबान ही बची है। हड़ताल करें तो भी तो आपको दि कत होती है। आपके सभ्य समाज को नागवार गुजरता है। आपकी रफ्तार जो रुक जाती है। अब यह जुबान ही हमारा अस्त्र है। हमारा परमाणु बम है। जानता हंू, एक दिन आप इसे भी छीन लेंगे। लेकिन हो सकता है कि उससे पहले यह बम विस्फोट कर जाए और आपके अस्तित्व को ही मिटा जाए..। वैसे भी हवा खाने वाले मरने से नहीं डरते..। आप भी जानते हैं कि हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है और पाने के लिए पूरा आकाश है...। हमें भी हमारे हिस्से की धूप चाहिए...। चांदनी चाहिए...। यदि नहीं मिलेगी तो हम ऐसे ही भौंकते रहेंगे...। शब्दबाण चलाते रहेंगे...। &lt;br /&gt;ठीक कह रहे हैं आप कि मैं पगला गया हंू।  यांे न पगलाऊं! आज घर में बीवी-बच्चे हवा भी नहीं खा पाएंगे। बहुत कोशिश की पर हवा भी अंतड़ियों में छेद करके निकल जाती है। आपके कारखाने के धुएं ने हवा को भी खाने लायक नहीं छाे़डा है...। ऐसा आज ही नहीं कई दिनों से हो रहा था। आज किसी लिखने वाले ने बताया कि हवा प्रदूषित हो गई है। वह खाने योग्य नहीं रही। अच्छी हवा खानी हो तो खरीदो...। है न कमाल। हवा प्रदूषित कर दो, फिर उसे बेचो। आपकी चांदी ही चांदी है साहब...। &lt;br /&gt; या कहा आपने? लिखने वाले मूर्ख हैं? केवल सपने देखते हैं?  या करें साहब? सपने जो बाजार में नहीं बिकते...। इसलिए देख लेते हैं। हम भी देख लेते हैं पर पूरा कहां हो पाता है? आप तो हमारे सपने भी ताड़ लेते हो। आपके लिए हमारे सपने खतरनाक हो जाते हैं...। आप हमारे सपनों को मर जाने के लिए मजबूर कर देते हैं..। जो मजबूर नहीं होता उसे मार डालते हो..। हत्या कर देते हो। तुम हत्यारे हो। हमारे और हमारे सपनों के हत्यारे...।  &lt;br /&gt;हां, साहब मैं सचमुच पगला गया हंू। अब देखो न सोचा था समय पर वेतन मिल जाएगा तो ये करूंगा वो करूंगा। ठंड आ गई है। बच्चों के लिए गर्म कपड़े बनवाना है। गरमी होती तो चल जाता। चलता  या है। मच्छर काटते हैं तो उछलते हैं बच्चे। मिमियाते हैं जैसे बकरा कटते समय मिमियाता है। तो साहब आपने वेतन ही काट लिया। ठीक किया आपने। साले भूख से मर जाएंगे तो आबादी ही कम होगी। आबादी कम करने का कितना बढ़िया समाधान खोजा है आपने...। आपको तो सरकार इनाम देगी। वैसे भी आप तो देश की अर्थव्यवस्था के कर्णधार हैं, बंटाधार तो हम हैं..। जनसंख्या बढ़ाकर देश को चौदहवीं सदी में ले जा रहे हंै...। &lt;br /&gt;अरे-अरे बाबू साहब। आप तो नाराज हो गए। गाली दे रहे हो। कुत्ता कहा आपने। ठीक है, हम कुत्ते हैं। लेकिन आप हमें नहीं पालेंगे। यकीन करें, पाल कर देखें, हम कुत्ते से भी ज्यादा वफादार होंगे। ऐसी वफादारी करेंगे कि कुत्ते भी शरमा जाएं...। &lt;br /&gt;देखो साहब, बहन की गाली मत दो। एक ही बहन थी। उसने भी आत्महत्या कर ली। कार वालों ने बलात्कार किया था। शर्मशार हो गई। नहीं जी पाई। ठीक कहा आपने, हमें शर्म नहीं आनी चाहिए। शरमाने लायक है ही  या हमारे पास? अरे बलात्कार ही तो किया था आठ-दस लोगों ने। मर तो वह मौके पर ही गई थी। लेकिन पुलिस और डा टरों ने कहा कि आत्महत्या की है। यह सब तो झूठ बोलते नहीं। जाहिर भी है, जिसका नमक खाते हैं उससे नमकहरामी कैसे कर सकते हैं...? कानून तो आप लोगों की जेब में होता है न...। या यों कहें कानून तो बनता ही आप लोगों के लिए है...। जैसे यह लोकतंत्र है। कहने को तो यह जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए है, लेकिन यह जनता द्वारा, पैसे वालों का, पैसे वालों के लिए है...। जनता तो केवल वोट देती है। नेता चुनती है। नेता नीति बनाते हैं। जिसमें सभी होते हैं। केवल जनता नहीं होती..। वोट देने वाले नहीं होते...। पैसे देने वाले महत्वपूर्ण हो जाते हैं...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक कहा आपने। हमारे शरीर से बदबू आती है। लेकिन कभी सोचा है कि  यों आती है बदबू? जितना पैसा देते हो उससे तो परिवार वाले भर पेट भोजन भी नहीं कर पाते। फिर नहाएं कहां से? साबुन, शैंपू कहां से लाएं? कहां से लाएं कपड़े? श्रम से पसीना निकलता है, परफ्यूम नहीं...। यह भी  या व्यवस्था है कि हम जिन वस्तुआें को तैयार करते हैं, बनाते हैं, उन्हीं के लिए तरसतें हैं...  यों? किसान अनाज पैदा करता है लेकिन मरता भूख से है। परिवार सहित आत्महत्या करता है...। &lt;br /&gt;आपने हमें कुत्ता कहा। ठीक ही कहा। हम कुत्ते तो ही हैं। आवारा कुत्ते। जिन्हें कोई नहीं पूछता। जो रोटी देखकर दुम हिलाता है... यह हमारी फितरत में आ गया कि हम मर जाएंगे, लेकिन एकजुट होकर अपने हक के लिए आवाज नहीं उठाएंगे। आपने ठीक ही कहा। हमारे रहनुमाआें को आपने खरीद लिया है। वह आपके पालतू कुत्ते हो गए हैं। उन पर आपके उपदेश का असर है। &lt;br /&gt;उस दिन आपने ठीक ही उपदेश दिया था कि समस्त कर्मों को मानसिक रूप से मुझे समर्पित करके, मुझे ही परमगति मानते हुए तथा बुद्धि के द्वारा योग का आवलोकन करके तू निरंतर मुझमें चित्त को लगा.. अपने चित्त को तू मुझमें लगाकर तू मेरी कृपा से समस्त बाधाआें को पार कर लेगा। किंतु अहंकार के कारण मेरे वचनों को नहींं सुनेगा तो तू नष्ट हो जाएगा। हे श्रमजीवियो, मैं सर्वभूतों से हृदय मंे स्थित हूं और अपनी 'माया` से तुम सब को इस प्रकार भरमाता हूं मानो तुम मंत्रमुग्ध हो या आस त हो। इसलिए हे श्रमजीवियो तुम सब प्रकार से मेरी शरण में आ जाओ। मेरी कृपा से तुम परम शांति और सुख प्राप्त करोगे। &lt;br /&gt; या ज्ञान की बरसात की थी साहब आपने। मेरे एक मित्र का कहना है कि ऐसा ही भाषण श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिया था तो महाभारत हुआ था, लेकिन आप तो महाभारत दबाने के लिए यह कह रहे हो...। आप  या सेाचते हो कि हम आपके इस झांसे में आ जाएंगे? कदापि नहीं। आपकी चाल को हम सब समझ गए हैं...। &lt;br /&gt; या कहा? चुप रहूं। नहीं तो नौकरी से निकाल दोगो? आप और कर भी  या सकते हैं। लेकिन इसका  या करोगे। अब हमने हवा खा कर जीना जो सीख लिया है...। उड़ना सीख लिया है...। जहां से आप जैसे लोग छोटे और बौने नजर आते हैं...। जानवर नजर आते हैं..। ठीक कहा आपने। मैं बहुत बोलने लगा हूं। यही जुबान हमारी मिसाइल जो ठहरी...। अब इसे निशाने पर ही दागना है। चूकना नहीं है। अभ्यास जारी है। लक्ष्य पता है। एक दिन यह अपने निशाने पर ही गिरेगी...।  धमकी नहीं दे रहा। बता रहा हूं। कब तक चलेगा जमूरे का खेल। अब जमूरे ने भी खेल सीख लिया है। अब वह उस्ताद को उस्ताद नहीं कहेगा...। उस्ताद शब्द को ही दफना देगा। संसार के शब्दकोश से इसे निकाल फेंकेगा...। &lt;br /&gt; या कहा आपने? ऐसा नहीं होगा? अरे नहीं जनाब। अब तो ऐसा ही होगा। तुमने पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है। हम उसे साफ करेंगे।  योंकि इससे हमारा जीना मुहाल हो गया है...। कल ही मरी है मेरी छह माह की बच्ची। न उसकी मां की छाती से दूध उतरा न मैं बाजार से दूध खरीद पाया।  योंकि तुमने इस लायक छाे़डा ही नहीं। बारह घंटे काम करवाता है और उसके मुताबिक पैसे नहीं देता। जो देता है वह भी समय पर नहीं देता। आखिर कब तक हमें भूखों मारोगो? मैंं पूछता हूं कब तक? कब तक तू हमारी कमाई पर ऐश करता रहेगा.. कब तक?&lt;br /&gt; या कहा? मैं बकवास कर रहा हूूं? हां, मैं बकवास कर रहा हूं,  या करूं मैं? तीन दिन से घर में चूल्हा नहीं जला है। बच्चे भूख के मारे बिलख रहे हैं। घरवाली बीमार पड़ी है। उसका इलाज नहीं करवा सकता। खुद तीन दिन से अन्न नहींं खाया। जब पेट में भूख के मारे चूहे कूद रहे हों तो कोई प्रवचन तो नहीं कर सकता न? तुम वेतन नहीं दे रहे हो। हमें भूखों मार रहे हो। तो  या मैं बकवास भी नहीं कर सकता?&lt;br /&gt; या! तुमने मुझे नौकरी से निकाल दिया? ठीक है। ऐसी नौकरी का फायदा ही  या, जिसके होते हुए भी भूखोंं मरे आदमी। लेकिन तुम एक बात मेरी भी सुन लो। आज तुमने मुझे नौकरी से निकाला है एक दिन मैं तुम्हें इस देश से निकाल दूंगा...। पूरी दुनिया में तुम्हें ठिकाना नहीं मिलेगा...। कहते हुए उसने फोन का चोंगा पटक दिया। लंबी सांस ली। आसमान की तरफ देखा। आसमान काले बादलों से अच्छादित था...। ऐसा लग रहा था कि कभी भी बारिश हो जाएगी...।  वह आगे बढ़ा तो अन्य श्रमिक उसके पीछे चल पड़े...। सभी के हाथ ऊपर उठे हुए थे...। मुठि्ठ यां भिंची थीं...। मंुह से नारे निकल रहे थे...।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;- ओमप्रकाश तिवारी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानी, साहित्य&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-2357367347830200030?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/2357367347830200030/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=2357367347830200030' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/2357367347830200030'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/2357367347830200030'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2008/02/blog-post_25.html' title='अलाप उर्फ दर्द-ए-धुआं'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-5406979274113269987</id><published>2008-02-19T20:02:00.000+05:30</published><updated>2008-02-27T02:50:14.127+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>डूबते सूरज की ओर</title><content type='html'>कहानी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सियाराम ने साइकिल पर बैठकर जैसे ही पैंडल पर जोर लगाया खटाक की आवाज के साथ चेन उतर गई। &lt;br /&gt;गुस्से में सियाराम ने मां-बहन की गाली दी। फिर साइकिल से उतर कर चेन ठीक करने लगे। चेन चढ़ा ही रहे थे कि किसी ने पूछा।  &lt;br /&gt;- साइकिल खराब हो गई? &lt;br /&gt;सियाराम ने चेन छाे़डकर आवाज की तरफ देखा और मुस्करा कर बोले -हां भाई। &lt;br /&gt;- किसी कबाड़ी को बेच दो। अब यह चलने लायक नहीं है। &lt;br /&gt;- पुरानी होने पर कोई घरवाली को बदल देता है  या? सियाराम ने चुहल की। &lt;br /&gt;- अरे भाई, दुनिया मोटरसाइकिल और कार से चलने लगी है, आप कम से कम नई साइकिल तो ले लो। &lt;br /&gt;- दुनिया और मेरी तुलना नहीं हो सकती न। सियाराम ने लंबी सांस ली और चेन ठीक करके साइकिल पर बैठ गए। &lt;br /&gt;- लगता है कचहरी (अदालत) से आ रहे हो? &lt;br /&gt;- हां भाई। &lt;br /&gt;-  या हुआ? &lt;br /&gt;- होना  या है। फिर तारीख मिल गई है। &lt;br /&gt;- कब तक मिलती रहेगी तारीख? &lt;br /&gt;- अब  या बताएं। अपने वश में तो कुछ है नहीं। १८ साल हो गए। अभी तक बहस तक नहीं हुई है। &lt;br /&gt;- मेरी मानो तो समझौता कर लो। &lt;br /&gt;- किससे?&lt;br /&gt;- जिससे मुकदमा लड़ रहे हो। &lt;br /&gt;- एक हाथ से ताली बजती है  या? &lt;br /&gt;- अरे यार प्रयास करके तो देखो। कहते हुए वह सड़क से अपने घर की तरफ मु़ड गया। वह सियाराम का शुभचिंतक नहीं था। यह बात वह अच्छी तरह से जानते थे। लेकिन उसे कुछ कहना भी उन्हें अशोभनीय ही लगा। बातचीत करते हुए दोनों बाजार से काफी दूर आ गए थे। इस बीच उस आदमी का गांव आ गया तो वह अपने रास्ते हो लिया। &lt;br /&gt;अब सियाराम साइकिल की गति बढ़ाने के लिए जल्दी-जल्दी पैंडल मारने लगे। पेट में चूहे कूद रहे थे। ऐसे में वह घर शीघ्र पहंुच जाना चाह रहे थे, लेकिन जैसे ही वह पैंडल जल्दी-जल्दी चलाने की कोशिश करते चेन उतर जाती। इसके अलावा सड़क में जगह-जगह बने गढ्डे अलग से परेशान कर रहे थे। उनकी वजह से साइकिल तेज चलाना मुश्किल हो रहा था। कहने को यह हाइवे है, लेकिन सड़क की हालत गांव की पगडंडी से भी बदतर है। गड्ड ों में सड़क को खोजना पड़ता है। &lt;br /&gt;दरसअल, सियाराम पर उनके पड़ोसियों ने कोई आठ मुकदमें कर रखे हैं। जिसमें से हर महीने किसी न किसी की तारीख पड़ती ही है। सियाराम हर माह अपने गांव से २७ किलोमीटर दूर अदालत में पेशी भुगतने जाते हैं। यह सिलसिला पिछले १८ सालों से बदस्तूर चला आ रहा है। &lt;br /&gt;तारीख वाले दिन सियाराम सुबह ही उठते हैं। नित्य-क्रिया करते हैं। जानवरों को चारा डालते हैं। नहाते-धोते हैं और पूजा-पाठ करके दो-चार रोटियां खा कर साइकिल लेकर  घर से निकाल पड़ते हैं। घर से तीन किलोमीटर साइकिल से जाते हैं। इसके बाद कसबे के एक परिचित के यहां साइकिल खड़ी करते हैं और फिर जीप या बस पकड़ कर शहर यानी अदालत जाते हैं। &lt;br /&gt;आज सुबह वह दो रोटी खाकर ही पेशी भुगतने चले गए थे। आज दो मुकदमों की तारीख थी। अदालत में अपनी बारी का इंतजार करते रहे। लंबी प्रतीक्षा के बाद नंबर आया तो फिर मिल गई तारीख...। &lt;br /&gt;-------&lt;br /&gt;सियराम के गांव का चौराहा। चाय की दुकान पर कई लोग बैठे थे। उनके हाथों में चाय के कप के अलावा आज के अखबार के एक-एक पन्ने थे। उनके बीच कोर्ट के एक निर्णय पर बहस छिड़ी थी। लगभग सभी एक सुर में कह रहे थे कि जिस तरह से अदालत निर्णय दे रही है उससे लगने लगा है कि न्याय हमारे देश में अब भी जिंदा है। इधर अदालत ने कुछ फैसले ऐसे सुनाए हैं कि लोगों की आस्था फिर से न्याय के प्रति बढ़ गई है। अब  या पैसे वाला और  या नेता, कोई भी कानून से बड़ा नहीं रह गया है। अदालत ने किसी को नहीं बख्शा है। जिसने अपराध किया उसे सजा दी है। पैसा और सत्ता की ताकत को भी अपनी औकात बता दी है।&lt;br /&gt;इसी बीच उन्हीं में से किसी ने कहा -तभी तो नेता लोग न्यायिक सक्रियता का राग अलापने लगे हैं। कहने लगे हैं कि न्यायपालिका को अपने हद में रहना चाहिए। &lt;br /&gt;लेकिन इस आदमी की बात को किसी ने नहीं सुना। सभी इसी चर्चा में मशगूल रहे कि अदालत किसी को नहीं छाे़डेगी। वहां देर है लेकिन अंधेर नहीं है। &lt;br /&gt;इन्हीं के बीच गांव का एक आदमी बैठा इनकी बातों को सुन रहा था। वह इनकी बातों से सहमत नहीं था। वह इन्हें मूर्ख नहीं तो अज्ञानी जरूर समझ रहा था, लेकिन इनकी बातों पर वह हंस नहीं रहा था। उसे गुस्सा भी नहीं आ रहा था, लेकिन जब बात अधिक खिंच गई तो वह बोल ही पड़ा। &lt;br /&gt;- देर होना  या अंधेर नहीं है? &lt;br /&gt;उसके सवाल पर चुप्पी छा गई। लोग एक दूसरे की तरफ देखने लगे। इसी बीच दुकान के बाहर शोर मचा। &lt;br /&gt;- अरे उठाओ भाई। &lt;br /&gt;- चोट तो नहीं लगी? &lt;br /&gt;- डा टर के पास ले चलना होगा। &lt;br /&gt;- लगता है, धुस्स चोट आई है। &lt;br /&gt;- पैर टूट गया लगता है। &lt;br /&gt;- सिर में चोट लगी है। &lt;br /&gt;- हाथ भी टूट गया लगता है। &lt;br /&gt;- कोई पानी लाओ भाई। &lt;br /&gt;यह सभी लोग सियाराम को उठाए हुए थे। सियाराम बेहोश थे। उन्हें अभी-अभी एक मोटरसाइकिल वाला ट कर मार कर भाग गया था। वह सड़क से सीधे खाई में आ गिरे थे। &lt;br /&gt;लोगों ने सियाराम को खाई से बाहर निकाल कर एक जगह लिटाया। एक आदमी ने उनके मंुह पर पानी के छींटे मारे तो उन्होंने आंखें खोलीं। &lt;br /&gt;- कैसी है तबीयत? ठीक हैं? एक साथ कई लोगों ने पूछा। सियाराम एकटक सभी को देखते रहे। उनके मंुह से आवाज ही नहीं निकली। &lt;br /&gt;- इनके घर खबर दे दो भाई। किसी ने अपनी राय दी। उसकी बात का सुनना था कि सियाराम ने उठने का प्रयास किया। इसमें वह सफल हुए। उठकर खड़े हो गए। दो कदम चले तो लोगों ने खुशी व्य त की। &lt;br /&gt;-बच गए भाई। बच गए। &lt;br /&gt;- कोई गंभीर चोट नहीं आई है। &lt;br /&gt;- किस्मत से ही बच गए। &lt;br /&gt;- भगवान की बड़ी कृपा थी। &lt;br /&gt;- थाे़डे में ही बड़ी ग्रह कट गई। नहीं तो उसने तो उठाकर फेंक ही दिया था। &lt;br /&gt;- मेरे घर तो खबर नहीं भिजाई? सियाराम ने लोगांे से पूछा। &lt;br /&gt;- अभी नहीं। &lt;br /&gt;- भिजवानी है  या? &lt;br /&gt;- डा टर को दिखाना है? &lt;br /&gt;- नहीं। मैं ठीक हंू। घर चला जाऊंगा। घर वाले बेकार ही परेशान हो जाएंगे। &lt;br /&gt;- इसीलिए तो, घर किसी को भिजवाया नहीं। &lt;br /&gt;- थाे़डी देर और होश में न आते तो आपके बेटे को फोन कर देता। यह देखो मोबाइल हाथ में निकाल लिया था। एक युवक ने अपनापन दिखाया। &lt;br /&gt;- तेरे पास नंबर कहां है? उसकी डींग की किसी ने हवा निकालनी चाही।&lt;br /&gt;- इस मोबाइल में है। चाचा कई बार इससे फोन कर चुके हैं।  यों चाचा? उसने सियाराम से समर्थन हासिल कर लिया। &lt;br /&gt;दरअसल, सियाराम उसके मोबाइल से मिस्ड काल करवाते हैं अपने इकलौते बेटे के पास। फिर बेटा उन्हें फोन करता है। उसकी योजना अभी भी मिस्ड काल करने की ही थी। &lt;br /&gt;सियाराम चाय-पानी पीकर साइकिल को ठीक-ठाक कराकर घर के लिए चल पड़े। वह दुाकन से थाे़डी ही दूर गए थे कि दुकान में चुपचाप बैठे आदमी ने अदालत के फैसलों पर बहस कर रहे लोगों से बोला। &lt;br /&gt;- हमारी न्यायपालिका कितनी सक्रिय है और वहां कितना न्याय मिलता है जरा इनसे पूछिए। &lt;br /&gt;उसका इशारा सियाराम की तरफ था। जो अपनी पुरानी साइकिल से घर की तरफ जा रहे थे। खडंजे की सड़क पर खड-खड कर रही थी...। &lt;br /&gt;इस समय वह पश्चिम दिशा की तरफ जा रहे थे और उनके ठीक सामने सूरज डूबने वाला था....। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-ओमप्रकाश तिवारी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-5406979274113269987?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/5406979274113269987/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=5406979274113269987' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/5406979274113269987'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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आवाज आई।&lt;br /&gt;- या कर रहे हो?&lt;br /&gt;- या करें?&lt;br /&gt;- आज का अखबार देखा?&lt;br /&gt;- नहीं, या हो गया? अमेरिका पर आतंकवादी हमला हुआ है या?&lt;br /&gt;- अरे नहीं यार।&lt;br /&gt;- फिर या देश से गरीबी मिट गई?&lt;br /&gt;- सुबह-सुबह या बकवास कर रहा है?&lt;br /&gt;- बकवास मैं कर रहा हूं कि तू। कितनी बढ़िया नींद आ रही थी। जगा दिया।&lt;br /&gt;- अरे जागो प्यारे मोहन, यह जागने का व त है।&lt;br /&gt;- यों? या देश से बेरोजगारी खत्म हो गई? &lt;br /&gt;- अरे, नहीं यार।&lt;br /&gt;- फिर या अमेरिका ने किसी देश पर हमला किया है?&lt;br /&gt;- ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है।&lt;br /&gt;- तो फिर या हुआ है?&lt;br /&gt;- पीएम हाउस में मोर नाचा है प्यारे मोहन।&lt;br /&gt;- तू पागल हो गया है या? मोर जंगल में नाचता है बच्चे।&lt;br /&gt;- इसीलिए तो कह रहा हूं प्यारे मोहन, जागो, उठो और अखबार पढ़ो।&lt;br /&gt;दोस्त ने फोन काट दिया। मेरी भी नींद भाग गई।&lt;br /&gt;साले मोर को या हो गया? जंगल छाे़डकर पीएम हाउस में आ गया। सोचते हुए चारपाई से उठा। दरवाजे पर गया और अखबार उठा लाया।&lt;br /&gt;पहले पन्ने पर ही पीएम हाउस में नाचते हुए मोर की तस्वीर छपी थी। &lt;br /&gt;-अरे वाह! यह तो कमाल हो गया। पूरा का पूरा सिद्धांत और दर्शन ही बदल गया। मेरे मुंह से ये शब्द अनायास ही निकल पड़े।&lt;br /&gt;तस्वीर के साथ समाचार भी छपा था। शीर्षक था-पीएम हाउस में मोर नाचा। लिखा था कि आज जब प्रधानमंत्री अमेरिका की यात्रा पर जाने से पहले अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों से विदा ले रहे थे तो उसी व त पीएम हाउस में एक मोर नाचने लगा। मोर को नाचते देख पीएम हाउस में अफरा तफरी मच गई। हर कोई यही कह रहा था कि यह मोर यहां पर कैसे आ गया? प्रेस फोटोग्राफरों और टीवी कैमरा वालों के लिए यह ऐतिहासिक क्षण था। सभी नाचते हुए मोर की तस्वीर अपने कैमरे मेें कैद करने लगे। कुछ उत्साही टीवी पत्रकार और कैमरामैन तो मयूरनृत्य को लाइव दिखाने लगे। सबसे पहले की हाे़ड में चैनल वाले टूट पड़े और उसके पत्रकार मोर के बारे में कुछ भी बोले जा रहे थे। चैनलों के स्टूडियो में बैठी एंकर भी अजीबो गरीब सवाल पूछे जा रही थी। ब्रेकिंग न्यूज चल रही थी कि पीएम हाउस की सुरक्षा में सेंध। मोर पीएम हाउस में घुसा और नृत्य कर रहा है। सुरक्षा बलों के बयान लिए जा रहे हैं। नेताआें से टिप्पणी मांगी जा रही है। स्टूडियों में विशेषज्ञ बुला लिए गए है। गहन परिचर्चा भी आरंभ हो गई है। चैनल देखकर ऐसा लगा कि देश पर घोर विपदा आ गई है। एक चैनल की एंकर ने अपने संवाददाता से सवाल किया कि या अब भी प्रधानमंत्री अमेरिका की यात्रा पर जाएंगे? संवाददाता ने कहा कि इस संबंध में जानकारी तो नहीं मिल पाई है लेकिन मेरा मानना है कि पीएम को अपनी यात्रा रद कर देनी चाहिए। यात्रा से पहले अपशगुन हुआ है। अभी मोर घुस आया है। अगर आतंकवादी घुस आता तो या होता। एंकर ने फिर सवाल किया कि यदि आतंकवादी घुस आता तो या होता? कितना नुकसान पहुंचाता? या मार दिया जाता? या अपने मकसद में कामयाब हो जाता? संवाददाता फिर बोला कि कुछ भी हो सकता था। वह अपने मकसद में कामयाब भी हो जाता। पकड़ा भी जा सकता था।&lt;br /&gt;टीवी चैनलों की इस गहमा गहमी के बीच पीएम अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों से विदाई लेते रहे। हर कोई उन्हें झुकर सलाम कर रहा है। फूलों का गुलदस्ता भेंट कर रहा है और तस्वीरें खिंचवा रहा है, लेकिन मोर के नाचने से यहां पर व्यवधान पड़ा। चूंकि मीडिया मयूरनृत्य पर मोह गया तो नेतानृत्य की तस्वीर कौन खींचे? ऐसे में नेताआें की त्योरी चढ़ गई। सुरक्षाबलों को आदेश हुआ कि मोर को जल्दी भगाओ। इस पर जवाब मिला कि चैनल वाले लाइव दिखा रहे हैं। यह जवाब मिलना था कि एक नेता चीखा। इसीलिए तो कह रहा हूं कि मोर को भगाओ, नहीं तो ये मूर्ख लोग पता नहीं या- या करेंगे? यहां प्रधानमंत्री इतने महत्वपूर्ण दौरे पर जा रहे हैं। हम लोग मिलने आए हैं। ऐसी शुभ घड़ी पर इस कार्यक्रम को दिखाने के बजाए मयूरनृत्य का सीधा प्रसारण कर रहे हैं। &lt;br /&gt;कुछ जवान मोर को भगाने के लिए गए तो मीडिया वालों ने विरोध कर दिया। बोले यार इतनी बढ़िया बाइट्स मिल रही है। यों चौपट कर रहे हो। जो इसे लाइव दिखा रहे हैं उनकी टीआरपी बढ़ जाएगी। ऐसे में भैये यह मोर नहीं हमारे लिए तो भगवान है। इसकी आरती कर लेने दे भाई। &lt;br /&gt;जवान बोले कि लेकिन नेता जी विरोध कर रहे हैं। कह रहे हैं कि उनके कार्यक्रम को लाइव करो। यह सुनना था कि कई टीवी चैनल के पत्रकार हंसकर बोले कि उनसे बोलो कि ऐसा ही नृत्य वह भी करें। उनका भी सीधा प्रसारण कर देंगे। अभी तो आप जाओ और इसे नाचने दो। इसके जवाब में एक जवान ने चुटकी ली कि भाई नृत्य तो वह भी कर रहे हैं लेकिन आप लोगों को उनकी नाच शायद अच्छी नहीं लग रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोर को बिना भगाए जवान वापस लौटे तो एक नेता चीखा कि या हुआ?&lt;br /&gt;- मीडिया वाले मोर को भगाने नहीं दे रहे हैं।&lt;br /&gt;- तो इन सालों को भी भगा दो। नमक हराम, कमीने कहीं के।&lt;br /&gt;- जवान जाने लगा तो नेता फिर चीखा। साले ऐसे न मानें तो मोर को गोली मार दो। &lt;br /&gt;- लेकिन सर, वह राष्ट ्रीय पक्षी है और यह मीडिया वाले।&lt;br /&gt;- तो या हुआ? हम किसी की परवाह नहीं करते। नेता गुस्से में बोला।&lt;br /&gt;इसी बीच पीएम वहां से निकल कर बाहर आ गए। वह अपनी कार में बैठे ही थे कि मीडिया भी उनके पीछे भागा। &lt;br /&gt;मयूरनृत्य का सीधाा प्रसारण बंद।&lt;br /&gt;जब मीड़िया वाले चले गए तो मोर ने भी नाचना बंद कर दिया। इधर-उधर निगाह दाै़डाया और पास की झाड़ियों में गुम हो गया। &lt;br /&gt;समाचार पढ़कर जम्हाई ले रहा था कि मित्र का फोन फिर आया। &lt;br /&gt;- अखबार पढ़ा या?&lt;br /&gt;- हां, पढ़ा।&lt;br /&gt;- तो यह बताओ पीएम हाउस में मोर यों नाचा? &lt;br /&gt;मुझसे कोई उत्तर देते नहीं बना, मैं चुप रहा। फिर मुझे लगा कि मित्र से ही पूछ लेना चाहिए।&lt;br /&gt;- इसका उत्तर तो तू ही बता सकता है बच्चे। &lt;br /&gt;- साजिश प्यारे मोहन साजिश&lt;br /&gt;किसकी?&lt;br /&gt;- पाकिस्तान की&lt;br /&gt;वह भला यों?&lt;br /&gt;- योंकि प्रधानमंत्री अमेरिका की यात्रा पर जा रहे थे। पाकिस्तान नहीं चाहता कि हमारे रिश्ते अमेरिका से ठीक हों।&lt;br /&gt;- वह भला यों?&lt;br /&gt;- योंकि यदि अमेरिका हमारा दोस्त बन जाएगा तो पाकिस्तान किसके दम पर हमें धमकाएगा। यों? सही कह रहा हूं न?&lt;br /&gt;- अब तू कह रहा है तो सच ही कह राह होगा।&lt;br /&gt;दोस्त ने फोन काट दिया। मैं सोच में पड़ गया। पीएम हाउस में मोर यों नाचा? या कारण हो सकता है? यही सब सोचते-सोचते मुझे नींद आ गई। &lt;br /&gt;सपने में मेरी मुलाकात पीएम हाउस में नृत्य करने वाले मोर से होती है। मंै उससे सवाल करता हूं।&lt;br /&gt;- हे मेरे देश के राष्ट ्रीय पक्षी। आपने पीएम हाउस में नृत्य यों किया? &lt;br /&gt;- योंकि आपके प्रधानमंत्री अमेरिका की यात्रा पर जा रहे थे।&lt;br /&gt;- महोदय, उनकी अमेरिका यात्रा से आपके नृत्य का या संबंध?&lt;br /&gt;- हे भले मानुस। या तुम इतना भी नहीं जानते कि पूरी दुनिया में अमेरिका के इशारे के बिना पत्ता भी नहीं हिलता।&lt;br /&gt;- जानता हूं वत्स।&lt;br /&gt;- तो, श्रीमान जी बेवकूफों जैसा सवाल यों कर रहे हैं?&lt;br /&gt;- वत्स, बेवकूफ तो तुम हो जो जंगल छाे़डकर पीएम हाउस में नाच रहे हो।&lt;br /&gt;- नहीं श्रीमान। आपका आरोप निराधार और बेबुनियाद है। आपको ज्ञात होना चाहिए कि धरती पर जंगल कितने बचे हैं। कितने प्राणी लुप्त हो गए हैं। हमारी जाति भी संकट में है। इसी संकट के निदान के लिए मैं पीएम हाउस गया था। सोचा था बढ़िया नृत्य करुंगा तो पीएम प्रसन्न हो जाएंगे। लेकिन वहां तो पहले से ही नृत्य करने वाले मौजूद थे। उनके आगे मेरी एक न चली। हां, मीडिया वालों ने अपने चैनलों पर दिखाकर मेरे महत्व को रेखांकित जरूर किया, लेकिन उन्होंने भी मुझे आतंकवादी बनाकर प्रस्तुत किया। खैर, इससे या फर्क पड़ता है। मुझे कवरेज तो मिल ही गई। अब यह खबर अमेरिका तक तो पहुंच ही जाएगी। हो सकता है अमेरिका हमारी जाति के लिए भी कुछ करे। किसी पैकेज-वैकेज की घोषणा करे। ताकि हम विलुप्त होने से बच जाएं। &lt;br /&gt;- वत्स, तुम तो बड़े समझदार निकले।&lt;br /&gt;- श्रीमान जी, यह समझदारी आदमियों की सोहबत से ही आई है। &lt;br /&gt;- मैं समझा नहीं वत्स।&lt;br /&gt;- श्रीमान जी, जब मैं बहुत छोटा था तो मुझे एक आदमी जंगल से पकड़ कर ले गया। मैं अपने माता-पिता और दोस्तों के लिए बहुत तड़पा, लेकिन उसने मुझे पिंजरे मेंं कैद करके रखा। धीरे-धीरे मुझे भी अच्छा लगने लगा। मां-बाप को भूल गया। इस तरह आदमियों वाले गुण मुझमें आते गए। बाद में तो वह मुझे पिंजरे से आजाद कर दिया। फिर भी मैं जंगल में नहीं गया। योंकि मैं जान गया था कि जंगल रह ही नहीं गए हैं। हमारी जाति संकट में है। ऐसे में उसी आदमी के साथ रहने में ही मुझे अपनी भलाई दिखी। सोचा इसके यहां रहकर ही मैं अपनी जाति केलिए कुछ कर सकता हंू। धीरे धीरे उसकी सारी आदतें मुझमें आ गइंर्। बिना दुम के भी दुम हिलाने की उसकी कला मुझे बहुत पसंद आई। वह इसी कला से बड़े से बड़ा काम करवा लेता। एक दिन मंैने भी सोचा कि मैं भी इस कला का प्रदर्शन करके अपनी जाति को बचाऊंगा। बस यही सोचकर पीएम हाउस पहुंच गया। अब देखो या परिणाम सामने आता है।&lt;br /&gt;- परिणाम अच्छा ही आएगा वत्स।&lt;br /&gt;- मैं वत्स नहीं, तुम्हारी पत्नी हूं। इतना दिन चढ़ गया और अभी तक सो रहे हो। पत्नी की आवाज सुनकर मैं जागा तो बड़ी देर तक खुद पर यकीन नहीं हो रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओमप्रकाश तिवारी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-378499535105732506?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/378499535105732506/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=378499535105732506' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/378499535105732506'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/378499535105732506'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html' title='पीएम हाउस में मोर नाचा'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-8471391626263829777</id><published>2008-02-14T00:24:00.000+05:30</published><updated>2008-02-14T00:27:31.570+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>उधार की जिंदगी</title><content type='html'>कहानी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओमप्रकाश तिवारी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह फोन पर पिता जी से बातें कर रहा था। हाल-चाल पूछने के बाद जैसे ही उसके पिता ने कहा कि हो सके तो कुछ पैसे...। आगे का शब्द पिता जी बोल भी न पाए कि वह फट पड़ा -पैसा-पैसा-पैसा, आप  या समझते हैं? मेरे पास पैसों का पे़ड लगा है? या मैंने छापाखाना लगा रखा है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर से डरी सहमी आवाज आई -तुम्हारी मां बीमार...। वा य फिर अधूरा छाे़ड दिया गया,  योंकि बोलने वाला जानता था कि आगे के शब्द सुने ही नहीं जाएंगे। हुआ भी यही। वह फिर चिल्ला पड़ा -तो मैैं  या करूं? जान दे दूं? आप मेरी मजबूरी को  यों नहीं समझते? उधर से हताश-निराश पिता जी की आवाज आई -तो फोन रखता...। पिता जी का वा य पूरा होने से पहले ही उसने फोन रख दिया...। &lt;br /&gt;पैसा देकर वह पीसीओ से बाहर आ गया। उसे बेहद गुस्सा आ रहा था, लेकिन उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह गुस्सा किस पर है। पिता जी पर? अपने आप पर? हालात पर? वह जानता है कि घर पर पैसे की जरूरत है, हमेशा रहती है और यह स्वाभाविक भी है,  योंकि मां बीमार रहती है। भतीजे-भतीजियां पढ़ रहे हैं। पिता जी की भी तबियत ठीक नहीं रहती है। बड़े भाई बेरोजगार हैं। खेती है, जो खाने भर का ही आनाज पैदा करती है। कभी सिंचाई तो कभी बुवाई और कभी कटाई का काम लगा ही रहता है। कभी डीजल के लिए तो कभी ट्यूबवेल खराब होने पर पैसे की जरूरत बनी ही रहती है। कभी खाद के लिए पैसे चाहिए तो कभी मजदूरी देने के लिए। मौसम और बीमारियों के प्रकोप से फसल भी कभी-कभार चौपट हो ही जाती है। तब खाने के लिए अनाज भी खरीदना पड़ता है। लेकिन वह  या करे? पिछले माह ही उसकी श्रीमती जी ने एक भोले-भाले शिशु को एक निजी अस्पताल में जन्म दिया। पहले से ही कंगाल चल रहा वह एकाएक कर्ज के दलदल में फंस गया। उस समय उसकी मां उसके साथ ही थीं। वह जानती हैं कि वह कर्ज में डूबा हुआ है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका हर काम कर्ज से ही होता है। उधार की जिंदगी जीना उसकी नियति-सी बन गई है। पिछला कर्ज चुका नहीं पाया होता है कि अगले कर्ज की नौबत आ जाती है। ऐसे में बार-बार कर्ज कौन दे? इस समय उसकी चिंता यही है कि वह दोस्तों का कर्ज कैसे चुकाए? वह बैंक से कर्ज लेकर दोस्तों का कर्ज चुकाने की सोच रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; या कहा आपने? वह नौकरी नहीं करता? नहीं साहब, नौकरी करता है। उसे ठीक-ठाक वेतन भी मिलता है, लेकिन खर्च के हिसाब से कम ही है। ठीक-ठाक है फिर भी कम है? यही पूछना चाहते हैं न आप? बता रहा हूं भाई। उसे आठ हजार रुपये हर माह वेतन मिलता है। इसी मेंं उसे अपने बीवी और तीन बच्चों का खर्च चलाने के अलावा गांव में रह रहे माता-पिता का भी ख्याल रखना पड़ता है। शहर में वह किराये के मकान में रहता है। दो बच्चे पढ़ रहे हैं। मोटरसाइकिल उसने बैंक से कर्ज लेकर ली है। आठ हजार रुपये की वेतन रूपी चादर से वह पैर ढकता है तो सिर खुल जाता है और सिर ढकता है तो पैर...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो बच्चे थे तो तीसरा पैदा करने की  या जरूरत थी? आपका सवाल सही है, लेकिन उसकी श्रीमती जी की इच्छा थी कि एक बेटी हो जाए। लेकिन बेटी के च कर में बेटा हो गया। आप भी सोच रहे होंगे कि अजीब महिला है। आज जबकि लोग बेटी पैदा ही नहीं करना चाहते। कई तो पैदा होने के बाद मार देते हैं। यहां-वहां फेंक आते हैं। ऐसे में उसे बेटी चाहिए। हां साहब, उसका कहना है कि बिना बेटी के कोख पवित्र नहीं होती। इसे आप उसकी मूर्खता भी कह सकते हैं, लेकिन आज के जमाने में बेटी पैदा करने की इच्छा रखने वाली महिलाएं कितनी हैं? कितने दंपति हैं जो बेटी पैदा करना चाहते हैं? आज जबकि देश का लिंगानुपात गड़बड़ा गया है, ऐसे में उनकी जैसी महिलाआें की हिम्मत की दाद नहीं देनी चाहिए? लेकिन इससे तो वह कंगाल हो गया? उसका पूरा बजट चौपट हो गया। हां, यह बात आपकी सही है, लेकिन पत्नी की इच्छा का सम्मान भी तो कोई बात होती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठंड का महीना है और वह बच्चों के लिए गर्म कपड़े नहीं बनवा पाया है। दोनों बच्चे फटा स्वेटर पहनकर स्कूल जाते हैं। घर पर भी पहनने के लिए ठीक से गर्म कपड़े नहीं हैं। वह खुद के लिए रजाई तक नहीं बनवा पाया है। कंबल-चादर आे़ढकर गुजारा कर रहा है। दो चारपाई है, एक पर श्रीमती जी और छोटा बच्चा और एक पर दोनों बड़े बच्चे सो जाते हैं और वह फर्श पर सोता है...।  &lt;br /&gt;अब उसे पिता जी के साथ किए व्यवहार पर अफसोस हो रहा है, लेकिन  या करे, जानता है कि हाथ से छूटा तीर और मंुह से निकला शब्द वापस नहीं आता। पहले से दुखी यह प्राणी और दुखी हो गया...। &lt;br /&gt;कमरे पर आते ही श्रीमती जी का सवाल। &lt;br /&gt;-  या कह रहे थे बाबू जी? &lt;br /&gt;- बाबू जी को पैसा चाहिए। उसने लंबी सांस लेते हुए कहा। श्रीमती जी के पूछने से उसे फिर से गुस्सा आने लगा। थाे़डी देर पहले अपने जिस व्यवहार पर वह पश्चाताप कर रहा था उसे भूल गया। &lt;br /&gt;- बाबू जी भी न हद करते हैं। शिशु को मालिश करते हुए श्रीमती जी ने कहा। वह अपने गुस्से को जज्ब करते हुए अखबार पढ़ने लगा। &lt;br /&gt; या कहा आपने? अखबार पढ़ता है तो खरीदता भी होगा? हां भाई, लेकिन ऐसा वह शौक के लिए नहीं, बल्कि मजबूरी में करता है। पेशे से पत्रकार जो है। अखबार, पत्रिका और किताब पढ़ना तो उसकी पेशेगत मजबूरी है। &lt;br /&gt;अखबार पढ़ते हुए अचानक उसकी निगाह बच्चे पर पड़ी तो वह कह उठा-साला पंडित कहता है कि तुम्हारा यह बेटा लकी है। तुम्हारी उन्नति करेगा, लेकिन यहां तो उल्टा हो रहा है। पैदा होते ही कर्ज में डुबो दिया नालायक ने। &lt;br /&gt;-हे, मेरे बेटे को कोसो मत। श्रीमती जी ने आंखें तरेरीं। &lt;br /&gt;-मारेगा बु़ढापे में लात तो पता चलेगा। उसने तंज किया।&lt;br /&gt;- आप मार रहे हो अपने मां-बाप को लात?&lt;br /&gt;-नहीं, मैं तो उन्हें निहाल कर रहा हूं। बीमार मां के लिए पैसे नहीं भेजना, लात मारना नहीं तो  या है? एक हजार किलोमीटर दूर बैठा बाप फोन पर जब मां की बीमारी के बारे में बता रहा था तो उसी पर झल्ला बैठा।  या इसी दिन के लिए पाला था उन्होंने?&lt;br /&gt;-इसमें मेरे बेटे का  या कसूर है?&lt;br /&gt;-सारे बेटे ऐसे ही होते हैं। कमाने लगते हैं तो उन्हें अपना ही खर्चा भारी हो जाता है। मां-बाप बोझ लगने लगते हैं।&lt;br /&gt;-मेरा बेटा ऐसा नहीं होगा। &lt;br /&gt;-सारे मां-बाप यही सोचते हैं। एक तरह से अच्छा ही है कि उनका यह भ्रम बना रहता है। नहीं तो इस सृष्टि  का पता नहीं  या हो...। &lt;br /&gt;वह बोल ही रहा था कि श्रीमती जी किचन में चली गइंर्। वह फिर से अखबार पलटने लगा, लेकिन उसका मन अखबार पढ़ने में नहीं लगा। उसे याद आया कि रात बहुत ठंड लगी थी। लाख कोशिशों के बाद भी वह इस माह की तनख्वाह में से रजाई नहीं बनवा पाया। इस साल ठंड भी बहुत पड़ रही है। अभी तो आधा दिसंबर ही बीता है। आगे  या हाल होगा? उसे यह भी याद आया कि वह फर्श पर सोता है। रात बिस्तर पर बहुत सारे चींटें चढ़ जाते हैं। वह जिस मकान में रहता है वह बहुत पुराना है। उसमें चींटे बहुत निकलते हैं। न चाहते हुए भी दिन भर में सैकड़ों चीटें मर जाते हैं। चाहते हुए भी वह कमरा नहीं बदल पा रहा है। किराया कम होने के कारण वह इस मकान में रह रहा है।&lt;br /&gt;तमाम विसंगतियों से घिरा यह इनसान सपने बहुत देखता है। वह रोमांचक कल्पनाएं भी करता है। अभी वह अखबार पढ़ना बंद करके सोच रहा है कि उसे कहीं से दस लाख रुपये मिल गए हैं। उन पैसों से वह गांव का अपना मकान बनवा रहा है। उसका गांव का मकान इस बरसात में गिर गया है। एक भतीजी की शादी कर रहा है। शहर में, जहां रह कर वह नौकरी कर रहा है, वहां पर एक मकान खरीद लिया है। भतीजे के लिए मोटरसाइकिल खरीद दी है और भाई के लिए गांव में किराने की दुकान खुलवा दी है। इससे पहले कि उसकी कल्पना और उड़ान भरती। सपने उसकी आंखों से जमीन पर आने लगते श्रीमती जी ने आवाज लगा दी। &lt;br /&gt;-खाना नहीं खाना  या? एक झटके में वह आसमान से धरती पर आ गया।&lt;br /&gt;- यों नहीं खाना।&lt;br /&gt;-बिना नहाए खाओगे?&lt;br /&gt;-नहीं।&lt;br /&gt;- फिर जल्दी नहाओ। खाना तैयार है।&lt;br /&gt;वह नहाने चला गया। वह नहाता रहा और सपना देखता रहा..। वह खाना खाता रहा और सपना देखता रहा...। &lt;br /&gt;खाना खाने के बाद श्रीमती से बोला कि मकान देखने जा रहा हूं।&lt;br /&gt;-आप तो कह रहे थे कि कमरा बदलना ही नहीं है।&lt;br /&gt;-कमरा नहीं, मकान देखने जा रहा हूं, खरीदने के लिए। वह मुस्कुराते हुए बोला।&lt;br /&gt;- या?&lt;br /&gt;-हां, सोच रहा हूं कि कोई ढाई-तीन लाख का मकान खरीद ही लूं।&lt;br /&gt;- यह भी खूब रही, घर में नहीं दाने और अम्मां चली भुनाने। श्रीमती ने व्यंग्य किया।&lt;br /&gt;-नहीं, मुंगेरी लाल के हसीन सपने। कहते हुए वह चला गया।&lt;br /&gt;उसका एक दोस्त प्रापर्टी डीलर का काम करता है। उसके साथ उसने कई मकानों को देखा। शाम हो गई तो घर वापस आ गया। कमरे में प्रवेश करते ही श्रीमती का सवाल पत्थर की तरह दिमाग पर लगा।&lt;br /&gt;-देख आए?&lt;br /&gt;-हां।&lt;br /&gt;- कोई पसंद आया?&lt;br /&gt;-नहीं।&lt;br /&gt;-  यों?&lt;br /&gt;- जब लेना ही नहीं तो पसंद आने का सवाल ही कहां उठता है।&lt;br /&gt;-फिर देखने  यों गए?&lt;br /&gt;- यों ही, जानकारी बढ़ाने के लिए। खरीद नहीं सकता तो  या देख भी नहीं सकता। देखने के पैसे थोड़े ही न लगते हैं।&lt;br /&gt;-आप भी न हद करते हो। कहते हुए श्रीमती जी कमरे से निकलने लगीं तो उसने जेब से दो हजार रुपये निकाल उनके आगे कर दिए। पैसे देखकर वह रुक गईं। दिमाग में सवाल उठा तो पूछ भी लिया-किससे लिए?&lt;br /&gt;- दोस्त से।&lt;br /&gt;-  या करना है?&lt;br /&gt;- घर भेजना है।&lt;br /&gt;-कौन सा दोस्त बचा था अभी तक...।&lt;br /&gt;- वही, जिसने मकान दिखाए। प्रापर्टी डीलर रवि। लाखों का मकान खरीदवाएगा तो दो हजार रुपये कर्ज भी नहीं देगा...।&lt;br /&gt;-आप भी न...&lt;br /&gt;- हद करते हो...। श्रीमती जी के वा य को उसने पूरा किया और दोनों ठहाका मारकर हंस पड़े...। उनकी हंसी बड़ी देर तक कमरे में गूंजती रही...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओमप्रकाश तिवारी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-8471391626263829777?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/8471391626263829777/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=8471391626263829777' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/8471391626263829777'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/8471391626263829777'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2008/02/blog-post_13.html' title='उधार की जिंदगी'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-4798177337287802646</id><published>2008-02-13T02:06:00.000+05:30</published><updated>2008-02-13T02:09:19.572+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>खुशी बाजार में नहीं मिलती</title><content type='html'>कहानी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओमप्रकाश तिवारी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्र में लिखे हर शब्द किसी गोले की तरह उसके मन-मष्तिस्क में पर प्रहार कर रहे थे। हर वा य के साथ शरीर का र त-संचार बढ़ता ही जा रहा था। ठंड का मौसम था, लेकिन उसके माथे पर पसीने की बंदूें साफ-साफ देखी जा सकती थीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्र पढ़ने के बाद उसने उसे माे़डकर जेब के हवाले कर दिया और बेचैनी में कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। इधर-उधर देखा सभी साथी या तो अपने काम में तल्लीनता से लगे थे या फिर किसी साथी से बातचीत में। एक पल को उसे लगा कि दुनयिा में सभी खुश हैं, सिवा उसके। &lt;br /&gt;वह माथे पर हाथ फेरता हुआ आफिस से बाहर निकल आया और कैंटीन पर आकर खड़ा हो गया। चाय का आर्डर देने के बाद वह वहीं चहल-कदमी करने लगा। अमूमन इस समय कैंटनी पर कोई न कोई साथी मिल जाता था, लेकिन आज कोई नहीं मिला। वह टहलते हुए ही सोचने लगा। मां की तबीयत खराब है। शरीर में खून की कमी है। ताकत का इंजेक्षन लगता है तो ठीक रहती हैं। अभी तीन माह पहले घर गया था तो मां का इलाज करवाया था, लेकिन इलाज पूरा नहीं हो पाया था। तीन-चार हजार रुपये खर्च करने के बाद पैसे की कमी इलाज में आड़े आ गई। मां भी चलने-फिरने लगी तो अभाव ने लापरवाही का रूप ले लिया। वह फिर शहर आ गया। तब से आज तक वह पैसा नहीं भेज पाया। पिता जी ने लिखा है कि तुम्हारी मां के इलाज के अलावा भी बहुत खर्चे हैं। कैसे  या करें मेरी तो समझ में ही नहीं आता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी भी तो समझ में नहीं आता कि  या करें कि हर माह इतना पैसा बच जाए कि घर भी भेजा जा सके  और अपनी भी जरूरतें पूरी हो सकें। पिता जी शायद सोचते हैं कि मैंं यहां आराम से हंू। पैसा बैंक में जमा कर रखा है। वह यह नहीं जानते  कि मेरा बेटा पिछले दिनों हर शनिवार महज इसलिए या तो मार खाता रहा या फाइन भरता रहा या दो चार पीरियड खड़ा रहता,  योंकि मैं उसकी शनिवार की ड्रेस के अनुरूप एक सफेद जूता नहीं खरीद पाया था। ऐसा एक-दो नहीं, पूरे चार महीने तक हुआ था। हर शनिवार वह स्कूल से रोता हुआ आता। जब वह घर आता तो उससे नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं होती। मुझसे तो वह कुछ नहीं कहता, लेकिन अपनी मां से रो-रोकर खूब लड़ता है। उसके बाद श्रीमती जी मुझे कोसतीं। कई बार तो इस मामले पर हम दोनों में खूब झगड़ा भी हुआ। एक दिन जब मैं उसे किसी दोस्त से पैसे उधार लेकर जूता ला दिया तो उसे देखकर वह ऐसा खुश हुआ मानो उसकी झोली में जूता नहीं चांद-तारे आ गए हों। आजकल उसकी एक साइकिल की मांग है। जिसे मैं टाल रहा हंू। लेकिन मां के इलाज के लिए पैसा भेजना तो नहीं टाल सकता। कुछ करना ही पड़ेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच कैंटीन वाले ने चाय बनाकर उसे दे दी। इस दौरान एक दोस्त भी वहीं आ गया। दोस्त ने उसकी परेशानी का कारण पूछा तो उसने बाता दिया। दोस्त उसे कुछ पैसे देने के लिए तैयार हो गया। वह खुश हो गया। इतना कि लगा ही नहीं कि थाे़डी देर पहले वह निराशा और उदासी के समुद्र मेंं गोते लगा था। परेशानी और तनाव उसके चेहरे कपूर की तरह गायब हो गई। वह हंसी-मजाक में मशगूल हो गया और तनाव रहित होकर आकर काम करने लगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह आफिस से घर आया तो उसकी पत्नी ने बताया कि उन्होंने दो कमरों वाला एक मकान देखा है। सब कुछ सेपरेट है किसी से कोई लेना-देना नहीं होगा। श्रीमती जी इतनी खुश थीं कि वह उनकी खुशी छीनना मुनासिब नहीं समझा। बेटा भी खुशी में झूमता हुआ बोला कि डैडी कमरा बहुत बढ़िया है। नया बना मकान है। दीवालें चमक रहीं हैं। उन पर पेंट किया गया है, चूने की पुताई नहीं। दोनों कमरों में अलमारियां भी हैं, बिल्कुल नई। एक कमरा आपका हो जाएगा, एक मेरा और मम्मी का। फिर आप खूब पढ़ना-लिखना। आपको कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा। मुझे भी एक कुर्सी-मेज ला देना। उसे मैं अपने कमरे में लगा लूंगा। फिर खूब मन लगाकर पढूंगा। आप जब कंप्यूटर लेंगे तो उसे भी उसी कमरे में लगाना। मैं खूब बढ़िया चित्रकारी करूंगा। मैं बढ़िया पेंटिंग कर लेता हंू। मेरे कंप्यूटर के सर मेरी खूब तारीफ करते हैं। बेटा खुशी में बोलता ही जा रहा था। उसने कोई जवाब नहींं दिया। कमरेकी दीवारांे पर नजर डाला। पुरानी दीवालें बदरंगी लग रहींं थीं। एक अजीब सी उदासी दीवालोंं पर तारी थी, जो पूरे कमरे में छा जाती जा रही थी। उसे लगा कि इन दीवालों की जिंदगी भी उसी की तरह है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात को सोते व त उसने पत्नी को बताया कि घर से पिता जी का पत्र आया है। मां की तबीयत खराब है। कुछ पैसा भेजना होगा। कहां से भेजेंगे? पत्नी ने प्रश्न किया तो उसने बताया कि एक दोस्त से मांगा हंू। काम हो जाएगा। जवाब में पत्नी ने गुस्से में कहा कि आप उधार लेने से नहीं चूकते। हमेशा कर्ज में डूबे रहते हैं। वेतन मिलते ही कर्ज चुकाने में चला जाता है। फिर अगला काम कर्ज लेकर ही करना पड़ता है। पता नहीं कब तक ऐसा करते रहोगे। जवाब में उसने कहा कि कोई काम रुकता तो नहीं न। थाे़डा आगे पीछे हो ही जाता है। हां, कर्ज जरूर बना रहता है, लेकिन दे भी देता हंू। कभी-कभी इसकी वजह से कुछ दि कतें जरूर हो जाती हैं। लेकिन जिंदगी तो यह सब चलता ही रहता है। यह भी सही है कि इसकी वजह से जीवन में एक दबाव भी बना रहता है, जिसके कारण जिंदगी बदरंग सी बनी रहती है। लेकिन  या किया जाए? अपने पास कोई और उपाय भी तो नहीं है। खर्चे इतने हैं कि उस हिसाब से कमाई नहीं है। लगे हाथ उसने यह भी कह दिया कि हम अभी कुछ महीने दो कमरों वाला घर नहीं ले सकते। पैसे की जरूरत है। मां का इलाज कराना जरूरी है। कुछ कर्ज भी देना है। इसलिए हमें अभी इस योजना को कुछ दिनों के लिए भूलना होगा। इतना सुनना था कि पत्नी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहंुच गया। वह करवट बदल कर लेट गई। वह समझाने की कोशिश करता रहा। कहता रहा कि हम कमरा लेंगे, लेकिन कुछ दिन और हमें इसी हाल में रहना होगा। कान पक गए आपकी यह बात सुनते-सुनते पत्नी ने पलटकर जवाब दिया। वह कुछ बोल नहीं पाया। यह बात इतनी सच थी कि उसे झूठ से ढका नहीं जा सकता था। वैसे भी झूठ बोलने के लिए जो जरूरी कौशल और कला चाहिए वह उसमंे नहीं है। उसकी पत्नी की तल्खी में हकीकत थी, लेकिन सच उससे आगे भी कुछ और था, जिससे अनजान न पत्नी थी, न ही वह। आराम की जिंदगी वह भी चाहता है। उसके लिए प्रयास भी करता है, लेकिन पर्याप्त संसाधन नहीं जुटा पाता। मौजूदा परिस्थितियों में जिम्मेदारियों और दायित्वयों का बोध भी है उसे। वह खुद के आराम के लिए इन्हें नहीं भुला सकता। &lt;br /&gt;एक बार उसने पिता जी की बीमारी पर अपने बॉस से कुछ पैसे मांगे थे। बॉस ने पैसे तो नहीं दिए, लेकिन दिए ढेर सारे उपदेश। बॉस ने कहा था कि कहां से दोगे इतना पैसा। मां-बाप से कह दो कि तुम अपनी ही जरूरतें नहीं पूरी कर सकते। तुम्हें कहां से दें। वैसे भी तुम उधार बहुत लेते हो। इस कारण तुम तनाव मंे रहते हो। इसी वजह से तुम्हारा काम में भी मन नहीं लगता और गलतियां बहुत करते हो। इसके बाद मेरी डांट खाते हो और फिर और गलतियां करते हो।  यों करते हो ऐसा? जितना मिलता है उसी में गुजारा  यों नहीं करते? उस समय उसे अपने बॉस पर बहुत गुस्सा आया था। उसने डरते हुए ही सही, लेकिन कहा था कि मां-बाप को वह अपने हाल पर नहीं छाे़ड सकता। मैं हंू  योंकि मेरे माता-पिता हैं। मैं हंू  योंकि मेरे बच्चे हैं। बच्चे हैं, माता-पिता हैं, इसलिए मैं हंू। आपको पैसा नहीं देना, न दें, ऐसी बातें भी न करें। संतों के प्रवचन से किसी की जिंदगी नहींं चलती,  योंकि वह कोरे उपदेश होते हैं। उसमें जीवन का सार तत्व नहीं होता। आप भी उपदेश दे रहें हैं। संत बनने का प्रयास कर रहे हैं। मेरी नजरों में संत से बड़ा ढोंगी और कोई नहीं होता। उपदेशक अपने ही उपदेश का पालन नहीं करता। यह एक हकीकत है और मैं इसे जानता हंू। उसकी बात सुनकर बॉस नाराज हो गया था। उसने और भी कटु वचन उसे कहे थे, लेकिन वह इसकेआगे कुछ नहीं बोला और वहां से चला गया। बॉस के केबिन से निकलते ही उसने अस्पुट स्वरों में कई भद्दी गालियां बॉस के लिए निकालीं। साला कहता है कि जितना मिलता है उतने में ही गुजारा करो। यह नहीं कहता कि गुजारे लायक वेतन दे दूं। ऐसे तो कहेगा कि मैं इस कंपनी के परिवार का सदस्य हंू।  या ऐसे ही परिवार बनता और चलता है? सदस्य संकट में हो और मुखिया उपदेश देने में व्यस्त रहे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह वह फे्र श होने के लिए बाथरूम गया तो उसकी निगाह बाथरूम की दीवारों पर अनायास ही चली गइंर्। वैसे तो वह इन्हें रोज ही देखता है और सोचता है कि एक न एक दिन उसे इस बाथरूम से मुि त जरूर मिलेगी। लेकिन आज उसे बाथरूम की दीवारें बदली नजर आइंर्। पुताई के पपड़ी छाे़डने से उधड़ी दीवारों पर तरह-तरह के पक्षी, शेर, हाथी, ऊंट और गाय की आकृतियां नजर आइंर्। वह खुश हो गया, बोला यह तो कलाकारी है। चित्रकारी है। वह भसी मुफ्त की जोकि दीवारों के खराब होने के कारण बन गई हैं। उसे वही दीवारें अच्छी लगने लगीं, जो पहले खराब लगती थीं। उन दीवारों में उसे धड़कन सुनाई देने लगी। उदासी की जगह जीवंतता दिखाई पड़ने लगी। लगा वह उससे कुछ कह रही हैं। दीवारों पर बनी आकृतियां उससे बोल रही हैं, बातें कर रही हैं। वह खुशी से झूम उठा। जल्दी से बाथरूम से बाहर आया और पत्नी को बुलाकर ले गया। देखो, दीवारों पर हाथी, घाे़डे, शेर, चीता, मोर, कोयल के चित्र बने हुए हैं। यह देखो यह आदमी की आकृति और यह हनुमान जी की। पत्नी ने देखा और मुस्कराते हुए कहा-हां बना तो है। मैंने तो इस नजरिये से इन्हें कभी देखा ही नहीं। लेकिन मैंने देखा था। उनके बेटे ने कहा। डैडी, मैं तो रोज देखता हूं। इनसे बातें भी करता हूं। यह हाथी, मेरा साथी है। शेर मेरा दोस्त। मैं इनसे खूब बातें करता हूं्र। अपनी कंप्यूटर की  लास में मैं इन्हीं जैसी आकृतियां बनाता हंू और सर मुझे शाबासी देते हैं। उसे आश्चर्य हुआ कि जो बात उसके बेटे ने पहले ही जान ली, वह  यों नहीं जान पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन वह खुशी-खुशी आफिस गया। शाम को घर आया तो कमरे का नजारा बदला-बदला हुआ था। लकड़ी की पुरानी अलमारी के ऊपर बहुत सारे रंगीन कार्टून और चित्र सजाए गए थे। उसकी सुंदरता में अलमारी का पुरानापन, उदासीपन गायब हो चुका था। वह चहक रही थी। दीवारों पर भी कई जगह चित्र और कार्टून टंग गए थे। दीवारें भी हंस रही थीं। यह सब उसके बेटे ने किया था। वह दीवारों और अलमारी को देखकर मुस्कराया और बेटे का माथा चूम लिया। उस समय उसकी पत्नी और उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन खुशी के......।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूर्व में इरावती पत्रिका में प्रकाशित&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-4798177337287802646?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/4798177337287802646/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=4798177337287802646' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/4798177337287802646'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/4798177337287802646'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2008/02/blog-post_12.html' title='खुशी बाजार में नहीं मिलती'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-4867876032325955726</id><published>2008-02-04T18:00:00.000+05:30</published><updated>2008-02-04T18:04:05.922+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रिपॊरताज   साहित़य'/><title type='text'>अपनी अपनी श्रद्धा</title><content type='html'>रिपोर्ताज&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- ओम प्रकाश तिवारी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम एक किलोमीटर की भी चढ़ाई नहीं चढ़े होंगे कि सुस्ताने के लिए स्थान तलाशने लगे। यही नहीं हमारी टोली के लगभग सभी सदस्य आगे-पीछे हो गए थे। हां, बच्चों की बात अलहदा थी। वह पूरे उत्साह के साथ आगे बढ़ते जा रहे थे। उनके उत्साह में मुझे आस्था-श्रद्धा का भाव रंच मात्र भी नहीं नजर आ रहा था। शायद वह परिवर्तन से उत्साहित थे। जिज्ञासा के कारण रोमांचित थे। उनके सामने एक नई दुनिया थी, जिसकी विसंगतियों से वह अनजान थे। उनकी कोशिश यही थी कि इस यात्रा के हर पल को आंखों में समेट लिया जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चे यह जानते थे कि वह माता वैष्णो देवी के दर्शन के लिए जा रहे हैं। जिनका मंदिर पहाड़ की ऊंचाई पर है। लेकिन वह माता का दर्शन क्यों करना चाहते हैं, यह शायद नहीं जानते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा बड़ा बेटा छठी कक्षा में पढ़ता है। जब उसकी पाँचवी कक्षा की परीक्षा आरंभ हुई थी तो पहले दिन वह स्नान करने के बाद अगरबत्ती जलाकर पूजा करने लगा। उसे ऐसा करते देख मुझे आश्चर्य हुआ। मैं कभी घर में क्या मंदिर जाकर पूजा-पाठ नहीं करता। उसकी मम्मी जरूर धार्मिक हैं, लेकिन मेरी उदासीनता धीरे-धीरे उन पर भी प्रभावी हो गई है। गहरी आस्तिकता के बावजूद अब वह भी कभी-कभार ही पूजा-पाठ करती हैं। ऐसे में बेटे द्वारा पूजा करना चौंकाया। लेकिन मैंने उसे तत्काल टोका नहीं। उसकी पूजा खत्म होने के बाद मैंने उससे पूछा कि बेटा आज तुमने पूजा क्यों की? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- आज मेरा पेपर है। उसने सरलता से जवाब दिया। उसके जवाब से लगा जैसे वह कहना चाहता हो कि आपको तो पता होना चाहिए डैडी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- मालूम है, लेकिन पेपर का पूजा से क्या संबंध? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह सकुचा गया और चुप हो गया। जब मैंने फिर पूछा तो जवाब दिया कि ताकि पेपर बढ़िया हो और मैं अच्छे नंबर से पास हो जाऊं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- यह सच नहीं है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता बेटा। पेपर बढ़िया तभी होगा जब आप मन लगाकर मेहनत से पढ़ाई किये होंगे। यदि आपकी तैयारी बढ़िया होगी तो पेपर तो अच्छा होगा ही और तभी ईश्वर भी आपकी मदद करेंगे। अन्यथा सब बेकार। पूजा-पाठ पर ध्यान देने से बेहतर है कि अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। मैंने उसे समझाने की कोशिश की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेटे ने अगले दिन पूजा नहीं की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह पास हो गया। वह भी अच्छे नंबरों से। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस यात्रा में मेरे साथ यह बेटा भी था। उससे छोटा बेटा, उसकी मम्मी और मेरी मां। साथ में एक मित्र और उनका परिवार। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह यात्रा मेरी मां की वजह से हो रही थी। वह गांव से मेरे पास आईं थीं। उनकी अभिलाषा थी कि वह माता वैष्णो देवी का दर्शन करें। उन्होंने सुन रखा था कि माता वैष्णो देवी का दर्शन करने के बाद इनसान की मुराद पूरी हो जाती है। गांव (सुल्तानपुर) से जालंधर के लिए (मेरे पास) चलते समय ही उन्होंने तय कर लिया था कि माता का दर्शन जरूर करेंगी। लिहाजा जब उन्होंने इच्छा व्यक्त की तो मैं इनकार नहीं कर पाया। दरअसल घूमने से जो अनुभव होता है, उससे मैं वंचित भी नहीं रहना चाहता था। मेरे लिए यह अच्छा मौका था। पैसे की क़िल्लतों की वजह से घर से बाहर निकलना कहां हो पाता है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम सुस्ताने के लिए एक जगह बैठ गए। मेरे बगल में एक आदमी भी बैठा था। उसके गोद में एक बच्चा था। उसे देखकर मैं चौंका। बच्चे के कपड़े और रंग देखकर नहीं लग रहा था कि वह उसका बच्चा होगा। लेकिन वह आदमी उस बच्चे से बड़े प्यार से बातें कर रहा था। बिस्कुट खिला रहा था। पानी पिला रहा था। मैं उसकी यह क्रिया देखते हुए सोच रहा था कि इसने किसी का बच्चा चुरा लिया है। लेकिन उसकी बेफिक्री ने मेरे दिमाग से इस सोच को उड़ा दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह पिट्ठू था। पिट्ठू मतलब, यात्रियों के बच्चों को ढोने वाला मजदूर। चूंकि मैं पहली बार माता के दर्शन के लिए यात्रा पर था और विस्तृत जानकारी लेकर नहीं आया था, इसलिए मैं उसे समझ नहीं पा रहा था। लेकिन मेरे दिमाग में यह बात आ गई कि वह पैसे के लिए किसी के बच्चे को ढो रहा है...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्गुणी ठीक ही कहते हैं कि यह दुनिया माया है। माया-मोह के च कर में आदमी परमात्मा से दूर हो जाता है। आस्था के बीच दुनियादारी और बच्चे...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह विचार आते ही मेरे दिमाग में यह भी विचार आया कि माता क्या आप इस गरीब की दशा से अनभिज्ञ हैं? यदि आपका दर्शन करने मात्र से ही आपके दर्शनार्थियों का दुख और संकट दूर हो जाते हैं तो आपके चरणों में पड़े हुए आपके दर्शनार्थियों की सेवा करने वाले आपके भक्तों का कष्ट क्यों दूर नहीं होता? मेरे मन में यह सवाल इसलिए उठा क्योंकि यहां आने वाला प्रत्येक आदमी माता से कुछ न कुछ मांगने ही आता है। लोगों की धारणा भी है कि माता जी से जो माँगों मिल जाता है। तो क्या यह स्थानीय लोग मां से कुछ मांगते ही नहीं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'दर्शनार्थियों` शब्द इसलिए इस्तेमाल किया क्योंकि यहां आने वाले अधिकतर लोग मुझे 'दर्शनार्थी` या फिर 'पर्यटक` ही नजर आए। मेरा मानना है कि भक्त को भगवान या देवी के दर्शन के लिए कहीं जाना नहीं पड़ता। भगवान यदि हैं तो वह अपने भ त के आसपास ही रहते हैं। मुझे लगता है कि भगवान 'दर्शनार्थियों` से नहीं, 'भक्तों` से हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भ त हैं तो भगवान हैं...। मेरे मन में यह विचार आया तो यह भी आया कि इसका मतलब दर्शनार्थी हैं तो पहाड़ के लोगों की आय है...उनके पास रोजगार है...। शायद यही कारण है कि हिंदुओं के कई प्रसिद्ध तीर्थ स्थल पहाड़ों पर हैं...। प्रकृति की गोद में...। पहाड़ जो मैदान के निवासियों को आकर्षित और रोमांचित करता है। पहाड़ जो पहाड़ पर रहने वालों के जीवन को कठिन और संघर्ष पूर्ण बनाता है...और कई मायनों में जीना मुश्किल भी कर देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चे के माता-पिता आ गए तो वह (पिट्ठू) बच्चे को कंधे पर बैठाकर चलने लगा। मेरी निगाह उसके पैरों पर पड़ी। प्लास्टिक का घिसा हुआ जूता पहनकर वह पैर घसीटते हुए चल रहा था...। उसका पायजामा गंदा और फटा हुआ था...। लबादे जैसा लिबास जो वह पहने हुए था वह भी गंदा और फटा था, जिसमें जगह-जगह पैबंद लगे थे...। उस समय उसके शरीर पर उस लबादे का औचित्य मेरी समझ में नहीं आया। लेकिन जब माता के भवन पहुंचा और रात हो गई और ठंड लगने लगी तो मुझे ख्याल आया कि वह पिट्ठू दिन में भी गर्म लबादा क्यों पहने हुए था...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम बातचीत करते हुए फिर आगे बढ़ने लगे। इसी बीच टट्टुओं का एक रेला आया और हमें ध का देते हुए आगे निकल गया। घोड़ों-घोड़ियों पर सैलानी बैठे थे और उनकी पूछ पकड़े उनके मालिक दौड़ रहे थे...। मुझे अवधी की कहावत याद आई-ठाकुर भूईं, कुकुर पुरौठे। (मालिक पैदल कुत्ता घोड़े पर) यह सोचकर मैं मन ही मन मुस्कराया। लेकिन यहां संबंध आर्थिक था। एक के पास पैसा था। वह माता का दर्शन करना चाहता था, लेकिन पहाड़ पर चढ़ाई के कष्टों से बचना चाहता था। दूसरे को पैसा चाहिए था। वह माता के दर्शनार्थियों से पैसा कमाकर अपनी जीविका चलाना चाहता था। मां वैष्णो में दोनों की आस्था बराबर थी। एक जो है उससे ज्यादा चाहता है तो दूसरा रोजगार चलता रहे कि कामना से परिपूर्ण है...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे याद आया माता वैष्णो देवी आने वाले यात्री कहते हैं कि १४-१५ किलोमीटर की चढ़ाई और उतराई आदमी माता की कृपा से ही कर पाता है। तो क्या घोड़े से चढ़ाई करने वालों और नीचे उतरने वालों पर माता की कृपा नहीं होती....या इन्हें माता की कृपा चाहिए ही नहीं.... जबकि माता की कृपा के यही सबसे ज्यादा आकांक्षी होते हैं...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं कि यदि भ त अपने आपको कष्ट देता है तो मां उसकी जल्दी सुनती हैं। लेकिन जो पहले ही कष्ट में हो वह क्या करे...? मेरी आंखों के सामने थोड़ी देर पहले देखा दृश्य तैर गया। एक आदमी सांप की तरह लेटकर चढ़ाई कर रहा था...। उसकी मदद दो आदमी कर रहे थे। एक आदमी दो पैर होते हुए भी एक पैर से चढ़ाई कर रहा था...। दूसरेपैर को मोड़कर बांध लिया था और लंगड़ा हो गया था...। एक घुटनों के बल चल रहा था...। पूछने पर पता चला कि इन्होंने मान्यता मानी थी। वह पूरी हो गई तो मां का दर्शन करने जा रहे हैं...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी-अपनी श्रद्धा....। मैंने सोचा और उनकी आस्था को नमन किया...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चार पांच लोगों की टोली, चलो बुलावा आया है माता ने बुलाया है, गाते हुए चली जा रही थी। उनके पीछे एक टोली माता के जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ रही थी। 'प्रेम से बोलो, जयमाता दी। जोर से बोलो, जयमाता दी। सारे बोलो, जयमाता दी। मिलकर बोलो, जयमाता दी।` &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ी दूरी पर एक ढोल वाला कोई भक्ति धुन बजा रहा था। एक जगह लिखा था 'भीख मांगना मना है।` ढोल वाला इस आशा में ही ढोल बजा रहा था कि माता के दर्शनार्थी उसे कुछ देंगे...। भीख का परिष्कृत रूप...। पूरे रास्ते ऐसे ढोल बजाने वाले मिलते रहे...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी ने बताया कि टट्टू वाले दिन में चार-पांच बार माता के भवन तक जाते हैं और नीचे आते हैं। मुझे आश्चर्य हुआ, क्योंकि हम लोगों से तो एक बार ही नहीं चढ़ा जा रहा था। हर बीस-तीस मिनट बाद ब्रेक ले रहे थे। बेशक यह कमर्शियल नहीं था, लेकिन शरीर को ऊर्जावान और तरोताजा बनाने के लिए जरूरी था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने अपनी मां से पूछा कि घोड़े की सवारी करोगी? उन्होंने इनकार कर दिया। मैंने फिर पूछा कि चढ़ाई चढ़ लोगी? उन्होंने तत्काल उत्तर दिया कि सब माता जी निभाएंगी। मैं आश्वस्त हुआ। इसलिए नहीं कि मां ने इनकार कर दिया, बल्कि इसलिए कि जिस श्रद्धा के साथ उन्होंने इनकार किया, वह उन्हें 'भ त` की श्रेणी में ले जाता था...। धार्मिक एंगल से और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से माता के प्रति उनकी श्रद्धा और आस्था मानसिक तौर पर उन्हें मजबूत बनाती थी...। माता के प्रति उनका अनुराग उनके रास्ते को सरल बना रहा था। पिठ्ठुओं और टट्टू वालों की तरह...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यात्रा से दो दिन पहले मां बीमार हो गईं थीं तो मैं चिंतित हो गया था। यदि ठीक नहीं हुईं तो यात्रा पर कैसे जाएंगी? मैंने अपनी आशंका उनसे जाहिर की तो उन्होंने कहा कि माता को बुलाना होगा तो ठीक करेंगी...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'चलो बुलावा आया है माता ने बुलाया है` कहता हुआ एक जत्था मेरे सामने से निकल गया...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग आधी चढ़ाई चढ़ने के बाद हम एक जगह रुके तो एक छोटा पहाड़ हमारे नीचे आ गया था...। उसकी चोटी पर बना मंदिर साफ दिख रहा था। बच्चे यह दृश्य देखकर उत्साहित और रोमांचित थे...। कहावत याद आई 'अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे।` यहां पहाड़ आदमी के नीचे था...। वह पहाड़ जो नीचे से देखने पर काफी ऊंचा लगता था अब ऊंचे से देखने पर कितना नीचा लग रहा था...। हमारी निगाह पहाड़ के बीच बनी घाटी पर गई तो वहां दो-तीन घर नजर आए और सीढ़ीदार खेत। घर से बाहर एक महिला नजर आई। लेकिन हम इतनी ऊंचाई पर थे कि वह बहुत छोटी दिखी। वहां से कटरा शहर भी दिख रहा था। कटरा से ही माता के दर्शन के लिए चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। मैंने शहर को देखा और सोचा 'यदि माता का मंदिर यहां नहीं होता तो क्या यह शहर होता?` जवाब न में आया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम फिर चढ़ाई चढ़ने लगे। मैं सोचता जा रहा था। माता का भवन इतनी ऊंचाई पर क्यों? अब तो माता के भवन तक जाने के लिए बढ़िया रास्ता बनाया गया है। टट्टू भी चलते हैं। पिट्ठू भी हैं। आटोरिक्शा भी चलाने की योजना है, जो कि प्रायोगिक तौर पर शुरू भी हो गया है। कटरा से सांझीछत तक हेलिकॉप्टर की भी सुविधा है। लेकिन पहला यात्री मां तक कैसे पहुंचा होगा? कितने दिनों में पहुंचा होगा? यहां पहुंचने की उसे जरूरत ही क्या थी? कहानी है कि मां ने उसे दर्शन दिया था। अपना स्थान और रास्ता भी बताया था। बताते हैं कि बहुत समय तक उसी व्यक्ति का मंदिर पर कब्जा रहा। उसी ने माता की महिमा को लोगों तक पहुंचाया। धीरे-धीरे प्रसिद्धि फैली और देश-दुनिया से श्रद्धालु आने लगे...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और मंदिर आमदनी का जरिया बन गया...। क्या यही चाहता था माता का वह पहला पुजारी? वह पुजारी आर्थिक संकट में रहा होगा। इसलिए यह उक्ति निकाली। यह भी हो सकता है कि वह जंगली जानवरों से परेशान रहा हो? सोचा इस तरह माता का सहारा मिल जाएगा और उनकी महिमा के च कर में लोग आएंगे तो यह जंगल गुलजार हो जाएगा। जाहिर है आदमियों की आवाजाही से जंगली जानवर भाग गए होंगे। मंदिर होने की वजह से ही यहां बहुत तरह के रोजगार पैदा हो गए...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम लोग माता के भवन पहुंचे तो शाम हो गई थी। पूछने पर पता चला कि माता के दर्शन के लिए मंदिर आठ बजे खुलेगा। उस समय छह बज रहे थे। लोग लाइन में लग कर बैठते जा रहे थे। ऊंचाई पर चढ़ने की थकान आस्था बनकर उनके चेहरे पर तैर रही थी...। मां के दर्शन की अभिलाषा और बैठने से आराम की संतुष्टि उन्हें श्रद्धालु से भ त बना रही थी...। ऐसा मुझे लगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माता के भवन की पूरी सुरक्षा व्यवस्था सीआरपीएफ के हवाले है। मैंने पहले ही एक सीआरपीएफ जवान का परिचय खोज लिया था। सीधा उसी के पास पहुंचा। उसके आफिस में पूछने पर पता चला कि वह ड्यूटी पर हैं। उनकी ड्यूटी आठ बजे खत्म होगी। तब तक हम लोग नहाने-धोने का कार्य करने लगे। ठीक आठ बजे हम लोग सीआरपीएफ के जवान राममिलन यादव, जो कि हमारे जिले के थे, के पास फिर गए। वह ड्यूटी से अभी नहीं आए थे। हम लोग सीआरपीएफ के मेहमान हाल में बैठ गए। ठंड बढ़ गई थी और थकान परेशान कर रही थी...। बच्चे तो लेट कर सो गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साढ़े आठ बजे राममिलन आए। नौ बजे उन्होंने वीवीआईपी दरवाजे से हम लोगों को माता के दर्शन लिए मंदिर में प्रवेश करवा दिया...। पंद्रह मिनट में ही हम माता के दर्शन करके बाहर आ गए...। यदि राममिलन न मिले होते तो हम लोगों को माता का दर्शन सुबह चार बजे ही मिल पाता...। राममिलन की कृपा से हम ग्यारह बजे लंगर छक कर कंबल ओ़ढ़कर सीआरपीएफ के आरामखाने में आराम से सो गए...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह छह बजे उठकर फ्रेश होने के बाद हम लोगों ने भैरो मंदिर के लिए चढ़ाई शुरू की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात में मिले आराम के कारण शरीर में ताजगी आ गई थी। मां, जो रात भर घुटनों में जोड़ों के दर्द के कारण परेशान थीं, वह भी चढ़ाई के लिए तैयार हो गईं। यही नहीं उन्हीं की वजह से हम भैरो मंदिर जाने को तैयार भी हुए। मेरे मित्र तो कह रहे थे कि यहीं से वापस हो लेते हैं। मां का कहना था कि माता के दर्शन के बाद भैरो बाबा का दर्शन जरूरी है, नहीं तो दर्शन फलीभूत नहीं होगा। मेरी भी इच्छा थी कि जब यहां तक आ ही गए हैं तो आगे भी चलकर देख ही लिया जाए। भैरो मंदिर इस पहाड़ की चोटी पर है। मैं शिखर पर होने के आनंद की अनुभूति करना चाहता था...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भैरो मंदिर से कश्मीर घाटी के पहाड़ों की ऊंची चोटियों पर फैली बर्फ की सफेद चादर साफ दिख रही थी...। बच्चे यह देखकर खुश थे। रोमांचित थे। मेरी निगाह साथ चल रहे पिट्ठू पर पड़ी। उसका चेहरा सपाट था...। आंखें स्वप्नविहीन लगीं। उसने एक बार भी उन पहाड़ों की तरफ नहीं देखा...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भैरो बाबा की प्रतिमा को मैं नहीं देख पाया। कारण जैसे ही मंदिर के दरवाजे पर पहुंचा जवान ने पीठ पर थपकी दी और आगे बढ़ने को कहा। मैंने सिर झुकाया तो आंख बंद हो गई... भैरो बाबा कैसे हैं यह देख नहीं पाया। सीआरपीएफ के जवानों की मुस्तैदी से अधिकतर श्रद्धालुओं के साथ ऐसा ही होता है। जवान भी क्या करें। यदि प्रत्येक श्रद्धालु को पांच मिनट का समय देंगे तो भीड़ खत्म ही नहीं होगी। अफरातफरी मच जाएगी अलग से। वैसे भी यहां पहुंचने के बाद लोग जल्दी से जल्दी नीचे पहुंचना चाहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने मां को बताया कि मैं भैरोबाबा को नहीं देख पाया तो उन्हें बहुत दुख हुआ। जबकि मैंने गंभीरता से नहीं लिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहाड़ से उतरते समय नीचे खाई की तरफ देखने से मुझे बहुत डर लगता था। इस कारण मैं नीचे नहीं देखता था। देखता तो दूरी बनाए रखता। मुझे लगता था कि खाई में झांकने से मैं उसमें गिर पड़ूंगा। इस डर के कारण मेरे मन में यह विचार आया कि कहीं माता के प्रति मेरी अनास्था के कारण तो ऐसा नहीं हो रहा है...? फिर ध्यान आया कि ऊंचाई से नीचे देखने पर मुझे हमेशा ही डर लगता रहा है। मुझे याद आया कि गांव में नहर पार करने के लिए दो बांस रखकर रास्ता बनाया गया था। उस पर चलकर नहर पार करना मेरे लिए हमेशा ही मुश्किल रहा। यही नहीं मुझे सपने में अ सर ऐसा पुल पार करना होता है जो संकरा है। उस पुल पर चलते हुए मुझे डर लगता है। यही लगता है कि मैं कभी भी नदी में गिर पड़ूंगा...। मैंने इसे मनोवैज्ञानिक डर माना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहाड़ से नीचे आते-आते मां की तबीयत खराब हो गई। हम जल्दी से होटल पहुंचे। वहां उनकी दवा रखी थी। उन्हें दवा खिलाई गई। मां को आराम होने के बाद हम जम्मू के लिए चल पड़े। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कटरा से हमारी बस चली तो शाम हो गई थी। थोड़ी दूर आने के बाद अंधेरा हो गया। बस जम्मू की तरफ भागी जा रही थी कि बेटे ने कहा कि डैडी बाहर देखो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने बाहर देखा तो माता के भवन को जाने वाला रास्ता बिजली की रोशनी से जगमगा रहा था। लग रहा था जैसे आसमान में कई तारे चमक रहे हों। मुझे यह दृश्य अच्छा लगा, लेकिन इस रोशनी से परे पसरा अंधेरा भयावह था...। उसका सन्नाटा डरावना था...। मुझे उस अंधेरे में वह मजदूर अपने घर जाता नजर आया...। उसके जेब में टाफियां थीं, जो अपने बच्चों को देने के लिए खरीदी थीं...। पीठ पर चावल-दाल, आटा और सब्जी की गठरी...। इसे लेकर वह घर पहुंचेगा तब जाकर चूल्हा जलेगा...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस आगे बढ़ रही थी उसी के साथ मैं भी सीने में यह दर्द लिए भागा आ रहा था...। कानों के पास गूंज रहा था -चलो बुलावा आया है माता ने बुलाया है। प्रेम से बोलो जयमाता दी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-ओमप्रकाश तिवारी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-4867876032325955726?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/4867876032325955726/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=4867876032325955726' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/4867876032325955726'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/4867876032325955726'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2008/02/blog-post.html' title='अपनी अपनी श्रद्धा'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-4701783478500797018</id><published>2008-01-04T01:55:00.000+05:30</published><updated>2008-01-04T01:58:53.147+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>Kahani----------Kudimar</title><content type='html'>कहानी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुड़ीमार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-ओमप्रकाश तिवारी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह नहर के किनारे खड़े होकर उसमें बहते पानी को बड़े गौर से देख रहा है। उसे देखकर लगता है कि उसकी कोई चीज पानी में खो गई है। नहर का गंदा पानी मंथर गति से बह रहा है। नहर जो कि शहर के बीच से निकलती है, किसी गंदे नाले की तरह हो गई है। उसमें लोग कूड़ा-करकट भी फेंक देते हैं। हालांकि उसका पानी सिंचाई के लिए है। वह अकसर यहां आ कर खड़ा हो जाता है और घंटों नहर के पानी को बहते हुए देखता है। फिर अचानक चिल्ला पड़ता है। हां-हां मैं कुड़ीमार हूँ... मैंने कुड़ीमारी है... लेकिन सभी कुड़ीमार हैं...। वो शर्मा, वो कोहली, ढिल्लन, ढिल्लों, कपूर, चावला, मिश्रा, पांडेय, यादव सभी कुड़ीमार हैं... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कुलदीप सिंह है। कुछ ही दिन पहले जेल से छूटकर आया है। तब से अकसर इस तरह बोलता रहता है। उसे लगता है कि उसके कान के पास कोई कुड़ीमार... कुड़ीमार...कहता रहता है। वह काफी देर तक इसे बरदाश्त करता है, लेकिन जब सहन नहीं होता तो चीख पड़ता है -हां-हां, मैं कुड़ीमार हूँ.. कुड़ीमार हूँ..। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग समझते हैं कि जेल में रहकर उसका दिमाग खिसक गया है। वह पागल हो गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, वह नहीं चाहता था कि उसे तीसरी बेटी हो। बेटे की चाहत में उसकी पत्नी कुलवंत कौर एक बार फिर उम्मीद से हुई तो कुलदीप सिंह की चिंता बढ़ गई। उसकी रातों की नींद और दिन का चैन उड़ गया। यदि फिर लड़की हुई तो...? यह सोचकर वह परेशान रहता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुलदीप सिंह को लड़कियों से न तो चिढ़ थी न ही वह इनसे नफरत करता था। वह अपनी दोनों बेटियों को बहुत प्यार करता था। वह लोगों से कहता भी था कि हमारी बेटियां ही बेटा हैं। इन्हीं को पढ़ा-लिखाकर बड़ा करना है। किसी काबिल बनाना है। आजकल बेटे-बेटी में कोई फर्क नहीं है। जो काम बेटे करते हैं, वही बेटियां कर रही हैं। बल्कि लड़कियां दो कदम आगे हैं। वह गर्व से कहता कि सानिया मिर्जा को देखो। मां-बाप का ही नहीं पूरे देश का नाम रोशन कर रही है। सवाल मौका, अवसर, समानता और आजादी मिलने का है। लड़कियों को भी यदि लड़कों जैसा महत्व दिया जाए। आजादी दी जाए। वैसी ही परवरिश की जाए तो वे भी वह सब हासिल कर सकती हैं जो लड़के करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी इसी सोच की वजह से वह तीसरा बच्चा पैदा करने के हक में नहीं था। लेकिन उसकी घरवाली और माता-पिता चाहते थे कि एक बेटा पैदा हो जाए। बेटा नहीं होगा तो बुढ़ापे का सहारा कौन बनेगा? वंश कौन चलाएगा? इन सवालांे का जवाब वह केवल इतना कह कर देता कि जमाना बदल गया है। लड़कियां या नहीं कर रही हैं। लेकिन हर कोई उसके तर्क को खारिज कर देता और वह हार जाता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह अपनी पत्नी से कहता कि हमारी आर्थिक स्थिति एक और बच्चे की इजाजत नहीं देती। बच्चों का पालन-पोषण और पढ़ाई-लिखाई कितनी मुश्किल होती है, तुम अच्छी तरह से जानती हो। पहले ही घर की सारी जमा-पूंजी अपनी पांच बहनों की शादी करने में गंवा चुका हूँ। उसकी पत्नी उसकी बातों को ध्यान से सुनती और चुप रहती। वह भी सोचती कि कह तो ठीक ही रहे हैं। लेकिन वह एक बेटे की इच्छा को दबा न पाती। दूसरी ओर पति की बात से सहमत भी थी। यही कारण था कि उसने बेटे के लिए कभी जिद नहीं की, लेकिन परिवार वालों का दबाव और पड़ोसियों का तंज उससे बरदाश्त न होता। उसे निपूती कहा जाता तो वह तिलमिला उठती। वह तो लोगों को सुनाती हुई कहती भी कि दो-दो फूल जैसी बच्चियों को पैदा किया है। बांझ नहीं हूँ। कहने वाले पहले अपनी तरफ देखें। लेकिन इससे उसके दिल को तसल्ली न होती। उसे भी लगता कि बिना बेटे के जीवन निर्वाह मुश्किल होगा। बेटियां तो अपने घर चली जाएंगी। फिर उनका या होगा? वह तो बु़ढापे में अकेले ही रह जाएंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुलदीप सिंह के पिता करतार सिंह एक मामूली किसान थे। लेकिन उन्होंने तीन बेटे और पांच बेटियां पैदा कर दीं। इतने बच्चों को पाल-पोस कर बड़ा करने और उन्हें किसी काबिल बनाने में ही सारी जमीन बिक गई। आज कुलदीप के सभी भाई एक अदद नौकरी के मोहताज हैं। जमीन बिकने, गांव छोड़ने का दर्द और मजदूर बनने की पीड़ा कुलदीप के जेहन में नासूर बनकर रह गई है। जब भी इनकी याद आती है वह तड़प उठता है और लंबी सांस लेकर कहता है कि काश! पिता जी इतने बच्चे न पैदा किए होते...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक हादसे में चोट लगने के बाद कुलदीप सिंह के पिता ने चारपाई पकड़ ली तो बहनों की शादी की जिम्मेदारी तीनों भाइयों पर आ गई। सभी ने मिलजुल कर अपनी औकात से अधिक खर्च करके बहनों का विवाह किया। लेकिन एक भी बहन अपने घर खुश नहीं है। एक का तलाक हो गया। एक ने ससुराल वालों से प्रताड़ित होने के बाद आत्महत्या कर ली। बाकियों की जिंदगी भी खुशहाल नहीं है। इनकी वजह से भी कुलदीप को बहुत पीड़ा मिलती है। वह सोचता है काश! वह इतनी बहनों का भाई न होता...। अभी उसे अपना दुख और बहनों का भी दुख सहना पड़ता है। इन्हीं सब कारणों से उसने तय किया था कि वह दो बच्चे ही पैदा करेगा। चाहे बेटा हो या बेटी। लेकिन दो बेटियों के बाद जब उसे तीसरे बच्चे को इस दुनिया में लाना पड़ा तो वह विचलित हो गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन उसने अपनी चिंता अपने एक दोस्त को बताई। दोस्त ने सलाह दी कि वह लिंग परीक्षण करवा ले। यदि लड़की हुई तो गर्भपात करवा दे। कुलदीप को दोस्त की बात अच्छी नहीं लगी। वह गर्भपात के पक्ष में कभी नहीं रहा। उसकी नजरों में यह एक हत्या और पाप है। वह यह पाप नहीं कर सकता। लेकिन उसके पास इसके अलावा दूसरा रास्ता यही था कि वह बच्चे को इस दुनिया में आने दे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने इसकी चर्चा कुलवंत कौर से की तो उसने भी झिड़क दिया। बोली यह या फालतू का सोचते रहते हैं आप? कुड़ी हो या मुंडा, है तो अपना ही खून ना? उसकी हत्या हम कैसे कर सकते हैं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- लेकिन यदि फिर बेटी हो गई तो? कुलदीप ने अपनी आशंका प्रकट की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- तो पाल-पोस लेंगे। यदि एक बेटा पाल-पोस सकते हैं तो एक और बेटी क्यों नहीं? लेकिन गर्भपात कभी नहीं। कुलवंत पूरी गंभीरता से अपना निर्णय सुना दिया। इससे कुलदीप परेशान हो गया। उस समय तो वह चुप्पी लगा गया, लेकिन कुछ ही दिन बाद वह फिर गर्भपात के मु े पर आ गया। इस बार भी मियां-बीवी में काफी बहस हुई और अंतत: हथियार कुलवंत को ही डालना पड़ा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिरकार कुलदीप ने तय कर ही लिया कि वह डा टर से मिलेगा। पत्नी को लेकर वह डा टर के पास गया तो डा टर ने भ्रूण परीक्षण करने से साफ इनकार कर दिया। यह भी बताया कि यह कानून जुर्म है। इस पर कुलदीप ने डा टर से सवाल कर दिया कि डा टर साहब सभी तो ऐसा कर रहे हैं? मैं क्यों नहीं कर सकता? इस पर डा टर नाराज हो गई। उसने धमकी दी कि यदि उसने फिर ऐसी बात कही तो वह उसे पुलिस के हवाले कर देगी। कुलदीप सिंह डर गया और घर आ गया। लेकिन उसकी समझ में नहीं आया कि लोग किस डा टर के पास जाते हैं, जो लिंग परीक्षण करके गर्भपात भी कर देता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह सोचता यदि डा टर लिंग परीक्षण नहीं करते तो प्रदेश में इतनी तेजी से महिला-पुरुष अनुपात घट क्यों रहा है? उसे अखबार में पढ़ी वह खबर याद आई कि कन्या भ्रूण हत्या में प्रदेश अव्वल है। वह सवाल करता कि जब लिंग परीक्षण ही नहीं होता तो कन्या भ्रूण हत्या कहां से हो रही है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे ध्यान आया कि जितनी अस्पतालों में वह गया है, वहां यह जरूर लिखा होता है कि इत्थो लिंग निर्धारण नहीं कीता जांदा है। यह कानून जुर्म है। करने और कराने वाले को सजा हो सकती है। कुलदीप सोचता कि फिर भी लोग कन्या भ्रूण हत्या करा और कर रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन तो उसने अखबार में पढ़ा कि लोग इंटरनेट से जानकारी लेकर अमेरिका से कोई किट मंगा कर कन्याओं को पेट में ही मार डाल रहे हैं। उसने सोचा वह भी इंटरनेट से इस जानकारी को हासिल करेगा। उसने अखबार में से उस वेबसाइट का नाम भी नोट कर लिया। अगले दिन वह साइबर कैफे गया। एक घंटे तक मगजमारी करता रहा, लेकिन उसकी समझ में कुछ नहीं आया। हार कर घर आ गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुलदीप सिंह को अपने गांव का हाकम सिंह याद आया। उसने अपनी पत्नी का तीन बार गर्भपात कराया था। क्योंकि उसकी पत्नी के गर्भ में लड़कियां थीं। यह बात उसे लिंग परीक्षण से ही पता चली थी। चौथी बार जब उसे लिंग परीक्षण से यह ज्ञात हुआ कि उसकी घरवाली के गर्भ में लड़का है तभी उसने उसका गर्भपात नहीं कराया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार हाकम सिंह की पत्नी हरदीप कौर ने उससे कह दिया कि उसे एक बेटी चाहिए। इस पर वह बिफर गया। गुस्से में घरवाली को गालियां तो दी हीं उसकी पिटाई भी की। इसके बाद से हरदीप कौर की उससे अपनी चाहत को बताने की हिम्मत नहीं हुई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार हाकम सिंह किसी से डींग मार रहा था कि उसे बेटी-सेटी नहीं चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- क्योंकि बेटी को पालो-पोसो, लिखाओ-पढ़ाओ और ब्याह कर किसी हरामी के साथ विदा कर दो। यह मुझसे नहीं हो पाएगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- तुम भी तो किसी की बेटी अपने बेटे के लिए लाओगे? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- मेरी बात और है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- लेकिन, यदि तुम्हारे जैसा ही सभी सोचने लगें और करने लगें तो इस दुनिया के सभी बेटे कंुवारे रह जाएंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- रह जाएं, मेरी बला से। मैंने दुनिया ठेका नहीं ले रखा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- तुम्हें बेटियों से इतनी नफरत क्यों है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- बेटियां कई बार मां-बाप की नाक कटवा देती हैं। प्यार-वार कर बैठती हैं। रोको तो भाग जाती हैं। इससे कितनी बदनामी होती है। यही नहीं, बेटी घर से निकलती है तो सोहदे उसे छेड़ते हैं। कई बार गुंडे उठा ले जाते हैं। बलात्कार कर देते हैं। इससे उनके मां-बाप को कितना शर्मसार होना पड़ता है। इससे तो अच्छा ही है न कि इन्हें पैदा ही न किया जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुलदीप सिंह सोचता ऐसा क्यों होता है? बलात्कार औरत से ही क्यों होता है? बलात्कार होने पर औरत की ही इज्जत क्यों जाती है? उसी के मां-बाप को क्यों शर्मसार होना पड़ता है? रही बात प्यार की तो इसमें या दोष है? प्यार तो रब की अनमोल देन है। आदमी अपने अहम में समझ नहीं पाता, तभी तो प्रेमियों को भागना पड़ता है। या फिर जान देनी पड़ती है। इसमें लड़कियों का या दोष है? दोष तो हमारे समाज में है। हमारे मन में है। सोच में है और सजा औरत को दे रहे हैं। आखिर कब तक यह चलेगा? कहां जाकर रुकेगा यह अन्याय? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुलदीप सिंह का किसी को कहा याद आया कि राजे-रजवाड़े पैदा होते ही बेटियों को मार डालते थे। उनके यहां तो बाकायदा एक दाई हुआ करती थी। जिसे यह साफ हिदायत होती थी कि यदि रानी या ठकुराइन को बेटी पैदा होती है तो उसका तुरंत काम तमाम कर दिया जाए...। दाई बेटी पैदा होते ही उसे मार डालती थी और कह देती थी कि बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ। कैसे औरत ही औरत की दुश्मन बन जाती है? बन जाती है या बना दी जाती है। दाई यदि नवजात बच्ची की हत्या न करती तो या वह जीवित रह सकती थी? जाहिर है अपनी जान बचाने के लिए वह बच्ची को मार डालती थी। ऐसी भी कहानियां सुनने को मिलती हैं कि कई दाइयों ने कई बार नवजात बच्चियों को बचाया भी है किसी और को देकर। कुलदीप सोचता कि यदि राजे-रजवाड़े ऐसे थे तो प्रजा कैसी रही होगी? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- वे ऐसा क्यों करते थे? कुलदीप ने उस आदमी से पूछा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- क्योंकि यदि किसी राजा के यहां सुंदर कन्या हुई तो दूसरा राजा उसके राज्य पर आक्रमण कर देता था और उसकी बेटी से जबरन शादी करता था। इस कारण राजा बेटी पैदा ही नहीं करते थे। उस समय लिंग परीक्षण नहीं होता था अत: उन्होंने बच्चियों को पैदा होते ही मार डालने की व्यवस्था कर दी थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- चलो वह तो राजा थे, लेकिन प्रजा? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- जैसा राजा वैसी प्रजा। कहावत ऐसे ही थोड़े कही गई है। इसका कुछ तो मर्म होगा ही। प्रजा की बेटियों पर राजा, सामंत, जमींदार, सेनापति और अन्य सरकारी अधिकारी बुरी निगाह रखते थे। इन्हें किसी की कोई लड़की पसंद आई नहीं कि उसे उठवा लेते थे। ऐसे में कौन है जो बेटी पैदा करने चाहे? हमारा समाज कहने को आज आधुनिक हो गया है, लेकिन औरत को लेकर उसका नजरिया अब भी नहीं बदला है। पहले दबंग लोग दूसरों की बहू-बेटियों से बलात्कार करते थे। आज तो हालात यह है कि घर में ही बेटी सुरक्षित नहीं है। पिता, चाचा और भाई तक की निगाह गंदी हो गई है। ऐसे में कौन बेटी पैदा करना चाहेगा? बेटी जवान हुई नहीं कि मां-बाप के दिलों की धड़कनें बढ़ जाती हैं। माना कि आज लड़कियां घर के बाहर निकल रही हैं। लेकिन वह कितनी सुरक्षित हैं? छोटे शहरों, कसबों और गांवों को छोड़ भी दें तो महानगरों तक में लड़कियों की आबरू सुरक्षित नहीं है। मैं तो कहता हूँ कि लड़कियों को लेकर हमारा डर, हमारी कुंठा हमारे डीएनए (जीन) में समा गई है। पीढ़ी दर पीढ़ी बहू-बेटियों पर हुए अत्याचार से हमारे मन में बेटियों की एक निरीह और प्रताड़ित-पीड़ित स्त्री की छवि बन गई है। आज हम इस छवि से भागने के लिए ही भ्रूण हत्या कर रहे हैं। जबकि जरूरत अपना नजरिया बदलने की है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने कहना जारी रखा। हमारे प्रदेश में यह कुप्रथा इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि यह सीमा प्रांत क्षेत्र रहा है। विदेशियों के अधिकतर हमले इधर से ही हुए। उनका हमला देश पर ही नहीं हमारी बहू-बेटियों की आबरू पर भी होता था। जब-जब ऐसा होता कई मां-बाप यह कसम खाते कि वह बेटी नहीं पैदा करेंगे। फिर हुआ देश का बंटवारा। यह प्रांत विभाजित हो गया। सांप्रदायिक दंगे हुए तो उसकी सबसे ज्यादा मार हमारी बहू-बेटियों पर पड़ी। कितनी महिलाओं ने अपनी इज्जत बचाने के लिए खुद ही अपनी जान ले ली और कितनों की अस्मत लूट ली गई, इसका कोई हिसाब-किताब नहीं है। इस दुर्घटना के बाद भी कई मां-बाप ने यह कसम खाई कि वह बेटी नहीं पैदा करेंगे। कालांतर में यही कसम हमारे डीएनए में समा गई और अशिक्षा, गरीबी, दहेज और अन्य आधुनिक बुराइयों ने उसे मानसिक रूप से मजबूत कर दिया। परिणाम आज कन्या भ्रूण हत्या रोके नहीं रुक रही है। राज्य में एक हजार पुरुष पर ७७५ महिलाएं हैं। दिनोंदिन यह स्थिति भयावह ही होती जा रही है। यह धरती हीर-रांझा की है। सोनी-महिवाल की है। आज यह किस्से बन गए हैं। हम इन्हें सम्मान से सुनते-देखते हैं। इनका आदर करते हैं और पूजने की हद तक चाहते भी हैं। कभी इन्होंने एक दूसरे से प्रेम किया था। लेकिन तब जमाना इनके खिलाफ था। यह एक दूसरे से मिल नहीं पाए। यही हालत आज भी है। प्रेम करने वालों को हमारा समाज आज भी बरदाश्त नहीं कर पाता। प्रेमी युगलों को आए दिन जहर खा कर अपनी जान देनी पड़ती है, क्योंकि उनका प्रेम जमाने को स्वीकार नहीं होता। लड़की के प्यार की भनक लगते ही पहले तो मां-बाप-भाई उसे पीट-पीट कर सही करने का प्रयास करते हैं। इसके बाद भी यदि वह नहीं मानती तो उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है और यदि मान जाती है तो पूरी जिंदगी ऐसे आदमी के साथ जीवन व्यतीत करती है जिसे वह चाहती ही नहीं। प्यार ही नहीं करती। उसके सीने में एक याद हमेशा शूल की तरह चुभती रहती है। जिसकी पीड़ा को वह आंसू के रूप में भी नहीं व्यक्त कर पाती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्मों की नायक-नायिका को हम बेशक समर्थन देते हैं, लेकिन जब वही कहानी हमारे घर में घटित होती है तो हम बरदाश्त नहीं पाते हैं। हम खलनायक से बड़ा हैवान हो जाते हैं। हमारी क्रूरता हिंसा की सारी हदें पार कर जाती है। हमारे समाज को इस दोहरे चरित्र को त्यागना होगा। सृष्टि के लिए जितना पुरुष जरूरी है उतना ही औरत भी। फिर दोनों के साथ समान व्यवहार क्यों नहीं किया जाता? बेटी होते हुए भी बेटे की आकांक्षा क्यों? यदि हमने अपना नजरिया नहीं बदला और कन्या भ्रूण हत्या इसी तरह होती रही तो एक दिन यह मानव सभ्यता खत्म हो जाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुलदीप सिंह सोचता कि बेटी को पेट में मारना पाप है और अपराध भी, लेकिन मेरे लिए ही क्यों? सभी तो गर्भ में ही बेटियों को मार डाल रहे हैं। फिर मेरे तो दो बेटी पहले से ही है। या ऐसा नहीं होना चाहिए कि जिसे दो बेटी हो उसे कानून लिंग परीक्षण कराने और गर्भपात की छूट होनी चाहिए। कुलदीप ने किसी से सवाल किया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- तब लोग इसका भी दुरुपयोग करेंगे। उस व्यक्ति ने अपनी आशंका प्रकट की थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- कानून का दुरुपयोग तो अब भी हो रहा है। मेरी समझ से कानून न्याय संगत होना चाहिए। जिसे दो बेटी हो उसे लिंग परीक्षण और गर्भपात की छूट मिलनी ही चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- हां, तेरी बात में दम तो है। सरकार को इस नज़रिये से भी सोचना चाहिए। लेकिन शायद वह डरती है कि यदि यह छूट दे दी गई तो लोग इसका बेजा इस्तेमाल करेंगे। फिर असली गुनहगारों पर शिकंजा नहीं कसा जा सकेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- सब बकवास है। कुलदीप सिंह झुंझला गया। बोला- जो कानून का दुरुपयोग कर रहे हैं उनका कुछ नहीं हो रहा है। न कोई पकड़ा जाता है और न किसी को सजा होती है। मेरे बाप ने पांच बेटियां पैदा कीं, अब मैं सात पैदा करूं तो समाज का संतुलन बना रहेगा? पूरे समाज का ठेका मैंने ही लिया है या? कहते हैं राज्य में लिंग अनुपात में भारी गड़बड़ी हो गई है। पुरुषों के मुकाबले औरतों की संख्या कम हो गई है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि लोग बेटियों की हत्या पेट में ही कर दे रहे हैं। ये कौन लोग हैं जो ऐसा कर रहे हैं? मैं तो डा टर के पास गया तो उसने साफ कह दिया कि यह कानून अपराध है। वह लिंग परीक्षण नहीं करती। जब लिंग परीक्षण ही नहीं होता तो पेट में कन्या भ्रूण हत्या की बात कहां से आ गई? लेकिन नहीं। यह तो हम गरीबों के लिए है। जिनके पास पैसे हैं, जो रसूख वाले हैं, उनके लिए कानून जेब में होता है। लिंग परीक्षण भी होता है और गर्भपात भी...। धनाढ्य घरों और पढ़े-लिखे शिक्षित घरों में देखिए। या संतुलन होता है? एक बेटा और एक बेटी। यह संतुलन यों ही नहीं बन जाता है...। इसे बनाया जाता है...। जैसे हाकम सिंह बना रहा है। कुलदीप सिंह को याद आया कि पिछले ही दिनों तो एक अखबार में यह खबर छपी थी कि पढ़-लिखे और पैसे वाले लोग कन्या भ्रूण हत्या में सबसे आगे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सोचते-सोचते कुलदीप को नींद आ गई। सोते में वह सपना देखता है। वह ऐसे लोक में चला गया है जहां औरतें हैं ही नहीं। वहां सभी आदमी उदास हैं। जिसे देखो वहीं मुंह लटकाए घूम रहा है। उसने सोचा यहां के लोग इतने उदास क्यों हैं? उसने देखा कि यहां केवल आदमी ही हैं। न औरत है और न ही बच्चे। आदमी भी कोई युवा नहीं है। सभी के सभी बू़ढे। उसने सोचा ऐसा कैसे हुआ? जब कुछ समझ में नहीं अया तो एक आदमी से पूछ लिया। पहले तो उस आदमी ने उसे गौर से देखा और देखता रहा। जैसे वह दूसरे ग्रह का प्राणी हो। फिर वह मुस्कराया और फिर जोर से हंसने लगा और तब तक हंसता रहा जब तक कि वह थक नहीं गया। इस बीच कुलदीप उसे आश्चर्य से देखता रहा। हंसने से वह थक गया था। हंसी थमी तो थोड़ी देर तक हांफता रहा फिर बोला -भाई साहब, यह तो आप जानते ही होंगे कि बिन जननी घर भूत का डेरा। जवाब में कुलदीप ने कहा - हां। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- फिर यहां भूतों का डेरा है। प्रत्युत्तर में वह आदमी बोला। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- मैं कुछ समझा नहीं। अपने ही थूक को बड़ी मुश्किल से गले के नीचे उतार पाया कुलदीप। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- भाई साहब, हमारे यहां औरतें नहीं हैं। बिना औरत के जीवन में उमंग होती है या? उत्साह होता है या? आदमी का प्रेम सूख जाता है। जीने की इच्छा खत्म हो जाती है। यहां आप देख ही रहे हैं। हर आदमी ऐसे जी रहा है जैसे जीना उसकी मजबूरी हो। बिना औरत के जीना तो जीना मजबूरी ही हो जाता है। जानते हैं, आदमी की जिंदगी औरत होती है। यदि औरत ही नहीं तो जिंदगी कहां? यहां किसी के पास जिंदगी नहीं है। सब अपने मरने का इंतजार कर रहे हैं। एक-एक कर सभी मर रहे हैं और एक दिन सभी मर जाएंगे। फिर यहां कोई नहीं होगा। सृष्टि के साथ हमने जो खिलवाड़ किया है उसका परिणाम भुगत रहे हैं। वह आदमी एक सांस में बोल गया और फिर हांफने लगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- या यहां शुरू से ही औरतें नहीं थीं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- फिर? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- यह तो हमारी बेवकूफी का परिणाम है। सभी लोगों ने मिलकर कन्याओं की हत्या मां के पेट में करनी आरंभ कर दी और आज आप देख ही रहे हैं कि या दशा है। एक दिन यहां भूत रहेंगे। यह भूत लोक कहलाएगा। वैसे तो यह आज ही भूत लोक हो गया है। यहां जो लोग हैं उन्हें आप इनसान नहीं कह सकते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुलदीप सिंह की आंख खुल गई। मैंने यह सपना क्यों देखा? उसने सोचा। या यह कोई संकेत है? उसने इस सपने का जिक्र अपने एक दोस्त से किया तो उसने झट कहा कि हां, संकेत ही तो है। इस राज्य के लोग बेटियों की हत्या पेट में ही कर दे रहे हैं और बेटों की शादी के लिए दूसरे राज्यों से लड़कियां खरीदकर ला रहे हैं। यदि यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन यहां भी ऐसी ही नौबत आ जाएगी। दोस्त की बात सुनकर कुलदीप बड़बड़ाने लगा। - मेरी बला से। पूरे समाज की चिंता करना मेरा ही काम तो नहीं है। मेरे यहां तो पहले ही दो बेटियां हैं। मैं तीसरी और नहीं पैदा कर सकता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन कुलदीप सिंह के एक दोस्त ने उसे एक डा टर से मिलवाया। वह पैसे लेकर लिंग परीक्षण करने को तैयार था। कुलदीप सिंह अगले ही दिन अपनी घरवाली को लेकर उसके क्लीनिक पर चला गया। डा टर ने लिंग परीक्षण करके बताया कि उसकी घरवाली के पेट में बच्ची है। इस पर कुलदीप ने तुरंत कहा कि वह गर्भपात कर दे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डा टर बताया कि बच्चा छह माह का हो गया है। अब गर्भपात नहीं हो सकता। हां, एक रास्ता है। इसे आपरेशन करके निकाल देते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- फिर तो वह जिंदा रहेगा? कुलदीप की घरवाली का यह मासूम सवाल था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- जिंदा तो तब भी रहता है जब उसकी सफाई की जाती है। लेकिन आजकल कौन इन च करों में पड़ता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- हमें रब से डरना चाहिए। यह तो साफ-साफ हत्या है। कुलदीप की घरवाली साफ बोल गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- आपकी मरजी। मैंने तो आठ-आठ महीने की बच्चियों को ठिकाने लगाया है। यही नहीं सामान्य प्रसव के बाद भी हमारे यहां बच्चियों को ठिकाने लगा दिया जाता है। बस रकम थोड़ा ज्यादा लगती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- यह अस्पताल है कि कत्लगाह। कुलवंत कौर के मुंह से बरबस ही निकल गया। उसे वह डा टर साक्षात यमराज नजर आया। वह डर गई और मन ही मन सोची कि यह आदमी है कि शैतान। लेकिन वह प्रत्यक्ष कुछ बोल नहीं पाई। केवल इतना ही कहा कि आप ठिकाने लगाइए। हमें नहीं करना यह पाप। कहते हुए वह अस्पताल से बाहर आ गई। उसके पीछे-पीछे कुलदीप भी आ गया। उसे अपनी पत्नी पर गुस्सा भी आ रहा और नहीं भी आ रहा था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी पत्नी ने सही किया कि गलत। इसी असमंजस में वह चुपचाप घर आ गया। तब उसकी जुबान खुली। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-यह तुमने ठीक नहीं किया कुलवंत। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- और तुम ठीक करने जा रहे थे? ऐसा काम कसाई करते हैं। वह डा टर तो पैसे के लिए कसाई हो गया है। हम भी वैसे हो जाएं। जब हम एक बेटा पाल सकते हैं तो एक बेटी और क्यों नहीं पाल सकते? अब जबकि वह पेट में आ ही गई है तो हम कौन होते हैं उसे मारने वाले? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- क्योंकि हमें उसकी जरूरत नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- जरूरत नहीं है तो उसकी हत्या कर दें? दो और बेटियां इनका भी गला घोंट दो। मुझे भी मार डालो। सारी बला टल जाएगी और तुम्हारे मन को शांति भी मिल जाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुलदीप को कोई जवाब नहीं सूझा तो चुप्पी लगा गया। इस तरह दोनों मियां-बीवी एक सप्ताह तक लड़ते रहे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन अखबारों-चैनलों में खबर आई कि एक निजी नर्सिंग होम का संचालक लिंग परीक्षण और कन्या भ्रूण हत्या के मामले में पकड़ा गया। उसके अस्पताल में दो गड्ढे थे जिसमें वह गर्भपात करके भ्रूण को फेंक देता था। उन गड्ढों से न केवल भ्रूण जैसे मांस के लोथड़े मिले, बल्कि हडि्डयां तक बरामद हुई हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खबर पढ़कर कुलदीप सिंह सन्न रह गया। बड़ी देर बाद वह घरवाली से बोला कि वह डा टर तो पकड़ा गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- अच्छा ही हुआ। उसने कर्म ही ऐसे किए थे। मैं तो कहती हूँ कि उसे गोली मार देनी चाहिए। कसाई कहीं का। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुलदीप चुप हो गया। सोचने लगा कि उसका या होगा। पैसा ले-देकर सब मामला रफा-दफा कर दिया जाएगा। सजा तो गरीबों को होती है। पैसे वाले तो अपराध करके भी अपराधी नहीं होते। साला एक रास्ता मिला था वह भी बंद हो गया। बुदबुदाते हुए वह घर से बाहर चला गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी तक तो कुलदीप इस बात से अनजान था कि उसके पत्नी के पेट में पल रहा शिशु या है। लेकिन अब जब कि वह जान गया कि वह कन्या शिशु है तो वह परेशान हो उठा। अब उसे इस शिशु को इस दुनिया में लाने के सिवा और कोई चारा ही नहीं बचा था। उसे याद आई अपनी बहनों की दुर्दशा। उनका दुख। दहेज के लिए आग में जलती बहन। दहेज के लिए घर से निकाल दी गई बहन। पति के दारूबाज निकल जाने से परेशान बहन। गरीबी और अभाव भरा जीवन जीती बहन। बलात्कार पीड़ित पड़ोसी की बेटी। उसके जेहन में एक भी तस्वीर ऐसी नहीं उभरी जहां से उसे राहत मिले। वह परेशान हो उठा। उस रात वह सो नहीं पाया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी बीच उसके मन में यह खतरनाक विचार आया कि वह पैदा होते ही बच्ची को मार डालेगा। यह सोचकर एक बार तो वह कांप गया। नहीं, ऐसा वह नहीं कर पाएगा। लेकिन यदि नहीं करेगा तो उसे खुद आत्महत्या करनी पड़ जाएगी। फिर इनका या होगा? कहां जाएंगी मां-बेटी? नहीं, सभी को जिंदा रखने के लिए आने वाले को ही जाना होगा। इसी असमंजस में वह तब तक रहा जब तक कि तीसरी बेटी ने जन्म नहीं ले लिया। लेकिन उसके पैदा होते ही कुलदीप सिंह के अंदर बैठा शैतान जाग गया। वह उस नवजात को मां की गोद से उठा लिया और ले जाकर नहर में फेंक दिया। उस समय उसकी घरवाली बेहोश थी। जब वह होश में आई तो उसने कह दिया कि मरी हुई बच्ची पैदा हुई थी। फेंक आया। लेकिन जिस तरह उसने उससे आंखें चुराते हुए यह बात कही, वह सचाई समझ गई। उसके मुंह से केवल इतना ही निकला - यह तुमने ठीक नहीं किया। यदि एक बेटे को पाल-पोस सकते हो तो एक और बेटी को भी...। आगे वह बोल नहीं पाई। उसका गला रुंध गया और आंखों से आंसू की गंगा बह निकली। कुलदीप को लगा कि कुलवंत के आंसुओं में उसकी नवजात बच्ची डूब उतरा रही है। वह कांप उठा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन नहर से उस बच्ची की लाश मिली। मोहल्ले में हो-हंगामा हुआ और पुलिस ने खोजबीन करके कुलदीप सिंह को गिरफ्तार कर लिया। इस बीच घरवाली की दशा देखकर कुलदीप सिंह भी टूट चुका था। उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। इस अपराध में उसे सजा हुई दस साल की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेल में उसे नींद न आती। आंख लगते ही कुलवंत कौर का रोता हुआ चेहरा सामने आ जाता। कुलवंत कौर के आंसुओं में डूबती-तैरती बच्ची दिखाई पड़ती। बच्ची बचाओ-बचाओ चिल्लाती। कई बार तो यह भी कहती कि पापा, मुझे मत मारो, मुझे मत मारो। मेरा या गुनाह है पापा? मैं तुम्हें कभी तंग नहीं करूंगी। आप जैसा चाहेंगे वैसा ही करूंगी। मुझे बचा लो पापा। मुझे मत मारो पापा। मेरे प्यारे पापा। वह अकबका कर उठ बैठता। आसपास देखता। चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा होता। इसके बाद उसे नींद न आती। वह रात भर अपनी बैरक में टहलता रहता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी-किसी रात वह सपना देखता कि नहर में बच्ची को फेंक दिया है। वह चिल्ला रही है, रो रही है और वह क्रूरता से हंस रहा है। उसकी हंसी देखकर बच्ची रोना बंद कर देती है। पानी में डूबने से पहले कहती है कि कुड़ीमार तुझे जीवन में कभी चैन नहीं मिलेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी-किसी रात उसे किसी गड्ढे में बहुत सारे मादा भ्रूण दिखाई देते। बच्चियों की हडि्डयां दिखाई देतीं। साथ ही नजर आता क्रूरता से मुस्कराता हुआ एक डा टर का चेहरा। वह कहता कि देखा मैंने या किया है? तभी सभी भ्रूण लड़की बन जाते और डा टर को उसी गड्ढे में धकेलकर उसे मिट्टी से दबा देते और खूब जोर-जोर से हँसते हुए गायब हो जाते। डा टर बचाओ-बचाओ चीखता रहता लेकिन उसकी मदद को कोई न आता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेल में रह कर इस तरह के सपने देखकर कुलदीप लगभग पागल ही हो गया। वह जेल में ही रह-रह कर चीखने लगा कि हां, मैं कुड़ीमार हूँ...। मैं कुड़ीमार हूँ...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी जेल में जब उसकी बेटियां और पत्नी उससे मिलने जातीं तो वह कहता -मुझे देखने मत आया करो। मैं पापी हूँ। हत्यारा हूँ। इतना कहकर रो पड़ता। उसकी बेटियां भी रोतीं और पत्नी भी। फिर वह संभलता और बेटियों से कहता कि तुम दोनों बेटी नहीं बेटा हो। तुम्हें यह साबित करना होगा। तुम्हारा बाप कायर निकला, लेकिन तुम अपनी मां की तरह बहादुर बनना। तुम्हें मेरे माथे पर लगे कलंक को धोना होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी बेटियों ने उसे निराश नहीं किया। दोनों पढ़ाई में अव्वल हैं। अपने दम पर पढ़ाई कर रही हैं। आज उनका एक सपना है। वह आश्वस्त हैं कि वे अपने सपने को जरूर साकार करेंगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेल से बाहर आने के बाद कुलदीप सिंह को यह जानकर बड़ी तसल्ली हुई। लेकिन जेल में अधिक चिंतन के कारण उसका मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया है। अकसर उसे लगता है कि कोई उसके कान के पास जोर-जोर से कुड़ीमार... कुड़ीमार... कह रहा है। वह बहुत देर तक इसे बरदाश्त करता है, लेकिन जब नहीं सह पाता तो चिल्ला पड़ता है कि हां-हां मैं कुड़ीमार...हूँ, मैं कुड़ीमार... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;---------------- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपर्क : ओमप्रकाश तिवारी, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमर उजाला, ए-५, एसएसजीसी, कपूरथला रोड, जालंधर-२१, पंजाब। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोबाइल : 09915027209&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ई-मेल : op.tiwari16@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-4701783478500797018?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' 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src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-8921858970898490182</id><published>2007-12-29T02:06:00.000+05:30</published><updated>2007-12-29T02:07:30.530+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='kahani'/><title type='text'>कहानी डर के साये में</title><content type='html'>कहानी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-ओमप्रकाश तिवारी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजय अपनी सीट पर लेटा एक पुस्तक पढ़ने में ध्यानमग्न था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- हिंदू, हिंदी, हिंदुस्तान। वह जोर से चीखा। विजय के हाथ से पुस्तक गिरते-गिरते बची। इधर-उधर देखा तो निगाह बोगी के दरवाजे पर खड़े व्यक्ति पर अटक गई। वहां एक भगवाधारी व्यक्ति हाथ में डंडा लिए और माथे पर श्रीराम नाम लिखी पट्टी बांधे खड़ा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- सब साले चोर हैं। नाली के कीड़े हैं। पूरे देश को गंदा करके रख दिया है। कहते हुए उसने डंडे से दरवाजे को पीटा तो विजय उठकर बैठ गया। विजय की दिलचस्पी किताब से हटकर उस व्यक्ति में हो गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- भगवान राम का मंदिर जरूर बनेगा। हिंदू, हिंदी, हिंदुस्तान, जिंदाबाद-जिंदाबाद। वह लगभग चीख रहा था। उसकी इस हरकत से डिब्बे में बैठे लोगों का ध्यान उसकी तरफ चला गया था। लगभग सभी उसी को देख रहे थे। उसकी हरकतों से विजय आशंकित हो गया। विजय की निगाह अपनी किताब पर पड़ी तो वह और डर गया...। किताब उसकी विचारधारा से मेल नहीं खाती थी। विजय ने सोचा यदि इसे पता चल गया तो...। कुछ भी कर सकता है। हाथ में डंडा है...। पता नहीं और भी कुछ लिए हो...। याद आया गुजरात का गोधरा ट्रेन कांड और उसके बाद की स्थितियां...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- साले झूठ बोलते हैं। पूरे देश में गंदगी फैला रखी है। मच्छर की तरह फैलते जा रहे हैं। बोगी से बाहर डंडे को लहराते हुए वह बोले जा रहा था। उसके पास खड़े लोग सहमे हुए थे। उसकी हरकतें 'पागल` जैसी लग रही थीं, लेकिन इस किस्म के 'पागलों` का क्या भरोसा? वे अपने 'पागलपन` में कुछ भी कर सकते हैं। विजय सोचकर ही डर गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच वह दरवाजा बंद करके चुपचाप फर्श पर बैठ गया। उसकी देखादेखी कुछ और लोग भी वहीं बैठ गए। विजय ने राहत की सांस ली। हालांकि विजय की आंखों से नींद भाग चुकी थी। अब उसका मन उस पुस्तक को पढ़ने में भी नहीं लग रहा था। उसे डर लग रहा था कि यदि उसने पुस्तक पढ़नी शुरू की और इस आदमी को पता चल गया तो...। एक अज्ञात आतंक उसके मन-मस्तिष्क पर हावी हो गया...। विजय को अतीत की एक घटना याद आने लगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कालेज पहुंचते ही पहली सूचना जो मिली वह यह थी कि किसी मुसलमान ने अवध बिहारी चौबे की पालतू नीलगाय को गोली मार दी है। धीरे-धीरे कालेज का माहौल गरमा गया और दो पीरियड भी पढ़ाई नहीं हुई थी कि कालेज के प्रांगण में एक पे़ड में टंगी घंटी किसी ने टन-टना दी...। इसका मतलब था आज की छुट्टी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्लास से बाहर निकलते छात्र कह रहे थे कि नीलगाय का मतलब गाय होता है.... गाय हमारी माता है...हम इसकी पूजा करते हैं...उसे एक कटुए ने मांस खाने के लिए मार डाला... उस कटुए को छो़ड़ना नहीं है....हां, नहीं छोड़ना है...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह ऐसा समय था जब स्कूलों-कालेजों में भी कई बार साधु-संतों और पंडितों ने गाय की महत्ताा को बताया था...। सत्यनारायण भगवान की कथा हो, तो गाय का दूध ही खोजा जाता...। जिस घर में गाय न हो वह मांग कर, खरीदकर व्यवस्था करता, लेकिन करता जरूर। इसलिए छात्रों का उद्वलित होना स्वाभाविक लग रहा था...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छात्रों में गुस्सा ही नहीं यह नफरत भी दिख रही थी कि एक मुसलमान ने उनकी पूज्यनीय गाय माता की नस्ल की नीलगाय की हत्या कर दी है...। वह भी मांस खाने के लिए.... यह अपराध है...। कटुए ऐसा क्यों करते हैं...? कभी हमारे आराध्य देव भगवान श्रीराम की जन्मभूमि हड़प लेते हैं..., तो कभी हमारी पूज्यनीय गाय माता को मांस खाने के लिए मार डालते हैं...। इन्हें सबक सिखाना ही होगा...। कई छात्रों ने सार्वजनिक घोषणा कर दी...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छात्रों की भीड़ कालेज प्रांगण से निकलकर समसुद्दीन की आटा चक्की की तरफ बढ़ने लगी। आगे-आगे बजरंगी और उसके साथी नारे लगाते हुए चल रहे थे। बाजार के दुकानदार फटी आंखों से छात्रों के बढ़ते हुजूम को देख रहे थे। उनकी आंखों में एक ही सवाल था कि क्या हो गया? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अवध बिहारी चौबे के चरित्र से सभी परिचित थे। वह पिछले पांच सालों से बारहवीं में पढ़ रहा है। लोग यह भी कहते कि वह कालेज केवल बदमाशी करने के लिए आता है। उसका नाम भी इस कालेज में नहीं है। वह प्राइवेट पढ़ रहा है। कालेज रोज आता है और हर दिन किसी न किसी से उसकी मारपीट होती है। लगभग ऐसा ही हाल उसके साथियों का भी है। आज ही नहीं, उसने इससे पहले भी कई बार कालेज की घंटी बजाई है। शिक्षक ही नहीं, प्रधानाचार्य तक खड़े देखते रहे गए। उसके पिता किसी हिंदू संगठन के बड़े नेता हैं। वे बड़ी पहुंच वाले हैं। भगवान श्रीराम के भक्त हैं। श्रीराम मंदिर आंदोलन के लिए सक्रिय हैं। जो कहते हैं, वह होकर रहता है...। लोग उन्हें पूजने की हद तक चाहते हैं...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छात्रों की भीड़ जैसे ही समसुद्दीन की आटा चक्की पर पहुंची तो तोड़फोड़ शुरू हो गई। आटा चक्की पर कोई आदमी नहीं मिला तो भीड़ ने वहां लगे आम-अमरूद, नींबू और केले के पेड़ों को तहस-नहस कर डाला। पेड़ों की एक-एक डाल तो़ड़ डाली। आटा-चक्की तो़ड़ डाली। मोटर को उखाड़ कर फेंक दिया। इसी धमाचौकड़ी में एक छात्र घायल हो गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसे चोट कैसे लगी? कई छात्रों ने एक साथ पूछा। एक छात्र जो उसके साथ था, बताने लगा कि अमरूद की डाल तोड़ते समय उसका हाथ फिसल गया और वह जमीन पर गिर पड़ा। गिरते समय अमरूद की कोई टूटी डाल उसके पेट में घुस गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- चुपकर, क्या बकवास करता है। इसे गोली लगी है। चौबे दौ़ड़कर उस लड़के के पास आया और बताने वाले लड़के को डांटते हुए कहा। घायल लड़के के जख्म से खून बह रहा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- लेकिन गोली की आवाज तो सुनाई नहीं दी? कइयों ने शंका व्यक्त की तो चौबे ने कहा कि नजदीक से गोली मारी गई है। साइलेंसर लगाकर... इसीलिए सुनाई नहीं दी। मैंने उसे गोली मारते देखा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- फिर पकड़ा क्यों नहीं? कइयों ने प्रश्न किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- कोशिश की पर वह भाग निकला। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- किधर गया? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- उधर। बजरंगी ने सामने जंगल की तरफ इशारा किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- पहले इसे अस्पताल तो ले चलो। किसी ने कहा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- नहीं, इसे पहले थाने ले चलते हैं। इसकी रिपोर्ट लिखवानी होगी। यह पुलिस केस है। चौबे ने कहा और घायल छात्र को लेकर अपने दो दोस्तों की मदद से उठाकर थाने की तरफ चल पड़ा। वह तांगे पर बैठा जख्मी छात्र को लेकर जा रहा था। पीछे-पीछे छात्रों का हुजूम चल रहा था। देखने वाले हैरान थे। लोगों को जब यह पता चला कि समसुद्दीन ने एक छात्र को गोली मार दी है तो किसी अनहोनी की आशंका से सहम गए...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक जोरदार झटके के साथ ट्रेन रुक गई। उसने दरवाजा खोल लिया था। स्टेशन के प्लेटफार्म पर एक दाढ़ी वाले को देखकर वह चीखा था कि सालों ने देश पर कब्जा कर रखा है। इन्हें देश से खदेड़ना ही होगा। हिंदू, हिंदी, हिंदुस्तान। जिंदाबाद-जिंदाबाद। उसने डंडे को दरवाजे पर पीटते हुए नारा लगाया। विजय उसे देखने लगा। विजय को आश्चर्य हो रहा था कि उसकी इस हरकत से सभी यात्रियों को परेशानी हो रही थी, लेकिन कोई कुछ नहीं बोल रहा था...। इसी बीच ट्रेन फिर चल पड़ी। इसी के साथ चल पड़ी विजय की अतीत की ट्रेन...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थाने पहुंचने तक घायल लड़का बेहोश हो गया था। दारोगा ने रिपोर्ट लिख ली और घायल छात्र को अस्पताल भिजवा दिया। लेकिन चौबे इससे संतुष्ट नहीं हुआ। वह इस बात पर अड़ गया कि समसुद्दीन को गिरफ्तार किया जाए। इस पर दारोगा भी अड़ गया। उसका कहना था कि रिपोर्ट लिख ली है, गिरफ्तारी भी हो जाएगी। पहले लड़के का उपचार तो हो जाए। उसका बयान लेना जरूरी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- उसका बयान लेना क्यों जरूरी है? जब हम कह रहे हैं कि उसे समसुद्दीन ने गोली मारी है, तो मारी है। चौबे ने अपनी जिद के पक्ष में तर्क दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- यह सब तो ठीक है, लेकिन घायल लड़के का बयान जरूरी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- तो आप उसे गिरफ्तार नहीं करेंगे? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- मैंने इनकार तो नहीं किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- नहीं, आप उसकी तरफदारी कर रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- मैं उसकी तरफदारी क्यों करूंगा? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- क्योंकि आप भी मुसलमान हैं और वह भी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- आपको गलतफहमी हो गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- गतलफहमी तो आपको हो गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- क्या तुम बता सकते हो कि समसुद्दीन ने उसे गोली क्यों मारी? दारोगा कड़ककर बोला। तुम लोग उसकी चक्की पर क्या करने गए थे? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- उसने मेरी गाय की हत्या की है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- अच्छा, अब गाय भी मार डाला उसने! जब गाय को मारा तो तुमने उसकी रिपोर्ट क्यों नहीं लिखवाई? रिपोर्ट लिखवाई नहीं और खुद ही बदला लेने चले गए। ऐसी बदमाशी नहीं चलेगी। दारोगा ने कहा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- मैं तुझे अच्छी तरह से जानता हूं। तू भी कटुआ है इसलिए एक कटुए की तरफदारी कर रहा है। चौबे सीधा तू-तड़ाक पर आ गया। वह कुर्सी से उठा और जिस झोपड़ी के नीचे दारोगा बैठा था उसमें जाने का प्रयास किया, लेकिन संख्या में कम होने के कारण उसने मूकदर्शक बनना ही बेहतर समझा। इस बीच चौबे एंड पार्टी ने थाने का फोन काट दिया, लेकिन तब तक दारोगा घटना की जानकारी पुलिस अधीक्षक को दे चुका था। बजरंगी के चेलों ने इस बीच आसपास के इंटर कालेजों को भी इसकी सूचना दे दी थी। लिहाजा वहां के छात्र भी कालेज की घंटी टन-टनाकर मैदान में आ डटे थे। इससे थाने के चारों तरफ छात्र ही छात्र नजर आ रहे थे। उनमें से अधिकतर छात्र अपना धर्म ही निबाह रहे थे। कई केवल मजा ले रहे थे। कई अपने घरों को चले गए। कई इस जिज्ञासा में रुक गए कि आगे क्या होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छात्र जब थाने में तो़ड़फोड़ कर रहे थे तो दारोगा ने कई बार गोली चलाने और लाठीचार्ज की धमकी दी, लेकिन छात्रों की संख्या को देखते हुए उसकी हिम्मत नहीं हुई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौबे एंड पार्टी थाने पर अपनी जीत का जश्न मना ही रही थी कि पीएसी की दस गाड़ियां आ गईं। उसमें से धड़ाधड़ पीएसी के जवान उतरने लगे। छात्रों की भीड़ ने उनकी तरफ देखा और हंगामा करने में व्यस्त हो गई। चूंकि जवानों की संख्या अब भी कम थी इसलिए वे कुछ करने की बजाए केवल छात्रों की हरकतों को देखते रहे। दस मिनट बाद ही पीएसी की दस गाड़ियां और आ गईं और उनके साथ ही आ गए एसपी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक भद्दी गाली के साथ उसने फिर डिब्बे के दरवाजे पर डंडा मारा था। जिसकी आवाज से विजय चौंक गया। पलट कर देखा तो वह गेट खोलकर इधर-उधर के छड़ को पकड़े खड़ा था और जो मन में आ रहा था बोले जा रहा था। इतना साफ था कि वह एक समुदाय विशेष के प्रति अपनी घृणा व्यक्त कर रहा था। - सनकी कहीं का। विजय ने मन ही मन कहा औ फिर करवट बदलकर लेट गया। नींद तो उसे आनी नहीं थी इसलिए वह फिर अतीत के सूत्रों को जोड़ने लगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एसपी ने जीप के नीचे पैर रखा ही था कि किसी ने उन्हें गाली दे दी, लेकिन एसपी ने उसे सुना-अनसुना कर दिया। पहले छात्रों की भीड़ की तरफ देखा, फिर जवानों की तरफ और चुपचाप थाने के अंदर चला गया। जैसे ही एसपी दारोगा के पास पहुंचा छात्रों की गिरफ्तारी का आदेश दे दिया। आदेश मिलते ही पुलिस हरकत में आ गई और छात्रों की धरपकड़ शुरू हो गई। गिरफ्तारी के भय से आतंकित छात्रों ने इंट-पत्थरों को अपना हथियार बना लिया और लगे पुलिस जवानों पर बरसाने। ऐसा होते ही पुलिस वाले पीछे हटने लगे तो एसपी ने लाठीचार्ज का आदेश दे दिया। फिर क्या था, पुलिस वाले आंख बंद करके लगे लाठियां बरसाने। अंधाधुंध पिटाई से भयभीत छात्रों ने भागना शुरू कर दिया। साथ ही वे इंर्ट और पत्थर भी फेंकते रहे। इस प्रक्रिया में कभी पुलिस वाले छात्रों को खदेड़ते तो कभी छात्र पुलिस वालों को रपट लेते। यह खेल लगभग दो घंटे तक चलता रहा। इस बीच जब छात्र पुलिस वालों पर हावी होने लगे तो एसपी ने हवा में फायरिंग कर दी। गोली चलने की आवाज से छात्र सहम गए। वे खेतों की तरफ भागे, लेकिन कुछ छात्र अब भी पुलिस वालों से जूझ रहे थे। इसी बीच एक छात्र को गोली लगी और वह तड़प कर ढेर हो गया...। चौबे चीख-चीखा कर कहने लगा कि पुलिस ने हमारे एक साथी को मार डाला। हम इसका बदला लेंगे। कई और छात्रों ने उसके सुर में सुर मिलाया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एसपी ने इस बात का खंडन किया। उसने ऐलान किया कि इसकी जांच की जाएगी और दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। उसके इस बयान से भी छात्र शांत नहीं हुए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौबे कह रहा था कि खून का बदला खून। जिस पुलिस वाले ने गोली मारी है, उसे भी गोली मारी जाए। उसके साथ कई और छात्रों ने एक साथ कहा कि हां, गोली मारी जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एसपी ने छात्रों की गिरफ्तारी का आदेश दे दिया। पुलिस वाले छात्रों को पकड़-पकड़ कर जीप में डालने लगे। उनके हत्थे जो भी छात्र चढ़ता उसे वह उठाकर सीधे गाड़ी में फेंक देते। उनकी इस हरकत को देखकर कई छात्र भाग खड़े हुए। बाकी छात्रों ने पथराव तेज कर दिया। पुलिस वाले भी आरपार की सोचकर पिल पड़े। इस प्रक्रिया में जहां कई छात्र घायल हो गए, वहीं कई पकड़े गए। पथराव में कई पुलिस वाले भी घायल हुए। इस बीच चौबे एंड पार्टी गिरफ्तार हो चुकी थी और बहुत सारे छात्र दूर खड़े होकर तमाशा देखने लगे। इसके बाद छात्रों और पुलिस में मुश्किल से दस मिनट संघर्ष हुआ। जिन्होंने तेजी दिखाई पकड़े गए और जिन्होंने समझदारी दिखाई वह अपने घर चले गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन के हंगामे के बाद किसी भी गड़बड़ी की आशंका को देखते हुए तीनों कालेजों को तीन दिन के लिए बंद कर दिया गया। चौथे दिन विजय जब कालेज गया तो पता चला कि गिरफ्तार किए गए छात्र जमानत पर छूट गए हैं, लेकिन पुलिस ने इतना पीटा है कि वह कई दिन तक कालेज आने की स्थिति में नहीं हैं। दूसरी जानकारी यह मिली कि समसुद्दीन की चक्की पर जो छात्र घायल हो गया था, उसकी मौत हो गई है। वह अपने मां-बाप का इकलौता था। यह भी पता चला कि समसुद्दीन की गिरफ्तारी तो हुई, लेकिन वह जमानत पर छूट गया। हां, दारोगा को निलंबित कर दिया गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी पता चला कि समसुद्दीन ने नीलगाय को गोली नहीं मारी थी। बजरंगी और समसुद्दीन का खेत अगल-बगल में हैं। चौबे की पालतू नीलगाय अँसर समसुद्दीन के खेत को चर (खा) जाती थी। उसने इस बात का विरोध किया तो दोनों में तकरार हो गई। आर्थिक रूप से समसुद्दीन चौबे पर भारी था। इस कारण चौबे उससे जलता था। जब तकरार हो गई तो चौबे ने समसुद्दीन को सबक सिखाने की ठान ली। उस दिन जब उसकी पालतू नीलगाय समसुद्दीन के खेत में चर रही थी तो चौबे ने नीलगाय को गोली मार दी...। अगले दिन कालेज आकर हंगामा कर दिया...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कालेज में यह बात भी दबी जुबान चर्चा में थी कि थाने में प्रदर्शन के दौरान गोली से मरने वाला छात्र पुलिस की गोली से नहीं, बल्कि चौबे की गोली से मरा था...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- अपना टिकट दिखाओ। किसी ने तेज आवाज में कहा तो विजय ने उसकी तरफ देखा। सामने टीटीई था, जो उस भगवाधारी से टिकट मांग रहा था, लेकिन उसके पास टिकट नहीं था। इसके बदले वह कोई पास दिखा रहा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- नहीं, नहीं, यह नहीं चलेगा। टीटीई गुस्से में कह रहा था। वह टीटीई को समझाने का प्रयास कर रहा था। कई धार्मिक बातों का भी उल्लेख कर रहा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- तुऔहारी यही दिक्कत है। बनते देशभक्त हो और काम गैरकानूनी करते हो। ऊपर से शोर भी मचाते हो। आज तो छोड़ रहा हूं, लेकिन ध्यान रखना, आगे से नहीं छोडूंगा। टीटीई ने उसे चेतावनी देकर बाकी के लोगों का टिकट चेक करने लगा। विजय अपनी सीट पर लेट गया। थोड़ी देर बाद उसे नींद आ गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सपने में वह देखता है कि ट्रेन में आग लग गई है। ट्रेन में चीख-पुकार मच गई है। सभी अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे हैं। कई लोग जिंदा जल रहे हैं, तो कई लोगों ने प्राण रक्षा के लिए ट्रेन से छलांग लगा दी। विजय भी आग की लपटों में घिर गया है। उसके मुंह से जोर की चीख निकल पड़ती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंख खुलने पर वह देखता है कि कोई उसे जगा रहा है। उसके दिल की धड़कनें तेजी से धड़क रही हैं और वह पसीने से तर-बतर है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ट्रेन तड़तड़ाती हुई भागी जा रही थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात के नौ बजे थे। सवारियां अपनी-अपनी सीट पर पसर चुकी थीं। जिनके साथ बच्चे थे, वह महिला सोने को जा रही थी। विजय की निगाहें भगवाधारी व्यक्ति को खोजने लगी...। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-----------समाप्त ------------- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपर्क : ओमप्रकाश तिवारी, अमर उजाला, ए-५, स्पोर्ट्स एंड सर्जिकल काम्प्लेक्स, कपूरथला रोड, जालंधर-१४४००२१, पंजाब &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोबाइल : 09915027209&lt;br /&gt;op.tiwari16@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5172670250437792486-8921858970898490182?l=katha-kahani.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://katha-kahani.blogspot.com/feeds/8921858970898490182/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5172670250437792486&amp;postID=8921858970898490182' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/8921858970898490182'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5172670250437792486/posts/default/8921858970898490182'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://katha-kahani.blogspot.com/2007/12/blog-post_6289.html' title='कहानी डर के साये में'/><author><name>ओमप्रकाश तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14790859884634428056</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/-8gjQs64T3o4/Tq2YcI0p6QI/AAAAAAAAAKI/0CizML-vmkM/s220/op%2Btiwari.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5172670250437792486.post-3929516591670557804</id><published>2007-12-28T23:08:00.000+05:30</published><updated>2007-12-28T23:09:57.272+05:30</updated><title type='text'>कहानी - एक लड़की पहेली सी</title><content type='html'>कहानी - एक लड़की पहेली सी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- ओमप्रकाश तिवारी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टाइपिंग कोचिंग सेंटर में विजय का पहला दिन था। वह अपनी सीट पर बैठा टाइप सीखने के लिए नियमावली पुस्तिका पढ़ रहा था। तभी उसकी निगाह अपने केबिन के गेट की तरफ गई। गाय की आंख जैसी कजरारे नयनों वाली एक सांवली उसी केबिन में आ रही थी। वह देखता ही रह गया। लड़की उसकी बगल वाली सीट पर आ कर बैठ गई। टाइप राइटर को ठीक किया और टाइप करने में मशगूल हो गई। लेकिन विजय का मन टाइप करने में नहीं लगा। वह किसी भी हालत में लड़की से बातें करना चाह रहा था। वह टाइप राइटर पर कागज लगाकर बैठ गया और लड़की को निहारने लगा। लड़की की अंगुलियां टाइप राइटर के की-बोर्ड पर ऐसे पड़ रही थीं जैसे वह हारमोनियम बजा रही हो। थोड़ी देर बाद लड़की को विजय की इस हरकत का एहसास हुआ तो वह गुस्से में बोली।&lt;br /&gt;- क्या देख रहे हो?&lt;br /&gt;- आपको टाइप करते हुए देख रहा हूं।&lt;br /&gt;- यहां क्या करने आए हो? उसका स्वर तल्ख था।&lt;br /&gt;- टाइप सीखने। बिल्कुल सहज जवाब था विजय का।&lt;br /&gt;- ऐसे सीखोगे? लड़की के स्वर में तल्खी बरकरार&lt;br /&gt;- मेरा आज पहला दिन है न, इसलिए मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है। आप टाइप कर रहीं थीं तो मैं देखने लगा कि आपकी अंगुलियां कैसे पड़ती हैं की-बोर्ड पर।&lt;br /&gt;- कैसे पड़ती हैं?&lt;br /&gt;- लगता है जैसे आप हारमोनियम बजा रही हों। आपको टाइप करते देखकर लगा कि मैं भी सीख जाऊंगा।&lt;br /&gt;- यदि इसी तरह मुझे ही देखते रहे तो आपकी यह मनोकामना कभी पूरी नहीं होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़की फिर टाइप करने में जुट गई। विजय भी की-बोर्ड देखकर टाइप करने लगा। टाइप करने में उसका मन नहीं लग रहा था। वह बेचैनी महसूस कर रहा था। उसका मन लड़की को निहारने को ही कह रहा था। वह चोर निगाहों से उसे देख भी लेता। दस मिनट बाद ही उसने टाइप राइटर का रिबन फंसा दिया। वह उसे ठीक करने लगा पर ठीक नहीं कर पाया। हार कर बैठ गया&lt;br /&gt;- क्या हुआ?&lt;br /&gt;- रिबन फंस गया। ए&lt;br /&gt;- रिबन तो फंसेगा ही जब ध्यान कहीं और हाथ कहीं और होगा तो।&lt;br /&gt;- मैं तो टाइप ही कर रहा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़की उसके टाइप राइटर को थोड़ा अपनी ओर खींचकर रिबन ठीक करने लगी। इसी बीच रिबन नीचे गिर गया। वह उसे उठाने के लिए झुकी तो उसके गले से चुन्नी गिर गई। रिबन उठाने के लिए विजय भी झुका था। उसकी निगाह अकस्मात ही लड़की के उरोजों पर चली गई। लड़की ने भी विजय की इस हरकत को देखा और उठकर फिर से रिबन ठीक करने लगी। विजय के चेहरे पर पसीना चुहचुहा आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- लो, ठीक हो गया। लड़की ने कहा तो उसकी चेतना लौटी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़की फिर टाइप करने में लग गई। लेकिन विजय का मन टाइप में बिल्कुल भी नहीं लगा। वह लड़की से बात करने की ताक में ही लगा रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- मन नहीं लग रहा है? अचानक लड़की ने उससे पूछा तो उसकी बांछें खिल गईं। उसने सोचा कि आप जैसी खूबसूरत लड़की बगल में बैठी हो तो टाइप करने में किसका मन लगेगा, लेकिन वह सोचकर ही रह गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- नहीं और लगता है कि सीख भी नहीं पाऊंगा।&lt;br /&gt;- आसार तो कुछ ऐसे ही दिखते हैं।&lt;br /&gt;- आपका नाम?&lt;br /&gt;- सरिता।&lt;br /&gt;- अच्छा नाम है।&lt;br /&gt;- लेकिन मुझे इस नाम से नफरत है।&lt;br /&gt;- क्यों?&lt;br /&gt;- कोई एक कारण हो तो बताएं। यह कहते हुए सरिता अपनी सीट से उठी और पर्स कंधे पर टांगते हुए केबिन से बाहर निकल गई। विजय उसे जाते हुए देखता रहा। सरिता के जाने के बाद उसने एक निगाह उसके टाइप राइटर पर डाली। टाइप राइटर उसे उदास लगा। विजय को लगा कि उसकी उदासी उस पर भी तारी होती जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और दुनिया बदल गई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी दिन से विजय हवा में उड़ने लगा। रातों को छत पर घूमने लगा। तारे गिनता और आसमान से बातें करता। चांदनी रात अच्छी लगने लगी और उसमें बैठकर कविताएं लिखता। गर्मी की धूप उसे गुनगनी लगने लगी। दुनिया गुलाबी हो गई तो जिंदगी गुलाब का फूल। आंखों से नींद गायब हो गई। वह ख्यालों ही ख्यालों में पैदल ही कई-कई किलोमीटर घूम आता। अपनी इस स्थिति के बारे में उसने अपने एक दोस्त को बताया तो उसने कहा -गुरु, तुम्हें प्यार हो गया है। दोस्त की बात सुनकर उसे लगा कि दोस्त ने उसके दिल की बात कह दी। उसे अच्छा लगा। वह दोस्त को देखकर मुस्कराने लगा और बड़ी देर तक मुस्कराता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन विजय ने सरिता से कहा कि आप पर एक कविता लिखी है। चाहता हूं कि आप इसे पढें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- यह भी खूब रही। जान न पहचान। तू मेरा मेहमान। कितना जानते हैं आप मुझे?&lt;br /&gt;- जो भी जानता हूं उसी के आधार पर लिखा हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरिता उसकी लिखी कविता पढ़ने लगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरिता,&lt;br /&gt;कल-कल करके बहने वाली जलधारा&lt;br /&gt;लोगों की प्यास बुझाती&lt;br /&gt;किसानों के खेतों को सींचती&lt;br /&gt;राह में आती हैं बहुत बाधा&lt;br /&gt;फिर भी मिलती है सागर से&lt;br /&gt;उसके प्रेम में सागर&lt;br /&gt;साहिल पर पटकता है सिर&lt;br /&gt;उनके प्रेम की प्रगाढ़ता का प्रमाण&lt;br /&gt;पूर्णमासी की रात में&lt;br /&gt;उठने वाला ज्वार-भाटा&lt;br /&gt;सरिता है तो सागर है&lt;br /&gt;सरिता के बिना रेगिस्तान हो जाएगा सागर&lt;br /&gt;सागर के प्रेम में&lt;br /&gt;सरिता लांघती है पहाड़, पठार&lt;br /&gt;और मानव निर्मित बाधाओं को&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता के नीचे उसने विजय की जगह सागर लिखा था। सरिता ने उसे देखा और मुस्कराते हुए कागज विजय की तरफ बढ़ा दिया। विजय ने उसके चेहरे को देखते हुए कहा कि मैं चाहता हूं कि आप इसे टाइप कर दें। इसे छपने के लिए भेजना है। सरिता कुछ नहीं बोली। कागज को सामने रखकर टाइप करने लगी। विजय उसे देखता रहा। इस बात का आभास सरिता को भी था कि विजय उसे ही देख रहा है, लेकिन उसने कोई विरोध करने के बजाए पूछा कि आप कवि हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- बनने की कोशिश कर रहा हूं।&lt;br /&gt;- कवि भगोड़े होते हैं। सरिता ने उसकी ओर देखते हुए कहा। उसकी इस टिप्पणी से विजय सकपका गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- कवि अपने सुख के लिए कविता का सृजन करता है। रचते समय वह कविता के बारे में सोचता है। उसके बाद वह कविता को उसके हाल पर छोड देता है। कविता जब संकट में होती है तो कवि कविता के पक्ष में खड़ा नहीं होता है। वह भाग खड़ा होता है दूसरी कविता की रचना करने के लिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- यह आप कैसे कह सकती हैं&lt;br /&gt;- मैं समझती हूं कि आदमी की जिंदगी भी एक कविता है। मेरी जिंदगी एक कविता है। मेरी जिंदगी मुझे अच्छी नहीं लगती। इसलिए कविता भी मुझे अच्छी नहीं लगती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजय अवाक । सरिता चुप हुई तो उसने कहा-अरे वाह, आप तो कवि हैं। अभी आपने जो कहा वह तो कविता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- कविता नहीं, कविता का प्रलाप है, उसकी वेदना।&lt;br /&gt;- कवि वेदना ही तो व्यक्त करता है।&lt;br /&gt;- लेकिन यह कविता की वेदना है। जो उस कवि के कारण उपजी है, जिसने मेरी जिंदगी की रचना की। इतना कह कर सरिता केबिन से बाहर चली गई। कैसी है यह? विजय ने सरिता के टाइप राइटर को देखा। कुछ देर पहले जहां से उसे संगीत की सरिता बह रही थी, अब वहां मुर्दानी शांति पसर गई थी। लगा जैसे टाइप राइटर किसी शोक गीत की रचना में मशगूल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यार की खुशबू&lt;br /&gt;आज उन्होंने बातें अधिक कीं। उनके वार्तालाप को देखकर टाइपिंग इंस्टीटयूट चलाने वाली मैडम ने उनके पास आकर कहा -आजकल तो तुम काफी खुश हो सरिता। बदले में सरिता केवल मुस्कराई। विजय भी मुस्कराया। तो क्या मेरे प्यार की गंध इसे भी लग गई। प्यार होता ही ऐसा है। जब महकता है तो सरी सीमाएं तोड़कर पूरे परिवेश में अपनी खुशबू बिखेर देता है। विजय ने सोच&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन सरिता जब टाइपिंग इंस्टीटयूट आई तो काफी सजीधजी थी। नया गुलाबी सूट पहने थी। बालों की स्टाइल भी बदली हुई थी। विजय को सरिता का यह बदला रूप बेहद प्यारा लगा। वह अपनी भावनाओं को दबा नहीं पाया। बोला- काफी सुंदर लग रही हो। जवाब में जब सरिता ने मुस्कराते हुए थैंक्यू का फूल उसकी तरफ फेंका तो उसकी इच्छा हुई कि वह खड़ा होकर नाचने लगे और जोर-जोर से चिल्लाए कि उसे प्यार हो गया है। अपनी इस 
